विचार/लेख
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन का जैसा व्यापक असर पड़ रहा है, वैसा ही असर प्रकाश प्रदूषण का भी हैI इससे जन्तुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों में हॉर्मोन के स्तर पर बदलाव आ रहे हैं, प्रजनन चक्र अनियमित होता जा रहा है और व्यवहार तक बदल रहा हैI
- महेन्द्र पांडे
वैज्ञानिक लम्बे समय से बता रहे हैं कि अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश भी एक तरह का प्रदूषण हैI इससे रात में आसमान में तारे दिखने बंद हो जाते हैं, उपग्रहों से रात में पृथ्वी का चित्र लेने में बाधा पड़ रही है और साथ ही बिजली की बर्बादी भी हो रही हैI पर, हाल में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार इस प्रकाश प्रदूषण का मानव के साथ ही जीव-जन्तुओं पर भी व्यापक असर पड़ रहा हैI वैज्ञानिकों के अनुसार यह असर इतना व्यापक है कि अब प्रकाश प्रदूषण को भी जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि और प्रजातियों के विनाश जैसी समस्याओं के समकक्ष रखने की जरूरत हैI
पहले बिजली का उपयोग केवल घरों को रोशन करने के लिए किया जाता था, फिर बाद में सड़कें, सार्वजनिक स्थल, बड़े कार्यालय और भवन, स्टेडियम, उद्योग, ऐतिहासिक स्थल, नदी का किनारा, समुद्र का किनारा और बाजार में भी रात भर बिजली जली रहती हैI अब तो शहरों को रात में भी दिन जैसा प्रकाश में डुबोने की होड़ लग गई हैI प्रकाश की तीव्रता भी बढ़ती जा रही हैI इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि जब हम सडकों, रेल या विमान से यात्रा करते हैं, तब आसमान में फैली रोशनी से यह अनुमान लगा लेते हैं कि अब कोई शहर आने वाला हैI
कहीं भी प्रकाश आसमान में फैलाने के लिए नहीं किया जाता, फिर भी यह वायुमंडल में फैलता है, और यही प्रकाश प्रदूषण हैI प्रकाश के प्रभाव का उदाहरण भी हमारे सामने सामान्य तौर पर आता हैI बारिश के मौसम में कीट-पतंगे प्रकाश के चारों तरफ उड़ते हैं और सुबह तक जलते बल्ब की गर्मी से मर जाते हैंI प्रकाश प्रदूषण के कारण कीटों की अनेक प्रजातियां विलुप्तीकरण के कगार पर हैंI
मानव निर्मित प्रकाश का दायरा और तीव्रता प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत की दर से बढ़ रही हैI यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सटर के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन का जैसा व्यापक असर पड़ रहा है, वैसा ही व्यापक असर प्रकाश प्रदूषण का भी हैI इससे जन्तुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों में हॉर्मोन के स्तर पर परिवर्तन आ रहे हैं, प्रजनन चक्र अनियमित होता जा रहा है, व्यवहार बदल रहा है और शिकारियों की चपेट में आसानी से आ रहे हैंI जिस तरह प्रकाश में मनुष्यों को सोने में दिक्कत आती है, उसी तरह पूरे जीव जगत पर प्रभाव पड़ रहा हैI पृथ्वी पर जीवन में दिन और रात के अंधेरे का व्यापक प्रभाव है और पूरे जीव जगत का विकास इसी आधार पर हुआ हैI
इस अध्ययन को जर्नल ऑफ नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन के नए अंक में प्रकाशित किया गया हैI इस अध्ययन का आधार प्रकाश प्रदूषण का जीव जगत पर पड़ने वाले प्रभावों से संबंधित दुनिया भर में प्रकाशित 126 शोधपत्र हैंI इसके अनुसार प्रकाश प्रदूषण का सबसे गहरा प्रभाव कीट जगत पर पड़ रहा हैI यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि दुनिया भर में जीव जगत में विलुप्तीकरण का सबसे अधिक खतरा कीट-पतंगों को ही हैI बहुत सारे कीट केवल रात में उड़ते हैं और अपनी गतिविधियों के दौरान अनेक फूलों का परागण करते हैंI जब ये कीट परागण नहीं करते तो फिर फसलों का उत्पादन या फिर वनस्पतियों का विस्तार प्रभावित होता हैI दूसरी तरफ, अनेक कीट सडकों के किनारे की रोशनी के चारों-तरफ रात भर उड़ते हुए बल्ब की गर्मी में झुलस कर मर जाते हैंI रात भर तेज प्रकाश झेलने वाले वनस्पतियों में फूल खिलने का, फल लगने का समय बदल जाता हैI
लम्बी दूरी तय करने वाले प्रवासी पक्षियों पर भी प्रकाश प्रदूषण का व्यापक असर होता हैI रात में ये पक्षी शहरों की रोशनी से चकमा खाकर अपना रास्ता भटक जाते हैं, या फिर शहरों की इमारतों से टकराकर मर जाते हैंI समुद्री कछुवे भी सागर तट के रिसोर्ट के प्रकाश से आकर्षित होकर उसकी तरफ जाते हैं और फिर भूख-प्यास से मर जाते हैं या वन्यजीवों के तस्करों की गिरफ्त में आ जाते हैंI
सभी जन्तुओं में रात की रोशनी के प्रभाव से मेलाटोनिन नामक हार्मोन का उत्सर्जन प्रभावित होता हैI यही हार्मोन शरीर में निद्रा-चक्र को नियंत्रित करता हैI रात में अत्यधिक प्रकाश के कारण निशाचर के साथ ही अन्य जंतुओं का व्यवहार भी बदलने लगता हैI इसके प्रभाव से पक्षी सुबह जल्दी चहकने लगते हैं और रात में निकलने वाले चूहे या अन्य जानवर बाहर कम समय के लिए निकलते हैंI
जून 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी अब रात के आसमान में आकाश-गंगा नहीं देख पातीI अमेरिका की 80 प्रतिशत से अधिक और यूरोप की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी ने कभी आसमान में आकाशगंगा को देखा ही नहीं हैI इसका एकमात्र कारण प्रकाश प्रदूषण है, जिसके कारण अब रात के आसमान में बहुत सारे खगोलीय पिंड दिखना बंद हो चुके हैंI
अनुमान है कि प्रकाश प्रदूषण के कारण कुल बिजली की खपत का लगभग 35 प्रतिशत बर्बाद हो रहा है, और बिजली उत्पादन को ही जलवायु परिवर्तन का मुख्य जिम्मेदार माना जाता हैI प्रदूषण के इस स्वरुप के प्रभावों का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि रात में कीटों द्वारा की जाने वाली परागण प्रक्रिया में लगभग 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई हैI कुछ कोरल रीफ की प्रजातियों के प्रजनन प्रक्रिया के लिए चांद की रोशनी अनिवार्य है, पर अब चांद की रोशनी मानव निर्मित प्रकाश से दब जाती है, इसलिए इन प्रजातियों का प्रजनन प्रभावित हो रहा हैI
प्रकाश प्रदूषण के तीन मुख्य कारण हैं- बिना ढके प्रकाश के स्त्रोत, प्रकाश का अवांछित अतिक्रमण और शहरी सडकों और भवनों का प्रकाशI वायु प्रदूषण, विशेष तौर पर पार्टिकुलेट मैटर की वायु में अधिक सांद्रता भी प्रकाश प्रदूषण में सहायक हैI कोहरे या धूम कोहरा की स्थिति में प्रकाश दूर तक फैलता नजर आता है और इस कारण प्रकाश प्रदूषण बढ़ता हैI जर्नल ऑफ नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार प्रकाश प्रदूषण का असर पूरे जीव जगत पर पड़ रहा है, इसमें सूक्ष्मजीव, अरीढ़धारी जंतु, रीढ़धारी, मनुष्य और वनस्पति सभी शामिल हैंI कुछ प्रजातियों में इनका लाभदायक असर भी स्पष्ट हो रहा हैI कुछ वनस्पतियों में प्रकाश प्रदूषण के असर से वृद्धि दर में तेजी देखी जा रही है और चमगादड़ों की कुछ प्रजातियों का दायरा बढ़ रहा हैI
यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सटर के एनवायर्नमेंटल सस्टेनेबिलिटी इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर केविन गास्तों की अगुवाई में यह अध्ययन किया गया हैI इनके अनुसार प्रकाश प्रदूषण के भयानक और व्यापक प्रभावों को देखते हुए अब आवश्यक हो गया है कि इसे भी जलवायु परिवर्तन जैसी प्रमुखता दी जाएI आजकल सडकों और सार्वजनिक स्थलों पर जिस सफेद प्रकाश वाले एलईडी लैम्पों का प्रचलन बढ़ा है, उनसे भले ही बिजली की बचत होती हो, पर वे जंतु जगत के लिए पहले के लैम्पों से अधिक खतरनाक हैंI सफेद प्रकाश में सूर्य के प्रकाश की तरह अनेक वेवलेंथ की किरणों का समावेश रहता है। इसलिए यह प्रकाश जंतु जगत को अधिक प्रभावित करता हैI(navjivan)
भारत में लोग कोरोना महामारी के बावजूद त्योहारों के दौरान बहुत कम सावधानी बरत रहे हैं. महीनों के लॉकडाउन के बाद इस बीच कई प्रतिबंधों को हटाया जा चुका है, लेकिन महामारी अभी तक खत्म नहीं हुई है.
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन की रिपोर्ट-
उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के अलवर जिले में एक फैक्ट्री में फोरमैन का काम करने वाले 42 वर्षीय रुद्रनाथ कहते हैं कि उन्हें अपने सहकर्मियों को हर समय अपने मास्क पहने रखने के लिए कहना बहुत बुरा लगता है. लोहे के कारखाने को फिर से शुरू हुए एक महीने से ज्यादा हो गया है. जून से सरकार धीरे-धीरे लोगों की आवाजाही और व्यापार पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे रही है. राज्य भर से आने वाले आर्डर के कारण, कारोबार धीरे धीरे गति में आ रहा है. रुद्रनाथ कहते हैं, "कई कर्मचारी अब वायरस से नहीं डरते हैं. उन्हें लगता है कि खराब समय बीत चुका है और जल्द ही टीके के आने से बीमार होने के बावजूद इलाज हो सकेगा."
राजस्थान में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, मास्क पहनना अपवाद जैसा है. यहां अधिकांश लोग ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे कि महामारी खत्म हो गई हो. कई लोग सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की अनदेखी कर रहे हैं, और कोरोना नियमों को लेकर अधिकारियों के ढीले रवैये ने इस समस्या को बढ़ा दिया है.
कोरोना से डर नहीं
कुछ ऐसा ही भारत के केंद्रीय प्रांत मध्य प्रदेश में भी दिखता है, जैसे कि कोई महामारी है ही नहीं. इसके अतिरिक्त देहाती इलाकों में लोग बिना मास्क पहने बाजारों में काम, यात्रा और खरीदारी कर रहे हैं. मंदसौर जिले के पोस्टमास्टर प्रभात कुमार सिंह कहते हैं, "हम शहरों से आने वाले यात्रियों से अधिक सावधान रहते हैं. हम उनसे शारीरिक दूरी बनाए रखते हैं. ऐसे आपस में हमारे लिए चिंता की कोई वजह नहीं है."
भारत में अब तक कोरोना महामारी से 85 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं. भारत अमेरिका के बाद संक्रमण के मामले में दुनिया भर में दूसरे स्थान पर है और अब तक इसकी वजह से 1,26,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. देश ने पिछले एक महीने में रोज होने वाले नए मामलों में गिरावट देखी है. हालांकि, भारत में अभी भी औसतन हर दिन लगभग 50,000 नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं.
आठ महीने पहले पूरे देश में लागू किए गए पहले लॉकडाउन के मुकाबले, अब लोगों के बीच कोरोना वायरस का डर कम होता नजर आ रहा है. यूरोलॉजिस्ट और सर्जन अनंत कुमार का कहना है, "जब सख्त लॉकडाउन था और जनता की आवाजाही पर रोक थी, तब लोग डरे हुए थे. उस समय भय व्यवहार को नियंत्रित करता था. अब ऐसा नहीं है."
अर्थव्यवस्था की ज्यादा चिंता
हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार भारतीयों के बीच कोरोना संक्रमित होने के मुकाबले अर्थव्यवस्था और निजी आमदनी बड़ी चिंता का विषय है. इंफेक्शन विशेषज्ञ जैकब जॉन के अनुसार "भारत में अधिकतर लोग बीमार पड़ने की तुलना में खाना और दवाओं की उपलब्धता आवश्यक जैसी चीजों के बारे में ज्यादा चिंतित हैं." .
इंफेक्शन विशेषज्ञ जैकब जॉन के अनुसार "भारत में अधिकतर लोग बीमार पड़ने की तुलना में खाना और दवाओं की उपलब्धता आवश्यक जैसी चीजों के बारे में ज्यादा चिंतित हैं." .सरकार द्वारा नियुक्त वैज्ञानिकों की एक टीम ने हाल ही में दावा किया है कि भारत में कोविड-19 अपने चरम पर पहुंच चुका है और अगले साल फरवरी तक चलेगा.
वैज्ञानिक दल के अनुसार, देश में रोजाना कोरोना वायरस के नए संक्रमण में गिरावट जारी रहेगी और फरवरी 2021 तक महामारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है, बशर्ते सभी स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का पालन किया जाए और सरकार आगे भी सोशल डिस्टेंसिग के नियमों के मामले में ढील न दे. कमिटी ने यह भी दावा किया कि भारत की लगभग 30 प्रतिशत आबादी ने वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित कर ली है.
क्या भारत में समस्या और बढ़ेगी?
हालांकि भारत कोरोना संक्रमण के मामले में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन प्रति दस लाख लोगों पर यहां मृत्यु दर काफी कम है. यह आंकड़ा प्रति 8.3 करोड़ के आसपास है, जबकि फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में यह संख्या 500 से 700 प्रति दस लाख के बीच है.
भारत सरकार का दावा है कि कोविड-19 से जुड़े कम मृत्यु दर, महामारी को सही तरीके से हैंडल करने में कामयाबी को दर्शाता है. इन आकड़ों का इस्तेमाल प्रतिबंधों को हटाने के फैसले के समर्थन में किया गया है. हालांकि, महामारी विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि उत्तर भारत में सर्दियों में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण आने वाले महीनों में वायरस संक्रमण में तेजी आ सकती है. जॉन का कहना है कि "वायु प्रदूषण संक्रमण को बढ़ावा देता है. एरोसोल हवाई यात्रा में और बड़ी दूरी तक सफर करते हैं."
ऑल इंडिया इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के पूर्व चिकित्सा अधीक्षक एम सी मिश्रा ने डीडब्ल्यू को बताया कि त्योहारों के समय भी वायरस फैल सकता है. "दीवाली जो रोशनी का त्योहार है, आने ही वाला है और हम पहले से ही लोगों को बाजारों और मॉलों में घूमते हुए देख रहे हैं. यह बीमारी बेहद संक्रामक है और हम सभी जानते हैं कि हम आने वाले कुछ महीनों में बीमारी में एक और उछाल देख सकते हैं, जैसा यूरोप अभी देख रहा है."(dw.com)
- प्रभाकर मणि तिवारी
क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में बीजेपी के ख़िलाफ़ तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच तालमेल होगा. क्या हर सीट पर बीजेपी उम्मीदवार के ख़िलाफ़ इन तीनों दलों का साझा उम्मीदवार होगा?
अगर भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के सुझाव को ध्यान में रखें तो पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तस्वीर कुछ ऐसी ही उभरती है.
हालांकि बंगाल वाममोर्चा नेताओं के रवैए ने इस तस्वीर के बनने से पहले ही कैनवास पर घड़ों पानी उड़ेल दिया है.
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल में अगले विधानसभा चुनावों की रणनीति पर दीपंकर भट्टाचार्य की टिप्पणी ने यहां राजनीति के ठहरे पानी में कंकड़ उछाल दिया है.
दीपंकर ने कहा कि वाम दलों को पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी को ही नंबर एक दुश्मन मानते हुए भावी रणनीति बनानी चाहिए. इसके लिए ज़रूरत पड़ने पर तृणमूल कांग्रेस के साथ भी हाथ मिलाया जा सकता है.
लेकिन उनके इस सुझाव को वाममोर्चा ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है. दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने इसका स्वागत किया है.
दीपंकर भट्टाचार्य के नेतृत्व में बिहार में वाम दलों को 19 में से 12 सीटें जीतने में कामयाबी मिली है.
बावजूद इसके पश्चिम बंगाल में वाम नेता उस मॉडल को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं. वाममोर्चा अध्यक्ष विमान बसु कहते हैं, "बंगाल का अपना अलग मॉडल है. यहां बिहार मॉडल अपनाने की कोई ज़रूरत नहीं है."
दीपंकर का कहना था कि पश्चिम बंगाल में तमाम वामदल बीजेपी की बजाय तृणमूल कांग्रेस को ही अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान कर आगे बढ़ रहे हैं. उन्होंने संकेत दिया कि ममता बनर्जी के साथ हाथ मिलाने में कोई समस्या नहीं है.
दीपंकर के मुताबिक़, हमें यह समझना होगा कि देश के लोकतंत्र और नागरिकों के लिए बीजेपी सबसे प्रमुख दुश्मन है. तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस इस श्रेणी में नहीं आते.
दीपंकर की इस टिप्पणी से यहां माकपा मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट में हलचल तेज़ हो गई है.
विमान बसु समेत तमाम नेताओं ने दीपंकर की टिप्पणी के लिए उनकी खिंचाई की है.
बंगाल बिहार से अलग
उनका कहना है कि दीपंकर को बंगाल की राजनीति के बारे में कोई जानकारी नहीं है. माकपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "दरअसल भट्टाचार्य यहां वाम नेताओं पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत ऐसा कर रहे हैं ताकि अगले चुनावों में उनको अधिक सीटें मिल सकें. बिहार में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर ऐसे बयान देना उचित नहीं है. बंगाल की राजनीति बिहार से कई मायनों में अलग है."
विमान बसु ने बुधवार को मालदा में पत्रकारों से कहा, "बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस दोनों सांप्रदायिक पार्टियां हैं. ऐसे में बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनावी या दूसरे किसी गठजोड़ का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता. वाममोर्चा यहां तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी दोनों से लड़ेगा. तृणमूल कांग्रेस के पास कोई आदर्श या नैतिकता नहीं है. बीजेपी को बंगाल में वही ले आई है."
माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद सलीम कहते हैं, "दूरबीन से बंगाल को देखने वाले लोग ज़मीनी हक़ीक़त से अवगत नहीं है. तृणमूल कांग्रेस का गठन कर ममता ने एनडीए के साथ हाथ मिलाया था. बंगाल में बीजेपी के प्रवेश और वाममोर्चा के सफ़ाए के लिए ममता ही ज़िम्मेदार हैं."

उधर, तृणमूल कांग्रेस ने भट्टाचार्य के सुझाव का स्वागत किया है.
पार्टी के प्रवक्ता सांसद सौगत राय कहते हैं, "एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना रणनीतिक रूप से गंभीर ग़लती है. नेपोलियन और हिटलर ने इसे काफ़ी नुकसान उठाने के बाद समझा था. पता नहीं बंगाल में वाममोर्चा कब यह बात समझेगा? जब इसके लिए काफी देरी हो चुकी होगी?"
सौगात राय का कहना है कि राष्ट्रहित में वाममोर्चा को बंगाल में बीजेपी के ख़िलाफ़ लड़ाई में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ममता की मदद करनी चाहिए.
दूसरी ओर, बीजेपी ने दीपंकर के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "अगले चुनावों में बंगाल में हमारी जीत तय है. बिहार के बाद अब हमारा लक्ष्य यहां दो-तिहाई बहुमत से जीत कर सत्ता हासिल करना है. बिहार के नतीजों का फ़ायदा पार्टी को यहां भी मिलेगा."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दीपंकर का सुझाव उतना बुरा नहीं है जितना बंगाल के वाम नेता मान या कह रहे हैं.
34 साल तक बंगाल पर राज करने वाले वाममोर्चा के पैरों तले तेज़ी से खिसकती ज़मीन को ध्यान में रखते हुए उसे अपना वजूद बचाने के लिए सही रास्ता चुनना चाहिए.
दीपंकर के सुझाव को मानेंगी पार्टियां?
राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ पंडित कहते हैं, "2011 के बाद होने वाले तमाम चुनावों में वाममोर्चा की ज़मीन धीरे-धीरे खिसकती रही है. हालांकि उसके पास अब भी आठ से 10 फ़ीसद वोट हैं. लेकिन उसने कांग्रेस से हाथ मिलाया है जिसके पास न तो कोई ढंग का नेता है और न ही कोई जनाधार. बीजेपी ने उसे तेज़ी से राजनीतिक हाशिए पर पहुंचा दिया है. ऐसे में बंगाल में भी बिहार मॉडल अपनाने में कोई बुराई नहीं नज़र आती है. चुनावों में हार-जीत ही मायने रखती है. नतीजों के बाद चुनावी रणनीति या तालमेल जैसी बातों की अहमियत ख़त्म हो जाती हैं."

बांग्ला अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका के लिए दशकों तक वाम राजनीति कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "दरअसल, वाममोर्चा नेता यहां ममता की तृणमूल कांग्रेस के हाथों मिले हार के ज़ख्मों को भुला नहीं सके हैं. ममता बनर्जी भी गाहे-बगाहे वामपंथी दलों को निशाना बनाती रही हैं. हालांकि राजनीति में दोस्ती या दुश्मनी स्थायी नहीं होती. लेकिन मौजूदा संदर्भ में दीपंकर के सुझाव पर अमल दूर की कौड़ी ही है."
बीते लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के बावजूद वामदलों का खाता नहीं खुल सका था.
मुखर्जी कहते हैं कि वाममोर्चा बीजेपी और तृणमूल दोनों से समान दूरी बना कर चलने की रणनीति पर बढ़ रही है. दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी भी बार-बार बीजेपी और वाम दलों से समान दूरी बना कर चलने की बात कहती रही हैं. बावजूद इसके उनकी पार्टी को वाम दलों के समर्थन पर कोई आपत्ति नहीं है.(bbc)
भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर हो रही गोलाबारी में 11 लोग मारे गए हैं. पाकिस्तान ने 4 असैनिक नागरिकों के मरने का दावा किया है तो भारत ने सात लोगों के मरने की बात कही है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने भारत के वरिष्ठ राजनयिक को तलब कर पाकिस्तानी कश्मीर में एक असैनिक नागरिकों के मारे जाने पर विरोध जताया है जबकि भारत का कहना है कि पाकिस्तान की गोलाबारी में उसके पक्ष में सात लोग मारे गए हैं. पाकिस्तानी अधिकारियों ने मीडिया से कहा है कि गोलाबारी में शुक्रवार को चार असैनिक लोग मारे गए हैं और 22 घायल हुए हैं. इलाके से रिपोर्ट है कि कश्मीर नीलम घाटी के कई इलाकों में गोलाबारी हो रही है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि भारतीय राजनयिक को बुलाकर कहा गया कि ऐसी निर्मम कार्रवाई 2003 की संघर्षविराम सहमति का हनन है.पाकिस्तानी कश्मीर के एक अधिकारी राजा शाहिद महमूद ने कहा है कि बहुत से घरों को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि लोग सुरक्षित जगहों पर भाग रहे हैं और सामुदायिक बंकरों में छुप रहे हैं.
भारतीय अधिकारियों ने कहा है कि नियंत्रण रेखा पर शुक्रवार को हुए संघर्ष में 4 सैनिकों सहित 7 लोग मारे गए हैं. श्रीनगर में पुलिस अधिकारी मोहम्मद अशरफ के अनुसार मरने वाले तीन असैनिक नागरिकों में एक महिला भी है. भारतीय सेना के प्रवक्ता कर्नल राजेश कालिया ने पाकिस्तान पर विवाद भड़काने का आरोप लगाया है.
पाकिस्तान का कहना है कि दोनों देशों की सेना के बीच गोलाबारी गुरुवार को शुरू हुई और रात भर जारी रही. ताजा खबरों के अनुसार अभी भी दोनों ओर से गोलाबारी हो रही है.
भारत और पाकिस्तान के बीच ताजा संघर्ष के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक बहस शुरू हो गई है. मुस्लिम लीग की उपाध्यक्ष मरियम नवाज ने भारतीय गोलाबारी में निर्दोष और निहत्थे नागरिकों को भारी नुकसान का आरोप लगाया है.
पत्रकार हामिद मीर ने एक ट्वीट कर गोलाबारी में मारे गए लोगों की जानकारी प्रकाशित की है.
दोनों देशों के बीच जनवरी 2019 से विवाद गहरा गया है जब भारतीय कश्मीर में एक आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान मारे गए थे. बदले में भारत ने पाकिस्तान में उग्रपंथियों पर हमला किया था, जबकि पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के एक विमान को गिरा दिया था और पायलट को बंधक बना लिया था.(dw.com)
रिपोर्ट: महेश झा (एपी/डीपीए)
थाईलैंड में महीनों से चल रहे लोकतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. प्रदर्शनकारियों के गुस्से के केंद्र में अब तक राजा वजिरालांगकॉर्न नहीं रहे हैं, लेकिन उनके लिए अब और अलगथलग रहना मुश्किल होगा.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट-
प्रदर्शन में भाग लेने वाले लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस की झड़पें भी. 8 नवंबर को भी प्रदर्शनकारी भीड़ को काबू करने की कोशिश में पुलिस ने वाटर कैनन का भी इस्तेमाल किया. प्रदर्शन में उमड़े सैलाब का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भीड़ को रोकने के लिए हजारों की संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था. पिछले कुछ दिनों में प्रदर्शनकारियों के नेताओं को गिरप्तार भी किया गया है. वैसे तो इन विरोध प्रदर्शनों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है लेकिन यूनाइटेड फ्रंट आफ थमासात एंड डेमन्स्ट्रेशन और फ्री यूथ मूवमेंट ने प्रदर्शनों को ताकत देने में बड़ी भूमिका निभाई है. इमरजेंसी लगने के बाद से रैलियां और सभाएं करने पर रोक है, पांच से ज्यादा लोगों के सभा करने और सार्वजनिक तौर पर इकट्ठा होने पर प्रतिबंध है, लेकिन प्रतिबंधों का कोई असर नहीं होता दिखता. हालांकि रानी के मोटरकेड के सामने नारेबाजी की घटना के बाद पुलिस चौकन्नी है.
युवाओं में बढ़ता असंतोष
आम तौर पर शांतिप्रिय थाईलैंड पिछले कई महीनों से कठिन दौर से गुजर रहा है. विरोध करती जनता सड़कों पर है, जिनमें छात्र नेताओं और युवा थाई लोगों की संख्या बहुत अधिक है. पुलिस की लाठियां और आंसूगैस इन विरोधों को रोकने में बेदम हो रही हैं, देश के प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट सत्ता से चिपके और यथार्थ से दूर बैठे हैं और इन सब से परे देश के नए राजा अपनी अलग दुनिया में गोते खा रहे हैं. विरोध प्रदर्शनों और लोगों की मांगों पर राजा की चुप्पी जनता को और बेचैन कर रही है.
आमतौर पर माना जाता है कि संवैधानिक राजतंत्र जनता को जवाबदेह और जिम्मेदार शासन उपलब्ध कराता है. पड़ोसी मलेशिया को ही ले लीजिए. हाल के दिनों में सत्ता के लालच में जब जब नेताओं ने अपनी मनमानी चलानी चाही, अगोंग (मलेशिया के राजा की उपाधि) ने हस्तक्षेप किया और ऐसे कदम उठाए जो जनता और देश के हित में थे. साथ ही उन्होंने राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं पर भी दबाव डाला. अपने इन जनहितवादी और न्यायपरक कदमों से उन्होंने राजा की गद्दी को और सम्मान दिलाया है.
राजा को लिखी प्रजा ने चिट्ठी
इसके बिल्कुल उलट, थाईलैंड में पूर्व सेना प्रमुख प्रयुथ के शासन से परेशान जनता के लिए राजा और भी बड़ी मायूसी की वजह हैं. इसी के विरोध में 8 नवम्बर को हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने शाही ऑफिस की तरफ जुलूस निकला और हजारों चिट्ठियों के माध्यम से राजा के कामकाज के तरीके में बदलाव की मांग खुद राजा वजिरालांगकॉर्न से की. झड़पों के बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत भी हुई जिसके दौरान पुलिस ने जनता से माफी भी मांगी और प्रदर्शनकारियों की चिट्ठियों को पहुंचाने के लिए रखे लेटरबाक्सों को गंतव्य तक पहुंचाने का वादा भी किया. वैसे लगता नहीं कि राजा हजारों चिट्ठियों में से कुछ को भी पढ़ने की इच्छा रखते होंगे.
प्रदर्शनकारियों के पत्रों में इस बात पर जोर दिया गया है कि थाईलैंड पारस्परिक समझौतों और प्रेम का देश है न कि क्रूरता, हिंसा, और नफरत से भरा देश. पत्रों में यह भी नसीहत दी गयी कि प्रजा राजा से प्रेम करे न करे, राजा को सभी नागरिकों और प्रजा से समान प्रेम करना चाहिए, उसे प्रशंसा ही नहीं आलोचना पर भी ध्यान देना चाहिए. इन बातों को राजा के अपने समर्थकों और पुलिस की प्रशंसा में दिए गए वक्तव्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. पिछले कई महीनों के दौरान जब देशवासी कोविड महामारी और प्रयुथ के कुशासन से त्रस्त थे, तब राजा जर्मनी में रह रहे थे और उन्होंने जनता की परेशानियों पर कोई ध्यान नहीं दिया. रानी को छोड़ने और वापस स्वीकार करने, रानी के फैशन शो और ऐसी ही कई घटनाओं से राजा वजिरालांगकॉर्न की सामाजिक प्रतिष्ठा गिरी है.
नाराजगी राजा से नहीं, सरकार से
इन विरोधों की सबसे बड़ी वजह राजा से असंतुष्टि नहीं है, इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है देश के प्रधानमंत्री और भूतपूर्व थलसेना अध्यक्ष प्रयुथ छान-ओ-छा के प्रशासन से लोगों की नाराजगी. प्रयुथ पिछले छः सालों से सत्ता पर काबिज हैं. पिछले चुनावों में उन्हें जीत तो मिली थी लेकिन विरोधी दल और प्रदर्शनकारी भी उस चुनाव को निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं मानते. जहां तक विरोध प्रदर्शनों का सवाल है तो इसका एक कारण है प्रयुथ सरकार का तानाशाही रवैया जिसके चलते पिछले साल उन्होंने विपक्षी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया. भ्रष्टाचार के तमाम आरोप प्रयुथ सरकार पर लगते रहे हैं. आर्थिक मोर्चे पर भी थाई सरकार फेल ही रही है. कोविड महामारी के दौरान थाई अर्थव्यवस्था न सिर्फ लचर हुई है बल्कि पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं और सब्सिडी के अभाव में प्रयुथ की सरकार की काबिलियत पर भी सवाल उठे हैं.
इसके अलावा प्रदर्शनकारियों की मांग है कि संविधान में संशोधन कर इसे और लोकतांत्रिक और लोक-केंद्रित बनाया जाय. दस-सूत्री मांगों में उनकी एक प्रमुख मांग यह भी है कि राजा की संवैधानिक राजतंत्र में निभाई जाने वाली भूमिका में भी बदलाव किए जायं ताकि वह और जिम्मेदार बन सके. सेना और राजदरबार के बीच लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाहर कोई सांठगांठ न हो जिससे थाईलैंड संवैधानिक राजतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटियों पर खरा उतर सके. एक आम थाई को कहीं न कहीं यह भी लगने लगा है कि राजा और मंत्री अपनी दुनिया में मशगूल हैं और आम आदमी की किसी को परवाह ही नहीं है. कोविड महामारी ने गरीब तबके के लोगों और युवा वर्ग को सरकार को लेकर खासा निराश भी किया है.
सोशल मीडिया समर्थित विरोध
थाई इतिहास में तख्तापलट और सेना का राजा की कृपा से लोकतंत्र पर कब्जा करना कोई नई बात नहीं है. जनता का सब्र भी एक बार फिर जवाब दे रहा है. लेकिन अतीत में हुए जनविरोधों से यह विरोध कई मामलों में अलग है जिसमें सबसे बड़ी है सोशल मीडिया की भूमिका. सोशल मीडिया ने प्रदर्शनकारियों को सरकार और पुलिस के दमनकारी तरीकों से बचने और अपनी ताकत और पहुंच बढ़ाने में मदद की है. जनता के गुस्से को देखकर कयास यह भी लगे हैं कि कहीं यह थाईलैंड में राजा की संवैधानिक राजतंत्र में प्रधान अभिभावक की भूमिका का अंत ही न कर दे.
प्रदर्शनकारियों ने इन कयासों और अफवाहों पर तुरंत यह कह कर लगाम लगा दी है कि राजदरबार थाई समाज और राजनीति का अभिन्न और सम्माननीय हिस्सा है और वो इसके खिलाफ कभी नहीं जाएंगे. पिछले कई महीनों के घटनाक्रम और जनता की बढ़ती नाराजगी से साफ है कि देर सेबर राजा को सामने आना ही पड़ेगा. साथ ही यह भी तय है की लेसे मेजेस्टे अनुच्छेद भी अब इतिहास का हिस्सा बनेगा. राजा की तर्कसंगत आलोचना करने की बात कल राजा को भेजी चिट्ठियों में भी साफ थी. इसमें कितना समय और संघर्ष और लगेगा, यह कहना मुश्किल है. फिलहाल यह साफ है जोर जबरदस्ती और विपक्ष का मुंह बंद करके प्रयुथ सत्ता में ज्यादा दिन नहीं रह पाएंगे. उनके पास अभी भी शांतिपूर्वक ढंग से विवादों को सुलझाने और बिना सत्ता छोड़े सुशासन लाने का मौका है. यह और बात है कि सत्ता के नशे में चूर तानाशाह इन मौकों को यूं ही गवां देते हैं और उनकी गल्तियों की सजा पूरा देश भुगतता है.(dw.com)
(राहुल मिश्र मलाया विश्वविद्यालय के एशिया-यूरोप संस्थान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)
चुनाव के बाद सत्रहवीं बिहार विधानसभा की तस्वीर बता रही है कि सदन में गुलाबी रंग तो और चटक नहीं हो सका, लेकिन दागियों-अमीरों की तादाद जरूर बढ़ गई. इतना ही नहीं यह पिछली बार के मुकाबले थोड़ी और उम्रदराज भी नजर आएगी.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार, की रिपोर्ट-
हाल में हुए चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि बिहार की राजनीति में दबंगों का रुतबा बढ़ता ही जा रहा है. नए सदन में दागियों-अमीरों की संख्या में इजाफा हुआ है. चुनाव के बाद की हालत चुनाव के पहले से बेहतर नहीं हुई है. बात भले ही दागियों से दूर रहने की जाती हो, किंतु मुख्यधारा की किसी भी पार्टी को उनसे कोई परहेज नहीं है. कारण साफ है, राजनीतिक पार्टियों को टिकट देते वक्त केवल अपने प्रत्याशी की येन-केन प्रकारेण विजयी होने की संभावना (विनिबिलिटी) ही दिखती है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भी इन्हें विचलित नहीं कर सका. बिहार के मतदाता सिर्फ इस बात पर सुकून कर सकते हैं कि पढ़े-लिखे सदस्यों की संख्या भी एक हद तक बढ़ी है. पिछली विधानसभा में जहां 138 सदस्य स्नातक थे वहीं इस बार 2020 में 149 ऐसे विधायक चुने गए हैं.
राजद सबसे दागी तो भाजपा सबसे अमीर
चुनाव परिणामों के विश्लेषण पता चलता है कि नई विधानसभा के 68 प्रतिशत माननीयों के खिलाफ अदालतों में आपराधिक मामले दर्ज हैं. नई विधानसभा में ऐसे सदस्यों की संख्या में दस फीसद का इजाफा हुआ है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार 243 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के एक और राजद के एक सदस्य को छोड़ चुने गए 241 विधायकों के हलफनामे के अनुसार 163 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें 51 प्रतिशत यानी करीब 123 पर हत्या, अपहरण, हत्या के प्रयास या महिलाओं के प्रति अपराध जैसे गंभीर आरोप हैं. इनमें 19 पर हत्या, 31 पर हत्या की कोशिश तथा आठ पर महिलाओं के प्रति अपराध का मुकदमा लंबित है. पिछले चुनाव यानी 2015 में ऐसे सदस्यों की संख्या 143 यानी 40 फीसद, 2010 में 133 तथा 2005 में 100 थी. 2020 की स्थिति की 2015 से तुलना में इनकी संख्या में 11 प्रतिशत का इजाफा यह बताने को काफी है कि राजनीति में ऐसे तत्वों की धमक बढ़ती ही जा रही है.
नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी ने की एक दूसरे की मदद
अगर दागी विधायकों की दलगत उपस्थिति को देखें तो राजद इसमें सबसे आगे दिखता है. इसके चुने गए सदस्यों में 73 फीसद यानी 44 ऐसे ही विधायक हैं. वहीं भाजपा के 47, जदयू के 20, कांग्रेस के 10 तथा सीपीआई (एमएल) के आठ चुने गए सदस्यों का क्रिमिनल रिकॉर्ड है. अहम यह है कि असदुद्दीन ओवैसी की एएमआइएमआइएम पार्टी के चुने गए सभी पांच विधायकों के खिलाफ भी आपराधिक मामले दर्ज हैं. असलहा धारकों के संदर्भ में देखें तो नए चुने गए विधायकों में 48 इसके शौकीन हैं. यह सुखद है कि ऐसे माननीयों की संख्या में कमी आई है. 2015 की विधानसभा में 63 ऐसे सदस्य थे जिनके पास आग्नेयास्त्रों के लाइसेंस थे. इस बार चुने गए विधायकों में असलहों के सबसे ज्यादा शौकीन भाजपा के 21 विधायक हैं जबकि राजद में इनकी संख्या 15 और जदयू में सात है.
अगर धनबलियों की बात करें तो इनकी संख्या में भी खासी बढ़ोतरी हुई है. सोलहवीं विधानसभा में 162 यानी 67 प्रतिशत ऐसे सदस्य थे जिनकी संपत्ति एक करोड़ से अधिक थी. थोड़ा और पीछे देखें तो 2010 में 44 तो 2005 में मात्र आठ विधायक ही करोड़पति थे. जबकि इस बार इनकी संख्या 194 यानी करीब 81 फीसद हो गई. भाजपा इसमें अव्वल दिखती है. भाजपा के सर्वाधिक 89, जदयू के 88, राजद के 87 तथा कांग्रेस के 74 प्रतिशत सदस्यों की संपत्ति एक करोड़ या उससे अधिक है. अर्थात भाजपा के विजयी हुए 74 सदस्यों में 66, जदयू के 43 में 37, राजद के 75 में 62 व कांग्रेस के 19 में 15 करोड़पति हैं. विधायकों की औसत संपत्ति भी इस बार बढक़र 4.32 करोड़ हो गई है. इस बार राजद के टिकट पर पटना के मोकामा से चुने गए अनंत सिंह ऐसे माननीय हैं जो सबसे अधिक दागी और सबसे बड़े करोड़पति हैं. इनके खिलाफ हत्या, अपहरण व आर्म्स एक्ट के 38 मामले दर्ज हैं. वहीं ये 68 करोड़ से अधिक की संपत्ति के स्वामी हैं.
आधी आबादी को अपेक्षित सफलता नहीं
राज्य में स्थानीय निकायों में पचास प्रतिशत आरक्षण मिलने के बाद राजनीति में आधी आबादी की धमक बढ़ी है. एक ओर वे जहां बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा ले रहीं हैं वहीं अन्य वैधानिक संस्थाओं में उनकी दमदार उपस्थिति दर्ज हुई है. यही वजह रही कि विधानसभा चुनाव की उम्मीदवारी में भी इनकी हिस्सेदारी बढ़ी. भले ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने 33 फीसदी महिलाओं को पार्टी की उम्मीदवारी देने की हिम्मेत न दिखाई हो, इस बार पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में पहले से ज्यादा उदारता दिखाई. करीब पंद्रह दलों ने 370 महिलाओं को मैदान में उतारा.
2010 में हुए विधानसभा चुनाव में 307 मैदान में थीं जिनमें 34 विधायक बनने में कामयाब रहीं. वहीं 2015 में चुनाव लड़ रहीं 273 महिलाओं में से 28 को जीत हासिल हुई. जाहिर है, समय के साथ इनकी संख्या में बढ़ोतरी हुई. किंतु 2015 की तुलना में इस बार आधी आबादी की स्ट्राइक रेट में डेढ़ फीसद की कमी आ गई. तात्पर्य यह कि 2020 के विधानसभा चुनाव में 25 महिलाएं ही विजयी हो सकीं. इस बार महिलाओं को सबसे ज्यादा टिकट जदयू ने दिया था. जदयू ने 22, भाजपा ने 13, राजद ने 16, कांग्रेस ने सात व लोजपा ने सर्वाधिक 23 महिलाओं को मैदान में उतारा था. इस बार के चुनाव में जदयू की आठ, भाजपा की छह, राजद की सात, कांग्रेस की दो तथा वीआइपी व हम की एक-एक महिला उम्मीदवार ही कामयाब हो सकीं. जाहिर है आधी आबादी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली.
नए चेहरों व शिक्षितों पर बढ़ा भरोसा
इस साल के विधानसभा चुनाव में कई पार्टियों ने अपने सीटिंग विधायक को बदल दिया. उनकी जगह नए चेहरे को तवज्जो दी गई. हालांकि, यही वजह रही कि इस बार बागियों की संख्या में खासा इजाफा हो गया. कमोबेश सभी पार्टियों को बागियों का सामना करना पड़ा और इन्हीं बागियों को तवज्जो दे लोजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया और यह भाजपा व जदयू के लिए नुकसानदेह भी साबित हुआ. वैसे इस बार 95 ऐसे चेहरे हैं जो पहली बार विधानसभा की देहरी पर कदम रखेंगे. इनमें सर्वाधिक 35 सदस्य राजद के हैं. राजद ने अपने 144 प्रत्याशियों में 63 नए लोगों को टिकट दिया था. इसी तरह जदयू के 12, भाकपा-माले के आठ व भाजपा के 22 नए चेहरे विधानसभा में नजर आएंगे. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने दिग्गजों को पटखनी दी. एक बात और, नई विधानसभा में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे माननीय नजर आएंगे. पिछले परिणामों को देखें तो 2005 में जहां 110 शिक्षित विधानसभा तक पहुंचे थे तो वहीं 2020 में ऐसे लोगों की संख्या 149 हो गई है.
इस बार 22 पीएचडी, तीन डॉक्टर, तीन एमबीए, तीन लॉ डिग्रीधारी तथा 76 स्नातक विधानसभा के लिए चुने गए. पीएचडी धारकों में दीघा (पटना) से भाजपा के संजीव चौरसिया, फतुहा (पटना) से राजद के रामानंद यादव व पालीगंज (पटना) विधानसभा क्षेत्र से भाकपा-माले के संदीप सौरभ शामिल हैं. आयु के हिसाब से देखें तो पिछली बार जहां 49 विधायक 61 से 70 वर्ष की आयु के थे वहीं इस बार यह संख्या बढ़कर 58 हो गई है. प्रतिशत के तौर पर आकलन करें तो 40 से 60 आयु वर्ग के विधायकों की संख्या 61.72 प्रतिशत है. लोकतंत्र में हरेक नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार है. इसी तरह किसी को अपने फायदे के लिए वोटरों को किसी भी रूप में प्रभावित करने का अधिकार नहीं है. लेकिन चुनाव नतीजे यही बताते हैं कि हाल के चुनावों में धन व बाहु बल दोनों की भूमिका रही है.(dw.com)
कुछ लोग परंपरा की दुहाई देकर दीपावली में आतिशबाजी का बहाना ढूंढ रहे हैं तो कुछ दूसरे पटाखे न चलाने की दुहाई दे रहे हैं. त्योहार मजेदार तरीके से मनाने के और भी तरीके हैं जिनसे परंपरा भी निभेगी और सेहत भी नहीं बिगड़ेगी.
डॉयचे वैले पर हृदयेश जोशी की रिपोर्ट-
देश के ज्यादातर हिस्सों में, खासतौर से उत्तर भारत में पिछले दो हफ्तों से एयर क्वालिटी इंडेक्स बहुत खराब है और कई इलाकों में एक्यूआई 700 के पार चला गया. लोगों को आंखों में जलन और सांस लेने में दिक्कत महसूस हो रही है और डॉक्टरों का कहना है कि दमे के मरीज आईसीयू में पहुंच रहे हैं. अब संकट यह है कि प्रदूषित होती हवा अन्य बीमारियों के साथ कोरोना के खतरे को भी बढ़ा रही है. ऐसे में जहां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आतिशबाजी पर रोक लगाई है वहीं कई राज्यों की सरकारें सेहत और राजनीति के बीच झूलती दिख रही है.
क्या पटाखों से ही बढ़ता है वायु प्रदूषण
इसमें कोई शक नहीं कि कई लोग आतिशबाजी का मजा लेने के लिए दीपावली का इंतजार करते हैं. खासतौर से बच्चों में यह जुनून अधिक होता है. इसलिए अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या सिर्फ आतिशबाजी से ही प्रदूषण होता है और अगर ऐसा है तो साल के बाकी दिन होने वाले प्रदूषण का क्या. यह तर्क सही है कि सिर्फ पटाखों से ही वायु प्रदूषण नहीं होता. उसकी और भी वजहें हैं, लेकिन यह भी सही है कि दीवाली की रात और अगली सुबह हवा में ज्यादातर प्रदूषण पटाखों की वजह से ही होती है.
दियों का कारोबार
पटाखे हवा को स्वास्थ्य के लिए अधिक घातक बनाते हैं. इनमें सल्फर, कार्बन और कई ऐसे रसायन होते हैं जो आंखों और फेफड़ों के लिये खतरनाक हैं. आतिशबाजी के साथ हवा में धातुओं के बारीक कण भी मिल जाते हैं जो सांस के साथ फेफड़ों में जाते हैं और वहां से रक्त नलिकाओं में पहुंच जाते हैं. साइंस पत्रिका चेस्ट जर्नल में छपे शोध के मुताबिक वायु प्रदूषण शरीर के हर अंग को नुकसान पहुंचा सकता है.

पटाखों से कोरोना का खतरा
एक यूरोपीय शोध के अनुसार कोरोना के कारण होने वाली 15% मौतों के लिये पीछे वायु प्रदूषण एक वजह हो सकती है. इसी हफ्ते भारत के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने भी दोहराया कि प्रदूषण कोविड के मामले तेजी से बढ़ा सकता है. गुलेरिया ने कहा कि जब भी एयर क्वालिटी बिगड़ती है तो उसके बाद बच्चों और वयस्कों की इमरजेंसी में भर्ती बढ़ जाती है. जाहिर है प्रदूषण का बढ़ता स्तर उन लोगों को खतरे में डालेगा जो पहले से दमे के मरीज हैं और जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है.
सेहत और राजनीति का घालमेल
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने वायु प्रदूषण के आपातकालीन स्तर को देखते हुये पटाखों पर पाबंदी लगा दी. लेकिन कई राज्य सरकारें इसे लेकर असमंजस में दिख रही है. वह लोगों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहते. हरियाणा सरकार ने पहले पटाखों पर पाबंदी लगाई और फिर दो घंटे के लिए आतिशबाजी की छूट दे दी. उधर कर्नाटक सरकार ने पटाखों पर पाबंदी के ऐलान के कुछ घंटों बाद ही ‘ग्रीन क्रेकर्स' की इजाजत दे दी. यूपी ने एनसीआर क्षेत्र के साथ लखनऊ, कानपुर और आगरा जैसे शहरों में पटाखे जलाने पर रोक लगाई लेकिन जहां ‘मॉडरेट' और ‘बैटर' हो वहां पटाखे जलाने की इजाजत दी है.
महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने लोगों से अपील की है कि वह स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आतिशबाजी न करें हालांकि मुंबई में बीएमसी ने मुंबई म्युनिस्पल कॉर्पोरेशन की सीमाओं के भीतर पटाखे जलाने पर पाबंदी लगाई है. साफ है कि नेता स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की इच्छा शक्ति नहीं दिखा रहे और इन हालातों में भी राजनीतिक फिक्र हावी है.
दीपावली मनाने के बेहतर तरीके
वैसे दीपावली में मौजमस्ती और पर्व को सुखद बनाने के कई पारंपरिक तरीके हैं. परिवार और दोस्तों से मिलना, दिये जलाना, रंगोली बनाना, अच्छा भोजन और प्रियजनों को उपहार. आप दीवाली के दिन अपनी या दोस्तों की पसंदीदा डिश बना सकते हैं और बच्चों को रोशनी दिखाने के लिये वॉक पर ले जा सकते हैं. दिल्ली सरकार ने पटाखों पर पाबंदी लगाई है.
अब इसका कितना पालन हो पाएगा ये तो शनिवार को पता चलेगा लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल के मंत्री दीवाली पर अक्षरधाम मंदिर में लक्ष्मी पूजा कर रहे हैं. पिछले साल दिल्ली सरकार ने जनता के मनोरंजन के लिए दीवाली पर लेजर शो का आयोजन कराया था. इस साल लेजर शो नहीं है लेकिन अपनी सेहत के लिए क्या बेहतर है आप अच्छी तरह जानते हैं.(dw.com)
दरअसल एलजेपी को एक राज्यसभा सीट देने का फै़सला लोकसभा चुनाव के दौरान ‘सीट शेयरिंग फॉर्मूले’ के तहत तय हुआ था।
लोकसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू दोनों 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और एलजेपी ने 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। साथ ही राज्यसभा की एक सीट एलजेपी के खाते में देने के लिए बीजेपी-जेडीयू तैयार हुए थे।
अगर आने वाले दिनों में रामविलास पासवान वाली ख़ाली राज्य सभा सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी एलजेपी के उम्मीदवार को नहीं उतारेगी तो ये उस फॉर्मूले का उल्लंघन होगा।
बिहार चुनाव के नतीजों के बाद, दिल्ली के 12 जनपथ वाले बंगले की चर्चा राजनीतिक गलियारों में खूब हो रही है।
12 जनपथ बंगला वर्षों से एलजेपी नेता रामविलास पासवान के नाम पर था। वे 9 बार सांसद रहे और केंद्र में मंत्री भी थे। इस नाते इतना बड़ा बंगला उन्हें मिला हुआ था। लेकिन अगर चिराग पासवान को केंद्र में पिता वाला मंत्री पद नहीं मिलता है तो 12 जनपथ बंगले से हाथ धोना पड़ सकता है।
यानी 12 जनपथ बंगले और चिराग दोनों की किस्मत केंद्र में एनडीए सरकार के साथ से जुड़ी है। इसलिए ये सवाल और भी अहम हो जाता है कि चिराग केंद्र की एनडीए सरकार में बने रहेंगे या फिर चले जाएँगे?
वैसे ये बात किसी से छुपी नहीं है कि नीतीश कुमार बिहार चुनाव के नतीजों के बाद से चिराग से कितने नाराज़ हैं। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर किसी से इस बारे में भले ही न कहा हो, लेकिन अलग अलग मंच पर पार्टी के नेताओं ने इस बारे में ज़रूर कहा है।
चर्चा है कि नतीजे आने के घंटों बाद तक नीतीश कुमार और जेडीयू खेमे में चिराग की वजह से ही खामोशी छाई थी। पार्टी के नेता चाहते हैं कि चिराग को बीजेपी की तरफ़ से सख़्त संदेश दिया जाए।
एलजेपी को केंद्र से भी बाहर का रास्ता?
आखिर वो सख्त संदेश क्या होगा और कैसे दिया जाएगा?
एक विकल्प हो सकता है कि बिहार में सरकार बनने से पहले या तुरंत बाद, घोषणा कर दी जाए कि, चूँकि चिराग ने एनडीए के मुख्यमंत्री पद के दावेदार नीतीश कुमार का ख़ुलकर विरोध किया, इसलिए केंद्र में एनडीए से उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
ऐसा करके नीतीश कुमार के ग़ुस्से को बीजेपी थोड़ा शांत कर सकती है और चिराग को संदेश भी मिल जाएगा। लेकिन इस तरीके से सख़्त संदेश देने पर बीजेपी में थोड़ी हिचकिचाहट दिख रही है।
केंद्रीय मंत्री और बिहार के बीजेपी के बड़े नेता रविशंकर प्रसाद ने एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार में कहा, ‘एलजेपी, राष्ट्रीय पार्टी तो है नहीं। एक बिहार बेस्ड पार्टी है। चिराग ने बिहार में एनडीए गठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार नीतीश कुमार का खुला विरोध किया। इसलिए ये उन्हें तय करना है कि उनको आगे क्या करना है। लेकिन एक बात साफ़ है बीजेपी अपने गठबंधन के साथियों को ख़ुद नहीं भगाती। चाहे शिवसेना हो या फिर अकाली दल दोनों हमसे ख़ुद अलग हुए। ऐसे में चिराग को पिता वाला ख़ाली मंत्री पद मिलेगा या नहीं या वो ख़ुद एनडीए से केंद्र में अगल हो जाएँगे, ये मामला ऊपर के स्तर पर तय होगा।’
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह के मुताबिक़ नीतीश कुमार भी इस तरीके से चिराग के विरुद्ध जाना नहीं चाहेंगे। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘नीतीश कुमार, चिराग पासवान की वजह से ग़ुस्से में ज़रूर हैं। लेकिन ‘बदले वाली डिश’को गर्म खा कर मुँह जलाने वाली ग़लती नीतीश नहीं करेंगे। वो अनुभवी नेता हैं। खाना ठंडा करके ही खाना पसंद करेंगे।’
दूसरी तरफ़ बीजेपी भी बिहार में ऐसा कुछ नहीं करेगी की नीतीश कुमार नाराज़ हों। बिहार में बीजेपी का लॉन्ग टर्म एजेंडा हैं अति पिछड़ों को पार्टी के साथ जोडऩा। उनके इस एजेंडे में चिराग पासवान से ज़्यादा नीतीश कुमार उनको सूट करते हैं।’
बीजेपी और नीतीश के लिए ‘पासवान’ वोट के मायने
बिहार में ‘पासवान’ जाति का 4-5 फ़ीसद वोट हैं।
सीएसडीएस लोकनीति के सर्वे के मुताबक़ि इस बार के चुनाव में ‘पासवान’ का 32 फ़ीसद वोट एलजेपी को मिला, 17 फीसद एनडीए को मिला और 22 फीसद महागठबंधन को मिला।
चुनाव में चिराग पासवान भले एक ही सीट जीत पाएँ हों, पर वोट शेयर 5 फीसद से भी थोड़ा ज़्यादा ही रहा। साल 2000 में एलजेपी के गठन के बाद से बिहार चुनाव 2020 से पहले तक उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 12 फीसद वोट शेयर का रहा था। इतना ही नहीं, उनका थोड़ा प्रभाव दूसरी दलित जातियों पर भी पड़ा।
लिहाजा बीजेपी और नीतीश नहीं चाहेंगे कि सीधे तौर पर चिराग पासवान को केंद्र में एनडीए से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।
बीजेपी चिराग के बजाए उनके ‘पासवान’ वोट बैंक को साथ रखने की कोशिश करेगी, ताकि उन्हें ये समझाया जा सके कि आपके नेता ने ग़लती की है, वो ज़्यादा महत्वकांक्षी हो गए। उसके लिए उनके वोटर को सज़ा देना सही नहीं है।
प्रदीप सिंह कहते हैं कि बहुत मुमकिन है कि ऐसा करने पर एलजेपी में दरार पड़ जाए और पार्टी ही टूट जाए। कुछ नेता बीजेपी के समर्थन में खुल कर सामने आ जाएँ।
शायद इस बात का अहसास चिराग पासवान को भी है। और इसलिए पूरे चुनाव में वो ख़ुद को मोदी का हनुमान बताते रहे।
राम विलास पासवान के न रहने पर चिराग पासवान के लिए अकेले पार्टी को चलाना और एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
लेकिन सीएसडीएस के संजय कुमार दूसरी बात कहते हैं। बीबीसी से उन्होंने कहा, ‘पासवान या नीतीश? अगर सवाल इस पर आ जाए तो बीजेपी जाहिर है कि नीतीश के साथ ही जाएगी। नीतीश कुमार का जनाधार भी चिराग पासवान से कहीं ज़्यादा है। 6 सांसदों के साथ एलजेपी के साथ जाना कोई समझदारी वाला फैसला नहीं होगा।’
वे कहते हैं, ‘पॉलिटिकल प्रोमिनेंस की बात करें तो बीजेपी को चिराग पासवान को साथ रखना चाहिए। नीतीश कुमार बीजेपी पर किसी भी वक़्त हावी हो सकते हैं , लेकिन चिराग का हावी होना थोड़ा मुश्किल होगा। बड़े परिपेक्ष में देखें तो चिराग बीजेपी के लिए एक दलित चेहरे के तौर पर काम कर सकते हैं।’
एलजेपी का मंत्रीपद
चिराग को ना मिले
एलजेपी को सख्त संकेत देने का एक तरीका ये भी हो सकता है कि राम विलास पासवान के निधन के बाद, केंद्र में एलजेपी के कोटे का एक खाली पड़ा मंत्री पद बीजेपी चाहे तो एलजेपी को न दे।
डेढ़ साल पहले केंद्र में एनडीए की सरकार बनी। उनके दो पार्टनर शिवसेना और अकाली दल बाद में उससे अलग हो गए। हाल ही में रामविलास पासवान का निधन हो गया। इन वजहों से केंद्र में कई मंत्री पद ख़ाली पड़े हैं।
बिहार चुनाव के बाद इन मंत्री पदों को भरने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा काफ़ी दिनों से चल रही है।
ऐसे में एक संभावना ये बनती दिख रही है कि नीतीश की नाराजग़ी को दूर करने के लिए रामविलास पासवान की खाली जगह चिराग को या पार्टी के दूसरे सांसद को न देकर बीजेपी के किसी नेता को दे दिया जाए।
जानकार इस संभावना से भी इंकार नहीं करते कि जेडीयू, जो अब तक केंद्र में सरकार में शामिल नहीं है उनके कोटे से कोई मंत्री बन जाए।
दोनों ही सूरत में एलजेपी को बिना कुछ कहे एक संदेश मिल जाएगा कि बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ जाने की सज़ा उन्हें केंद्र में मंत्री पद गंवा कर मिली है।
प्रदीप सिंह कहते हैं कि इस बात की संभावना ज़्यादा है कि चिराग को केंद्र में मंत्री पद न मिले। ऐसा करके बीजेपी नीतीश कुमार को थोड़ा ‘कम्फर्ट ज़ोन’ में ले जाने की कोशिश कर सकती है। इससे चिराग भी एनडीए का दामन छोडऩे के लिए मजबूर हो जाएंगे।
इस बात का इशारा ख़ुद रविशंकर प्रसाद टीवी चर्चा में दे चुके हैं।
रामविलास पासवान वाली राज्यसभा सीट भी गंवा सकते हैं चिराग?
प्रदीप सिंह एक तीसरे तरीके की भी बात करते हैं। उनके मुताबिक़ अगर नीतीश थोड़ा और इंतज़ार करने के मूड में हों तो हो सकता है रामविलास पासवान वाली राज्य सभा सीट के लिए जब उपचुनाव हों तो भी उम्मीदवार एलजेपी का न उतारा जाए।
दरअसल एलजेपी को एक राज्यसभा सीट देने का फै़सला लोकसभा चुनाव के दौरान ‘सीट शेयरिंग फॉर्मूले’ के तहत तय हुआ था।
लोकसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू दोनों 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और एलजेपी ने 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। साथ ही राज्यसभा की एक सीट एलजेपी के खाते में देने के लिए बीजेपी-जेडीयू तैयार हुए थे।
अगर आने वाले दिनों में रामविलास पासवान वाली ख़ाली राज्य सभा सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी एलजेपी के उम्मीदवार को नहीं उतारेगी तो ये उस फॉर्मूले का उल्लंघन होगा। (bbc.com/hindi)
लेकिन ऐसा करके बीजेपी चिराग पासवान को इतना मजबूर कर सकती है कि वो ख़ुद ही एनडीए से बाहर हो जाएँ। (बीबीसी)
-गिरीश मालवीय
जो सेक्टर कोरोना काल में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है उसके लिए अब कुछ भी नहीं किया गया वो है हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और टूर एवं ट्रेवल बिजनस।
हर शहर में सैकड़ों की संख्या में होटल-रेस्टोरेंट पर परमानेंट रूप से ताले लटक गए हैं, टूर-ट्रेवल्स वाले की हालत तो इतनी बुरी है कि कई लोग आत्महत्या करने की कगार पर है।
इन दोनों सेक्टर में काम करने वाले लोगों की हालत अन्य व्यापार की अपेक्षा बहुत ही ज्यादा खस्ता हैै। कई प्रतिष्ठानों तो मार्च से अब तक खुले ही नहीं हैं। बिजली के बिलों में भी लॉकडाउन के दौरान कोई छूट नहीं मिली है।
यहाँ काम करने वाले लोगों की सैलेरी का अब तक कोई ठिकाना नहीं है। कई जगह आधी सेलरी मिल रही है। कई सेलेरिड लोगो के वाहन बिक गए तो कई बैंक की किश्तें ही जमा नहीं करवा सके। बच्चों की स्कूल फीस तो जमा कराने की बात छोड़ ही दीजिए।
देश में होटल, रेस्टोरेंट तथा अन्य आतिथ्य सत्कार उद्योग की शीर्ष संस्था फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (स्न॥क्र्रढ्ढ) के अपाध्यक्ष गुरूबख्शीश सिंह कोहली का कहना है कि पिछले साल इन दिनों में जिन स्थानों पर होटल फद्दल चलते थे, ऐसी जगहों पर इस साल होटल के कमरे की बुकिंग औसतन 15 से 25 फीसदी ही हुई है।
एफएचआरएआई का मानना है कि अगर एक-दो महीने और ऐसे ही हालात रहे तो इंडस्ट्री के लिए आगे कामकाज कर पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। एसोसिएशन सरकार से अपील करती आ रही है कि उन्हें भी कद्दछ मदद मिले। जैसे लोन्स की रिस्ट्रक्चरिंग, हॉस्पिटेलिटी सेक्टर के लिए आसान रूप से लोन्स की सुविधा आदि। इन दिनों होटल और रेस्टोरेंटों में ग्राहकी नहीं रहने से होटल मालिकों के लिए कर्मचारियों का वेतन और दूसरे खर्च भी निकालना मुश्किल हो रहा है।
इन लोगों को सरकार से उम्मीद थी कि सरकार तीसरे पैकेज की घोषणा करते वक्त उनके लिए कद्दछ अलग योजना निकालेगी लेकिन कल जो राहत पैकेज दिया गया है उसमें भी इस सेक्टर के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत-चीन तनाव खत्म होने के संकेत मिलने लगे हैं। अभी दोनों तरफ की सेनाओं ने पीछे हटना शुरु नहीं किया है लेकिन दोनों इस बात पर सहमत हो गई हैं कि मार्च-अप्रैल में वे जहां थीं, वहीं वापस चली जाएंगी। उनका वापस जाना भी आज-कल में ही शुरु होनेवाला है। तीन दिन में 30-30 प्रतिशत सैनिक हटेंगे। जितने उनके हटेंगे, उतने ही हमारे भी हटेंगे। उन्होंने पिछले चार-छह माह में लद्दाख सीमांत पर हजारों नए सैनिक डटा दिए हैं।
चीन ने तोपों, टैंकों और जहाजों का भी इंतजाम कर लिया है लेकिन चीनी फौजियों को लद्दाख की ठंड ने परेशान करके रख दिया है। 15000 फुट की ऊंचाई पर महिनों तक टिके रहना खतरे से खाली नहीं है। भारतीय फौजी तो पहले से ही अभ्यस्त हैं। आठ बार के लंबे संवाद के बाद दोनों तरफ के जनरलों के बीच यह जो सहमति हुई है, उसके पीछे दो बड़े कारण और भी हैं। एक तो चीनी कंपनियों पर लगे भारतीय प्रतिबंधों और व्यापारिक बहिष्कार ने चीनी सरकार पर पीछे हटने के लिए दबाव बनाया है। दूसरा, ट्रंप प्रशासन ने चीन से चल रहे अपने झगड़े के कारण उसे भारत पर हमलावर कहकर सारी दुनिया में बदनाम कर दिया है। अब अमेरिका के नए बाइडन-प्रशासन से तनाव कम करने में यह तथ्य चीन की मदद करेगा कि भारत से उसका समझौता हो गया है। लद्दाख की एक मुठभेड़ में हमारे 20 जवान और चीन के भी कुछ सैनिक जरुर मारे गए लेकिन यह घटना स्थानीय और तात्कालिक बनकर रह गई। दोनों सेनाओं में युद्ध-जैसी स्थिति नहीं बनी, हालांकि हमारे अनाड़ी टीवी चैनल और चीन का फूहड़ अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ इसकी बहुत कोशिश करता रहा लेकिन मैं भारत और चीन के नेताओं की इस मामले में सराहना करना चाहता हूं। उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ नाम लेकर कोई आपत्तिजनक या भडक़ाऊ बयान नहीं दिए। हमारे प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने चीनी अतिक्रमण पर अपना क्रोध जरुर व्यक्त किया लेकिन कभी चीन का नाम तक नहीं लिया।
चीन के नेताओं ने भी भारत के गुस्से पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। दोनों देशों की जनता चाहे ऊपरी प्रचार की फिसलपट्टी पर फिसलती रही हो, लेकिन दोनों देशों के नेताओं के संयम को ही इस समझौते का श्रेय मिलना चाहिए। सच्चाई तो यह है कि भारत और चीन मिलकर काम करें तो इक्कीसवीं सदी निश्चित रुप से एशियाई सदी बन सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत चीन से बेखबर हो जाए। दोनों देशों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा जरुर चलती रहेगी लेकिन वह प्रतिशोध और प्रतिहिंसा का रुप न ले ले, यह देखना जरुरी है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-आमिर अंसारी
पिछले कई महीनों से भारत और चीन के बीच एलओसी के मुद्दे पर तनाव बना हुआ है और इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है. इस बीच रूस ने भारत और चीन के बीच जारी तनाव पर चिंता जताते हुए कहा है कि तनाव बढ़ने से यूरेशिया में क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ेगी और अन्य देश इस टकराव का अपने भू-राजनीतिक मकसद के लिए गलत इस्तेमाल कर सकते हैं.
गुरुवार को पत्रकारों से बात करते हुए रूसी मिशन के उप-प्रमुख रोमन बाबुश्किन ने कहा कि दो एशियाई शक्तियों के बीच तनाव से रूस स्वाभाविक रूप से चिंतित है. उन्होंने कहा, "एलएसी पर जारी तनाव का शांतिपूर्ण समाधान बिना देर किए जरूरी है." उन्होंने इस बात के भी संकेत भी दिए कि रूस बैक चैनल वार्ता का इस्तेमाल तनाव कम करने के लिए कर सकता है.
उन्होंने आगे कहा, "रूस एक विशिष्ट स्थिति में है क्योंकि उसके संबंध दोनों चीन और भारत के साथ विशेष और रणनीतिक रूप से अहम हैं और यह संबंध स्वभाव से स्वतंत्र है. हम स्वाभाविक रूप से भारत-चीन के मौजूदा तनाव से चिंतित हैं."
भारत और चीन के शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स का सदस्य होने का संदर्भ देते हुए बाबुश्किन ने कहा जब बहुपक्षीय मंच पर सहयोग की बात आती है तो सम्मानजनक संवाद ही प्रमुख हथियार होता है. साथ ही बाबुश्किन ने कहा है कि रूस सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें एस-400 भारत को जल्द सप्लाई करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है. इस हथियार प्रणाली की पहली खेप की आपूर्ति अगले साल के अंत तक होनी है.
उन्होंने एस-400 सौदे के बारे में कहा, "फिलहाल समय सीमा में कोई बदलाव नहीं हुआ है. पहली खेप की आपूर्ति 2021 के अंत तक होने की उम्मीद है लेकिन हम उस आपूर्ति के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं."
गौरतलब है भारत ने ट्रंप प्रशासन की चेतावनी के बावजूद अक्टूबर 2018 में एस-400 मिसाइल प्रणालियों की पांच इकाइयों को खरीदने के लिए रूस के साथ पांच अरब डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. रूस ने ऐसा ही एक समझौता नाटो के सदस्य तुर्की के साथ भी किया है.(DW.COM)
स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने अपने ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला दर्ज होने के बाद देश के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के नाम एक संदेश जारी किया है.
उन्होंने शुक्रवार को ट्विटर पर बयान जारी करके बताया कि वो इस मामले में न तो माफ़ी माँगेंगे और न ही अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील रखेंगे.
अटॉर्नी जनरल के.के वेणुगोपाल ने ही सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ कथित अपमानजनक ट्वीट करने के लिए उन पर न्यायालय की अवमानना का मामला चलाने की अनुमति दी थी.
कामरा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर विस्तृत बयान जारी किया.
मैंने हाल ही में जो ट्वीट किए थे उन्हें न्यायालय की अवमानना वाला माना गया है. मैंने जो भी ट्वीट किए वो सुप्रीम कोर्ट के उस पक्षपातपूर्ण फ़ैसले के बारे में मेरे विचार थे जो अदालत ने प्राइम टाइम लाउडस्पीकर के लिए दिए थे.
मुझे लगता है कि मुझे मान लेना चाहिए: मुझे अदालत लगाने में और एक संजीदा दर्शकों वाले प्लैटफ़ॉर्म पर आने में मज़ा आता है. सुप्रीम कोर्ट के जजों और देश के सबसे बड़े वकील तो शायद मेरे सबसे वीआईपी दर्शक होंगे. लेकिन मैं ये भी समझता हूँ कि सुप्रीम कोर्ट का एक टाइम स्लॉट मेरे उन सभी एंटरटेनमेंट वेन्यू से अलग और दुर्लभ होगा, जहाँ मैं परफ़ॉर्म करता हूँ.
मेरे विचार बदले नहीं हैं क्योंकि दूसरों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी की आलोचना न हो, ऐसा नहीं हो सकता. मेरा अपने ट्वीट्स को वापस लेने या उनके लिए माफ़ी माँगने का कोई इरादा नहीं है. मेरा यक़ीन है कि मेरे ट्वीट्स ख़ुद अपना पक्ष बख़ूबी रखते हैं.

मैं सुझाना चाहूँगा कि मेरे मामले को जो वक़्त दिया जाएगा (प्रशांत भूषण के खिलाफ़ चले मामले का उदाहरण लें तो कम से कम 20 घंटे) वो दूसरे मामलों और लोगों को दिया जाए. मैं सुझाना चाहूँगा कि ये उन लोगों को दिया जाए जो मेरी तरह कतार तोड़कर आगे आने के लिए पर्याप्त भाग्यशाली नहीं हैं.
क्या मैं सुझा सकता हूँ कि मेरी सुनवाई का वक़्त नोटबंदी की याचिका, जम्मू-कश्मीर का ख़ास दर्जा वापस मिलने को लेकर दायर की गई याचिका और इलक्टोरल बॉन्ड जैसे उन अनगिनत मामलों को दिया जाए, जिन पर ध्यान दिए जाने की ज़्यादा ज़रूरत है.
अगर मैं वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे की बात को थोड़ा घुमाकर कहूँ तो, क्या अगर ज़्यादा महत्वपूर्ण मामलों को मेरा वक़्त दे दिया जाए तो आसमान गिर जाएगा?
वैसे तो भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक मेरे ट्वीट्स को किसी श्रेणी (अवमानना की) में नहीं रखा है लेकिन अगर वो ऐसा करते हैं तो उन्हें अदालत की अवमानना वाला बताने से पहले वो थोड़ा हँस सकते हैं.
कुणाल कामरा के इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा है. ट्विटर पर #KunalKamra और #ContemptOfCourt ट्रेंड कर रहे हैं. कुछ लोग कुणाल कामरा के 'बोल्ड' विचारों के लिए उनकी सराहना कर रहे हैं तो कुछ उनका विरोध भी कर रहे हैं.
क्या है मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी को ज़मानत पर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था. इसके बाद कुणाल कामरा ने अपने ट्विटर एकाउंट से सुप्रीम कोर्ट पर कथित अपमानजनक ट्वीट किया था.
इसके बाद अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को आठ से अधिक पत्र मिले थे, जिनमें कामरा के ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी.
ऐसा नहीं है कि कुणाल कामरा पहली बार विवादों में आए हैं.
इस वर्ष जनवरी के महीने में कुणाल कामरा पत्रकार अर्नब गोस्वामी से एक फ़्लाइट में उनकी सीट पर जाकर सवाल पूछते नज़र आए थे. यह वीडियो वायरल हो गया था.
उस वीडियो में अर्नब गोस्वामी कुणाल को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने लैपटॉप पर कुछ देखने में व्यस्त दिखते हैं. इस घटना के बाद कुणाल पर इंडिगो ने छह महीने का यात्रा प्रतिबंध लगा दिया था.
कुणाल कामरा सोशल मीडिया पर काफ़ी मुखर होकर सरकार और सरकारी नीतियों की आलोचना करते रहते हैं. (www.bbc.com)
-दीप्ति बथिनी
भारत सरकार ने बुधवार को ऑनलाइन कंटेंट प्रदाता समेत तमाम डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म्स को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत लाने का आदेश जारी किया.
इनमें नेटफ़्लिक्स, हॉटस्टार, अमेज़न प्राइम वीडियो, डिज़्नी-हॉटस्टार, एमएक्स प्लेयर जैसे अन्य ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स और ख़बरे देने वाले डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म शामिल हैं.
9 नवंबर को जारी हुए इस सरकारी आदेश के मुताबिक़, भारत सरकार (व्यवसाय का आवंटन) नियम, 1961 में 'ऑनलाइन विषय-वस्तु प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए फ़िल्म और दृश्य-श्रव्य कार्यक्रमों', साथ ही साथ 'ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स पर समाचार एवं समसामयिक विषय-वस्तु' को शामिल करते हुए संशोधन किया गया है.
इस फ़ैसले से यह सवाल उठने लगे हैं कि ऑनलाइन चलने वाले प्लेटफ़ॉर्म्स (ओवर-द-टॉप या ओटीटी) के साथ-साथ डिजिटल न्यूज़ मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.
हालांकि, अभी ये साफ़ नहीं है कि इसमें सेंसरशिप का तरीक़ा अपनाया जाएगा या किसी और तरह से कंटेंट पर नज़र रखी जाएगी और उसमें बदलाव कराए जाएंगे.
भारत में इस समय मीडिया के लिए एक स्व-नियामक तंत्र मौजूद है - जैसे प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एक वैधानिक निकाय) जो प्रिंट मीडिया पर नज़र रखता है.
उसी तरह न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन भी एक स्व-नियामक निकाय है जो न्यूज़ चैनलों पर नज़र रखता है. वहीं एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया विज्ञापनों के लिए दिशा-निर्देश जारी करती है, और फ़िल्मों से जुड़े मामलों में चर्चा में रहने वाला 'सीबीएफ़सी' सिनेमाघरों और टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्मों के लिए प्रमाण-पत्र ज़ारी करता है.

इससे जुड़े लोग क्या कहते हैं
एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म, द न्यूज़ मिनट की संपादक धन्या राजेंद्रन ने बीबीसी से कहा कि 'सैद्धांतिक तौर पर डिजिटल न्यूज़ को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत लाने में कोई समस्या नहीं है.'
वे कहती हैं, "हमारे अंदर जो संदेह पैदा करता है वो है इस फ़ैसले से पहले हुई घटनाएं, जैसा कि हम जानते हैं कि नियम अचानक नहीं बनाए जाते, उनके पीछे कारण होते हैं.
"केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह बताने में बहुत उत्सुकता दिखाई थी कि वो डिजिटल मीडिया का नियमन करना चाहती है और हाल ही में सरकार ने डिजिटल मीडिया में विदेशी निवेश पर भी सीमा तय कर दी है. इसलिए, मैं उम्मीद करती हूँ कि अगर सरकार डिजिटल मीडिया को नियमित करना चाहती है तो उसे पहले इससे संबंधित पक्षों से चर्चा करनी चाहिए."
धन्या राजेंद्रन हाल ही में बनाये गए 11 डिजिटल न्यूज़ प्रदाताओं के समूह, डिजिपब न्यूज़ इंडिया फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष हैं. वे कहती हैं कि इस आदेश में कई बातें अस्पष्ट हैं.
धन्या ने बताया, "कई ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल साइट्स भारत में संचालित होती हैं, पर भारत में पंजीकृत नहीं हो सकती हैं. मुझे उम्मीद है कि सरकार इस पर भी सोचेगी और डिजिटल उद्योग के विकास में मदद करेगी.''
'यह सेंसर बोर्ड का रूप ना ले ले'
भारतीय डिजिटल स्वतंत्रता संगठन, इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन ने एक बयान जारी कर कहा है कि संभावित नियम और क़ानूनों को लेकर घबराहट का माहौल है.
इस बयान में कहा गया है कि "अब ये खुला सवाल है कि ये या कोई अन्य क़ानूनी उपाय क्या सेंसरशिप का कारण बनेंगे? इसका मक़सद तो फ़ेक न्यूज़ जैसी समस्याओं पर नज़र रखना है, लेकिन उसके नतीजे सरकारी नियंत्रण बढ़ने के तौर पर सामने आ सकते हैं."
भारतीय ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म AHA के संस्थापक और कंटेंट मैनेजमेंट बोर्ड के अध्यक्ष अल्लू अरविंद ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "ओटीटी प्लेयर्स भी फ़िलहाल इंतज़ार कर रहे हैं और इस पर नज़र बनाये हुए हैं कि चीज़ें किस ओर जाती हैं."
अरविंद को लगता है कि "इसके ज़रिये अगर कंटेंट को सेंसर करने की कोशिश की गई और इन नियमों ने सेंसर बोर्ड की जगह ले ली, तो यह ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए बहुत ही बुरा होगा."
वे कहते हैं, "अभी नहीं पता है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस बारे में क्या सोच रहा है. पर हमें उम्मीद है कि वो सेंसर बोर्ड जैसा कुछ नहीं बनायेंगे. हो सकता है कि वो न्यूडिटी पर लगाम कसने के लिए कुछ प्रतिबंध लागू करें क्योंकि इस वजह से ओटीटी कंटेंट की काफ़ी चर्चा रही है. लॉकडाउन में ऐसी चर्चा भी रही कि यह कंटेट परिवार के लोग साथ बैठकर नहीं देख पाते. पर इससे ज़्यादा कटौती नहीं होनी चाहिए."
इस दौरान, मीडिया लॉ प्रोफ़ेसर मादाभूषि श्रीधर मानते हैं कि 'ये देखना होगा कि सरकार इंटरनेट पर आने वाले कंटेट को नियमित करने के लिए क्या योजना बनाती है.'
सूचना एवं तकनीक नीति के विशेषज्ञों की राय है कि हालांकि इस क़दम से संबंधित पक्षों में खलबली मची हुई है, लेकिन यह देखना होगा कि मंत्रालय कैसे संतुलन बनाता है.
साइबर सुरक्षा क़ानून पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष पवन दुग्गल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अब बेलगाम होकर काम करने के दिन ख़त्म हो गए हैं. हमने देखा है कि डिजिटल माध्यम कम से कम नियमन के बीच तेज़ी से वृद्धि करते हैं.''
वे कहते हैं कि 'पारंपरिक मीडिया कई सालों से इस बात को उठा रहा है कि नियामक तंत्र को लेकर पारंपरिक मीडिया और डिजिटल मीडिया के बीच समानता होनी चाहिए.'
पवन दुग्गल कहते हैं, ''इस माँग को पूरा करने के लिए यह नया क़दम उठाया गया है. यह क़दम वास्तव में विनियमन की दिशा में शुरुआत है. वह नियमन क्या होगा, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है.'
"हालांकि यह एक दिलचस्प क़दम है, इसका अनुपालन करने में मुश्किल हो सकती है, आदर्श रूप से सरकार फ़ेक न्यूज़ क़ानून की दिशा में आगे बढ़ सकती थी, हालांकि, उन्होंने किसी एक विशेष चुनौती के बजाय पूरे तंत्र को विनियमित करने का विकल्प चुना है."

सुदर्शन टीवी
इस नियम की घोषणा से पहले...
अक्तूबर महीने में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को विनियमित करने के लिए दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था.
पेशे से वकील शशांक शेखर झा ने अपनी याचिका में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के विनयमित नहीं होने को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी.
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका में कहा गया था कि ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर अनुचित और अश्लील सामग्री परोसी जा रही है, लिहाज़ा इन प्लेटफ़ॉर्म्स की निगरानी के लिए किसी स्वायत्त संस्था या बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए.
इससे पहले सितंबर महीने में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सुदर्शन न्यूज़ के 'यूपीएससी जिहाद' कार्यक्रम को लेकर दायर की गई एक याचिका के जवाब में हलफ़नामा दायर किया था.
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफ़नामे में सरकार ने कहा था कि 'पहले डिजिटल मीडिया का नियमन होना चाहिए, क्योंकि उसकी पहुँच अब टीवी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से ज़्यादा है.'
बारह पन्ने के हलफ़नामे में केंद्र सरकार की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अवर सचिव विजय कौशिक ने लिखा था कि 'सुप्रीम कोर्ट को न्याय-मित्र (एमिकस क्यूरे) या न्याय-मित्रों की एक कमेटी को नियुक्त किये बिना मीडिया में हेट स्पीच के नियमन को लेकर और कोई दिशा-निर्देश नहीं देने चाहिए.'
मंत्रालय ने कहा था कि 'अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा करने का निर्णय लेता है, तो कोर्ट को पहले डिजिटल मीडिया के नियमन से जुड़े दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के संबंध में पहले से ही पर्याप्त रूपरेखा और न्यायिक घोषणाएं मौजूद हैं.'
केंद्रीय मंत्रालय ने अपने हलफ़नामे में दो पुराने मामलों और साल 2014 और 2018 में आये उनके निर्णयों का ज़िक्र करते हुए यह बताने की कोशिश की थी कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के मामले में हेट स्पीच को लेकर काफ़ी स्पष्टता से उल्लेख मिलता है, मगर डिजिटल मीडिया के मामले में इसकी कमी है.
हलफ़नामे में यह भी कहा गया था कि अगर कोर्ट नियमन के लिए आगे बढ़ता है और कुछ नये दिशा-निर्देश जारी करने का निर्णय लेता है, तो कोई वजह नहीं बनती कि इसे सिर्फ़ मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक ही सीमित रखा जाये.
मीडिया में तो मुख्यधारा का प्रिंट मीडिया, एक समानांतर मीडिया अर्थात डिजिटल मीडिया, वेब आधारित न्यूज़ पोर्टल, यू-ट्यूब चैनल और ओटीटी यानी ओवर द टॉप प्लेफ़ॉर्म भी शामिल हैं.
बीते दो साल से ऑनलाइन सामग्री को विनियमित करने का मुद्दा और इसके लिए मंत्रालय तय करने को लेकर चर्चा जारी है.
ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को विनियमित करने के मुद्दे पर कब-कब क्या क्या हुआ
अक्तूबर 2018 में ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद सामग्री को विनियमित करने संबंधी दिशा-निर्देश जारी करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जवाब तलब किया था.
इसके बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा था कि यह उनका विवाद है, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के लिए सूचना मंत्रालय से लाइसेंस लेना आवश्यक नहीं है. इसी तरह वो अपने प्लेटफ़ॉर्म पर क्या प्रसारित करते हैं, यह भी मंत्रालय विनिमित नहीं करता है.
इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अपने हलफ़नामे में कहा था कि वे इंटरनेट पर मौजूद सामग्री को विनियमित नहीं करते और इंटरनेट पर सामग्री डालने के लिए किसी भी संगठन या प्रतिष्ठान के लिए लाइसेंस देने का कोई प्रावधान नहीं है.
साल 2019 में इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने एक स्व-विनियमन कोड की घोषणा की थी.
इस पर नौ ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स - नेटफ़्लिक्स, ज़ी5, ऑल्ट बालाजी, अर्रे, इरोज़ नाऊ, हॉटस्टार, वूट, जियो और सोनालिव ने हस्ताक्षर किए थे.
फ़रवरी 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेटफ़्लिक्स-अमेज़न प्राइम वीडियो समेत अन्य ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर दिशा-निर्देशों लागू होने तक पाबंदी लगाने की याचिका ख़ारिज कर दी.
इसके बाद अगस्त 2019 में पीआईबी की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम के तहत ऑनलाइन सामग्री के प्रमाणन के लिए सुझाव आमंत्रित करता है.
अक्तूबर 2019 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म के अधिकारियों के बीच बैठक हुई, जिसमें यह संकेत मिले कि आने वाले समय में सरकार स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए 'क्या नहीं दिखाना है' की लिस्ट जारी करेगी.
5 फ़रवरी 2020 को इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने एक सेल्फ़ रेगुलेटिंग कोड, कोड फ़ॉर सेल्फ़-रेगुलेशन ऑफ़ ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट प्रोवाइडर्स की घोषणा की.
इस कोड के तहत हॉटस्टार, वूट, जियो और सोनीलिव ने हस्ताक्षर किये.
इस कोड के तहत इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया सरकार और उपयोगकर्ता की शिकायतों को दूर करने के लिए डिजिटल कंटेंट कम्प्लेंट काउंसिल नाम के एक स्वतंत्र प्रवर्तन प्रधिकरण की स्थापना करना चाहता है.
इसके बाद मार्च 2020 में सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक सहायक निकाय का गठन करने के लिए और कोड-कंडक्ट को अंतिम रूप देने लिए ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को 100 दिन का समय दिया था, लेकिन आईएएमएआई के तहत नियमों का पालन कर रहे स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स के बीच आपसी सहमति नहीं थी.
सितंबर 2020 में 15 ओटीटी प्लेयर्स ने सेल्फ़ रेगुलेशन कोड, यूनिवर्सल सेल्फ़ रेगुलेशन कोड पर हस्ताक्षर किये.
आईएएमएआई ने अपने एक बयान में कहा कि कोड में उम्र के वर्गीकरण के लिए फ़्रेमवर्क तय किया गया है.
वहीं इस संदर्भ में भारत सरकार के हालिया फ़ैसले पर काफ़ी चर्चा हो रही है. इस इंडस्ट्री से जुड़े लोग सरकार के इस क़दम के परिणामों को समझने का प्रयास कर रहे हैं.
-रवि प्रकाश
वो खूबसूरत हैं, उनकी भाषा अच्छी है, सलीके से बात करती हैं, तमाम सवालों के जवाब हैं से लबरेज़ हैं, कॉन्फिडेंट हैं, फेमिनिस्ट हैं, खूब पढ़ती हैं और नौकरी करती हैं, घर भी चलाती हैं.
ये नाज़िया नसीम हैं जिन्होंने भारतीय टेलीविजन के चर्चित शो 'कौन बनेगा करोड़पति' (केबीसी) के ताजा सीजन में एक करोड़ रुपये जीते हैं और इसके साथ ही वो इस सीज़न की पहली करोड़पति बन गई हैं.
11 नवंबर की इस घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी है और अब वो आम से ख़ास बन चुकी हैं.
10 और 11 नवंबर की रात उनके पूरे परिवार ने केबीसी के वो शो देखे जिसमें नाज़िया शो के होस्ट और भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन से मुख़ातिब थीं.
अब वह दिल्ली से रांची आई हैं जहां उनकी अम्मी-अब्बू और परिवार के दूसरे सदस्य रहते हैं. उनका बचपन इसी शहर की गलियों में गुजरा है और इसकी कई यादें उन्हें और सशक्त बनाती हैं.

BBC/RAVI PRAKASH
अपने बेटे के साथ नाज़िया नसीम
नाजिया नसीम ने रांची के उस डीएवी श्यामली स्कूल (अब जवाहर विद्या मंदिर) से पढ़ाई की है, जहां कभी भारतीय क्रिकेट के कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी भी पढ़ा करते थे.
बाद के सालों में उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में भी पढ़ाई की. अब वे मोटरसाइकिल बनाने वाली एक नामी कंपनी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.
वे दिल्ली में अपने शौहर मोहम्मद शकील और दल साल के बेटे दान्याल के साथ रहती हैं.
केबीसी का सफ़र
नाजिया नसीम अपने केबीसी से जुड़े अनुभव को याद करते हुए कहती हैं, ''मैं पिछले 20 साल से कौन बनेगा करोड़पति में जाना चाहती थी. ख़ुदा का शुक्र है कि मुझे यह मौक़ा मिला.
''मैं सबसे ज़्यादा खुश हुई जब अमिताभ बच्चन ने मुझसे कहा कि 'नाजिया जी, आइ एम प्राउड आफ यू.' (मुझे आप पर गर्व है). यह साल किसी और के लिए खराब होगा. मेरे लिए तो यह साल सबसे अच्छा रहा. ये यादें ताउम्र मेरे साथ रहेंगी.
''मेरी और मेरी अम्मी की ख्वाहिशें पूरी हुई हैं. इसका सारा श्रेय मेरे परिवार को जाता है. जिसने मुझे बाहर निकलने और पढ़ने-बोलने की आजादी दी. खासकर मेरी मां, जिनकी कम उम्र में शादी होने के बावजूद उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि एक बिजनेस वुमेन भी हैं. वे बुटिक चलाती हैं और आत्मनिर्भर हैं.''

BBC/RAVI PRAKASH
अपने माता-पिता के साथ नाज़िया नसीम
रिस्क लेने से क्या डरना
नाजिया बताती हैं,''तेरहवें सवाल के लिए मैं जब मैं अमिताभ जी से मुख़ातिब थी तो ये सवाल 25 लाख रुपये का था. मैं कॉन्फिडेंट थी लेकिन जवाब को लेकर श्योर नहीं थी तब मैंने कहा - रिस्क तो लिया ही है मैंने जिंदगी में, एक बार और ले लेते हैं. फिर मैंने जो जवाब दिया वह सही निकला. इसके साथ ही मैं 25 लाख जीत चुकी थी.
''मेरी आंखों में आंसू थे मैंने पीछे मुड़कर अपनी मां और पति को देखा. मेरा आत्मविश्वास और मज़बूत हुआ और देखते-देखते मैं सोलहवें सवाल तक पहुंच गई. फिर जो रिज़ल्ट आया, उससे आप सब वाक़िफ़ हैं. मैंने एक करोड़ रुपये जीत लिए और इतनी रक़म जीतने वाली इस सीजन की पहली विजेता बन गई.''
घर से मिली फेमिनिज्म की सीख
नाज़िया खुद को महिलावादी बताती है और कहती हैं उन्हें ये अपनी मां से विरासत में मिला है.
उन्होंने कहा,''मैंने एक फिल्म देखी थी सोनचिरैया. उसमें फूलन देवी का रोल निभा रही कलाकार भूमि पडनेकर से कहती है - 'औरत की कोई जात नहीं होती.' यह बहुत बड़ी बात है.
''आज भी हमारे समाज में औरतों को वह आजादी नहीं मिली है, जिसकी वे हक़दार हैं. मैं एक ऐसे समाज की चाहत रखती हूं, जहां मां-बाप अपनी लड़कियों को इसलिए नहीं पढ़ाएं कि उसे अच्छा लड़का (जीवनसाथी) मिलेगा, बल्कि इसलिए पढ़ाएं कि वह पढ़-लिखकर अच्छी लड़की बनेगी. लड़के तो फिर मिल ही जाएंगे.''

नाज़िया के बचपन की तस्वीर
नाजिया बताती हैं ''बचपन में अब्बू और अम्मी के व्यवहार से यह सीख मिली और शादी के बाद मेरे पति ने मेरे लिए ऐसा माहौल तैयार किया. मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा भी बड़ा होकर महिलाओं की इज़्ज़त करे और मेरे परिवार में औरतों की आज़ादी की परंपरा कायम रहे. हमारे समाज की यह सबसे बड़ी ज़रूरत है.
'पढ़ाई में औसत लेकिन एक सुलझी हुई बच्ची'
नाजिया की मां बुशरा नसीम ने बीबीसी को बताया कि ''बचपन में नाज़िया एक औसत छात्र थीं. वे तहज़ीबदार और शांत थीं लड़की थीं और अपने तीन भाई-बहनों में सबसे सुलझी हुई थीं.
''भाई-बहनों के झगड़ों की कई बातें नाज़िया खुद ही सुलझा लेतीं. इसकी भनक घरवालों को बाद में लगती. तभी लग गया था कि आगे चलकर यह हमारा नाम रौशन करेगी. आज हम खुश हैं और इसकी वजह मेरी बेटी है.''
नाजिया के अब्बू (पिता) मोहम्मद नसीमुद्दीन स्टील अथॉरिटी आफ इंडिया (सेल) से रिटायर हो चुके हैं.
उन्होंने कहा, '' मैंने अपने बेटे-बेटियों में कोई फ़र्क नहीं किया. सबलोग एक साथ एक ही स्कूल में पढ़े. इस कारण आज सब अपनी ज़िंदगी में व्यवस्थित हैं. किसी मां-बाप को इससे अधिक और क्या चाहिए, मुझे भरोसा है कि नाज़िया की जिंदगी में अभी खुशी के और मुक़ाम आएंगे. केबीसी तो सिर्फ़ एक पड़ाव है. (bbc.com/hindi)
मेरे जीवन में वह शाम यादध्यानी योग्य है जो मुक्तिबोध की प्रसिद्धि का डंका नहीं बजने के पहले किसी अव्यक्त बानगी का शिकार हो गई होती। दिग्विजय महाविद्यालय के परिसर में अपने जिस पहले मकान में वे रहे थे, ठीक उसके पीछे बूढ़ासागर की पथरीली पटरियों पर बैठकर उस वक्त के शीर्षक ‘आशंका के द्वीपः अंधेरे में‘ वाली कविता का एकल श्रोता बनना मेरे नसीब में आया। वह कविता उनके मुझ युवा श्रोता-शिष्य में घबराहट, कोलाहल, आक्रोश और जुगुप्सा भरती गई थी। मैं राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा के लिहाज़ से राममनोहर लोहिया के सबसे करीब था। मुक्तिबोध से लोहिया को लेकर कभी कभार सामान्य बात हुई होगी। उनके नहीं रहने के लगभग तीन वर्षों बाद लोहिया जी को मैंने मुक्तिबोध के बारे में बताया था। उन्हें इस बात का मलाल था कि ऐसे दुर्लभ कवि से उनका उतना प्रगाढ़ परिचय क्यों नहीं हो पाया जैसा उनके समकालीन अज्ञेय से था। साथ साथ अन्य कवियों से भी जिनमें श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और विजय देवनारायण साही वगैरह कई थे। मुक्तिबोध का वह अविस्मरणीय काव्यपाठ तब तक चलता रहा, जब तक सूरज पूरी तरह बूढ़ासागर में डूब नहीं गया। एक अमर कविता के अनावृत्त होने के रहस्य को देखना कालजयी क्षण जीना था। मैं कविता का अमर श्रोता बना दिया गया। मैं एक साथ हतप्रभ, आतंकित और भौंचक था। बूढ़ासागर का वह रहस्यमय रचना-परिप्रेक्ष्य पूर्वजन्म की घटना या उपचेतन के विस्फोट की तरह मुक्तिबोध की यादों में गूंजता रहता है।
वह कविता मैंने ‘चांद का मुंह टेढ़ा है' के संग्रह में शमशेर बहादुर सिंह की टिप्पणी के साथ कई बार पढ़ी। वह वाकई ‘गुएर्निका इन वर्स‘ ही है। उस कविता का मुझ पर इतना प्रभाव हुआ है कि मैं उसे किसी भी समाजचेता कविता का टचस्टोन (कसौटी) बनाता रहता हूं। मुझे पहली बार लगा था कि कविता हमारे पूरे अस्तित्व को न केवल झकझोर सकती है, बल्कि वह हमें अपनी वंशानुगत और पूर्वग्रहित धारणाओं तक की सभी मनःस्थितियों से बेदखल भी कर सकती है। पाठक या श्रोता का व्यापक मनुष्य समाज में गहरा विश्वास हो जाए और खुद उसमें किसी अणु के विस्फोट का संसार बन जाए-यह मुक्तिबोध की उस कविता का बाह्यांतरिक भूचाल है। वस्तुतः ‘अंधेरे में‘ आंतरिक उजास की कविता है। यह कविता भारतीय जनता का लोकतांत्रिक घोषणापत्र है। उसकी अभिव्यक्ति, निष्पत्ति और उपपत्ति सभी कुछ उन तानोंबानों से बुनी है जो एक मनुष्य को दूसरे से अविश्रृंखलित मानव तारतम्यता से जोड़ती है। यह एक आंशिक और अपूर्ण लेकिन आत्मिक-लयबद्धता का ऐलान है। उसके पौरुष के उद्घाटन का वक्त हिन्दुस्तान की लोकशाही में जनता की यंत्रणा भोगती अनुभूतियों में न जाने क्यों उग नहीं रहा है! मुक्तिबोध संभावित जनविद्रोह की निस्सारता से बेखबर नहीं थे। इसलिए इस महान कविता में लाचारी का अरण्यरोदन नहीं उसकी हताशा की कलात्मक अनुभूति है। पराजित, पीड़ित और नेस्तनाबूद हो जाने पर भी आस्था और उद्दाम संभावनाओं की उर्वरता के यौगिक बिखेर देना भी कविता की रचनात्मक ज़िम्मेदारी होती है। यह तयशुदा पाठ इस विद्रोही कवि का ऐसा उद्घोष है जिसे जनसमर्थन तो चाहिए लेकिन जनआकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए वह प्रतीक्षा करने की स्थिति में नहीं है। ‘अंधेरे में‘ को जितनी बार और जितनी तरह से पढ़ा जाए उसकी दृश्यसंभावनाओं, नाटकीयता और अतिरेक लगती संभाव्यता में मुक्तिबोध की कलम की बहुआयामिता का अनोखा और अकाट्य साक्ष्य गूंजता रहता है।
आम तौर पर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के नेता अंतरराष्ट्रीय उदारवादी व्यवस्था को बनाए रखने का जुमला ककहरे की तरह दुहराते रहते है. दूसरी ओर रूस, चीन और भारत जैसे देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के हिमायती रहे हैं.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र का लिखा-
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शंघाई कोआपरेशन ऑर्गनाइजेशन के राष्ट्राध्यक्षों की बीसवीं शीर्षस्तरीय वार्ता के दौरान दिए गए भाषण में वैश्विक शासन और समकालीन विश्व व्यवस्था को बनाए रखने पर जोर ने चीन की बदलती भूमिका पर एक बार फिर ध्यान आकर्षित किया. शी के भाषण ने एक और संदेश स्पष्ट रूप से दिया कि दुनिया को चीन की उतनी ही जरूरत है जितनी चीन को दुनिया की. और इस बात से चीन के कट्टर आलोचक भी अनदेखा नहीं कर सकते. शी ने न सिर्फ कोविड महामारी से लड़ने में बहुपक्षीय सहयोग की भूमिका पर बल दिया बल्कि एससीओ सदस्य देशों को कोविड-19 वैक्सीन मुहैय्या कराने का वादा भी किया. 10 नवंबर को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अध्यक्षता में हुई इस वर्चुअल बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई. रूस इस साल एससीओ की अध्यक्षता कर रहा है.
शी जिनपिंग के भाषण की सबसे खास बात रही उनका वैश्विक शासन और समकालीन विश्व व्यवस्था को बनाए रखने पर जोर. अमेरिका की घटती साख के बीच चीन के राष्ट्रपति का यह बयान अहम है. वैसे तो चीन कोरोना वायरस की उत्पत्ति की खोज तक का विरोध करता रहा है लेकिन राष्ट्रपति शी ने एससीओ सदस्य देशों के बीच एक स्वास्थ्य हॉट लाइन स्थापित करने की वकालत की और कहा कि इस हॉटलाइन से एससीओ सदस्य देश कोविड-19 जैसी किसी आपदा से जूझने में आपसी सहयोग और साझा सूझबूझ से काम ले सकेंगे. साथ ही शी ने किसी बाहरी ‘पालिटिकल वायरस' से बचकर रहने की नसीहत भी दी. शी की इन बातों में अमेरिका के लिए संदेश बहुत साफ है.
स्थापना
यूरोप और एशिया, यानी यूरेशिया को राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा के मुद्दे पर जोड़ने के लिए 15 जून 2001 को चीन में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन का एलान किया गया. 2002 में इसके चार्टर पर दस्तखत हुए और 19 सितंबर 2003 से यह संस्था काम करने लगी.
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर देश कहने वाले अमेरिका में आज कोविड के सबसे ज्यादा मरीज हैं और इस महमारी में जान देने वालों की संख्या भी सबसे ज्यादा है. वैसे तो बहुत से लोग ट्रंप प्रशासन पर यह जिम्मेदारी जड़कर आगे निकलने की कोशिश करते हैं लेकिन यह इतना आसान और सीधा मामला नहीं है. अमेरिका में प्रांतीय और शहरी प्रशासन की अलग व्यवस्था है और ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इन सभी पर ट्रंप का सीधा दखल था. अमेरिका की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था ने अमेरिका की कमजोरियों को उजागर किया है. शायद अमेरिकी लोगों को अब यूरोपीय सरकारों की सोशल डेमोक्रेटिक व्यवस्था की अच्छी बातें भी समझ में आने लगें.
अगर कोविड-19 जैसी बदहाली का आलम चीन और रूस में या दक्षिणपूर्व एशिया के किसी देश में होता तो अमेरिकी मीडिया किस तरह की रिपोर्टें पेश कर रहा होता. इन सभी के मद्देनजर चीनी राष्ट्रपति की बात आश्चर्यजनक तो लगती है लेकिन झूठी और बेमानी नहीं है. और अमेरिका के हालात एक सरकार के बदलने से बदल जाएंगे, ऐसा समझना बचपना होगा.
अमेरिका की अगली सरकार और चीन
चीन इस बात से भी वाकिफ है कि जो बाइडेन प्रशासन से भिड़ना ट्रंप के मुकाबले ज्यादा कठिन होगा क्योंकि अब दबाव सिर्फ आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर ही नहीं, पर्यावरण और मानवाधिकारों पर भी होगा. ये वो मुद्दे हैं जिन पर ट्रंप गलतियां पर गलतियां करते रहे. वह शायद भूल ही गए थे कि इन दोनों ही मुद्दों पर चीन बहुत कमजोर स्थिति में है.
हुआवे और 5जी तकनीक को लेकर शायद बाइडेन और ट्रंप में कोई अंतर नहीं होगा. यह बात भी चीन को परेशान कर रही है. और इसी की एक झलक शी के भाषण में दिखी जब उन्होंने यह घोषणा की कि अगले साल शी चोंगक्विंग में चीन-एससीओ डिजिटल इकोनॉमी फोरम की मेजबानी करेंगे. रूस के डिजिटल इकोनॉमी और 5जी के मुद्दे पर चीन को समर्थन से यह भी साफ है कि तकनीक के वर्चस्व की लड़ाई में चीन और रूस अमेरिका और यूरोप के विरुद्ध साथ-साथ खड़े होंगे.
भारत और चीन का टकराव
इस शिखर वार्ता में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भाग लिया. शी के बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के विचार को थोड़ा सा खींच कर भारत के पाले में लाते हुए मोदी ने कहा कि विश्व व्यवस्था में सुधार लाने के लिए परिमार्जित बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ दुनिया को बढ़ना ही पड़ेगा. इस संदर्भ में भारत का 1 जनवरी 2021 से संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में सदस्य बनना खास मायने रखता है. अपने भाषण में मोदी ने एससीओ सदस्य देशों को आपसी सौहार्द्र बनाए रखने और एक दूसरे की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करने की सलाह दी.
भारत और चीन के बीच महीनों से चल रहे सीमा विवाद के बीच यह बयान महत्वपूर्ण है. पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के बीच सीमा संबंधी विवाद सुलझाने के लिए कई विफल दौर चले हैं. आशा की जा रही है कि इस बार दोनों देशों की सेना एक आम सहमति बना पाएंगी. भारत को समझ आ चुका है कि पड़ोसी देश से ताकत के बल पर जीत नहीं पाई जा सकती. चीन भी शायद इस बात को धीरे-धीरे समझ रहा है. भारत, चीन और एससीओ, सभी के लिए यह एक राहत भरी खबर होगी.
(राहुल मिश्र मलाया विश्वविद्यालय के एशिया-यूरोप संस्थान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)
- रौनक कोटेचा
संयुक्त अरब अमीरात ने हाल ही में अपने नागरिक और आपराधिक क़ानूनों में कुछ व्यापक बदलाव किये हैं. 84 लाख से अधिक आबादी वाले इस देश में (2018 में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार) क़रीब 200 तरह की राष्ट्रीयता वाले लोग रहते हैं.
नागरिकों और वहां रह रहे प्रवासियों के जीवन को और अधिक सकारात्मक और अनुकूल बनाने के लिए ये संशोधन किए गए हैं. संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले प्रवासियों की एक बड़ी आबादी दक्षिण एशिया की है.
इन संशोधनों के तहत जो विदेशी यूएई में रह रहे हैं, उन्हें अब व्यक्तिगत मामलों को उनके अपने देश के क़ानून के अनुसार निपटाने की अनुमति होगी. मसलन, तलाक़ और अलगाव के मामले में, वसीयत या फिर संपत्ति के बंटवारे के मामले में, शराब की ख़पत के संबंध में, आत्महत्या, नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध बनाने के मामले में, महिला सुरक्षा और ऑनर-क्राइम के मामले में.
इससे कुछ सप्ताह पहले ही संयुक्त अरब अमीरात ने इसराइल के साथ अपने रिश्तों को सामान्य करने के लिए ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किया है. इस क़दम के साथ ही ऐसी उम्मीद भी की जा रही है कि देश में इसराइली पर्यटकों और निवेशकों की आमद बढ़ेगी.
अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी फ़र्म बेकर मैकेंज़ी के वकील आमिर अलख़ज़ा का कहना है, "नए संशोधन निवेशकों के विश्वास को बढ़ावा देने की कोशिश के तहत उठाया गया एक क़दम है."
वे आगे कहते हैं, "हाल के दिनों में संयुक्त अरब अमीरात की सरकार ने कई क़ानूनों में संशोधन किये हैं जो सीधे तौर पर प्रवासी आबादी को प्रभावित करते हैं. वो चाहे गोल्डेन वीज़ा स्कीम के तहत किए गए संशोधन हों या फिर उद्यमियों के रेज़िडेंसी वीज़ा की शर्तों में किये गए संशोधन."
अलख़ज़ा का कहना है कि सरकार ने संशोधन करके उन क़ानूनों में ढील दी है जिसके लिए अक्सर लोगों को (चाहें नागरिक हों या प्रवासी) दंडित किया जाता रहा है.
संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख ख़लीफ़ा बिन ज़ायेद ने सात नवंबर को फ़रमान जारी करके इन बदलावों की घोषणा की और ये संशोधन तत्काल प्रभाव से लागू हो गए.
अलख़ज़ा कहते हैं, "ये एक संघीय क़ानून है. एक बार प्रकाशित हो जाने के बाद सभी नागरिकों को इसका पालन करना होगा."
अलख़ज़ा का मानना है कि नए संशोधन से देश में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और सभी महत्वपूर्ण घटनाओं पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. जिसमें से एक बहुप्रतीक्षित आयोजन एक्स्पो 2021 भी है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में कई महत्वपूर्ण निवेशक और लाखों दर्शक शामिल होंगे.
प्रवासियों के लिहाज़ से तलाक़, अलगाव और संपत्ति से जुड़े क़ानूनों में होने वाले संशोधन सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. इन क़ानूनी संशोधनों के बाद अब अगर कोई जोड़ा अपने देश में शादी करता है लेकिन उनका तलाक़ संयुक्त अरब अमीरात में होता है तो उनके लिए उसी देश के क़ानून मान्य होंगे जहां उनकी शादी हुई थी. यानी उनके अपने देश के क़ानून उनके लिए मान्य होंगे.
अलख़ज़ा को लगता है कि इन संशोधनों को लागू करना आसान और प्रभावी होगा. उन्होंने कहा, "संयुक्त अरब अमीरात समाज प्रवासियों और यहां के मूल नागरिकों का एक मिश्रण है. दोनों ही बहुसंख्यकों के बीच एक-दूसरे को लेकर स्वीकार का भाव है और वे सभी की संस्कृति का सम्मान करते हैं."
उन क़ानूनों में भी बदलाव किए गए हैं जिनमें ऑनर क्राइम को अब तक संरक्षण प्राप्त था. अब इन्हें अपराध की श्रेणी में रखा गया है. नाबालिग या मानसिक तौर पर कम विकसित शख़्स के साथ रेप के दोषी को अब मृत्युदंड दिया जा सकता है.

बिना लाइसेंस के शराब का सेवन करते पाए जाने पर अब किसी तरह की सज़ा का सामना नहीं करना पड़ेगा. हालांकि, शराब पीने और ख़रीदने के लिए कुछ शर्तें लगाई गई हैं. जिनमें से एक यह है कि शराब पीने वाले की उम्र 21 साल से ऊपर होनी चाहिए.
एक भारतीय प्रवासी कहते हैं "पहले शराब पीने पर हमेशा डर रहता था. इन बदलावों से निश्चित तौर पर हम थोड़ा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं."
इन तमाम बदलावों के साथ ही संशोधन के तहत अब अविवाहित जोड़ों को साथ रहने की छूट मिल गई है. संयुक्त अरब अमीरात में इससे पहले अविवाहित जोड़ों का एक साथ रहना अपराध रहा है.
ये नए संशोधन विदेशी नागरिकों को विरासत, विवाह और तलाक सहित विभिन्न मुद्दों पर इस्लामिक शरिया अदालतों से बचने की अनुमति भी देते हैं.
28 साल की ज़रीन जोशी पिछले 25 सालों से दुबई में रह रही हैं. वह भारतीय मूल की हैं. उनका मानना है कि ये संशोधन विभिन्न राष्ट्रीयताओं को एक बड़ी स्वीकृति है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, इससे हमें अपने घर के क़रीब होने जैसा महसूस हो रहा है.
वो आगे कहती हैं, इस क़दम से और निवेश की संभावनाएं बढ़ी हैं साथ ही यह फ़ैसला उन्हें यूएई में और वक़्त रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.
बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की है.
अबू धाबी में रहने वाले और पेशे से इंजीनियर गियूलियो ओचिओनेरो ने ट्वीट करके इस संबंध में खुशी जताई है. वो इस फ़ैसले को सिविल प्रोग्रेस के एक उदाहरण के तौर पर देखते हैं.
एक अन्य ट्विटर यूज़र युसूफ़ नज़र का कहना है कि इन संशोधनों से जोड़े बिना शादी किये भी साथ रह सकेंगे.
संयुक्त अरब अमीरात की अधिकारिक समाचार एजेंसी डब्ल्यूएएम के अनुसार, ये संशोधन देश के वैधानिक वातावरण को और बेहतर करने के लिए और लोगों को यहां रहने, काम करने के लिए प्रेरित करता है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, यह बदलाव देश के प्रगति के पथ पर बढ़ने और विदेशी निवेश को लुभाने की दिशा में अपनी स्थिति को और मज़बूत करने के लिए हैं.
गल्फ़ न्यूज़ के एक संपादकीय में कहा गया है कि नए क़ानून विदेशी निवेशकों के वित्तीय हितों की स्थिरता को सुनिश्चित करेंगे.(bbc)
जर्मनी के बोखुम शहर में कुछ साल से अपराध विज्ञानियों की एक टीम एक अहम मुद्दे पर शोध कर रही थी. मुद्दा था - पुलिस की नस्लवादी सोच और उससे जुड़ी हिंसा का. अब उस रिसर्च के नतीजे सामने आ चुके हैं.
"मुझे गालियां देते हुए कहा, "गंदे लेबनीज, गंदे विदेशी." जर्मनी के एसेन शहर में रहने वाले 24 साल के ओमार अयूब पुलिस के मुंह से अपने लिए ऐसे अपशब्द सुनने की बात कहते हैं. अयूब आगे बताते हैं कि उनकी बहन से किसी पुलिस वाले ने कहा था कि "तुम अब अपने देश में नहीं हो, यहां जानवरों की तरह बर्ताव नहीं कर सकते." अयूब सवाल करते हैं कि यह नस्लवादी टिप्पणी नहीं है तो क्या है.
मुसलमानों के पवित्र महीने रमजान की एक शाम अयूब अपने परिवार के साथ शाम को उपवास तोड़ने जा रहे थे, तभी उनके घर की घंटी बजी. दरवाजे पर पुलिस वाले थे, जिन्होंने बताया कि उन्हें घर से शोर आने की शिकायत मिली है. पुलिस ने कहा कि वे घर के अंदर आकर शांति भंग होने की शिकायत की जांच करेंगे. लेकिन अयूब ने इससे मना करते हुए दरवाजा बंद कर दिया तो बात और बिगड़ गई. उसके बाद की घटना बताते हुए अयूब कहते हैं, "पुलिस ने जोर जबर्दस्ती की और मेरी मर्जी के खिलाफ घर में घुस गए. एक पुलिस वाले ने मेरे चेहरे से चश्मा हटा दिया और मुझसे अपना हाथ सिर के पीछे रखने का आदेश दिया. मैं मान गया. और तब उसने मेरे चेहरे पर मारा." अयूब का आरोप है कि वहां मौजूद उसकी बहन और पिता भी घायल हुए.
पुलिस बर्बरता की शिकायत करने वाले ओमार अयूब.
उसके परिवारजनों को लगी शारीरिक चोट के फोटोग्राफ होने के बावजूद उनके लिए इस घटना की पूरी सच्चाई साबित करना मुश्किल था. एसेन की पुलिस ने इससे जुड़ी काफी अलग कहानी सुनाई. उनका आरोप था कि अयूब और उनके पिता ने "पुलिस पर घूंसे चलाए" और अब उन पर पुलिस का विरोध करने का मुकदमा चल रहा है. अयूब ने भी पुलिस के खिलाफ मामला दर्ज कराया है. उसके हिसाब से पुलिस को लगता है कि उसका परिवार किसी संगठित अपराध से जुड़ा हुआ है क्योंकि वे लेबनानी मूल के हैं. अयूब कहते हैं कि बिना किसी सबूत के पुलिस ऐसा मानती है. इस मामले की जांच जारी होने के कारण पुलिस ने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से मना किया है.
सबूतों के बिना
अयूब के मामले को अपराध विज्ञानी लैला अब्दुल-रहमान एक आदर्श नमूना बताती हैं. बोकुम यूनिवर्सिटी में वह पिछले दो साल से एक टीम के साथ मिलकर पुलिस की बर्बरता और नस्लवादी रवैये पर शोध कर रही हैं. इसके लिए उनकी टीम ने 3,000 से भी अधिक लोगों का इंटरव्यू किया और उसके आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की. इस स्टडी का नेतृत्व करने वाले टोबिआस जिंगेल्नश्टाइन यह बात साफ करते हैं कि चूंकि सैंपल केवल कुछ हजार लोगों का था इसलिए इसके नतीजों को मोटे तौर पर पूरे जर्मनी पर लागू करना सही नहीं होगा. हालांकि वह मानते हैं कि यह चिंता का विषय है और इसकी बड़े स्तर पर जांच कराई जानी चाहिए.
इस स्टडी में जो मूल बात निकल कर आई है वह यह है कि जातीय अल्पसंख्यक समूह के लोगों को पुलिस के हाथों ज्यादा तकलीफ झेलनी पड़ती है. लैला अब्दुल-रहमान बताती हैं, "उनके बयान को आम तौर पर शक की निगाह से देखा जाता है, जबकि पुलिस और सरकारी अधिकारियों के बयान को कहीं ज्यादा विश्वसनीय माना जाता है." रिसर्चरों ने पाया कि ऐसे अल्पसंख्यकों को पुलिस के हाथों निजी स्तर पर हिंसा झेलनी पड़ती है, तो वहीं दूसरों को अकसर सार्वजनिक प्रदर्शनों या दूसरे सामूहिक आयोजनों में. रिसर्चरों ने पाया कि पर्याप्त सबूत ना हो ने के कारण इनमें से ज्यादातर मामले कोर्ट तक नहीं पहुंचते. अब्दुल-रहमान बताती हैं कि "ऐसे 90 फीसदी मामलों में सरकार का अभियोजन पक्ष शिकायत रद्द कर देता और इसकी कभी जांच ही नहीं होती." रिसर्चरों का मानना है कि इसके कारण पुलिस क्रूरता के शिकार कानून में भरोसा ही खो देते हैं."
कैसे जगे पुलिस में भरोसा
स्टडी के लेखकों का मानना है कि स्वतंत्र जांच कराने से मदद मिलेगी. उनकी मांग है कि बाहर से पुलिस पर नजर रखी जानी चाहिए और पुलिस हिंसा के शिकार हुए लोगों को अलग से मदद देनी चाहिए. वहीं पुलिस ट्रेड यूनियन के मिषाएल मेर्टेन्स जोर देकर कहते हैं कि बाहरी कदमों से कुछ नहीं होगा. डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने कहा, "पुलिस हिंसा जैसे राज्य के अत्याचार के खिलाफ कार्रवाई के कई रास्ते हैं. हमें वे रास्ते अपनाने चाहिए और उनके प्रभावी होने पर भरोसा रखना चाहिए." हालांकि उन्होंने माना कि "राज्य और पुलिस में जरूर इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को लेकर और सुधार की गुंजाइश है. हमें इस विषय को लेकर खुला रवैया रखना होगा और बिना भावनात्मक हुए इस पर बात करनी होगी." उनके हिसाब से इसकी शुरुआत बिल्कुल शुरु से करनी होगी यानि पुलिस में भर्ती और उनकी ट्रेनिंग के समय से.
अब्दुल-रहमान कहती हैं कि चूंकि कोई अपना बाहरी रंग रूप तो बदल नहीं सकता, इसलिए औरों से अलग दिखने वालों के साथ कई बार ऐसी घटनाएं बार बार होती हैं. इसके कारण अल्पसंख्यक या अश्वेत इस घबराहट के साथ जीते हैं कि कहीं उनके साथ फिर से ऐसा ना हो जाए. अमेरिका में एफ्रो-अमेरिकन जॉर्ज फ्लॉएड की मई 2020 में पुलिस के हाथों मैत के बाद यह मुद्दा जर्मनी में भी गर्माया था. सवाल उठे कि क्या जर्मन पुलिस में भी नस्लवाद इस तरह रचा बसा है? इस पर अब्दुल-रहमान कहती हैं, "कुल मिलाकर, मैं कहूंगी कि जर्मनी में अमेरिका जितने ऊंचे स्तर की पुलिस क्रूरता नहीं होती. लेकिन ऐसे मामलों की जांच में समस्या जरूर है." (dw.com)
रिपोर्ट: मेलिना ग्रुंडमन/आरपी
-चारु कार्तिकेय
सरकार के अनुसार तीसरा पैकेज कुल 2,65,080 करोड़ रुपयों का है. इसमें रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए एक नई योजना, तनाव से गुजर रहे 26 सेक्टरों के लिए कुछ कदम, और संपत्ति खरीदने वालों और रियल एस्टेट डेवलपरों के लिए कुछ कदम हैं. नई "आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना" के तहत भविष्यनिधि संगठन (ईपीएफओ) के साथ पंजीकृत कंपनियां अगर नए लोगों को या मार्च से सितंबर के बीच नौकरी गंवा चुके लोगों को नौकरी पर रखती हैं तो उन्हें सरकार की तरफ से कुछ लाभ मिलेंगे.
इतिहास में पहली बार लगातार दो तिमाहियों में नकारात्मक वृद्धि के दौर से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था पर इन नए कदमों का कितना असर हो पाएगा, यह तो कुछ समय बाद ही पता चलेगा. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि पिछले दो पैकेजों और दूसरे छोटे छोटे कदमों का अर्थव्यवस्था पर कितना असर हो पाया. मार्च के अंत में केंद्र सरकार महामारी से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए पहले आर्थिक पैकेज लेकर आई थी, जिसे प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज कहा गया था.
एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये के इस राहत पैकेज का फोकस आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर रखा गया था. इसमें गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए अतिरिक्त खाद्यान्न, मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी में वृद्धि, मजदूरी में बढ़ोतरी है, अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बीमा, किसानों, विधवाओं, बुजुर्गों और विकलांगों को धनराशि, गरीबी रेखा से नीचे गुजर करने वाले परिवारों को अगले मुफ्त गैस के सिलेंडर, महिला स्वयंसेवी समूहों को और ज्यादा कोलैटरल मुक्त लोन, भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) खातों में सरकार द्वारा योगदान इत्यादि कदम शामिल थे.

अपर्याप्त स्टिमुलस
मई में कोविड-पैकेज की दूसरी किस्त आई जिसका मूल्य लगभग तीन लाख करोड़ रुपए था. इसमें किसानों, प्रवासी श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी वालों के लिए कुछ कदम थे, जैसे गरीबों और विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों के लिए अन्न की मुफ्त आपूर्ति, रेहड़ी-पटरी वालों के लिए आसान लोन, छोटे व्यापारियों को लोन के ब्याज पर दो प्रतिशत की छूट और छोटे और मझौले किसानों के लिए लोन लेने में मदद इत्यादि.
हालांकि सरकार का दावा है कि वो अभी तक कुल 29,87,641 करोड़ रुपयों के स्टिमुलस कदमों की घोषणा कर चुकी है, जिसमें आत्मनिर्भर पैकेज 3.0 भी शामिल है. जानकारों का लगातार यह कहना रहा है कि एक तो अर्थव्यवस्था को जो घाटा हुआ है उसकी भरपाई के लिए जितनी रकम के स्टिमुलस पैकेज की आवश्यकता थी, उतनी धनराशि कभी सरकार ने जारी ही नहीं की.
दूसरी बात यह कि जिन कदमों की घोषणा सरकार ने की भी उनमें सरकारी खर्च का अनुपात बहुत कम था. ऐसे में इन पैकेजों से वास्तविक राहत मिलने की उम्मीद बहुत कम थी. हालांकि अब जानकार मानते हैं कि अगर तालाबंदी के शुरूआती असर से तुलना करें तो स्थिति में कुछ सुधार जरूर आया है. आरबीआई ने जहां अप्रैल से मई की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 24 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया था, वहीं जुलाई से सितंबर की दूसरी तिमाही में लगभग 9 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया है.

दूसरी तिमाही में थोड़ा सुधार
नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से जुड़े अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने डीडब्ल्यू को बताया कि उनके आकलन के मुताबिक पहली तिमाही में लगभग 45 प्रतिशत की गिरावट थी जो दूसरी तिमाही में थोड़ा संभल कर 30 प्रतिशत पर सिमट गई है. ये कोविड के पहले के स्तर के मुकाबले अभी भी अत्यंत चिंताजनक स्थिति है लेकिन कोविड शुरू होने के बाद की स्थिति में तुलनात्मक रूप से सुधार हुआ है.
अर्थव्यवस्था में मूल संकट मांग का है, मतलब लोग आवश्यक चीजों के अलावा और कुछ खरीद नहीं रहे हैं. अरुण कुमार कहते हैं कि मांग कुछ हद तक बढ़ी है लेकिन उतनी ही जितनी धनराशि मांग को प्रोत्साहन देने के लिए अर्थव्यवस्था में सरकार ने लगाई थी, जो अपने आप में काफी अपर्याप्त थी. इसलिए मांग में अभी भी कमी देखी जा रही है. जानकारों का कहना है कि इस समय त्योहारों का मौसम होने के बावजूद बाजारों में जितनी भीड़ है उतनी खरीद-बिक्री नहीं हो रही है.
अरुण कुमार का कहना है कि इस समय सिर्फ टेलीकॉम, फार्मा, आईटी और एफएमसीजी जैसे चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़ कर बाकी सब क्षेत्रों में गिरावट चल रही है और इसी वजह से यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी अर्थव्यवस्था में सुधार आ गया है.(DW.COM)
-नवजीवन राजनीतिक ब्यूरो
बिहार चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। हालांकि अभी इन चुनावों का जमीनी स्तर पर विश्लेषण होना बाकी है, लेकिन फिलहाल जो मुख्य दस बातें सामने आ रही हैं, वे इस तरह हैं:
बहुत सी सीटों पर जीत का कम अंतर
बिहार में कम से कम 28 सीटें ऐसी रहीं जहां जीत का अंतर 1000 वोटों से भी कम रहा। वहीं 62 सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर 2000 वोटों से कम और 113 सीटों पर जीत का अंतर 3000 वोटों से कम रहा। इस तरह बिहार की कुल 243 सीटों में 203 सीटें ऐसी रहीं जहां कांटे का मुकाबला देखने को मिला। इसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि जब कहीं अधिक प्रत्याशी हों तो उसी दल को जीत मिल सकती है जो बेहतर तरीके से संयोजित और संगठित होन के साथ ही संसाधनों वाला भी हो।
महिलाओं ने किया नीतीश के लिए वोट!
माना जा रहा है और चुनाव आयोग के आंकड़े भी संकेत देते हैं कि इस बार के चुनाव में महिला मतदाताओँ ने नीतीश कुमार के पक्ष में वोट डाले। इसे राजनीतिक विश्लेषण की भाषा में एक्स फैक्टर कहा जा रहा है। कहा जा रहा है कि इसी साइलेंट वोटर ने नीतीश और एनडीए की जीत सुनिश्चित की। लेकिन ये आंकड़े कितने सटीक हैं आने वाले दिनों में इसका विश्लेषण करना जरूरी होगा।
योगी-नीतीश की रणनीतिक जुगलबंदी
बिहार में तीसरे चरण के मतदान से पहले बीजेपी ने अपने स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारा। योगी ने अपेक्षा के मुताबिक हिंदुत्व और सीएए-एनआरसी जैसे मुद्दे उठाए, जिसकी नीतीश कुमार ने खुलकर काट की। नीतीश कुमार ने खुलकर कहा कि भारतीय नागरिकों और मुस्लिमों कोई देश से नहीं निकाल सकता। इससे ध्रुवीकरण का माहौल बना जिसका फायदा बीजेपी को हुआ।
वामदलों का उत्थान
इस बार के चुनाव में सीपीआई-माले ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा और 12 पर जीत दर्ज की। जबकि 2015 के चुनाव में इसके खाते में सिर्फ तीन सीटें ही आई थीं। वहीं सीपीआई-सीपीएम ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ा और 4 सीटें जीतीं। इस तरह वामदलों के खाते में 16 सीटें गईं। बिहार में नक्सल, माओवादियों और कथित अर्बन नक्सल के राग के बावजूद वामदलों की यह जीत महत्वपूर्ण है। करीब 25 साल बाद बिहार में वामदलों का उत्थान उनके लिए नई ऊर्जा का काम करेगा।
हर चौथे वोटर ने दिया अन्य को वोट
बिहार चुनाव में इस बार महागठबंधन और एनडीए दोनों के हिस्से में करीब 37-37 फीसदी वोट आए हैं। यानी बाकी करीब 25 फीसदी वोट अन्य पार्टियों या निर्दलीयों के खाते में गए हैं। अर्थात हर चौथा वोटर मुख्य गठबंधनों के अलावा किसी अन्य से प्रभावित रहा।
जातिमुक्त नहीं हुआ है बिहार
बिहार के नतीजे साफ बताते हैं कि जातीय सघनता वाले इलाकों में वोटरों ने अपनी ही जाति का समर्थन किया है। अति पिछड़ों और अल्पसंख्यकों ने सीमांचल में नीतीश कुमार का साथ दिया तो उच्च जातियों ने बीजेपी का। इसके अलावा बिहार एम-वाई समीकरण यानी मुस्लिम-यादव वोटर अभी भी आरजेडी के साथ ही जुड़ा हुआ है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य
नीतीश कुमार ने अपनी आखिरी चुनावी रैली में ऐलान किया था कि यह उनका आखिर चुनाव है, ‘अंत भला तो सब भला...’ लेकिन जेडीयू नेताओं ने इसे नया मोड़ देते हुए कहा कि उनका तात्पर्य आखिरी चुनावी रैली से था। वैसे भी जेडीयू में नीतीश के बाद दूसरा नेता है नहीं, ऐसे में पार्टी के साथ ही नीतीश कुमार भविष्य भी अधर में ही लटका दिख रहा है। सवाल उठने लगे हैं कि नीतीश के बिना जेडीयू अपना अस्तित्व बचा पाएगा या नहीं।
कांग्रेस का प्रदर्शन
कांग्रेस ने इस चुनाव में 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, और उसके हिस्से में 19 सीटों पर जीत आई और उसने 9.75 फीसदी वोट हासिल किए। यह औसत आरजेडी, बीजेपी और जेडीयू से कम है। इन तीनों दलों ने कांग्रेस के मुकाबले कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा और उनका जीत का औसत काफी अच्छा रहा।
हर दौर का मिजाज साबित हुआ अलग
बिहार में तीन दौर में मतदान हुआ और हर दौर में वोटरों को मिजाज अलग साबित हुआ। पहले दौर में तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया तो दूसरे में एनडीए बेहतर स्थिति में रहा। लेकिन तीसरे और आखिरी दौर पर तो एनडीए ने पूरी तरह कब्जा कर लिया। माना जा सकता है कि इन दौर में स्थानीय मुद्दे हावी रहे।
शहरी इलाकों में कम मतदान
शहरी इलाकों की सीटों पर कम मतदान से एक बात तो साफ हो गई कि बिहार में इस बार लहर किसी की नहीं थी। लेकिन इससे किस पार्टी को नुकसान और किसे फायदा हुआ इसका विश्लेषण आने वाले दिनों में किया जाएगा(https://www.navjivanindia.com/)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में वही हुआ, जो अक्सर दक्षेस (सार्क) की बैठकों में होता है। चीन, रुस, पाकिस्तान और मध्य एशिया के चार गणतंत्रों के नेता अपनी दूरस्थ बैठक में अपना-अपना राग अलापते रहे और कोई परस्पर लाभदायक बड़ा फैसला करने की बजाय नाम लिये बिना एक-दूसरे की टांग खींचते रहे।
बैठक तो उन्होंने की थी, संयुक्तराष्ट्र संघ के 75 साल पूरे होने के अवसर पर लेकिन उनमें से पूतिन, शी, मोदी या इमरान आदि में से किसी ने भी यह नहीं कहा कि संयुक्तराष्ट्र के चेहरे पर जो झुर्रियां पड़ गई हैं, उन्हें हटाने का कोई उपाय किया जाए या संयुक्तराष्ट्र 75 साल का होने के बावजूद अभी तक अपने घुटनों पर ही रेंग रहा है तो कैसे दौडऩे लायक बनाया जाए ?
हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात की शाबाशी दी जा सकती है कि उन्होंने अपने भाषण में किसी राष्ट्र पर वाग्बाण नहीं छोड़े बल्कि ऐसे संगठनों की बैठकों में परस्पर वाग्बाण चलाने का उन्होंने विरोध किया। यही ऐसे संगठनों का लक्ष्य होता है। यह सावधानी रुस के व्लादिमीर पूतिन ने भी बरती। मोदी ने संयुक्तराष्ट्र की तारीफ करते हुए बताया कि भारत ने उसकी शांति सेना के साथ अपने सैनिकों को दुनिया के 50 देशों में भेजा है और कोरोना से लडऩे के लिए लगभग 150 देशों को दवाइयां भिंजवाई हैं।
मोदी ने मध्य एशियाई राष्ट्रों के साथ भारत के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों का भी जिक्र किया। क्या ही अच्छा होता कि वे दक्षेस के सरकारी संगठन के मुकाबले एक दक्षिण और मध्य एशियाई राष्ट्रों की जनता का जन-दक्षेस खड़ा करने की बात करते। मैं स्वयं इस दिशा में सक्रिय हूं।
चीन के नेता शी चिन फिंग ने अपने भाषण में नाम लिए बिना अमेरिकी दखलंदाजी को आड़े हाथों लिया लेकिन इमरान खान वहां भी चौके-छक्के लगाने से नहीं चूके। उन्होंने फ्रांस को दुखी करने वाले इस्लामी कट्टरवाद की पीठ तो ठोकी ही, भारत पर पत्थरबाजी करने से भी वे बाज नहीं आए। भारत का नाम तो उन्होंने नहीं लिया लेकिन कश्मीर का मसला उठाकर उन्होंने आत्म-निर्णय की मांग की, नागरिकता संशोधन कानून और कई सांप्रदायिक मसलों का जिक्र किया।
अच्छा हुआ कि इमरान ने मोदी को उस बैठक में दूसरा हिटलर नहीं कहा। इमरान खान को मैं जितना जानता हूं, वे काफी अच्छे और संयत इंसान हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि वे अपनी फौज और मुल्ला-मौलवियों की कठपुतली बने हुए हैं। पेरिस के हत्याकांड पर उनका शुरुआती बयान काफी संतुलित था, लेकिन पश्चिम और मध्य एशिया के मुसलमानों की लीडरी के खातिर उन्होंने इस मंच का इस्तेमाल कर लिया। मुझे शंका होती है कि यह एससीओ संगठन भी दक्षेस की तरह बड़बड़ाती मुर्गियों का दड़बा बनकर रह जाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-मणिकांत ठाकुर
तेजस्वी यादव बिहार में सरकार नहीं बना सके, यह तो ज़ाहिर है. लेकिन कई मायनों में तेजस्वी ने राष्ट्रीय जनता दल को नई ताक़त दी है, नया भरोसा दिया है. लेकिन उनके कई फ़ैसलों पर सवाल भी उठे हैं.
तेजस्वी की कुछ रणनीतियाँ उनके ख़िलाफ़ भी गई हैं. इन सबके बीच अब उनकी अनुभवहीनता की नहीं, कड़ी मेहनत के बूते विकसित संभावनाओं वाली नेतृत्व-क्षमता की चर्चा हो रही है. चुनाव परिणाम भी यही बताते हैं कि 'महागठबंधन' को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सामने मज़बूती से खड़ा कर देने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.
राज्य की सत्ता पर डेढ़ दशक से क़ब्ज़ा बनाए हुए नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सामने सबसे बड़े दल के रूप में आरजेडी को जगह दिलाना कोई आसान काम नहीं था.
वो भी तब, जब उनके पिता और आरजेडी के सर्वेसर्वा लालू यादव जेल में हों और परिवारवाद से लेकर 'जंगलराज' तक के ढेर सारे आरोपों से उन्हें जूझना पड़ रहा हो.
ऐसी सूरत में 31 साल के तेजस्वी की सराहना उनके सियासी विरोधी भी खुलकर न सही, मन-ही-मन ज़रूर कर रहे होंगे.

तेजस्वी ने मोड़ा चुनाव अभियान का रूख़
सबसे बड़ी बात कि जातिवादी, सांप्रदायिक और आपराधिक चरित्र के राजनीतिक माहौल में लड़े जाने वाले चुनाव को जन सरोकार से जुड़े मुद्दों की तरफ़ मोड़ने में तेजस्वी पूरी कोशिश करते दिखे.
इस कोशिश में वह कम-से-कम इस हद तक तो कामयाब ज़रूर हुए कि बेरोज़गारी, शिक्षा/चिकित्सा-व्यवस्था की बदहाली, श्रमिक-पलायन और बढ़ते भ्रष्टाचार के सवालों से यहाँ का सत्ताधारी गठबंधन बुरी तरह घिरा हुआ नज़र आया.
बार-बार पुराने लालू-राबड़ी राज के कथित जंगलराज और उसके 'युवराज' की रट लगाने में भाषाई मर्यादा की सीमाएँ लांघी गई. व्यक्तिगत आक्षेप करने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो आगे रहे ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी तेजस्वी पर हमलावर हुए.
इतने आक्रामक उकसावे पर भी तेजस्वी यादव का उत्तेजित न होना, संयम नहीं खोना और 'गालियों' को भी आशीर्वाद कह कर टाल देना, उनके प्रति लोगों में सराहना का भाव पैदा कर गया.
ख़ासकर जब तेजस्वी अपने तूफ़ानी प्रचार अभियान के दौरान '10 लाख सरकारी नौकरी' समेत कई समसामयिक मसलों से जुड़े मुद्दों वाला चुनावी एजेंडा सेट करने लगे थे, तो सत्तापक्ष की चिंता काफ़ी बढ़ने लगी थी.
इसके अलावा तेजस्वी की चुनावी सभाओं में भीड़ भी ख़ूब उमड़ी और इसने सत्ता पक्ष में चिंता भी पैदा कर दी थी.
पूरे प्रचार के दौरान तेजस्वी का जाति और धर्म से ऊपर उठकर सबको जोड़ने जैसी बातें करना और 'मुस्लिम-यादव जनाधार' पर लंबे समय तक टिकी लालू-राजनीति से थोड़ा बाहर निकल कर व्यापक सोच में उतरना, तेजस्वी को एक अलग पहचान दे गया है.

वो चूक जिसके कारण सत्ता तक नहीं पहुंच सके
बेतरीन तरीक़े से चुनाव लड़ने के इतर तेजस्वी से कुछ ऐसी चूकें भी हुई हैं, जो 'महागठबंधन' को सत्ता तक पहुँचने में बाधक साबित हुईं. ख़ासकर कांग्रेस के दबाव में आ कर उसे 70 सीटों पर उम्मीदवारी देने के लिए राज़ी हो जाना, उनकी सबसे बड़ी चूक मानी जा रही है.
इस बाबत आरजेडी ने दबे-छिपे अंदाज़ में ही सही, अपनी जो विवशता ज़ाहिर की है, वो यह है कि कांग्रेस मनचाही संख्या में सीटें नहीं दिए जाने की स्थिति में 'महागठबंधन' से अलग हो जाने तक का संकेत देने लगी थी.
इतना ही नहीं, जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार से भी कांग्रेस के संपर्क-सूत्र बन जाने और चुनाव परिणाम के बाद समीकरण बदलने तक की चर्चा सरेआम होने लगी थी.
दूसरी वजह यह भी थी, कि जीतनराम माँझी, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी से जुड़ी पार्टियों को 'महागठबंधन' से जोड़े रखना जब संभव नहीं रहा, तब कांग्रेस को किसी भी सूरत में साथ रखना तेजस्वी की विवशता बन गई. ऐसा नहीं होता, तो मुस्लिम मतों में कुछ विभाजन और सवर्ण मतों की उम्मीद घट जाने की आशंका थी.
दूसरी कमज़ोरी यह मानी जा रही है कि 'महागठबंधन' ने उत्तर बिहार में अति पिछड़ी जातियों (पचपनिया कहे जाने वाले वोटबैंक) के बीच एनडीए की गहरी पैठ को उखाड़ने या कम करने संबंधी कोई कारगर प्रयास नहीं किया. सिर्फ़ इस समुदाय के लिए चुनावी टिकट देने में थोड़ी उदारता दिखा कर तेजस्वी निश्चिंत से हो गए.
उधर सीमांचल में उम्मीदवार चयन को लेकर आरजेडी पर कई सवाल उठे और वहाँ मुस्लिम समाज में इस नाराज़गी का फ़ायदा असदुद्दीन ओवैसी ने उठाया. दूसरी बात ये भी कि 'जंगलराज' की वापसी जैसा ख़ौफ़ पैदा करने वाले प्रचार का पूरी प्रखरता के साथ प्रतिकार करने में तेजस्वी कामयाब नहीं हो सके.
वैसे तो कमोबेश हरेक दल आपराधिक छवि वालों को चुनाव में उम्मीदवार बनाने का दोषी रहा है, फिर भी आरजेडी पर ऐसे दोषारोपण ज़्यादा होने के ठोस कारण साफ़ दिख जाते हैं. इस बार तेजस्वी भी दाग़ी छवि वालों को, या उनके रिश्तेदारों को उम्मीदवार बनाने के दबाव से मुक्त नहीं रह सके. तो आरजेडी को स्वीकार करने वालों की तादाद बढ़ाने में तेजस्वी को मुश्किलें होंगी ही.
क्या होगी आगे की राह
अब सवाल उठता है कि राज्य में सत्ता-शीर्ष तक पहुँचने से कुछ ही क़दम दूर रह जाने वाले इस युवा नेता की दशा-दिशा क्या होने वाली है. इसका जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि तेजस्वी यादव अपनी पार्टी को बिहार की राजनीति में आगे बढ़ाने को तैयार दिख रहे हैं.
लालू यादव ने पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीयू नेता नीतीश कुमार के साथ एक मज़बूत गठबंधन में रहते हुए 80 सीटों के साथ आरजेडी को सत्ता तक पहुँचाया था. तब सियासी हालात उनके बहुत अनुकूल इसलिए भी बने, क्योंकि नीतीश कुमार के तैयार किए हुए वोट बैंक भी उनके काम आ रहे थे.
अब ऐसा भी नहीं लग रहा कि लालू यादव के सहारे के बिना तेजस्वी अपनी सियासत को मज़बूती दे पाने में समर्थ नहीं हैं. अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए उन्होंने यहाँ सत्ताधारी गठबंधन को अकेले अपनी मेहनत और सूझबूझ से कड़ी टक्कर दी है. ये यही दिखाता है कि आगे भी बिहार में बीजेपी की मौजूदा बढ़त को तेजस्वी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल से ही चुनौती मिल सकती है.
अपने 'महागठबंधन' से जुड़े वामदलों को जिस कुशलता के साथ तेजस्वी ने जोड़ कर रखा, उसका चुनाव में आरजेडी और वामदल, दोनों को लाभ हुआ. इसलिए ऐसा लगता है कि आगे भी यह रिश्ता दोनों निभाना चाहेंगे. लेकिन कांग्रेस और आरजेडी के रिश्ते में ज़रूर दरार आई है.
एक बात और ग़ौरतलब है कि लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के अध्यक्ष चिराग़ पासवान अगर और उभर कर बिहार की राजनीति में असरदार बने, तो यह तेजस्वी के लिए भी एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी. ख़ासकर इसलिए, क्योंकि दलित वर्ग से आरजेडी में कोई असरदार नेतृत्व अभी भी नहीं है.
दूसरी बात कि चिराग़ भी युवा हैं और उन्होंने बिहार में अपनी राजनीतिक ज़मीन को दलित-दायरे से निकाल कर विस्तार देने वाली भूमिका बाँध चुके हैं. दोनों एकसाथ भी नहीं आ सकते, क्योंकि नेतृत्व और वर्चस्व की चाहत आड़े आ जाएगी.
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इस चुनाव-परिणाम ने तेजस्वी को सत्ता-प्राप्ति के बिल्कुल क़रीब ले जाकर मौक़ा चूक जाने का सदमा तो दिया है, लेकिन उनके लिए अवसर ख़त्म हो गए हैं, ऐसा भी नहीं है. इसी में उनके लिए संभावना भी छिपी हो सकती है. (bbc.com/hindi)
-बाला सतीश
वो सिविल सेवा में जाना चाहती थीं, कॉलेज की पढ़ाई पूरी करना चाहती थीं, ऑनलाइन क्लास लेना चाहती थीं... लेकिन, उनके पास कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे, एक साल बाद हॉस्टल से निकल जाने की चिंता सता रही थी और ऑनलाइन क्लास के लिए लैपटॉप खरीदने को वो जूझ रही थीं...
ये थी ऐश्वर्या रेड्डी की पढ़ने की चाहत और उस पर बंधी तंगहाली की बेड़ियां. वो बेड़ियां जिसने एक होनहार छात्रा को अपनी जान लेने पर मज़बूर कर दिया. कभी शहर की टॉपर रही ये लड़की आर्थिक मजबूरियों से लड़ते-लड़ते हार गई.
कभी शहर में टॉप करने वालीं ऐश्वर्या ने तंगहाली से लड़ते-लड़ते आख़िर में दो नवंबर को आत्महत्या कर ली. उनके आख़िरी शब्द थे 'मैं अपने घर में कई ख़र्चों की वजह हूं. मैं उन पर बोझ बन गई हूं. मेरी शिक्षा एक बोझ है. मैं पढ़ाई के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती.'
ऐश्वर्या की पढ़ाई के लिए जद्दोजहद की कहानी कुछ चंद महीनों की नहीं बल्कि एक लंबे समय का संघर्ष है.
हैदराबाद से 50 किमी. दूर स्थित शादनगर में ऐश्वर्या रेड्डी का घर है. जब हम उनके घर पहुंचे तो एक दो कमरों के घर के बाहर मीडिया का जमावड़ा लगा था. पत्रकार ऐश्वर्या की मां से बात करना चाहते थे.
परिवार को सांत्वना देने के लिए राजनीतिक दलों के नेताओं का घर पर आना-जाना लगा था.
ऐश्वर्या के पिता गांता श्रीनिवास रेड्डी एक मेकेनिक हैं और उनकी मां सुमति घर पर सिलाई का काम करती हैं.
ऐश्वर्या बचपन से ही मेधावी छात्रा थीं रही. उन्हें बारहवीं पूरी करने के लिए मुफ़्त शिक्षा मिली थी. उन्होंने बारहवीं में 98 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करके पूरे शहर में टॉप किया था.

दिल्ली में रहने और पढ़ने का खर्च
बारहवीं में उनके नंबर देखकर परिवार के एक परिचित ने नई दिल्ली में लेडी श्रीराम कॉलेज में दाखिला लेने का सुझाव दिया.
उन्होंने ऐश्वर्या को दाख़िला लेने में मदद करने का वादा किया. ऐश्वर्या सिविल सेवा में जाना चाहती थीं.
ऐश्वर्या को बीएससी ऑनर्स मैथमैटिक्स कोर्स में लेडी श्री राम कॉलेज में दाख़िला मिल गया. लेकिन, कॉलेज का ये नियम है कि कोर्स के पहले के साल के बाद हॉस्टल की सुविधा वापस ले ली जाती है. ऐश्वर्या को इस बात की जानकारी थी और एक साल के बाद की चिंता उन्हें हमेशा सताती थी.
वह ग्रेजुएशन के बाद सिविल सेवा की तैयारी करना चाहती थीं लेकिन कोचिंग के लिए पैसे इकट्ठा करना भी उनके लिए चुनौती बन गया था.
ऐश्वर्या के माता-पिता उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए दिन-रात कोशिशों में लगे थे. उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए घर का जेवर भी गिरवी रख दिया लेकिन फिर भी कुछ ना हो सका.

ऐश्वर्या रेड्डी ने जब शहर में टॉप किया था.
गिरवी रखा जेवर
ऐश्वर्या की मां सुमति रुंधी आवाज़ में कहती हैं, ''मैंने उसके दिल्ली जाने के लिए घर का जेवर बेचकर 80 हज़ार रुपयों का इंतज़ाम किया था. ऐश्वर्या को आगे होने वाले खर्चों की चिंता रहती थी. मैंने उसे कहा था कि अगर ज़रूरत हुई तो हम सोना बेच देंगे और उसके लिए लैपटॉप खरीदने की भी कोशिश करेंगे.'
''हमने उसे यहां तक कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर उसकी पढ़ाई के लिए हम अपना घर भी बेच सकते हैं. हमने उसे अपने सिविल सेवा के लक्ष्य पर ध्यान देने के लिए कहा था. मेरी बेटी पढ़ने में बहुत तेज़ थी. वो सिविल सेवा में नहीं भी जा पाती तो ऊंची रैंक की नौकरी ज़रूर पा लेती.'
''लेकिन, ऐश्वर्या हमसे घर और सोना बेचने के लिए हमेशा मना करती थी. मैं उसे कहती थी कि जब वो अधिकारी बन जाएगी तो हम ऐसे 10 घर खरीद सकते हैं.
''वह ऑनलाइन क्लासेज़ शुरू होने के बाद से लैपटॉप मांग रही थी और उसने बताया था कि 70 हज़ार का लैपटॉप ठीक रहेगा. मैंने उसे भरोसा दिलाया था कि हम उसे लैपटॉप दिला देंगे.''
हालांकि, परिवार की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें अपनी दूसरी बेटी को निजी स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में डालने का फैसला लेना पड़ा. पर वो ऐसा भी नहीं कर पाए. उन्हें स्कूल से ट्रांसफ़र सर्टिफिकेट लेने के लिए 7000 रुपयों की ज़रूरती थी. इतने पैसे ना होने के कारण उन्हें बेटी का स्कूल ही छुड़ाना पड़ गया.

ऐश्वर्या रेड्डी का परिवार
क्यों की आत्महत्या
अपनी ग्रैजुएशन की पढ़ाई के अलावा ऐश्वर्या फ्रेंच भाषा भी सीख रही थीं. वो लॉकडाउन के कारण अपने घर लौट आई थीं.
घर पर वो फ्रेंच सीखने के दौरान रात में फ्रेंच फ़िल्में देखा करतीं और सुबह देर तक उठती थीं. ऐश्वर्या का परिवार उन्हें घर के कामों से दूर रखता था और सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहता था.
वो रोज़ाना फोन पर ऑनलाइन क्लास, फ्रेंच क्लास लेतीं और दोस्तों से बात करतीं. वो ज़्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं और वहीं खाना खाती थीं. ऐश्वर्या को फोन पर ऑनलाइन क्लास लेने में दिक्कत होती थी इसलिए वो एक लैपटॉप खरीदना चाहती थीं.
इसी बीच ऐश्वर्या की वारंगल में एक दोस्त से मुलाक़ात हुई और उन्हें एजुकेशन लोन (शिक्षा ऋण) के बारे में पता चला. वह एक नवंबर को दोस्त से मिलने गई थीं.
दोस्त से मिलकर वापस आने पर ऐश्वर्या ने अपनी मां को एजुकेशन लोन के बारे में बताया.
सुमति बताती हैं, ''वो वापस लौटने के बाद बहुत खुश लग रही थी. उसने घर आकर डांस भी किया. उसने मुझे बताया कि उसकी दोस्त की मां ने उसे एजुकेशन लोन के बारे में बताया है और उसकी मदद करने की बात भी कही है.''
ऐश्वर्या अपने परिवार का दो लाख का कर्ज़ भी चुकाना चाहती थीं जो उनकी पढ़ाई के लिए लिया गया था. बाकी पैसों से वो अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थीं.
वो आख़िरी लड़ाई
हालांकि, उस दौरान ऐश्वर्या और उनकी मां के बीच कॉलेज एडमिशन के लिए दिल्ली जाने, वहां रहने और एडमिशन फीस में हुए खर्च को लेकर बहस हो गई. दोनों के बीच बहुत ज़्यादा बहस छिड़ गई.
बाद में, ऐश्वर्या अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया. उसने रोज़ की तरह फ़िल्म देखी और खाना खाने से मना कर दिया.
वो सुबह उठीं लेकिन दूसरे दिन भी खाना खाने से इनकार कर दिया.
ऐश्वर्या के पिता ने बाहर से खाने मंगाने के लिए भी कहा लेकिन उसने मना कर दिया.
हालांकि, ऐश्वर्या ने अपने पिता को उनकी डाइट के बारे में बताया क्योंकि उन्हें पीलिया हुआ था. उन्होंने अपने पिता को खाना भी खिलाया.
बाद में ऐश्वर्या अपने कमरे में चली गईं. उनके कमरे से काफ़ी देर तक कोई आवाज़ नहीं आई. उनकी बहन ने पायदान लेने के लिए जब कमरे में देखा तो ऐश्वर्या ने कमरे के पंखे से खुद को फांसी लगाई हुई थी.
सुमति रोते हुए कहती हैं, ''हमने उसे ज़मीन पर लिटाया और ऑटो लाने के लिए दौड़े. हम उसे जगाने की कोशिश कर रहे थे. हम सोच रहे थे कि काश ये सब झूठ हो.''

ऐश्वर्या का सुसाइड नोट
ऐश्वर्या ने अपने पीछे एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है. उन्होंने लिखा है-
''मेरी मौत के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है. मेरे कारण परिवार को बहुत खर्च उठाना पड़ रहा है. मैं उन पर बोझ बन गई हूं. मेरी पढ़ाई उन पर बोझ बन गई है. मैं इस बारे में लंबे समय से सोच रही हूं. मुझे लगता है कि मौत ही मेरी इस समस्या का एकमात्र हल है. लोग मेरी मौत के लिए कई कारण बता सकते हैं. हालांकि, मेरा कोई बुरा इरादा नहीं है. कृप्या देखें कि मुझे एक साल के लिए इंस्पायर स्कॉलरशिप मिल जाए. कृप्या मुझे माफ कर दें. मैं अच्छी बेटी नहीं हूं.''
ऐश्वर्या ने इस सुसाइड नोट के आख़िर में अंग्रेज़ी में अपने हस्ताक्षर किए हैं.
ऐसी कई संस्थाएं और लोग हैं जो होनहार और आर्थिक रूप से कमज़ोर स्टूडेंट्स की मदद करते हैं लेकिन ऐश्वर्या का परिवार उन तक नहीं पहुंच सका.
सुमति ने बीबीसी को बताया, ''हम किसी को नहीं जानते. हम नहीं जानते कि किससे मदद मांगनी चाहिए. कुछ लोगों ने हमें सलाह दी कि वो व्हाट्सऐप के ज़रिए मदद ले सकते हैं. लेकिन, हमने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि हमें डर था कि व्हाट्सऐप पर हमारी बेटी की फोटो सब तक पहुंच जाएगी और इससे हमारी बेइज्जती होगी. मैंने उन्हें रोक दिया.''
ऐश्वर्या ने मदद के लिए मुख्यमंत्री केसी रामाराव के बेटे और आईटी मंत्री केटी रामाराव को ट्वीट किया था और एक्टर सोनू सूद से भी लैपटॉप के लिए मदद मांगी थी.
आंसुओं के साथ अपनी बेटी को याद करते हुए सुमति कहती हैं, ''मैंने ही उस पर ज़ोर डाला था कि वो वारंगल से घर आ जाए और स्कॉलरशिप के लिए बैंक अकाउंट खोल ले. काश मैं उसे ना बुलाती और वो ज़िंदा होती.''
''हमने उसे हमेशा भरोसा दिलाया था कि पढ़ाई के लिए डरने की ज़रूरत नहीं है. एक दिन पहले हुए झगड़े से वो बहुत दुखी हो गई थी.''
अब कई ग़ैर-लाभकारी संगठनों, और सामाजिक कल्याण छात्र संघों, आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जाति संघों ने परिवार को समर्थन देने का आश्वासन दिया है. वर्तमान में, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) मामले को देख रहा है. (bbc.com/hindi)
-अनंत प्रकाश
दिल्ली में बीते पाँच दिनों से हवा इतनी ज़्यादा प्रदूषित हो चुकी है कि बेहद ख़तरनाक प्रदूषक पीएम 2.5 की हवा में मौजूदगी अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुँचीहै.
बीते गुरुवार से लेकर शनिवार, रविवार और सोमवार को दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण अपने उच्चतम स्तर पर दर्ज किया गया.
इस हवा में साँस लेना इतना ख़तरनाक है कि वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और अस्थमा एवं साँस से जुड़ी बीमारियां झेल रहे लोगों को आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं लेनी पड़ सकती हैं. वहीं, स्वस्थ लोगों के लिए लंबे समय तक इस हवा में साँस लेना नुकसानदायक साबित हो सकता है.
लेकिन ये पहला मौका नहीं है, जब नवंबर महीने के पहले-दूसरे हफ़्ते में ही दिल्ली की हवा इतनी प्रदूषित हो गई हो. पिछले कई सालों से दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में सर्दियां आते आते वायु प्रदूषण की समस्या खड़ी हो जाती है.
दिल्ली के गंगा राम अस्पताल में लंग कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार के मुताबिक़, उत्तर भारत के बड़े शहरों में प्रदूषण का ये ट्रेंड अगर इसी तरह जारी रहा तो इस क्षेत्र में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है. बीते साल ही दिल्ली की रहने वाली एक 28 वर्षीय महिला को लंग कैंसर होने की बात सामने आई थी जबकि वह सिगरेट या बीड़ी आदि नहीं पीती थीं.
ऐसे में सवाल ये उठता है कि इसका समाधान क्या है?
डॉ. अरविंद समेत देश के तमाम विशेषज्ञ मानते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या का सिर्फ एक समाधान है – वायु प्रदूषण को कम करना.
लेकिन पिछले कई सालों से वायु प्रदूषण कम होने की बजाए बढ़ता ही दिख रहा है. ऐसे में लोगों ने एन 95 मास्क और एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जिससे इस इंडस्ट्री में बेहद तेज़ उछाल आया है.
ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमेज़ॉन के मुताबिक़, साल 2016 में लोगों ने 2015 के मुक़ाबले 400% ज़्यादा एयर प्यूरीफ़ायर ख़रीदे थे. वहीं, 2017 में लोगों ने 2016 के मुक़ाबले 500 प्रतिशत ज़्यादा एयर प्यूरीफ़ायर ख़रीदे और एयर प्यूरीफायर आहिस्ता-आहिस्ता से टीवी, फ्रिज़, एसी जैसे होम एप्लाएंस कहे जाने वाले उत्पादों में शामिल हो चुका है.
बाज़ार में इस समय 5,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक के एयर प्यूरीफायर्स उपलब्ध हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या इस ज़हरीली हवा से बचने के लिए एयर प्यूरीफायर का सहारा लिया जा सकता है?

कितने कामयाब हैं एयर प्यूरीफायर?
एयर प्यूरीफायर बनाने वाली कंपनियां अपने विज्ञापनों में अलग-अलग तकनीकी शब्दों का प्रयोग करके ये जताने की कोशिश करती हैं कि उनके ब्रांड के एयर प्यूरीफायर आपको वायु प्रदूषण की समस्या से एक हद तक निजात दिला सकते हैं.
लेकिन अब तक किसी वैज्ञानिक अध्ययन में ये सिद्ध नहीं हुआ है कि एयर प्यूरीफायर दिल्ली जैसे विशाल शहर की आबादी को वायु प्रदूषण के नकारात्मक प्रभावों से बचा सकता है.
सेंटर फॉर साइंस एंड स्टडीज़ से जुड़े विशेषज्ञ विवेक चट्टोपाध्याय मानते हैं कि एयर प्यूरीफायर को एक समाधान मानना ग़लती होगी.
वे कहते हैं, “अभी हम जिस हवा में साँस ले रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिहाज़ से बेहद ख़तरनाक है. हम ख़राब, बहुत ख़राब स्तरों की बात नहीं कर रहे हैं. ये वो स्तर है जो कि सबसे ज़्यादा ख़राब है. इस हवा में साँस लेने से स्वस्थ लोगों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.”
लेकिन एयर प्यूरीफायर के प्रभावशाली होने या न होने के सवाल पर वे कहते हैं, “एयर प्यूरीफायर किसी जगह विशेष जैसे किसी कमरे की हवा में प्रदूषकों की संख्या कम कर सकता है. मान लीजिए कि आप एक कमरे में बैठे हैं, ऐसे में वहां आपको साँस लेने के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ेगी. लेकिन एयर प्यूरीफायर आपको ऑक्सीजन नहीं दे सकता. ऐसे में आपको इतनी जगह रखनी होगी कि बाहर से हवा अंदर आ सके. रूम में वेंटिलेशन की ज़रूरत होगी. ऐसे में एयर प्यूरीफायर को बाहर से अंदर आती हवा को शुद्ध करना होगा जो कि अपने आप में चुनौतीपूर्ण है.”
“आप दिन के 24 घंटे कमरे के अंदर नहीं बैठ सकते हैं. दिन के किसी भी वक़्त अगर एयर पॉल्युशन बहुत ज़्यादा हाई लेवल पर है और आप उसके संपर्क में आ जाते हैं तो उसका आप पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. ऐसे में आपने भले ही कुछ घंटे साफ हवा में बिता लिए हों लेकिन इसका कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है. एक और उदाहरण है कि जब आप ट्रैफिक में होते हैं तो थोड़ी सी देर ही अशुद्ध हवा में साँस लेने की वजह से आपको दिक्कत होने लगती है. ऐसे में बाहर की हवा को सुधारना हर हाल में ज़रूरी है.”
एयरप्यूरीफ़ायर खरीदने की आर्थिक क्षमता
चट्टोपाध्याय अपनी बात ख़त्म करते हुए एक दूसरे बिंदु की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं कि एक बड़ा सवाल ये है कि भारत में कितने लोग अच्छी क्वालिटी का एयर प्यूरीफायर ख़रीद सकते हैं?
इस बात में दो राय नहीं है कि भारत की आबादी में एक बड़ा वर्ग है जो कि प्यूरीफायर ख़रीदने में सक्षम नहीं है. लेकिन धीरे धीरे जैसे एयर कंडीशन ने मध्य वर्ग के घरों में जगह बनाई है, ठीक उसी तरह एयर प्यूरीफायर अपनी जड़ें जमाता जा रहा है.
लोग अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार एयर प्यूरीफायर खरीद रहे हैं. लगभग 10 हज़ार रुपये की कीमत वाले एयर प्यूरीफायर की बिक्री अपेक्षाकृत ज़्यादा हो रही है.
मगर एम्स (दिल्ली) पल्मनोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनंत मोहन मानते हैं कि इसे एक समाधान की तरह देखना बिलकुल ग़लत है.
वे कहते हैं, “एयर प्यूरीफायर के असर को लेकर साइंटिफिक जानकारी काफ़ी कम है. लेकिन वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए एयर प्यूरीफायर, (जब तक वे घर के अंदर हैं तब तक) उनके आसपास की हवा बाहर की तुलना में बेहतर कर सकता है. और कोई प्यूरीफायर कितना असरदार साबित होगा ये निर्भर करता है, उसके साइज़, इफिशिंएसी और कमरे के साइज़ पर, क्योंकि हर एयर प्यूरीफायर की क्षमता कमरे के साइज़ के मुताबिक़ अलग अलग होती है.”
“लेकिन घर से बाहर निकलते ही आप फिर प्रदूषित हवा के संपर्क में आ जाते हैं. और आप पूरे घर में एयर प्यूरीफायर नहीं लगा सकते. ऐसे में चूंकि अभी कोविड का दौर जारी है. और लोगों को घर पर रहने की सलाह दी जाती है. ऐसे में कुछ विशेष वर्गों (उम्र और बीमारी के आधार पर) के लिए एयर प्यूरीफायर काम कर सकता है. लेकिन इसे एक बड़ी आबादी के लिए घर के ज़रूरी सामान में शामिल करना मुश्किल होगा.”

एयर प्यूरीफायर के लिए तय मानकों की कमी?
लेकिन कम कीमत के प्यूरीफायर की बाज़ार में मौजूदगी को डॉ. अनंत मोहन चिंताजनक मानते हैं.
वे कहते हैं, “अब इस समय बाज़ार में इतनी तरह के प्यूरीफायर आ चुके हैं कि उनकी गुणवत्ता का नियंत्रण किया जाना बेहद ज़रूरी होगा. कुछ बड़ी कंपनियों के एयर प्यूरीफायर संभवत: गुणवत्ता वाले हों. लेकिन हम जानते हैं कि हर स्तर का माल बाज़ार में बिक जाता है. और जब ऐसे उत्पाद ख़रीदकर लोग ये सोचेंगे कि उन्होंने अपनी हवा की गुणवत्ता सुधार ली है तो ये पहले से ज़्यादा ख़तरनाक होगा. ऐसे में इस क्षेत्र में गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कड़े नियमों की ज़रूरत होगी कि बिना क्वालिटी कंट्रोल के मार्केटिंग और बिक्री की अनुमति ही न दी जाए.”
“लेकिन ये सब करते हुए भी हमें ये नहीं मानना चाहिए कि एयर प्यूरीफायर एक ज़रूरी चीज़ हो गई है. ऐसा मानने का मतलब ये है कि हमने ये मान लिया है कि हमारी एयर क्वालिटी और ख़राब होती जाएगी और जाने दिया जाए. ऐसे में एयर प्यूरीफायर किसी चीज़ का समाधान नहीं है. समाधान बस एक है – पर्यावरण को ठीक करना.” (bbc.com/hindi)
बाइडेन ने अपने सहयोगी रॉन क्लैन को व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त करने की घोषणा की है. बाइडेन जब राष्ट्रपति बन जाएंगे तो क्लैन उनके कार्यालय की देखरेख करेंगे और वरिष्ठ सलाहकार के रूप में काम करेंगे.
व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ की नियु्क्ति पूरी तरह से राजनीतिक होती है और इसके लिए सीनेट की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती है. चीफ ऑफ स्टाफ पूरी तरह से राष्ट्रपति के साथ मिलकर काम करता है और जरूरी मुद्दों पर अपनी सलाह देता है. जो बाइडेन ने अपने करीबी सहयोगी रॉन क्लैन को इस पद के लिए नियुक्त किया है. यह बाइडेन द्वारा पहली बड़ी नियुक्ति है और ट्रंप द्वारा हार नहीं स्वीकार करने के बावजूद राष्ट्रपति का पद संभालने के पहले अपना प्रशासन तैयार करने में पहला कदम है.
बराक ओबामा जब राष्ट्रपति थे और बाइडेन उप राष्ट्रपति तब 59 वर्षीय क्लैन ने बाइडेन के लिए चीफ ऑफ स्टाफ के तौर पर काम किया था. बाइडेन के चुनाव जीतने के बाद से ही इस पद के लिए उनके नाम की चर्चा जोरों पर थी.
साल 2014 में जब इबोला वायरस अफ्रीका में फैला तो क्लैन ने इस संकट से निपटने में अहम भूमिका निभाई थी. इबोला के खिलाफ कार्रवाई में ओबामा प्रशासन ने कई अहम फैसले लिए थे. क्लैन ने मौजूदा महामारी कोरोना से निपटने में ट्रंप की नाकामी की जमकर आलोचना की है. क्लैन ऐसे समय में अपना पद संभालने जा रहे हैं जब देश एक भयंकर महामारी की चपेट में है. अमेरिका में अस्पतालों में कोरोना मरीजों से बिस्तर भरे पड़े हैं और देश की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. बाइडेन कह चुके हैं कि कोरोना वायरस को काबू करना उनकी प्रमुख प्राथमिकता है.
वॉशिंगटन में व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ एक शक्तिशाली पद है. इस पद पर बैठा व्यक्ति एक गेट कीपर की तरह काम करता है, जो यह फैसला लेता है कि राष्ट्रपति किससे बात करें और किससे नहीं करें और अक्सर कई बड़े फैसले के पहले वही व्यक्ति आखिरी सलाहकार भी होता है. आम तौर पर ऐसी नियुक्ति नया राष्ट्रपति सबसे पहले करता है जो कि नए प्रशासन के लिए स्वर तय करता है.
2008-2009 के आर्थिक संकट के समय भी क्लैन ने बाइडेन के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं. इस चुनाव में उन्होंने बाइडेन के चुनाव अभियान में बाहर से सलाहकार के रूप में काम किया. बाइडेन ने क्लैन की नियुक्ति पर कहा, "राजनीतिक क्षेत्र के लोगों के साथ काम करने का उनका लंबा, विविध अनुभव है और उनकी क्षमता ठीक वैसी ही है जैसी मुझे व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ में चाहिए, क्योंकि हम अभी संकट का सामना कर रहे हैं और हमारे देश को एकसाथ लाने की जरूरत है."
एए/सीके (रॉयटर्स, एएफपी)


