विचार/लेख
-प्रकाश दुबे
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थक बेबाक सच कहने वाला कह कर वाहवाही करते हैं। अक्ल का इस्तेमाल करने से बचने वाले पप्पू की उनकी छवि विरोधियों ने बहुत पहले से बना रखी है। भले बुरे की परवाह किए बगैर राहुल मन की बात कहने से नहीं रुकते। बिहार में मंदिर निर्माण और घुसैठियों का मुद्दा गरमाने की कोशिश के बीच राहुल सभाओं में कहते फिरे-महागठबंधन की सत्ता आई तो सबसे पहले किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की शाखा खोली जाएगी। कांग्रेस राज में इसके लिए धनराशि का प्रावधान किया गया था। केन्द्र से कांग्रेस सरकार हटी। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल का साथ छोडक़र भाजपा के साथ चले गए। इसलिए वादा सरकारी फाइलों में धरा रह गया। कुछ कांग्रेसी खुश हुए। कुछ घबराए। अलीगढ़ मुस्लिम विवि छात्रसंघ के नेता को टिकट देकर कांग्रेस वैसे भी विवाद में फंसी है। विरोधियों ने जमकर प्रचार किया कि उम्मीदवार तो टुकड़े टुकड़े गिरोह का सरगना है। राहुल ने इन बातों पर माथापच्ची नहीं की। प्रधानमंत्री सहित कई नेताओं को राहुल की घोषणा पर फब्ती कसने का अवसर मिला।
ज्योतिषीजी का नया घर
बिहार के चुनाव में राजनीतिकों से दस कदम अधिक उत्सुकता पत्रकार बिरादरी की है। सबके अपने अपने कारण हैं। अपनी अपनी पसंद नापसंद है। देश के दो चैनलों ने चुनाव दिखाने का प्रचार करते हुए अपने दावे का प्रचार किया। विज्ञापन किया। होर्डिंग लगाए। इस होड़ में इंडिया टीवी के सर्वेसर्वा और चैनलों के एक संगठन के मुखिया पिछड़ गए। उन्हें पीछे छोडऩे वाले चैनल का नाम बिना बताए आप जान गए होंगे। रिपब्लिक टीवी ने अनेक शहरों के अनेक स्थानों पर हार्डिंग लगाए। अर्णब गोस्वामी की बडी सी तस्वीर के साथ भोजपुरी में लिखा था-केकर होईल बिहार (बिहार किसका होगा?) भारत में गणतंत्र की शुरुआत बिहार से हुई थी। बिहार में ही पता लगा कि दुनिया के एक गणतांत्रिक को अमेरिका में सरकारी मकान से बेदखल कर दिया। गणतंत्र के भारतीय टीवी प्रवक्ता की महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी आवास में रहने की व्यवस्था कर दी। बिहार का भविष्य कौन बाँचे?
लक्ष्मी का आवागमन
संसद की बहस से लेकर चुनाव प्रचार तक नकारात्मक बातें उछलती हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक इसके शिकार होते हैं। यह नहीं सोचते कि दोनों ने सांसारिक जीवन का सुख त्याग कर जनता का संसार सुधारने में जीवन लगा दिया। लोक जन शक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कई जगह सीता मैया का मंदिर बनाने की घोषणा दोहराई। अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर का उल्लेख प्रधानमंत्री, योगी आदि नेता करते रहे। उ प्र के मुख्यमंत्री ने राम जन्मभूमि को सीता मैया की जन्मभूमि से जोडऩे के काम की प्रगति की जानकारी दी। योगी ने बताया कि काम पूरा होने पर अयोध्या से सीतामढ़ी, जनकपुर छह घंटे के अंदर पहुंचना संभव होगा। भविष्यवाणी से आये दिन सडक़ मार्ग से यात्रा करने वालों के चेहरे खिले। द्वापर युग में जानकी मायके से गाजे-बाजे के साथ अयोध्या पहुंचीं। दशहरे पर रावण को मार कर लक्ष्मी पूजन के दिन राजधानी में दीपोत्सव समारोह मनाया। लंका से वापसी के बाद राजाज्ञा के कारण लक्ष्मण जी रथ से ले जाकर भाभी को वन में छोड़ आये थे। वह वाल्मीकि आश्रम बिहार में है। वाल्मीकि नगर में लोकसभा का उपचुनाव है। सकारात्मक सोच के अवसर सर पर हैं-महामारी से मुक्ति, माँ जानकी का मंदिर, लक्ष्मी पूजन आदि आदि।
पटाखेबाज नेता
कोरोना के बहाने पटाखे फोडऩे से मनाही पर कई लोगों के चेहरे उतर गए। बनाने और बेचने वलों के तो बिना प्रदूषण आंखों से आंसू बहने लगे। महामारी से लेकर चुनाव हलचल के बीच किसी ने ध्यान नहीं दिया। एक ही बड़े दिल वाला है। दिल्ली में रहने वाले इस दिलवाले का नाम है-विजय गोयल। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार मे राज्य मंत्री रह चुके गोयल इन दिनो उपेक्षित हैं। गोयल ने दिल्ली सरकार से पटाखे वालों की नुक़सान भरपाई करने की माँग की पुराने लोकसभा क्षेत्र चाँदनी चौक के पटाखे वालों से मिलने के बाद गोयल ने चेतावनी दी-केजरीवाल सरकार मांग पूरी करे अन्यथा धरना दूंगा। पटाखे की पहली लड़ी की आवाज हुई। भाजपा शासित राज्यों में उल्टी प्रतिक्रिया है। पटाखा धमाके बाज है या फुस्स होकर रह जायेगा?
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-विनोद वर्मा
अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति और दूसरी बार चुने जाने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की हार एक राहत भरी ख़बर है। अमरीकी राष्ट्रपति को दुनिया का सबसे ताक़तवर व्यक्ति माना जाता है। लेकिन कितना दुर्भाग्यपूर्ण और डरावना था कि वही राष्ट्रपति दुनिया की सबसे बड़ी विभाजनकारी ताकत में तब्दील हो गया था। ट्रंप ने न केवल अमरीका में विभाजन की उध्र्वाधर रेखा खींची बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी ही विभाजनकारी ताकतें उन्हें आदर्श के रूप में देखने लगीं। एकाएक दुनिया उन्मादी दिखने लगी।
ट्रंप दुनिया के सबसे अधिक झूठ बोलने वाले राजनेता के रूप में देखे गए। हालांकि झूठ बोलने के मामले में उनको चुनौती देने के लिए कई राजनेता कतार में हैं। भारतीय इस तथ्य को ठीक तरह से समझ सकते हैं।
ट्रंप की विदाई के बाद दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बहुत कुछ बदलेगा। इसकी शुरुआत इजऱाइल से होने के संकेत मिल रहे हैं। कहा जा रहा है कि ट्रंप के गहरे दोस्त नेतन्याहू पर पद छोडऩे के लिए दबाव बनना शुरु हो गया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के अगले साल रिटायर होने की ख़बरें पिछले दो दिनों में ही आई हैं। हालांकि इसका खंडन भी आ गया है। और इसे अमरीकी घटनाक्रम से जोडक़र न देखे जाने की? सलाह भी है।
कहा जा रहा है कि अगली ख़बर ब्राज़ील के जैर बॉल्सोनारो, फिलीपीन्स के ड्यूतेर्ते और तुर्की के आर्दोगान के बारे में आनी चाहिए।
आश्चर्यजनक नहीं था? कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी डोनाल्ड ट्रंप से? अभिभूत दिखे। इतने प्रभावित कि कभी गुटनिरपेक्ष देशों की? अगुवाई करते? रहे भारत के प्रधानमंत्री उनका चुनाव प्रचार कर आए। वे वहां भी ‘अबकी बार? ट्रंप सरकार’ का नारा लगा आए। हालांकि यह प्रेम एकतरफा ही अधिक था। जब ज़रूरत पड़ी तो ट्रंप हाइड्रोक्लोरोक्विन दवा के लिए मोदी सरकार को धमकाने से नहीं चूके और न भारत को ‘फि़ल्दी’ कहने में उन्हें कोई झिझक हुई। आने वाले दिनों में अमरीका का नया प्रशासन भारत और भारत के ट्रंप समर्थक प्रधानमंत्री का नए सिरे से आंकलन करेगा। हो सकता है कि भारतीय कूटनयिकों को खासी मशक्कत करनी पड़े और कश्मीर से लेकर चीन तक बहुत से विषयों पर सफाई देनी पड़े।
चाहे जो हो, दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ट्रंप की हार को अराजकता, झूठ, दंभ और विभाजन की राजनीति पर लगे विराम की तरह देखेगा। उन्हें यह स्वाभाविक डर था कि ट्रंप की जीत शेष दुनिया के समान विचारधारा वाले राजनीतिकों को एक तरह की वैधता दे देता और वे अपने अपने देशों में और अधिक निरंकुश हो जाते।
ट्रंप की हार निरंकुशता और अराजकता के हिमायती ताकतों को हतोत्साहित करेगी, यह तो तय है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल मैंने लिखा था कि डोनाल्ड ट्रंप- जैसे आदमी को साढ़े चौदह करोड़ वोटों में से लगभग सात करोड़ वोट कैसे मिल गए। अब पता चल रहा है कि जोसेफ बाइडन को ट्रंप के मुकाबले अभी तक सिर्फ पचास-साठ लाख वोट ही ज्यादा मिले हैं। बाइडन की जीत पर अमेरिका और भारत की जनता तो खुश है ही, दुनिया के ज्यादातर देश भी खुश होंगे।
सबसे ज्यादा खुश चीन होगा, क्योंकि पहले तो ट्रंप ने अमेरिका के व्यापारिक शोषण के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया और फिर उसे सारी दुनिया में कोविड-19 या कोरोना फैलाने के लिए बदनाम कर दिया। कोरोना के प्रति लापरवाही दिखाने वाले ट्रंप खुद कोरोना की चपेट में आ गये। दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थ-व्यवस्था लंगड़ाने लगी। लगभग 2 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए।
बेरोजगारों को पटाने के लिए ट्रंप ने बहुत-सा द्राविड़-प्राणायाम किया लेकिन वह भी उनको जिता नहीं पाया। अब बाइडन के कंधों पर यह बोझ आन पड़ा है कि वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जान फूंकें। उन्होंने अभी से इस दिशा में काम शुरु कर दिया है। उनकी सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि चुनाव-नतीजों के आने पर न तो उन्होंने ट्रंप के खिलाफ एक भी शब्द बोला और न ही चुनाव-प्रक्रिया के खिलाफ। उन्होंने अपनी गरिमा बनाए रखी लेकिन ट्रंप का घमंडीपन देखिए कि उन्होंने अपने बयानों से संपूर्ण अमरीकी लोकतंत्र को ही कलंकित कर दिया।
उनकी अनर्गल प्रलाप करने की आदत को किस-किसने नहीं भुगता है ? उन्होंने उत्तर कोरिया के किम, चीन के शिन ची फिंग, भारत के नरेंद्र मोदी, नाटो देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों— किसी को भी नहीं बख्शा। अमेरिकी राजनीति के इतिहास में उनका नाम सबसे घटिया राष्ट्रपतियों में लिखा जाएगा। जब वे नए-नए राष्ट्रपति बने तो उन पर बलात्कार और व्यभिचार के कितने आरोप लगे।
उनके मंत्रियों, साथियों और अधिकारियों ने उनसे तंग आकर जितने इस्तीफे दिए, शायद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के काल में इतने इस्तीफे नहीं हुए। लेकिन अमेरिका भी अजीब देश है, जिसने ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बना दिया और चार साल तक उसे अपनी छाती पर सवार रखा। अमेरिकी जनता हिलैरी क्लिंटन की हार की भरपाई तभी करेगी, जब वह 2024 में कमला हैरिस को राष्ट्रपति बनाएगी। मुझे विश्वास है कि बाइडन और कमला मिलकर अगले चार वर्षों में अमेरिकी लोकतंत्र की खोई प्रतिष्ठा का पुनरोद्धार करेंगे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रदीप कुमार
बिहार चुनाव का नतीजा चाहे जो भी निकले, चाहे एनडीए की सरकार बने या महागठबंधन की, दोनों ही सूरत में उसे हरियाणा कनेक्शन प्रभावित कर रहा है. चौंकिए नहीं, ये बिहार चुनाव का वो सच है जिसका असर चुनाव के दौरान पार्टियों की रणनीति पर देखा गया.
पहले बात करते हैं महागठबंधन की. अगर बिहार में महागठबंधन की सरकार बनती है तो इसमें जिन दो लोगों की अहम भूमिका होगी वो दोनों हरियाणा के हैं. इनमें एक ने पर्दे के पीछे अहम भूमिका अदा की तो दूसरे ने पर्दे के सामने आकर ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी सँभाला है.
बिहार में महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं तेजस्वी यादव. उनके राजनीतिक सलाहकार और निजी सचिव संजय यादव हरियाणा के हैं. 37 साल के संजय बीते एक दशक से तेजस्वी यादव से जुड़े हुए हैं. दोनों की मुलाक़ात दिल्ली में कॉमन दोस्तों के ज़रिए 2010 में हुई थी और तब तेजस्वी यादव आईपीएल में अपना करियर तलाश रहे थे.

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तेजस्वी के सलाहकार संजय
उस वक़्त भोपाल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में एमएससी और इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली से एमबीए करने के बाद तीन मल्टीनेशनल आईटी कंपनियों में नौकरियाँ बदल चुके थे.
अगले दो साल तक दोनों एक दूसरे से समय-समय पर मिलते रहे और सामाजिक न्याय की राजनीति को लेकर संजय की समझ ने उन्हें तेजस्वी के क़रीब कर दिया. फिर 2012 में तेजस्वी यादव ने क्रिकेट छोड़कर पूरी तरह से राजनीति पर फ़ोकस करने का निश्चय किया तो उन्होंने संजय यादव को नौकरी छोड़कर साथ काम करने को कहा.
हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले के नांगल सिरोही गाँव के संजय यादव इसके बाद अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर 10 सर्कुलर रोड, पहुँच गए. बीते आठ साल से उन्होंने न केवल तेजस्वी यादव के हर क़दम की रूपरेखा तैयार की बल्कि सीमित संसाधनों के बाद भी राष्ट्रीय जनता दल को लेकर ऑनलाइन और ऑफ़ लाइन प्रचार व्यवस्था का ज़िम्मा भी सँभाला है.

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2012 के बाद संजय ने बिहार की हर विधानसभा सीट का डेमोग्राफिक अध्ययन किया और किस विधानसभा में कौन सा फैक्टर अहम होगा, इसको समझा. 2015 में पार्टी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी. नीतीश कुमार की सरकार में तेजस्वी यादव उप मुख्यमंत्री बने.
हालाँकि तब प्रशांत किशोर के योगदान की चर्चा ज़्यादा हुई थी लेकिन तब भी प्रशांत किशोर ने ज़्यादा काम नीतीश कुमार को लेकर किया था और संजय ने आरजेडी के लिए किया था. लेकिन संजय यादव की सारी समझ 2019 के आम चुनाव में नाकाम हो गई. पार्टी का खाता नहीं खुल पाया.
और तो और इस बार के चुनाव अभियान में आरजेडी के पास लालू प्रसाद यादव नहीं थे लेकिन रणनीति के स्तर पर पार्टी को उनकी कोई कमी नहीं खली. संजय यादव उस टीम में सबसे मुखर थे जो तेजस्वी के पोस्टर के साथ चुनाव में उतरने की वकालत कर रहा था. ये भरोसा सही साबित होता लग रहा है.
इस दौरान वे न केवल तेजस्वी यादव की चुनावी सभाओं को मैनेज कर रहे थे बल्कि अलग अलग सभाओं में तेजस्वी को क्या बोलना चाहिए, इसकी रूपरेखा भी बना रहे थे.
तेजस्वी यादव हर दिन 17-18 सभाओं को संबोधित कर रहे थे और उसका कंटेंट मुहैया कराने के साथ-साथ तेजस्वी की बात पूरे बिहार तक पहुँचे, इसकी कोशिश भी लगातार हुई.

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इन सबके बीच अगले दिन की सभाओं की तैयारी और क्षेत्र से आ रही सभाओं की माँग पर ध्यान देने के अलावा हेलीकॉप्टर लैंड करने का अनुमति पत्र मिले, विपक्षी नेताओं ने क्या निशाना साधा है, पार्टी के कौन-से वरिष्ठ नेता किस बात पर नाराज़ हो गए हैं, किस उम्मीदवार के प्रति स्थानीय लोगों में रोष है, संजय सबको सुनते समझते रहे. इसी बीच दिल्ली से आए पत्रकारों के अनुरोध को भी सँभालते रहे.
इन सबके बीच संजय से नाराज़गी ज़ाहिर करने वाले पार्टी के नेता, पदाधिकारी भी हैं. कई इलाक़े के हेवीवेट नेताओं को लगता है कि उनकी बात अनसुनी की जा रही है लेकिन संजय इन सब स्थानीय फ़ैक्टरों से बचे रहते हैं क्योंकि वे ख़ुद बिहार नहीं हैं, लिहाजा कोई उनके लिए अपने इलाक़े का या अपने क्षेत्र का नहीं है.
ऐसे में, अगर तेजस्वी मुख्यमंत्री बनते हैं तो संजय यादव की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जाएगा और सरकार में उनकी भूमिका, पद के साथ या बिना किसी पद के, किस रूप में होगी ये देखने वाली बात होगी.

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सुरजेवाला की भूमिका अहम
महागठबंधन में शामिल कांग्रेस इस बार बिहार में 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव मैदान में उतरी है. तमाम एक्ज़िट पोल में कांग्रेस को क़रीब 30 सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है.
बिहार चुनाव में कांग्रेस की कमान 53 साल के हरियाणा के नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला के हाथों में थी. ख़ुद सुरजेवाला ने कांग्रेस की ओर से सबसे ज़्यादा 27 चुनावी सभाओं को संबोधित किया और राहुल गांधी सहित तमाम दूसरे कांग्रेसी नेताओं के चुनाव प्रचार के साथ-साथ मीडिया का प्रबंधन भी सँभाला.
यही वजह है कि नतीजा आने से ठीक पहले कांग्रेस की ओर से एक बार फिर रणदीप सिंह सुरेजवाला को पटना में तैनात किया गया है. किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने की सूरत में कांग्रेस को अपने विधायकों को एकजुट रखना होगा, और इसकी ज़िम्मेदारी सुरेजवाला को सौंपी गई है.
कांग्रेस महासचिव सुरेजवाला हरियाणा के कैथल से कई बार विधायक रहे और हरियाणा सरकार के सबसे कम उम्र में मंत्री तक बने. मृदुभाषी सुरजेवाला को राहुल गाँधी का बेहद ख़ास माना जाता है और वे पार्टी के कम्युनिकेशन विंग के प्रभारी भी रह चुके हैं.

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बिहार बीजेपी के चाणक्य
आरजेडी और कांग्रेस की ओर से बिहार के सभी समीकरणों को बनाने में हरियाणा कनेक्शन की भूमिका तो आपको समझ में आ गई होगी. लेकिन अगर बिहार चुनाव में एनडीए गठबंधन को बहुमत मिला तो क्या उसका भी कोई हरियाणा कनेक्शन है. तो जबाव है हां. चौंकिए नहीं.
दरअसल बिहार के बीजेपी प्रभारी भूपेंद्र सिंह यादव मूलरूप से हरियाणा के ही हैं, लेकिन यह बात सार्वजनिक तौर पर कम लोगों को ही पता है.
उनका परिवार हरियाणा के गुरुग्राम ज़िले से जुड़ा है जो बाद में राजस्थान शिफ़्ट हो गया और वे राज्यसभा में लगातार दो बार राजस्थान से चुने गए हैं.
भूपेंद्र यादव को चुनावी रणनीति में माहिर मानने वालों की कमी नहीं है. 2013 में राजस्थान, 2017 में गुजरात, 2014 में झारखंड और 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत में उनकी अहम भूमिका रही.
2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने 40 की 40 सीटों पर जीत का दावा किया था, उनके गठबंधन को 39 सीटों पर जीत मिली. लेकिन इस बार वे सीटों को लेकर कोई दावा नहीं करते बल्कि कहते हैं, '15 साल के एंटी इनकम्बेंसी के बाद भी हमारी सरकार की वापसी होगी, बहुमत हमें ही मिलेगा.'

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बिहार की प्रत्येक विधानसभा सीट पर न केवल अपने बल्कि विपक्षी उम्मीदवार और बाग़ी उम्मीदवारों के नाम तक भूपेंद्र यादव के टिप्स पर मौजूद हैं.
इस बार के चुनाव परिणाम को लेकर एक्ज़िट पोल में एनडीए गठबंधन भले ही पिछड़ रहा हो लेकिन भारतीय जनता पार्टी की ताक़त बढ़ती हुई दिख रही है.
बिहार बीजेपी की पहचान पहले स्वर्णों की पार्टी के तौर पर होती रही थी लेकिन भूपेंद्र यादव ने पार्टी में बड़े स्तर पर पिछड़े, अति पिछड़ों को जोड़ा है.
जिसके चलते पार्टी के अंदर एक तबके में नाराज़गी भी है और बहुमत नहीं मिलने पर भूपेंद्र यादव की आलोचना करने वालों की संख्या भी बढ़ सकती है लेकिन वे कहते हैं, 'राजनीति में वोटबैंक की भूमिका ही अहम होती है, हमारी पार्टी सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी है और मुझे इसका जनाधार बढ़ाने की भूमिका मिली है.'
एनडीए के गठबंधन और बीजेपी के सीटों पर टिकट वितरण करने वाली टीम में उनकी भूमिका अहम रही है.
हालाँकि एनडीए से अलग होकर चिराग पासवान के अकेले चुनाव मैदान में उतरने का नुक़सान इस गठबंधन को उठाना पड़ सकता है. लेकिन भूपेंद्र यादव कहते हैं कि नतीजों का इंतज़ार कीजिए. (bbc.com/hindi)
-माजिद जहांगीर
श्रीनगर के नामछाबल इलाक़े में मिर्ज़ा निसार हुसैन (40) के तिमंज़िले घर में घुसते ही सबसे पहले आपकी नज़र दीवारों पर पड़ी दरारों पर जाती है. मानो ये दरारें मिर्ज़ा परिवार की त्रासदी की कहानी बयां कर रही हों.
23 साल पहले चरमपंथियों से जुड़े दो बम विस्फोटों के मामले में निसार समेत इस परिवार के दो बेटों को गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसके बाद इस परिवार पर जो गुज़री, वो मानो इन दरार भरी दीवारों पर लिखी दिख रही है.
निसार 16 साल के थे. 1996 का साल था, जब पुलिस ने उन्हें नेपाल से उठा लिया था. उन पर कई भारतीय शहरों में हुए बम विस्फोटों में शामिल होने का आरोप लगाया गया.
इस आरोप में 23 साल जेल में बिताने के बाद आख़िरकार निसार को 22 जुलाई 2019 को राजस्थान हाई कोर्ट ने रिहा कर दिया. उन पर लगाए गए सारे आरोप ख़ारिज कर दिए गए.
श्रीनगर में अपने घर पर बैठे बात करते हुए निसार मानो अचानक 23 साल पुरानी अपनी जिंदगी में चले गए. खोए-खोए से निसार बोले, "यह बड़ी लंबी और त्रासद कहानी है. भाई और मेरी गिरफ़्तारी ने मेरे परिवार का बहुत कुछ छीन लिया."

BBC/MAJID JAHANGIR
मिर्ज़ा निसार हुसैन की गिरफ़्तारी से पहले की फोटो
वो दिन जब सबकुछ बदल गया
निसार बताते हैं, " वो 23 मई, 1996 का दिन था. उस दिन हमारे लिए सबकुछ बदल गया. मैं अपनी कालीनों के ग्राहक से पैसे लेने नेपाल गया हुआ था. हमारे ग्राहक ने पैसे के लिए दो दिन रुकने के लिए कहा था. हम रुक गए.
"अगले दिन मैं अपने साथ काम करने वाले दो लोगों के साथ टेलीफोन बूथ की ओर जा रहा था. महाराजगंज चौराहे पर उस टेलीफोन बूथ तक पहुंचने से पहले ही पुलिस आई और हम लोगों को पकड़ कर ले गई."
निसार आगे बताते हैं, "पुलिस ने एक शख़्स का फोटो दिखाया और पूछा- इसे पहचानते हो? मैंने कहा- हां. अपने पैसे के लिए मैं इस शख्स के पास एक दिन पहले गया था. पुलिस हमें लेकर सीधे दिल्ली की लोधी कॉलोनी पहुंच गई."
उसी दिन निसार और उनके बड़े भाई मिर्ज़ा इफ्तिखार हुसैन को दिल्ली में ही गिरफ्तार कर लिया गया. निसार उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "जब दिल्ली की पुलिस की पूछताछ वाली अंधेरी कोठरी में मेरा अपने बड़े भाई से आमना-सामना हुआ तो मैंने उन्हें गले लगा लिया. मैंने उनसे पूछा - क्या आपको भी गिरफ़्तार किया गया है?"
निसार के बड़े भाई मिर्ज़ा इफ्तिखार हुसैन को दिल्ली के लाजपत नगर में एक बम विस्फोट कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.
श्रीनगर में अपने घर में बैठे इफ्तिखार कहते हैं, "आप सोच भी नहीं सकते कि हम पर क्या गुजरी. दो-दो केस लड़ना आसान नहीं था. हमारा सब कुछ ख़त्म हो गया."
सेना के अफ़सर समेत 4 जवानों की मौत, 3 चरमपंथी मारे गए
'हमें अपने बेटों के शव चाहिए ताकि उन्हें ठीक से दफ़ना तो सकें'

MAJID JAHANGIR
एक की रिहाई, एक को सज़ा-ए-मौत
साल 1996 में दिल्ली के लाजपत नगर मार्केट के भीड़-भाड़ भरे इलाक़े में एक भीषण बम विस्फोट हुआ. इसमें 13 लोग मारे गए थे और 38 घायल हो गए थे.
निसार और इफ्तिखार पर बम धमाके के लिए विस्फोटक का बंदोबस्त करने का आरोप लगाया गया था.
निसार ने कहा कि पुलिस ने दोनों भाइयों पर चार्जशीट दायर करने में पाँच साल लगा दिए. जेल में 14 साल गुजारने के बाद 2010 में दिल्ली की एक अदालत ने निसार और दो अन्य कश्मीरियों को मौत की सज़ा सुनाई. मिर्ज़ा इफ्तिखार और चार अन्य लोगों को छोड़ दिया गया.
इफ्तिखार कहते हैं, "2010 में हमने मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ अपील की. 2012 में दिल्ली हाई कोर्ट ने निसार और मोहम्मद अली (अन्य अभियुक्त) को छोड़ दिया."
निसार बताते हैं कि अदालत में सभी 16 गवाह मुकर गए और कहा कि वे अभियुक्त और इस केस के बारे में कुछ नहीं जानते.
मिर्ज़ा भाइयों का केस लड़ चुकीं नामी वकील कामिनी जायसवाल ने बीबीसी हिंदी को बताया कि उन्हें सबूत के अभाव में छोड़ा गया.
कामिनी जायसवाल ने कहा, "नासिर और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं था. यह बग़ैर किसी सबूत वाला केस था."
इफ्तिखार ने बताया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एसएआर जिलानी ने उन्हें जायसवाल से मिलवाया था. जिलानी को 2005 में संसद पर हुए चरमपंथी हमले के मामले में सबूत के अभाव में छोड़ दिया गया था.

BBC/MAJID JAHANGIR
एक केस में रिहाई, दूसरी में गिरफ़्तारी
लेकिन, उनकी मुश्किलें ख़त्म नहीं हुई थीं. लाजपत नगर केस में रिहा होने के बाद निसार और अन्य पांच को राजस्थान के समलेटी में 23 मई 1996 को हुए विस्फोट के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया. इस धमाके में 14 लोग मारे गए थे और 37 लोग घायल हो गए थे.
इफ्तिखार कहते हैं, "इस मामले में भी राजस्थान की महुआ सेशन कोर्ट में 14 साल बाद चार्जशीट दाखिल की गई. मुकदमा 2014 तक चला और उस साल अक्टूबर में कोर्ट ने सबको उम्र कैद की सजा सुनाई. सिर्फ़ एक नौजवान फ़ारूक ख़ान को रिहा किया गया."
साल 2014 में राजस्थान हाई कोर्ट में इसके ख़िलाफ़ अपील की गई. यह मुक़दमा वहां जुलाई 2019 तक चला. 23 जुलाई को कोर्ट ने निसार को सारे आरोपों से बरी कर दिया. उन्हें रिहा करते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष साज़िश का कोई सबूत नहीं दे पाया.
निसार को अखबार से पता चला कि कोर्ट ने राजस्थान धमाके के मामले में उन्हें बरी कर दिया है. निसार ने कहा, "इतने साल जेल में बंद रहने के दौरान हमें सिर्फ एक चीज़ खुशी देती थी और वह थी- हर दिन के अख़बार में छपने वाले चुटकुले."

BBC/MAJID JAHANGIR
नामछाबल में वो मोहल्ला जहां मिर्ज़ा निसार हुसैन रहते हैं.
मिर्ज़ा परिवार के लिए झटके दर झटके
निसार कहते हैं, "हालांकि, इफ्तिखार को 2010 में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था लेकिन उन पर हमें छुड़ाने की बड़ी ज़िम्मेदारी थी. उन्हें कश्मीर में नौकरी मिली लेकिन केस के सिलसिले में दिल्ली आना पड़ता था इसलिए वो नौकरी भी छूट गई."
आखिरकार, 24 जुलाई 2019 को वह घर पहुंचे. एक सप्ताह बाद, अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर दिया गया और कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया. महीनों तक यहां कर्फ्यू और प्रतिबंध लगा रहा.
इसके बाद मार्च में कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से लॉकडाउन लगा दिया गया. एक ही साल में दो-दो लॉकडाउन की वजह से निसार अपनी ज़िंदगी के बिखरे टुकड़े भी समेट नहीं पाए हैं.
निसार अब आज़ाद हैं लेकिन रिहा होने के बाद अपने आस-पास का जो माहौल देख रहे हैं, उससे वह और ज़्यादा निराश हो गए हैं.
निसार कहते हैं, "शुरू में तो मैं सड़कों पर चल भी नहीं पाता था क्योंकि इतने लंबे वक़्त तक जेल में रहते हुए मैं सड़क पर चलना ही भूल गया था. जब भी कोई मोटर साइकिल सामने आती तो मैं भाग कर दूर खड़ा हो जाता था. मुझे लगता था कि मोटरसाइकिल मुझे रौंद देगी.
"जब भी मैं यह सोचता हूं कि मेरी मां और परिवार के दूसरे लोगों ने मेरी ग़ैर मौजूदगी में कैसे 23 साल काटे होंगे तो मैं सिहर उठता हूं. मैं सो नहीं पाता."
अब निसार की मां चाहती हैं कि बेटा शादी कर ले. लेकिन, बिना नौकरी के गृहस्थी शुरू करना आसान नहीं. निसार सिर्फ आठवीं तक पढ़े हैं. जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया था तो उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ कर दिल्ली में अपने भाई के कालीन के व्यापार में हाथ बंटाना शुरू किया था.
निसार श्रीनगर में नामछाबल इलाक़े के जाने-माने कारोबारी परिवार में पैदा हुए थे. उनके पिता कालीन का कारोबार करते थे. उनके भाई का दिल्ली का कालीन कारोबार काफी जमा हुआ था.
मगर अब उन्हें कोई पक्की नौकरी नहीं मिल रही है .
वह कहते हैं, "जेल से रिहा होने के बाद शुरू में सबने खूब सहानुभूति दिखाई. लेकिन, बाद में जो भी मिलता यही पूछता- क्या प्लान है? ये सवाल मुझे परेशान कर देता. ऐसा लगता था कि मैं एक जेल से दूसरी जेल में आ गया हूं. (bbc.com/hindi)
- मृणाल पाण्डे
दीपावली पर हम वैभव की देवी लक्ष्मी की आराधना करते हैं। लक्ष्मी से जुड़ी कथा मुख्यतः तीन मान्यताओं पर आधारित है- पहली, पृथ्वी और इसके समस्त जीवों की उत्पत्ति एक के बाद एक जल से हुई; दूसरी, पृथ्वी का भार तो वराह ने उठाया लेकिन इसे उर्वर बनाया एक देवी ने; और तीसरी, उसके बाद से हर प्रकार के जीवन का अंकुर गर्भ से ही प्रस्फुटित हुआ- धरती मां की बात हो या फिर इंसानी मां की। इन माताओं की उपेक्षा या उन्हें अप्रसन्न करना हमारे स्वयं के अस्तित्व के लिए विनाशकारी है।
शुभ-सौभाग्य की देवी की प्राचीनतम स्तुति है श्रीसूक्त, यानी श्री अथवा लक्ष्मी की आराधना और इसके अनुसार, सृष्टि के आरंभ में क्षीर सागर में जीवन का आरंभिक स्रोत हिरण्यगर्भ तैर रहा था। इसी से जगत की उत्पत्ति हुई जिसमें जीवन भरा श्री ने। पृथ्वी तब कीचड़ से भरी हुई थी और इसे जीवंत, सुंदर और हरा-भरा बनाया इसी श्री ने।
मातृशक्ति की प्राकृतिक प्रधानता ने गर्भ धारण करने में असमर्थ पुरुषों में ईर्ष्या की भावना को जन्म दिया और इसी के परिणामस्वरूप ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पुरुष वर्चस्ववाद की संस्थापना हुई। तदुपरांत अत्रि, भृगु और मरीच-जैसे ऋषियों ने गोत्रों के नाम से पुरुष प्रधान सामुदायिक पहचान की स्थापना की और इस प्रकार उन्होंने धर्म को एक पुरुष वर्चस्ववादी झुकाव दिया जबकि इन ऋषियों के स्वयं के नाम उनकी माताओं के नाम पर थे जो तब तक मातृसत्तात्मक व्यवस्था का नेतृत्व किया करती थीं। नई संकल्पना में लक्ष्मी को एक सुंदर महिला के रूप में चित्रित किया जाने लगा जिसे देवता मंत्रों से प्रसन्न किया करते थे और यहां तक कि सिद्धियां प्राप्त करने के लिए उनसे शक्ति की प्रार्थना करते थे: (महा प्रपन्न्युयम इति श्रीयै स्वाहा…)। ‘अथर्ववेद’ (9/5) में न केवल स्वयं के लिए धन-धान्य की वृद्धि, वरन दुश्मन की धन-हानि के लिए बकरी की बलि देने का विधान है।
जल्द ही पुरुष प्रधान व्यवस्था ने यह स्थापित कर दिया कि चंचला धन-देवी का आशीर्वाद अनिवार्य रूप से गुप्त क्रियाओं और निर्मम प्रथाओं से ही प्राप्त होता है। शास्त्रों और बाद में पुराणों में तो लक्ष्मी के दो रूपों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है- लक्ष्मी और अलक्ष्मीया पापलक्ष्मी। लक्ष्मी का घर में प्रवेश वांछनीय था जबकि अलक्ष्मी को बाहर ही रोक देने की हिदायत थी। इसी कारण उत्तर भारत के गांवों में सास और बहु के घर के बाहर सूप पीटने का रिवाज है। यह इसलिए कि घर में लक्ष्मी और उनके पति विष्णु का वास हो और पापलक्ष्मी घर से बाहर निकल जाए।
कृषि समाज ने लक्ष्मी की मलिन उत्पत्ति और घर को धन-धान्य तथा भंडार गृह को उपज से परिपूर्ण रखने की उनकी विशेषता को ध्यान में रखते हुए रीति-रिवाजों का निर्धारण किया। गोबर से लेकर गो-उत्पादों और ताजे मौसमी उपज तक, चंचला लक्ष्मी को उनकी प्रिय सामग्री पारंपरिक रूप से अर्पित की जाती है। लक्ष्मी को प्रसन्न करने के सभी जतन किए जाते हैं क्योंकि मान्यता है कि वह जल्दी ही रुष्ट होकर घर से पलायन कर जाती हैं। यहां तक कि मुस्लिम शासकों ने भी इस बात का ध्यान रखा कि सोने-चांदी के सिक्कों पर लक्ष्मी के चित्र हों। आखिर चंचला को क्रोधित करके साम्राज्य को बंजर अंधकारमय भविष्य की ओर धकेलने का जोखिम उठाने का क्या फायदा?
गौर करने वाली बात है कि प्रतिद्वंद्वी सरस्वती या दुर्गा की तरह लक्ष्मी की सवारी हंस या बाघ नहीं है। उनकी सवारी उल्लू है जो अंधेरे में देखता है और जरूरत पड़ी तो अपने नुकीले घुमावदार चोंच से वार भी कर सकता है। वाहन के रूप में उल्लू लक्ष्मी की गुप्त ज्ञान संबंधी मान्यताओं को ही स्थापित करता दिखता है। स्मशान में तांत्रिक क्रिया के दौरान उल्लू की तीखी कर्कश आवाज (उलूक ध्वनि) निकाली जाती है। हालांकि महिलाएं पारंपरिक रूप से उल्लू को मित्र मानती हैं और विवाह जैसे शुभ समारोह या फिर किसी सम्मानित अतिथि के आगमन के मौके पर उल्लू की आवाज निकालती हैं।
इस शक्तिशाली देवी के पति के तौर पर ख्याति पाने वाले विष्णु ने किसी आम शक्तिशाली पुरुष के किसी शक्तिशाली महिला से विवाह के उपरांत के आम चलन को चरितार्थ करते हुए लक्ष्मी को पृथ्वी से अलग करते हुए क्षीर सागर में अपने चरणों तक सीमित कर दिया। यह सब करने के लिए विष्णु को पुरुषोत्तम कहा जाने लगा, अर्थात पुरुषों में सर्वोत्तम! लेकिन गलती तो पुरुषोत्तम भी कर सकते हैं।
पुरी के भगवान जगन्नाथ के बारे में एक दिलचस्प कथा है। एक बार उनकी पत्नी महालक्ष्मी की नजर अपनी एक बड़ी भक्त श्रीया चंदलुनी पर पड़ी। वह अछूत थी। पुरुष-निर्मित मनुवादी जाति व्यवस्था से कभी सहमत न होने वाली देवी न केवल उसके घर गईं बल्कि समस्त वर्जनाओं को तोड़ते हुए उन्होंने चंदलुनि के यहां अर्पित प्रसाद को भी ग्रहण किया। यह सुनकर बलभद्र ने अपने छोटे भाई भगवान जगन्नाथ को महालक्ष्मी के गर्भ गृह में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने के लिए बाध्य कर दिया।
तब क्रोधित लक्ष्मी ने सारी धन-संपत्ति और पुजारियों के साथ उस जगह का त्याग कर दिया और अपने लिए एक अलग मंदिर बनवा लिया। लक्ष्मी द्वारा त्याग दिए गए मंदिर में श्रीहीन जगन्नाथ और बलभद्र ने भूख लगने पर स्वयं भोजन पकाने की कोशिश की लेकिन असफल रहे। फिर वे ब्राह्मण का वेश धरकर भीख मांगने निकले लेकिन किसी ने उन्हें भोजन नहीं दिया। फिर वे भूखे-प्यासे लक्ष्मी के दरवाजे पर पहुंचे जहां उन्हें कहा गया कि यह एक चांडाल का निवास है जहां केवल उन्हें ही भोजन परोसा जा सकता है जो अस्पृश्यता को व्यवहार में न लाने का प्रण करें। भूख-प्यास से त्रस्त बलभद्र और जगन्नाथ ने तत्काल यह प्रतिज्ञा कर ली। आज भी रथ यात्रा के शुरू होने से पहले किसी अछूत से भगवान जगन्नाथ को नारियल अर्पण कराने की परंपरा चली आ रही है। दूसरी ओर इस मौके पर क्षेत्र का राजा एक सफाई कर्मचारी की भूमिका में होता है जो सबसे पहले रथ यात्रा के रास्ते को झाड़ू से साफ करता है और फिर आकर रथ को खींचने में हाथ बंटाता है। इस तरह लक्ष्मी ने अपने ‘पुरुषोत्तम’ और उनके बड़े भाई के आंडबर युक्त पुरुष अहम को तोड़कर परस्पर संबंधों के प्राकृतिक संतुलन को बहाल किया।(navjivan)
-कीर्ति दुबे
"हम लोगों का फ़ैक्ट्री कबाड़े-कबाड़ रह गया, बाल-बच्चा सब भटक रहा है, दिल्ली, पंजाब यूपी-हरियाणा. होटल में काम करता है, प्लेट धोता है, कोई 3 हज़ार देता है, कोई 5 हज़ार देता है. ये फ़ैक्ट्री खुल जाए तो हमारा बच्चा सब नेता लोगों को इतना गेंदा का माला पहना देगा कि उनसे संभलेगा नहीं."
दरभंगा ज़िले के हायाघाट में एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठे उपेंद्र यादव अशोक पेपर मिल के सामने अपनी भैंसों को चराते हुए ये बात कहते हैं.
उनके पीछे सफ़ेद गेट पर ताला लगा है जिस पर हरे पेंट से अंग्रेजी में अशोक पेपर मिल लिखा है.
उपेंद्र इस पेपर मिल की कहानियां बताते हुए कहते हैं, "हमारा भी 18 बिगहा ज़मीन दरभंगा महाराज को दे दिया गया ताकि ये फ़ैक्ट्री बैठेगी तो रोज़गार आएगा. आज वो ज़मीन होती तो हमारे पास पैसा होता."
अपनी बेहतरीन पेपर क्वॉलिटी के लिए पहचाने जाने वाली अशोक पेपर मिल नवंबर 2003 से बंद पड़ी है.
पेपर मिल की तरह ही बिहार के चीनी मिल, जूट मिल सहित राज्य की पूरी इंडस्ट्री जिसका एक सुनहरा अतीत था, उसका वर्तमान आज अंधेरे में डूबा हुआ है.
बिहार चुनाव में रोज़गार सबसे बड़ा मुद्दा था, सभी पार्टियों के घोषणापत्रों में एक वादा जो कॉमन था, वह है रोज़गार देने का वादा. लेकिन बिहार में इन पार्टियों की ही सरकारों में राज्य के उद्योग-धंधे तिल-तिल कर ख़त्म हुए.

कहानी अशोक पेपर मिल की
अशोक पेपर मिल की शुरुआत 1958 में दरभंगा महाराज ने की थी, इसके लिए किसानों से ज़मीन मांगी गई और बदले में उन्हें फ़ैक्ट्री लगाने के फ़ायदे बताए गए.
साल 1989 में इस मिल का मालिकाना हक़ बिहार सरकार को मिला लेकिन 1990 तक बिहार सरकार ने चीज़ें अपने हाथ में नहीं लीं.
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने इंडस्ट्रियल पॉलिसी और प्रमोशन विभाग के सचिव से अशोक पेपर मिल का रिवाइवल प्लान कोर्ट में पेश करने को कहा. साल 1996 में कोर्ट में एक ड्राफ्ट पेश किया गया और मिल के निजीकरण की सिफ़ारिश हुई, जिसे कोर्ट ने सहमति दे दी.
साल 1997 में आईडीबीआई बैंक मर्चेंट बैंकर बना और अशोक पेपर मिल का सौदा मुंबई की कंपनी नुवो कैपिटल एंड फ़ाइनैंस लिमिटेड के मालिक धरम गोधा को मिल गया.
इसके बाद भी मिल लगभग 6 महीने ही चल सकी और नवंबर 2003 में इसका ऑपरेशन पूरी तरह से बंद हो गया. लगभग 400 एकड़ में फैली इस फ़ैक्ट्री में आज जंगल जैसी घास फैली हुई है और ये ज़हरीले सापों का डेरा बनकर रह गया है.
पास के गांव में रहने वाले महावीर यादव कहते हैं, "इतने नेता आए, देखे और चले गए लेकिन कुछ ना हुआ. अब ये मिल बंद ही है. यही हमारा दुर्भाग्य है, कोई नेता ऐसा हो जो कुछ कर सके."
"बिहार का आदमी तो भूखों मर रहा है, दूर देश जा रहा है. नीतीश कुमार ने तो जो किया, हम क्या बताएं. नल-जल में जितना पैसा ख़र्च किया है अगर उतना कारखाने में खर्च होता 50 गो कारखाना खुल जाता."

न्यूज़क्लिक की एक रिपोर्ट कहती है कि जो समझौता गोधा और सरकार के बीच हुआ उसके तहत 504 करोड़ रुपये का निवेश अशोक पेपर मिल में करना था. लेकिन ये हुआ ही नहीं.
38 बिंदुओं वाले इस समझौते के हिसाब से 18 महीने के भीतर मिल को चालू करना था. कर्मचारियों के बकाया वेतन देने थे. इसके अनुसार मिल की संपत्ति को बाहर ले जाना मना था. सिर्फ़ वही मशीनें बाहर लाई जा सकती थीं जिन्हें रिपेयरिंग की ज़रूरत थी.
लेकिन उपेंद्र यादव बताते हैं, "यहां से ट्रक में सारा फ़ैक्ट्री का सामान भर-भर कर जाता रहा. साल 2012 की बात है जब ट्रक में मशीन भर कर ले जाया जा रहा था तो सब कर्मचारी प्रदर्शन करने लगे."
"इतने में मिल के एक गार्ड ने गोली चलाई और गांव का लड़का सुशील शाह जो मिल में मज़दूर था मारा गया. आज तक उसके मां-बाप उसके बकाया पैसे का इंतज़ार कर रहे हैं, कोई आसरा तो नहीं है. इस मिल से हमको अब."
हालांकि बीबीसी इन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है.
मीठी चीनी मिलों की कड़वी दास्तां
बिहार चीनी के उत्पादन के लिए जाना जाता था. देश के कुल चीनी उत्पादन का 40 फ़ीसदी हिस्सा बिहार में होता था.
देश की आज़ादी से पहले बिहार में 33 चीनी मिलें हुआ करती थीं लेकिन आज 28 चीनी मिलें हैं इनमें से भी सिर्फ़ 11 मिलें ऐसी हैं जो इस वक्त चालू हालत में हैं. और इनमें से भी 10 मिलों का मालिकाना हक़ प्राइवेट कंपनियों के पास है.
साल 1933 से लेकर 1940 तक बिहार में चीनी मिलों की संख्या बढ़ती गई और उत्पादन भी ख़ूब बढ़ा लेकिन इसके बाद चीनी मिलों की हालत बिगड़ने लगी.
इसके बाद साल 1977 से लेकर 1985 तक बिहार सरकार ने इन चीनी मिलों का अधिग्रहण शुरू किया.
इस दौरान दरभंगा की सकरी चीनी मिल, रयाम मिल, लोहट मिल, पुर्णिया की बनमनखी चीनी मिल, पूर्वी चंपारण और समस्तीपुर की मिलें सरकार के पास आ गईं.
साल 1997-98 के दौर में ये मिलें संभाली नहीं जा सकीं और एक के बाद एक मिलें बंद होने लगीं.

दरभंगा की सकरी मिल बिहार में बंद होने वाली सबसे पहली चीनी मिल मानी जाती है. साल 1977 में जब राज्य की कर्पूरी ठाकुर सरकार ने इस मिल का अधिग्रहण किया था तो लोगों में उम्मीद जगी कि सबकुछ ठीक हो जाएगा.
इस मिल में काम करने वाले अघनू यादव कहते हैं, "1945-1947 में बिहार में 33 मिल थीं आज 10 मिल चल रही हैं वो भी प्राइवेट में चलती हैं. हमारी ज़मीन गन्ना के लिए सबसे उपयुक्त है लेकिन हम गन्ना नहीं उगा सकते. इतनी लड़ाई लड़ी अब तो लगता है, बस पैसा मिल जाए हमारा."
सकरी मिल नौजवानों के लिए बस एक खंडहर भर है, उन्होंने बस इसके क़िस्से अपने बड़े-बुज़ुर्गों से सुने हैं.
विश्वजीत झा को नौकरी नहीं मिली तो वो पिता के साथ किसानी का काम करने लगे.
सकरी को लेकर अपनी याद साझा करते हुए वह कहते हैं, "हमारे बाबा कहते थे कि हमारा गुजर बसर इस मिल से चलता था. नीतीश जी के शासन में जो हमको याद है, वो ये कि इस मिल का शाम में गेट खुलता था और यहां की सारी मशीनें-पुर्जे ट्रकों में लाद कर ले जाई जाती थी."
"आज इस मिल का ताला खुलेगा तो इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा. इस मिल का निजीकरण कर दिया गया. सरकार कहती है कि मिल चलाने में घाटा होता है. तो सरकार को ही घाटा है तो आम लोग क्या कर सकेंगे. अगर सरकार सारे संसाधन लेकर चीनी नहीं बनवा सकती तो किसान क्या करेगा."
"लालू जी ने क्या किया? नीतीश जी ने क्या किया? नीतीश जी ने रोड बनवा दिया लेकिन क्या हम रोड पर बैठ कर खाना खाएं? हम तो इस लायक भी नहीं हैं कि अपने बच्चे को ठीक से पढ़ा सकें कि वो कहीं नौकरी पा जाए. लेकिन जब पढ़ेगा नहीं तो यहां तो कोई काम है नहीं तो, बाहर जा कर मज़दूरी ही करेगा."

'सभी कलपुर्ज़े निकाले और बेच दिए'
बात करते हैं साल 2005 की. बिहार स्टेट शुगर डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन के तहत तमाम चीनी मिलों को रिवाइव करने का काम सौंपा गया.
इसके बाद राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी गई जिसमें दरभंगा की रयाम मिल, लोहट मिल और मोतीपुर मिल को छोड़ कर अन्य सभी मिल को कृषि पर आधारित अन्य फ़ैक्ट्री में तब्दील करने का प्रस्ताव पेश किया गया. इस रिपोर्ट में सकरी मिल को डिस्टलरी (शराब कारखाना) बनाने का भी प्रस्ताव दिया गया.
साल 2008 में मिल की नीलामी हुई और इनमें से ज़्यादातर मिलों को प्राइवेट कंपनियों ने ख़रीदा. रयाम और सकरी मिल को श्री तिरहुत इंडस्ट्री ने ख़रीदा है.
लेकिन ये मिल कभी नहीं खुल पाईं. जिन कंपनियों को इन प्लांट में निवेश करके इन्हें चलाना था उन्होंने कभी इसमें निवेश ही नहीं किया.
रामेश्वर झा इस मिल के कर्मचारी रहे हैं. वह कहते हैं, "इन प्राइवेट कंपनियों को ये मिल चलानी ही नहीं थी, उन्होंने इसके सभी कलपुर्ज़े निकाले और बेच दिए."
वो ये भी मानते हैं कि "बिहार में इन प्राइवेट कंपनियों को चीनी मिल नहीं चलानी थी बल्कि इथनॉल का उत्पादन करना था."

मौजूदा वक़्त में लोहट चीनी मिल, जिसके मुनाफ़े से 1933 में सकरी मिल खोली गई थी, वहां अब जंग लगी और खोखली हो चुकी लोहे की मशीनें निवेश के इंतज़ार में बर्बाद हो चुकी हैं.
रयाम मिल का हाल तो और भी बुरा है. वहां अब सिर्फ़ ज़मीन का टुकड़ा बचा हुआ है.
यहां काम करने वाले अपने बक़ाया वेतन का इंतज़ार करते हैं. सकरी मिल बंद हुई 1997 में लेकिन राज्य की नीतीश कुमार सरकार ने यहां के मज़दूरों को 2015 तक का वेतन देने की बात की है. और मुख्यमंत्री के इस आश्वासन में कई लोगों ने उन पैसों का हिसाब अभी ही लगा लिया है जो उन्हें मिलेंगे. लेकिन ये पैसे उन्हें कब मिलेंगे इसका जवाब उनके पास नहीं है.
मधुबनी की लोहट मिल में बतौर गार्ड काम करने वाले मति-उर-रहमान रोज़ चार किलोमीटर साइकिल चलाकर लोहट मिल आते हैं और इस जंगलनुमां कारख़ाने की देख-रेख करते हैं.
वह कहते हैं, "नीतीश कुमार ने कोशिश की थी कि कोई इसको लीज़ पर ले ले लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. अब तो सरकार भी छोड़ दी है और कोई पार्टी भी नहीं आ रही है."
"ये मिल चलता तो गन्ना किसान को फ़ायदा होता और लोगों को काम मिलता लेकिन मिल बंद हो गया तो किसान बिलकुल ख़त्म हो गया. इतने लोग हैं जिनका पैसा बिहार सरकार ने नहीं दिया, कई लोग को वेतन के इंतज़ार में ही रह गए. बीवी बच्चा पैसे के लिए रो रहा है. सरकार पैसा दे नहीं रही है."

बंद जूट मिल खुलवाना क्या चुनावी पैंतरा?
समस्तीपुर के मुक्तापुर में रामेश्वर जूट मिल 6 जून 2017 से बंद थी, लेकिन 13 सितंबर 2020 को राज्य के उद्योग मंत्री महेश्वर हज़ारी जो समस्तीपुर के ही कल्याणपुर से विधायक हैं, उनकी मौजूदगी में मिल दोबारा खुली.
जब हम मिल पर पहुंचे तो ऐसा लगा ही नहीं कि मिल में काम चल रहा है. वहां मौजूद लोगों से बात करने पर हमें पता चला कि मिल तो खुल गई लेकिन मिल खुलने की जो सबसे बड़ी निशानी होती है- हूटर बजना, वो अब तक मिल में नहीं बज रहा है.
फ़ैक्ट्री में बेहद कम संख्या में मज़दूर आ रहे हैं और लगभग 80 फ़ीसदी तक मिल बंद ही पड़ी हुई है. यहां काम करने वाले लोगों का मानना है कि इस मिल को चुनाव में लोगों की नाराज़गी कम करने के इरादे से खोला गया.
यहां सब-स्टाफ़ गार्ड के तौर पर तैनात संजय कुमार सिंह कहते हैं, "उद्योग मंत्री ने हमारे फ़ैक्ट्री मालिक से बात किया, बोला कि फ़ैक्ट्री का सारा बक़ाया दिया जाएगा. फ़ैक्ट्री का हूटर भी बजा. हम लोगों को लगा कि अब तो सब ठीक हो जाएगा, लेकिन आज इतने दिन हो गए. 11 करोड़ 65 लाख का बक़ाया जो बिहार सरकार के पास है वो नहीं मिला."
"मिल खुल गया है लेकिन हूटर नहीं बजता. उद्योग मंत्री ने मालिक से कहा था कि तीन दिन में ही पैसा मिल जाएगा, अब कहते हैं कि चुनाव संहिता लग गया, अभी नहीं मिलेगा."

राजू इस मिल में काम करने वाले मज़दूरों में से एक हैं. वह बताते हैं, "तीन साल का पैसा मिला नहीं है लेकिन मालिक क्या करेगा जो सरकार उसको पैसा नहीं देगी तो. वो तो अपने दम पर चला ही रहा है."
2017 में बंद होने से पहले इस मिल में 5000 लोग काम किया करते थे.
80 एकड़ में फैले इस मिल की शुरुआत 1926 में दरभंगा महाराज ने की थी, 1986 में इसे विन्सम इंडस्ट्रीज़ को बेच दिया गया लेकिन बाद में विन्सम ने इस कंपनी को पश्चिम बंगाल के एक व्यापारी बिनोद झा को बेच दिया.
इस मिल के बंद होने का कारण इसका लगातार आर्थिक संकट में फंसते जाना है.
मिल में साल 2012, 2014 और 2019 में आग लगी जिससे प्लांट का बड़ा नुक़सान हुआ. जूट मिल का बिजली बिल बकाया था और बिहार सरकार पर जूट मिल का 18 करोड़ रुपये बक़ाया था. पैसों के लेन-देन का मामला गहराता गया और ये मामला पटना हाईकोर्ट जा पहुंचा.
आख़िरकार मिल को बिजली बिल का भुगतान करने को कहा गया और सरकार को कंपनी के 18 करोड़ रुपये देने को कहा गया.

अभी भी जूट मिल का 11 करोड़ 65 लाख रुपये बिहार सरकार पर बक़ाया है. जूट मिल के मालिक ने उद्योग मंत्री के वादे पर मिल तो खोल दी लेकिन अब मिल के पास नया कच्चा माल लाने के पैसे नहीं हैं. लिहाज़ा मिल का हूटर बजाकर मिल नहीं खोली जा रही है.
मिल के कर्मचारी हरिया बताते हैं, "ये सब नेता लोग आता है और पागल बना कर जाता है. प्रिंस राज (समस्तीपुर से सांसद) भी आए थे चुनाव से पहले तो मिल का हूटर बजा था, बोले कि जब संसद में जाएंगे तो मिल का मुद्दा रखेंगे. बस उस दिन हूटर बज गया लेकिन एक दिन भी फ़ैक्ट्री नहीं खुला. ये भी (उद्योग मंत्री) यही करने आए हैं."
बिहार के सीमांचल का (कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया) इलाक़ा जूट के उत्पादन के लिए जाना जाता है. लेकिन सरकार की ओर से बढ़ावा ना मिलने और किसी भी तरह का निवेश ना होने के कारण यहां का जूट उत्पादन 10 क्विंटल सालाना पर आ चुका है.

कटिहार को 'जूट कैपिटल' तक कहा जाता है. यहां दो मिलें थीं, एक नेशनल जूट मैन्युफ़ैक्चरिंग कॉर्पोरेशन मिल (एनजेएमसी) और दूसरी सनबायो मैन्युफ़ैक्चरिंग लिमिटेड जिसे पुराना मिल भी कहते हैं.
50 एकड़ से ज़्यादा के क्षेत्रफल में फैले एनजेएमसी को साल 2008 में ही बंद कर दिया गया. अब ज़िले में सनबायो मिल ही है. ये मिल काम तो कर रही है लेकिन इसकी हालत भी बुरी है.
जानकार मानते हैं कि बिहार का सीमांचल इलाक़ा देश भर में जूट के उत्पादन का केंद्र हो सकता था लेकिन सरकार ने कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, अररिया में एक भी नई मिल नहीं लगवाई. जो थीं वो भी इन डेढ़ से दो दशकों में बर्बादी की ओर ही बढ़ीं.
एक वक़्त था जब इन मिलों में 4000 से 5000 लोग काम किया करते थे. आज बस दो सौ से ढाई सौ लोग मिल में काम करते हैं.

सिल्क सिटी भागलपुर को सरकार कितना बचा पाई?
भागलपुर में एक चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच से कहा, "त्योहारों का समय है, इसलिए पर्व पर जो भी ख़रीदारी करें, वह स्थानीय हो, भागलपुरी सिल्क के कपड़े ख़रीदें, साड़ियां ख़रीदें. मंजूषा पेंटिंग को बढ़ावा दें."
भागलपुर ज़िला प्रशासन की वेबसाइट खोलें तो मोटे अक्षरों में 'सिल्क सिटी' चमकता दिख जाएगा लेकिन इस सिल्क को बनाने वालों की क्या हालत है, इसकी चर्चा कहीं नहीं मिलती.
यहां की स्पन सिल्क फ़ैक्ट्री 1993-94 के दौर में ही बंद हो गई और इसके बंद होने का कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ बल्कि इसमें काम करने वाले कामगारों के वेतन का भुगतान कंपनी नहीं कर सकी और इसका संचालन रोक दिया गया.
17 सालों से ये फ़ैक्ट्री ऐसे ही बंद पड़ी है. इस मिल का मैदान जंगली घासों से भरा पड़ा है और लोग इसे डंपिंग यार्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं.
भागलपुर के पुरैनी गांव में 95 फ़ीसदी लोग बुनकर हैं. अंसारी बाहुल्य इस गांव में लोग पीढ़ी दर पीढ़ी सिल्क की बुनाई का ही काम करते आए हैं.
यहां रहने वाले 55 साल के सफ़ी अंसारी ख़ुद बुनकर हैं और उनका जवान बेटा भी बुनाई का ही काम करता है.
वह कहते हैं, "हमारा पूरा घर सिल्क का कपड़ा बनाता है और साड़ी बुनता है. मेरे बेटे को मैंने काम सिखाया है लेकिन काम आने से क्या होगा? स्किल इंडिया से नहीं होता, आपने (सरकार) हमको क्या दिया."
सफ़ी पास में पड़े हैंडलूम की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "देखिए वो साड़ी आधे पर बुनकर छोड़ दी गई है क्योंकि तागा (धागा) ख़त्म है और तागा बनाने का पैसा नहीं है."
"हम अपना बुनकर का कार्ड लेकर जाएंगे तो भी हमको साहेब यहां-वहां दौड़ाएंगे. कौन बेटा हमको देखने के बाद बुनकर बनना चाहेगा. बाल सफ़ेद हो गया लेकिन घिसते ही रहे, खाने और बच्चों को पढ़ाने के लिए ही पैसे पूरे नहीं हुए. किससे कहें कि हमसे काम सीख के बुनकर बनो. आप तो पहली बार आईं हैं वरना हमसे बात करने भी कौन आता है."
इस गांव के पिछड़ेपन का आलम ये है कि सरकार की नल-जल योजना तो दूर यहां पूरे गांव में दो से तीन घरों में ही नल है, बाकी सभी घरों में आज भी कुएं का पानी ही पिया जाता है.
आख़िर बीते डेढ़ दशकों में क्यों बिहार के उद्योग धंधों की तस्वीर नहीं बदल सकी. ये समझने के लिए हमने सत्तारुढ़ जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से संपर्क किया लेकिन नेताओं की चुनावी व्यस्तता के कारण हमें वक़्त नहीं मिल सका.
नेताओं के गोल-मोल जवाब
12 अक्टूबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक चुनावी रैली में कहा था, "ज़्यादा बड़ा उद्योग कहां लगता है, समुद्र के किनारे जो राज्य पड़ता है वहां लगता है. हम लोगों ने तो बहुत कोशिश की."
हालांकि लोगों ने सीएम के इस बयान की ख़ूब आलोचना की. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, यूपी जैसे कई राज्य जो लैंडलॉक्ड हैं वहां फैंक्ट्रियों की संख्या बिहार के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा हैं.
हालांकि छह ज़िलों में फैले बिहार के खस्ता औद्योगिक मिलों का हाल जानने के बाद हमने राजनीतिक पार्टियों से ये जानना चाहा कि आख़िरकार डेढ़-दो दशकों में राज्य के तमामा उद्योगों की हालत क्यों सुधारी नहीं जा सकी?
इस सवाल के जवाब में जनता दल यूनाइटेड के नेता संजय सिंह कहते हैं, "हमें 2005 में 1947 की हालत वाला बिहार मिला था. सड़कें, बिजली लोगों के पास नहीं थी हमने 15 साल में बिहार की सूरत बदली है. हमने साढ़े छह लाख लोगों को रोज़गार दिया है."
लेकिन 15 साल में उद्योग को लेकर क्या किया गया मेरे इस सवाल को दोहराने पर वह कहते हैं 'इसका जवाब तो आप उद्योग मंत्री जी से लीजिए.'
सत्ता में जेडीयू की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के नेता भी इस सवाल का सीधा जवाब नहीं देते.
बिहार बीजेपी के अध्यक्ष संजय जायसवाल भी इस सवाल का सीधा जवाब देने की बजाय कहते हैं कि "उद्योग की हालत 90 के दशक के आख़िर से ही बिगड़नी शुरू हुई. फ़ैक्ट्री के मालिकों से वसूली की जाती थी, उस जंगल राज से लोग इतना डरे की अपने ही फ़ैक्ट्री छोड़ कर भाग गए. नए व्यापारियों ने इस डर से ही प्लांट नहीं लगाया. अगर ये लोग सत्ता में आए तो फिर वही होगा."
इस पूरी बातचीत में उनकी सरकार के प्रयासों का ज़िक्र नहीं मिला लेकिन हमारे बार-बार सवाल दोहराने पर वह कहते हैं, "हमने ख़ूब काम किया है हमारे इलाक़े (बेतिया) में सुगौली और लौरिया चीनी मिल आज काम कर रही हैं."
दरअसल, मोतिहारी की सुगौली और लौरिया चीनी मिल का 2012 में दोबारा संचालन शुरू किया गया.
एचपीसीएल ने इस मिल को चालू किया. लेकिन अप्रैल 2020 को ख़बरें सामने आईं कि लौरिया मिल पर किसानों का 80.36 करोड़ और सुगौली पर किसानों का 58 करोड़ रुपये बक़ाया है. उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मिल मालिक से ये भुगतान करने को कहा था.
इन दो मिलों के सामने बिहार में औद्योगिकरण का स्याह चेहरा चमकता हुआ मानना थोड़ा बेमानी-सा लगता है.
इसके बाद जब हम राज्य के उद्योग मंत्री महेश्वर हज़ारी से मिले तो उन्होंने हमें सबसे पहले ये बताया कि आज वो बाइक पर सवार होकर अपने इलाक़े में निकले थे.
बिहार के उद्योग मंत्री होने के नाते उन्होंने क्या क़दम उठाए? इस सवाल पर वह कहते हैं, "हमको मंत्री पद ही दो महीने पहले मिला है."

लेकिन जूट मिल को लेकर वह अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं, "देखिए बक़ाया तो मिल के मालिक का बिजली बिल है. हां, बिहार सरकार पर देनदारी है लेकिन पहले उन्हें सूद के साथ चाहिए था, फिर बोले मूलधन ही दे दीजिए. हमने मिल खुलवा दी है लेकिन अब आचार संहिता लग गई तो क्या करें. लेकिन चुनाव नतीजे आते ही पैसा दे दिया जाएगा."
बिहार में बंद पड़ी मिलों पर वह कहते हैं अगर वो जीत कर सत्ता में आए तो इस बार उद्योगों का विकास होगा.
हालांकि नेता जी का ये बयान बिहार की जनता दशकों से सुन रही है, क्योंकि बिहार की इंडस्ट्री की ये बदहाली किसी एक पार्टी की सरकार की देन नहीं है, ऐसा लगता है कि इसे तमाम सरकारों ने कभी मुद्दा माना ही नहीं. लेकिन अब इन पार्टियों के लिए रोजग़ार मुद्दा है लेकिन जिन फ़ैक्ट्रियों से रोज़गार मिल रहा था वो किसी की ज़ुबां पर नहीं हैं.(https://www.bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव-परिणाम की घोषणा में चाहे देरी हो रही है लेकिन यह सवाल सबके दिमाग पर भारी पड़ रहा है कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप को इतने ज्यादा वोट क्यों मिले हैं ? लगभग सारे चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण गलत साबित क्यों हो रहे हैं? अमेरिका और उसके बाहर भी यह माना जा रहा था कि बड़बोले ट्रंप इस बार जबर्दस्त पटकनी खाएंगे। उन्हें आम मतदाताओं के वोट पिछले चुनाव की भांति (30 लाख) इस बार भी कम मिलेंगे बल्कि बहुत कम मिलेंगे लेकिन अभी तक जो भी आंकड़े सामने आए हैं, उनसे पता चल रहा है कि 2016 के मुकाबले उनके वोटों की संख्या बढ़ी है और सीनेट (राज्यसभा) के चुनाव में भी उनके उम्मीदवार जीत गए हैं। कांग्रेस (लोकसभा) में हालांकि डेमोक्रेट की संख्या बढ़ी है लेकिन कुल मिलाकर यदि ट्रंप हार भी गए तो भी अमेरिकी राजनीति में उनका दबदबा बना रह सकता है। रिपब्लिकन पार्टी में वे शायद किसी अन्य नेता को आगे आने नहीं देंगे। यहां सवाल सिर्फ रिपब्लिकन पार्टी का नहीं है बल्कि उन करोड़ों अमेरिकी नागरिकों का है, जिन्होंने ट्रंप-जैसे आदमी को अपना अमूल्य वोट दिया है। जिन्होंने ट्रंप को वोट दिया है, वे लोग कौन हैं ? जाहिर है कि वे रिपब्लिकन पार्टी के लोग तो हैं ही, उनके अलावा वे लोग भी हैं, जो रंगभेद में विश्वास करते हैं, जो गौरांग लोग अपने आप को असली अमेरिकी समझते हैं, जो अमेरिका को संसार के सबसे बड़े दादा के रुप में देखना चाहते हैं याने जो उग्र राष्ट्रवादी हैं, जो लोग तू-तड़ाक शैली में बोलनेवाले नेता को पसंद करते हैं, जो अमेरिका के नवांगतुकों को अपनी बेरोजगारी का कारण समझते हैं, जो चीन-जैसे देशों पर मुक्का तानने को राष्ट्रीय गौरव का विषय मानते हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन, नाटो और यूएन जैसी संस्थाओं को अमेरिका का शोषण करनेवाली संस्थाएं समझते हैं और जो बेलगाम और अक्खड़ आदमी को ही नेता मानते हैं। ऐसे ही लोगों ने ट्रंप को इतने ज्यादा वोट दिलवा दिए हैं। इसका अर्थ क्या निकला? इसका सबसे पहला अर्थ यही है कि आज की अमेरिका की जनता में उचित-अनुचित का विवेक करने की बौद्धिक क्षमता बहुत कम है। दूसरा, यदि जो बाइडन जीत गए तो भी ट्रंप उन्हें तंग करने में कोई कसर उठा न रखेंगे। तीसरा, चुनाव के बाद जिस तरह की तोड़-फोड़ और हिंसा की खबरें आ रही हैं, वे बताती हैं कि इस वक्त अमेरिका दो खेमों में बंट गया है। चौथा, ट्रंप की धमकियों और आरोपों ने अमेरिकी लोकतंत्र पर धब्बे मढ़ दिए हैं। पांचवां, यदि हारने के बावजूद ट्रंप कुर्सी नहीं छोड़ते हैं और अदालतों के दरवाजे खटखटाते हैं तो अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में वे एक काला पन्ना जोड़ देंगे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रदीप कुमार
बिहार की राजनीति में एक कहावत की चर्चा लोग अक्सर किया करते हैं- 'एक कटोरी, तीन गिलास, शरद, लालू, रामविलास.'
1974 के जेपी आंदोलन के बाद से बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई में वैसे तो कई नेताओं का योगदान रहा, पर इन तीनों के योगदान की अक्सर चर्चा होती है.
लेकिन इस बार के बिहार चुनाव में ये तीनों नेता मौजूद नहीं थे. 1990 के बाद बिहार की राजनीति में यह पहला मौक़ा था, जब लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और शरद यादव के बिना ना केवल चुनावी सभाएँ हुईं, बल्कि चुनाव भी हुए.
दिलचस्प यह भी रहा कि इन तीनों नेताओं की ज़िम्मेदारियों को काफ़ी हद तक इनके बच्चों ने सँभाल लिया.
सबसे पहले बात लालू प्रसाद यादव की. लालू प्रसाद यादव इन दिनों झारखंड के राँची में चारा घोटाले के मामलों में जेल में हैं.
साल 2015 के चुनाव के दौरान भी उन्हें सज़ा मिल चुकी थी, लेकिन तब वो ज़मानत पर थे और उन्होंने महागठबंधन को बनाने में अहम भूमिका अदा की थी, लेकिन इस बार उन्हें ज़मानत नहीं मिली और पूरे चुनाव के दौरान उनकी भूमिका जेल में रहकर चुनाव देखने वाले दर्शक की ज़्यादा रही.
तेजस्वी यादव का कितना तेज फैला?
वहीं दूसरी ओर उनके बेटे तेजस्वी यादव ने पिता की ग़ैर-मौजूदगी में पूरा चुनाव प्रचार अभियान ख़ुद पर फ़ोकस किया.
उन्होंने रणनीतिक तौर पर राष्ट्रीय जनता दल के पोस्टरों से लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की तस्वीरों की जगह नहीं दी और केवल ख़ुद को रखा.
इस बारे में राज्य के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर बताते हैं, "देखिए बिहार में काफ़ी ऐसे लोग हैं जो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के प्रति बैर भाव रखते हैं. तेजस्वी ने एक झटके में यह मुद्दा ही ख़त्म कर दिया. इसका उन्हें काफ़ी लाभ मिला."
हालाँकि, दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी लगातार अपने चुनावी अभियान के दौरान लालू-राबड़ी के 15 साल के दौर की याद दिलाते रहे.
नरेंद्र मोदी ने तेजस्वी यादव को 'जंगलराज का युवराज' कहा, तो नीतीश कुमार ने कहीं ज़्यादा व्यक्तिगत हमले करते हुए कह दिया, "अपने बाप से पूछो और जो लोग आठ-आठ, नौ-नौ बच्चे पैदा करते रहे, वे विकास की बात कर रहे हैं." सुशील मोदी ने भी लालू प्रसाद यादव के दौर को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए हर दिन मुद्दा बनाया.
जदयू ने पहले चरण के मतदान के बाद फुलवरिया टू होटवार, करके एक वेबसाइट ही बना दी. इस वेबसाइट पर लालू-राबड़ी शासन के दौरान हुए अपराध और भ्रष्टाचारों की जानकारी के साथ-साथ उस दौर के अख़बारों की क्लिपिंग भी लगाई गई.
लेकिन तेजस्वी यादव ने बिहार के आम चुनावों में इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनने दिया. महज़ 31 साल की उम्र में वे राजनीतिक तौर पर इतने सध चुके हैं कि जंगलराज की याद दिलाने पर वे डिफ़ेंसिव हुए बिना कहते हैं, "इस सरकार ने अपने 15 साल में क्या-क्या किया है, जनता ये पूछना चाहती है."
इसके बाद वे इस मुद्दे को उपमुख्यमंत्री के तौर पर अपने 18 महीने के कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहते हैं, "नए वाले महात्मा गांधी सेतु से लेकर छह-छह पीपा पुल बनाने का काम मैंने किया, उसमें क्या भ्रष्टाचार किया, ये बताइए."
इसके बाद तेजस्वी यादव, एनसीआरबी के आँकड़ों के हवाले से बताते हैं कि 'नीतीश कुमार के 15 साल के शासन में अपराध का ग्राफ़ बढ़ा है, लेकिन इस पर चर्चा नहीं होती है.'
राष्ट्रीय जनता दल की ओर से राज्य सभा सांसद मनोज झा कहते हैं, "मुज़फ़्फ़रपुर में बालिका गृह काण्ड में जो हुआ उसकी कल्पना क्या उस दौर में की जा सकती थी जिसे कथित तौर पर जंगलराज कहा जाता था, आप लालू जी के दौर को जंगलराज कहते हैं तो नीतीश कुमार के 15 साल को महा-जंगलराज कहना होगा."
तेजस्वी यादव ने अपने चुनावी अभियान में भले ही लालू प्रसाद यादव को लेकर इस बार कोई इमोशनल अपील नहीं की, लेकिन उनकी सभाओं में मौजूद भीड़ में लालू प्रसाद यादव को लेकर एक भावनात्मक जुड़ाव नज़र आ रहा था.
लालू प्रसाद यादव के समर्थकों का मानना है कि उन्हें चारा घोटाले में फँसाया गया है, तेजस्वी की सोनपुर में हुई सभा में एक युवा ने कहा, "बताइए चारा घोटाला क्या लालू के राज में शुरू हुआ था, लालू जी ने उस घोटाले को पकड़ा था, लेकिन जगन्नाथ मिश्र को बरी कर दिया गया और लालू को जेल क्यों भेजा गया."
लालू प्रसाद यादव की कमी कितनी खली?

मिथलांचल के सुपौल ज़िले में एक शख़्स ने कहा कि "लालू जी ने हमको वह दिया जिसके चलते हम आपसे बात कर रहे हैं, हमारी मछली की दुकान है और सरकार किसी की भी हो हमें तो कुछ मिलना नहीं है. लेकिन लालू जी ने जो दिया वो आपको बता रहे हैं, वरना 30-35 साल पहले हम लोग बात तक नहीं कर पाते थे."
बिहार चुनाव से पहले लालू प्रसाद यादव पर एक क़िताब भी आयी- 'द किंग मेकर, लालू प्रसाद यादव की अनकही दास्तान'.
इस किताब के लेखक और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर मीडिया स्टडीज़ में पीएचडी कर रहे जयंत जिज्ञासु खगड़िया के अलौली विधानसभा के हैं.
जयंत अपने पिता हलधर प्रसाद के हवाले से बताते हैं, "इस बार तेजस्वी यादव की सभा जो मेरे इलाक़े में हुई तो उसमें जुटी भीड़ को मेरे पिता ने 1995 के चुनाव में ऐसी भीड़ लालू जी के लिए जुटी भीड़ से भी ज़्यादा पाया. जबकि लालू प्रसाद एक तरह से क्राउड पुलर नेता के तौर पर जाने जाते थे. जबकि तेजस्वी जी की वैसी पहचान नहीं थी. इस बार उन्होंने यह साबित किया है कि वे भी भीड़ जुटाने वाले नेता हैं."
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि लोगों को लालू जी की कमी नहीं खली हो. लालू यादव के पैतृक गाँव फुलवरिया में एक युवा ने कहा, "लालू जी की बराबरी कोई नहीं कर सकता, उन्हें इस इलाक़े के हर घर की ख़बर रहती थी, तेजस्वी अगर वैसा कनेक्ट रखेंगे, इसकी उम्मीद है क्योंकि वे हमारे लालू जी के बेटे हैं, हमारे भाई हैं."
हाजीपुर के एक कारोबारी युवा ने कहा, "देखिए हम लोग नीतीश जी को वोट देते आये हैं, लेकिन इनके राज में ब्यूरोक्रेसी इतना निरंकुश हो चुका है कि किसी की सुनवाई नहीं है. लालू जी होते तो यह सब लगाम में होता, इसलिए भी इस बार बदलाव की उम्मीद है."
वहीं दरभंगा में एक युवा मतदाता ने कहा कि "लालू जी के चुनावी भाषण का कोई मुक़ाबला नहीं. वे होते तो मोदी और नीतीश कुमार को अपने राजनीतिक तंज़ में पहले हराते, फिर चुनाव में हराते."
जनता दल (यूनाइटेड) के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह लालू प्रसाद यादव के ज़माने में हुए भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए यह कहते हैं कि "इस चुनाव में भले लालू जी नहीं हैं, लेकिन तेजस्वी उनके बनाये नियमों और उनकी बातों के तहत ही पार्टी चला रहे हैं."
वैसे तेजस्वी यादव ने एक तरह से लालू प्रसाद की ग़ैर-मौजूदगी में अकेले दम पर महागठबंधन का नेतृत्व शानदार ढंग से सँभाला है और अपने पिता की उम्र वाले नेताओं के साथ युवाओं को भी साथ लेकर चले. लालू प्रसाद यादव के जेल में होने के चलते भी तेजस्वी को भावनात्मक स्तर पर लोगों का सपोर्ट मिला.
लालू प्रसाद यादव की तरह ही बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय के स्तंभ नेता रहे राम विलास पासवान इस बार बिहार चुनाव से नदारद रहे.
राम विलास पासवान के चिराग
दरअसल लंबी बीमारी के बाद आठ अक्टूबर को रामविलास पासवान का निधन हो गया था, ऐसे में बीते 50 साल से बिहार की राजनीति की पहचान रहे राम विलास की विरासत को उनके बेटे चिराग पासवान ने बख़ूबी सँभाला.
राम विलास पासवान खगड़िया के अलौली विधानसभा से बाहर निकले, बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा से बिहार पुलिस सेवा में पहुँचे और राजनीति में ऐसे रमे कि भारतीय दलित राजनीति में उनका नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया.
लेकिन इस बार उनके बेटे चिराग पासवान ने उनके उस सपने को पूरा करने का बेड़ा उठाया, जो राम विलास पासवान जीते जी कभी पूरा नहीं कर सके.
मण्डल कमीशन को लागू कराने वाले नेताओं में शामिल रहे राम विलास पासवान केंद्र की राजनीति में हमेशा प्रासंगिक रहे, लेकिन कभी बिहार की राजनीति में वे ताक़त के तौर पर स्थापित नहीं हुए.
उनकी पार्टी को हमेशा पाँच छह प्रतिशत वोट बैंक वाली पार्टी के तौर पर देखा गया.
लेकिन चिराग पासवान इस बार बिहार की राजनीति में एक फ़ैक्टर के तौर पर उभरे.
उन्होंने 'बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट' की नींव के ज़रिए बिहार की राजनीति में एक हलचल पैदा की.
वे तेजस्वी यादव की तुलना में कहीं ज़्यादा मुखरता से नीतीश कुमार की आलोचना करते रहे और नीतीश कुमार को हराने के इरादे से अपने उम्मीदवारों का चयन किया.
इस कोशिश में चिराग पासवान ने अपने पार्टी के उम्मीदवारों को 143 सीटों से खड़ा कर दिया.
'वोट कटवा पार्टी' का तमगा
एक झटके में उन्होंने इन सीटों पर अपनी पार्टी के आधारभूत ढाँचे और संगठन को खड़ा कर लिया. चिराग पासवान के मुताबिक़, उनके उम्मीदवार कम से कम 50 सीटों पर ऐसी स्थिति में हैं जहाँ से जनता दल यूनाइटेड को हराएँगे.
चिराग पासवान अपनी रणनीति को साफ़ करते हुए कहते हैं कि 'बिहार विधानसभा में महज़ दो विधायक हैं हमारे, अब हमारे विधायकों की संख्या कहीं ज़्यादा होगी, लेकिन उससे भी अहम बात यह होगी कि बिहार की राजनीति में लोक जनशक्ति पार्टी एक विकल्प के तौर पर उभरी है और हमारा वोट प्रतिशत दोगुने से भी ज़्यादा होने जा रहा है.'
चिराग पासवान इस पूरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के साथ होने का दावा करते रहे, हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने उन्हें 'वोट कटवा पार्टी' तक कहा.
इस चुनाव के दौरान एक सभा में उनके सामने कैसे-कैसे अनुभव हुए, उसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि एक सभा में एक युवक ने आकर उनसे कहा कि "भइया अब तो बीजेपी ने वोट कटवा पार्टी कह दिया है, ऐसे में कैसे चलेगा, तो चिराग ने उस युवक को समझाया कि अभी नीतीश कुमार पर ही फ़ोकस करो."
चिराग समर्थकों के मुताबिक़, अगर बीजेपी ने लोजपा के साथ चुनाव लड़ा होता तो बीजेपी और एलजेपी की सरकार बनती.
दिलचस्प यह है कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान ना तो तेजस्वी यादव ने और ना ही चिराग पासवान ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ आरोप-प्रत्यारोप लगाए.
इससे दोनों के बीच आपसी सहमति को लेकर भी लोगों में कयास दिखा. बरबीघा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले गजानंद शाही कहते हैं कि 'चिराग पासवान ने इस पूरे चुनाव अभियान में जो स्टैंड लिया है, वह उनकी अपनी राजनीति के लिए अच्छा होगा, उन्होंने अपना स्पेस मज़बूत किया है.'
हालाँकि, राम विलास पासवान के पुराने समर्थकों में एक बुर्ज़ुग ने कहा कि 'चिराग पासवान का भविष्य बहुत अच्छा है, लेकिन इस बार वे बीजेपी का साथ दे रहे हैं, वे पूँजीपतियों का साथ दे रहे हैं, जबकि उनके पिता ने हमेशा दलितों का साथ दिया.'
इस चुनाव में चिराग पासवान आक्रामकता के साथ अगर अपनी राह नहीं चुनते तो पासवान वोटों के भी छिटक कर बीजेपी में जाने का ख़तरा उत्पन्न हो सकता था.
लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के अलावा इस चुनाव में शरद यादव भी शामिल नहीं थे.
राजनीति के मैदान में नई एंट्री
सामाजिक न्याय की राजनीति का अहम चेहरा रहे शरद यादव वैसे तो जबलपुर के हैं, लेकिन वे बिहार के मधेपुरा से चार बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
मगर इस बार बीमार होने के चलते शरद यादव बिहार चुनाव के सीन से ग़ायब रहे. पर उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी उनकी बेटी सुभाषिनी ने बख़ूबी सँभाली.
मधेपुरा के बिहारीगंज से सुभाषिनी इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं.
राजद के बदले कांग्रेस को चुनने के अपने फ़ैसले पर सुभाषिनी ने बताया कि कांग्रेस से जो ऑफ़र था, वह उससे इनकार नहीं कर सकीं और महागठबंधन के साथ ही वह एनडीए सरकार के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में हैं.
सुभाषिनी यह भी बताती हैं कि उनके पिता ने मधेपुरा के लिए जितना कुछ किया है, वो शायद ही यहाँ किसी और नेता ने किया होगा, लेकिन अब वह बिहारीगंज में लोगों के विकास के लिए काम करेंगी.
हालाँकि अपने पिता की राह पर अभी सुभाषिनी को लंबा संघर्ष करना है, पर वह इसके लिए पूरी तरह तैयार दिखती हैं.
उनकी शादी हरियाणा में हुई है, पर सुभाषिनी यह बताती हैं कि मधेपुरा ही उनका घर है और वह वहाँ की मतदाता भी हैं, बचपन से लोगों को देखती आयी हैं, लिहाज़ा उन्हें लोगों की मुश्किलों का अंदाज़ा है.(https://www.bbc.com/hindi)
वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में पिछले दो वर्षों में करीब 200 से अधिक जंगली जानवर की मौत करंट लगने के कारण हुई
- Avdhesh Mallick
Wild lifeछत्तीसगढ़ के जसपुर इलाके में बिजली के करंट की वजह से मारा गया तेंदुआ। फोटो: अवधेश मलिक छत्तीसगढ़ के जसपुर इलाके में बिजली के करंट की वजह से मारा गया तेंदुआ। फोटो: अवधेश मलिक
बिजली की तारें छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणियों के लिए अभिशाप बन गई हैं। इसके चपेट में आने के कारण से पिछले 2 वर्षों में 200 वन्य प्राणी मारे जा चुके हैं। इसके चपेट में आने से जवान भी खुद को नहीं बचा पा रहे हैं।
5 नवंबर 2020 को बीजापुर के चिन्नाकोड़ेपाल के जंगल में एंटी-नक्सल आपरेशन अभियान में गए जवान श्रीधर की मृत्यु विधुत तार के चपेट में आने से हो गई।
वहीं पर वन विभाग ने इसी वर्ष 28 अक्टूबर को एक तेंदुआ की मौत के सिलिसिले में जशपुर के पत्थलगांव से चार लोगों को पकड़ा । इन पर जंगल में एक तेंदुआ को करेंट लगाकर मारने के आरोप है। पिछले वर्ष कवर्धा के जंगलों में बैल के साथ का शिकार करने पहुंचा तेंदुआ का शव मिला। जांच के बाद पता चला अज्ञात शिकारी ने तार में करेंट प्रवाहित कर उसे जमीन पर छोड़ दिया था। जिसमें तीनों मारे गए। इसी प्रकार मुंगेंली जिले के खुड़िया जंगल में एक और तेंदुआ की मौत करेंट लगने के हो गई। इसी अगस्त महीने में महासमुदं में दो भालुओं की मौत करंट लगने के कारण हो गई। प्रदेश में भालू ही नहीं, चीतल, सांभर, जंगली सूअर, गौर आदि वन्य प्राणियों की बड़े पैमाने पर शिकार बिजली के तारों में फंसने के कारण हो चुकी है।
वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में पिछले दो वर्षों में करीब 200 से अधिक जंगली जानवर की मौत करंट लगने के कारण हुई।
करंट से बड़ी संख्या में हाथियों की मौतें-
हाथियों के संदर्भ में यह आंकड़ा और भी भयावह है। छत्तीसगढ़ वन विभाग के एपीसीसीएफ अरूण पांडे बताते हैं पिछले 10 वर्षों में पूरे प्रदेश भर में 47 हाथियों की मौत करंट के चपेट में आने के कारण से हुआ। उनमें से सर्वाधिक 21 हाथी यानि कि करीब 45 प्रतिशत करंट लगने से हाथियों मौत धरमजयगढ़ फारेस्ट डिवीजन में हुआ।
धरमजयगढ़ में हाथियों के अधिक मौत के पीछे की वजह इस क्षेत्र का हाथी विचरण क्षेत्र होना तथा बड़ी संख्या में अवैध नल कनेक्शन होना है। यह वही क्षेत्र है जो महत्वाकांक्षी लेमरू एलिफेंट रिजर्व के लिए प्रस्तावित है।
अवैध नल कनेक्शन और जंगली सूअर का मांस-
वन विभाग की एक रिपोर्ट कहती है कि इस क्षेत्र में करीब 3500 से अधिक अवैध नल कनेक्शन है।
आरोप है कि किसानों ने खेतों में बोर करा लिए हैं और खुले तारों से बिजली का अवैध कनेक्शन ले लिया है। हाथी दल रात में विचरण करते हुए जब खेत पहुंचते हैं, तो खुले तारों की चपेट में आने से मर जाते हैं।
वाईल्ड लाईफ एक्टिविस्ट नितिन सिंघवी इसके लिए वन और बिजली विभाग के कर्मचारियों की मिली भगत, लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि ये सरकारी अधिकारी और कर्मचारी विधुत के अवैध कनेक्शनों को चेक नहीं करते। दूसरी बात बिजली विभाग के नए तार जो गुजरें हैं वह मानकों के हिसाब से नहीं लगाएं गए हैं। नितिन सिंघवी वन्य जीवों को बचाने के लिए हाई कोर्ट में पीआईएल भी लगा चुके हैं।
वन्य जीव बचाने लगेंगे 1,674 करोड़ रुपये
सुनवाई के दौरान विद्युत वितरण कंपनी ने वन क्षेत्रों में नीचे जा रही बिजली के नंगे तारों को कवर्ड कंडक्टर यानि इन्सुलेटेड वायर में बदलने के लिए वन विभाग 1,674 करोड़ रुपये की मागं की थी। जो अब तक कंपनी को नहीं मिलें हैं।
इस पर एपीसीसीएफ अरूण पांडेय कहते हैं इस संदर्भ में प्रक्रिया चल रही है। पर बात यहां पर मेंटलिटी की भी है। वन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोगों वन सूअर के मांस को काफी उच्च क्वालिटि का मानते हैं और अक्सर इसका शिकार हेतु खेतों और वनों में विधुत प्रवाह कर देते हैं। जिससे लगातार मौतें हो रही है। इस पर अंकुश लगाने विभाग जागरूकता अभियान चला रहा है।(downtoearth)
यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ ने चेताया है कि कोविड-19 महामारी के कारण कुछ देशों में टीकाकरण की दर में 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है
- DTE Staff
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने कहा है कि दुनिया भर में कोविड-19 महामारी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं और टीकाकरण में आई बाधा के कारण लाखों बच्चों के पोलियो और खसरा का जोखिम बहुत बढ़ गया है।
संयुक्त राष्ट्र के इन दोनों संगठनों ने चेताया है कि कोविड-19 महामारी के कारण कुछ देशों में टीकाकरण की दर में 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है।
इन संगठनों द्वारा जारी संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोनावायरस से बचने के लिए लगी पाबन्दियों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बहुत कम हो गई है। या बहुत से लोग कोरोनावायरस के संक्रमण के डर से खुद ही स्वास्थ्य सेवाओं तक जाने से बचने रहे। इसके चलते पोलियो और खसरे से रोकथाम के लिए चलाए जा रहे अभियान रोकने पड़े।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा कि दुनिया भर में कोविड-19 का स्वास्थ्य सेवाओं खासतौर से टीकाकरण सेवाएं व्यापक रूप में प्रभावित हुई हैं। हालांकि कोविड-19 के मुकाबले पोलियो और खसरे से निपटने के लिए हमारे पास न केवल विशेषज्ञता है, बल्कि इंतजाम भी हैं। बस जरूरत है कि हम इनका इस्तेमाल जमीनी तौर पर कर सकें। अगर हम ऐसा कर पाते हैं, तो बच्चों की जिंदगियां बचाई जा सकते हैं।
इस रिपोर्ट में यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया है कि मध्यम आय वाले देशों में टीकाकरण अभियानों के लिये मौजूद खाई को भरने के लिए लगभग 65 करोड़ 50 लाख डॉलर राशि की जरूरत है।
इस राशि में से लगभग 40 करोड़ डॉलर की राशि वर्ष 2020-2021 के दौरान पोलियो का मुकाबला करने के लिए चाहिए। जबकि अगले तीन वर्षों के दौरान खसरा के प्रसार को रोकने के लिए लगभग 25 करोड़ 50 लाख डॉलर राशि की जरूरत है।
संयुक्त राष्ट्र की दोनों एजेंसियों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर स्थिति को इसी तरह से छोड़ दिया गया तो इन दोनों बीमारियों का विस्फोटक प्रसार होने का डर है और पोलियो व खसरा का यह प्रसार अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं को भी पार कर सकता है।
यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक हेनरिएटा फोर ने कहा कि इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती कि कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई के कारण अन्य बीमारियों के खिलाफ अभियान पर प्रभाव पड़े।
उन्होंने कहा, “कोविड-19 महामारी का मुकाबला करना बहुत जरूरी है, लेकिन ये भी सच है कि दुनिया के कुछ गरीब देशों में अन्य घातक बीमारियां भी लाखों- करोड़ों बच्चों की जान पर भारी पड़ सकती हैं। इसलिए हम आज देशों के नेताओं, दानदाताओं और साझीदारों से तत्काल वैश्विक कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं।"
यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी देशों का आहवान किया कि वे बीमारियों का प्रसार रोकने के लिए तुरन्त कार्रवाई करें। अपने बजटों में टीकाकरण को प्रथामिकता पर रखें।(downtoearth)
जब 1982 ख़त्म होते-होते पंजाब के हालात बेक़ाबू होने लगे तो रॉ के पूर्व प्रमुख रामनाथ काव ने भिंडरावाले को हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के ज़रिए पहले चौक मेहता गुरुद्वारे और फिर बाद में स्वर्ण मंदिर से उठवा लेने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था.
इस बीच काव ने ब्रिटिश उच्चायोग में काम कर रहे ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसी एमआई-6 के दो जासूसों से अकेले में मुलाक़ात की थी. रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमण 'काव ब्वाएज़ ऑफ़ रॉ' में लिखते हैं, "दिसंबर, 1983 में एमआई-6 के दो जासूसों ने स्वर्ण मंदिर का मुआयना किया था. इनमें से कम से कम एक वही शख़्स था जिससे काव ने मुलाक़ात की थी."
इस मुआयने की असली वजह तब स्पष्ट हुई जब एक ब्रिटिश शोधकर्ता और पत्रकार फ़िल मिलर ने क्यू में ब्रिटिश आर्काइव्स से ब्रिटेन की कमाँडो फ़ोर्स एसएएस की श्रीलंका में भूमिका के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की. तभी उन्हें वहाँ कुछ पत्र मिले जिससे ये पता चलता था कि भारत के कमाँडो ऑपरेशन की योजना में ब्रिटेन की सहायता ली गई थी.
30 वर्षों के बाद इन पत्रों के डिक्लासिफ़ाई होने के बाद पता चला कि प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थैचर एमआई-6 के प्रमुख के ज़रिए काव के भेजे गए अनुरोध को मान गई थीं जिसके तहत ब्रिटेन की एलीट कमाँडो फ़ोर्स के एक अफ़सर को दिल्ली भेजा गया था.

लेबर पार्टी के सांसद टॉम वाटसन का दावा है कि उन्होंने इन दस्तावेज़ों को देखा है.
फ़िल मिलर ने 13 जनवरी, 2014 को प्रकाशित ब्लॉग 'रिवील्ड एसएएस एडवाइज़्ड अमृतसर रेड' में इसकी जानकारी देते हुए इंदिरा गांधी की आलोचना की थी कि एक तरफ़ तो वो श्रीलंका में ब्रिटिश खुफ़िया एजेंसी के हस्तक्षेप के सख़्त ख़िलाफ़ थीं. वहीं, दूसरी ओर स्वर्ण मंदिर के ऑपरेशन में उन्हें उनकी मदद लेने से कोई गुरेज़ नहीं था.
ब्रिटिश संसद में बवाल होने पर जनवरी 2014 में प्रधानमंत्री कैमरन ने इसकी जाँच के आदेश दिए थे. जाँच के बाद ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग ने स्वीकार किया था के एक एसएएस अधिकारी ने 8 फ़रवरी से 14 फ़रवरी 1984 के बीच भारत की यात्रा की थी और भारत की स्पेशल फ़्रंटियर फ़ोर्स के कुछ अधिकारियों के साथ स्वर्ण मंदिर का दौरा भी किया था.
तब बीबीसी ने ही ये समाचार देते हुए कहा था कि 'ब्रिटिश ख़ुफ़िया अधिकारी की सलाह थी कि सैनिक ऑपरेशन को आख़िरी विकल्प के तौर पर ही रखा जाए. उसकी ये भी सलाह थी कि चरमपंथियों को बाहर लाने के लिए हेलीकॉप्टर से बलों को मंदिर परिसर में भेजा जाए ताकि कम से कम लोग हताहत हों.'
अग़वा करने में होना था हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल
ब्रिटिश संसद में इस विषय पर हुई चर्चा का संज्ञान लेते हुए इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार संदीप उन्नीथन ने पत्रिका के 31 जनवरी, 2014 के अंक में 'स्नैच एंड ग्रैब' शीर्षक से एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने बताया था कि इस ख़ुफ़िया ऑपरेशन को 'ऑपरेशन सनडाउन' का नाम दिया गया था.
इस लेख में लिखा था, "योजना थी कि भिंडरावाले को उनके गुरु नानक निवास ठिकाने से पकड़ कर हेलीकॉप्टर के ज़रिए बाहर ले जाया जाता. इस योजना को इंदिरा गाँधी के वरिष्ठ सलाहकार रामनाथ काव की उपस्थिति में उनके 1 अकबर रोड निवास पर उनके सामने रखा गया था. लेकिन, इंदिरा गाँधी ने इस प्लान को ये कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इसमें कई लोग मारे जा सकते हैं."

जी.बी.एस सिद्धू
ये पहला मौक़ा नहीं था जब भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने भिंडरावाले को उनके ठिकाने से पकड़ने की योजना बनाई थी. काव उस समय से भिंडरावाले को पकड़वाने की योजना बना रहे थे जब वो चौक मेहता में रहा करते थे और बाद में 19 जुलाई, 1982 को गुरु नानक निवास में शिफ़्ट हो गए थे.
काव ने नागरानी को भिंडरावाले को पकड़वाने की ज़िम्मेदारी सौंपी
रॉ में विशेष सचिव के पद पर काम कर चुके और पूर्व विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह के दामाद जी.बी.एस सिद्धू की एक किताब 'द ख़ालिस्तान कॉन्सपिरेसी' हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने भिंडरावाले को पकड़वाने की उस योजना पर और रोशनी डाली है.
उस ज़माने में 1951 बैच के आँध्र प्रदेश काडर के राम टेकचंद नागरानी डीजीएस यानि डायरेक्टर जनरल सिक्योरिटी हुआ करते थे. रॉ की एक कमाँडो यूनिट होती थी एसएफ़एफ़ जिसमें सेना, सीमा सुरक्षा बल और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल से लिए गए 150 चुनिंदा जवान हुआ करते थे. इस यूनिट के पास अपने दो एमआई हैलिकॉप्टर थे. इसके अलावा वो ज़रूरत पड़ने पर एविएशन रिसर्च सेंटर के विमानों का भी इस्तेमाल कर सकते थे.
1928 में जन्में राम नागरानी अभी भी दिल्ली में रहते हैं. ख़राब स्वास्थ्य के कारण अब वो बात करने की स्थिति में नहीं हैं. सिद्धू ने दो वर्ष पूर्व अपनी किताब के सिलसिले में उनसे कई बार बात की थी.
जीबीएस सिद्धू बताते हैं, ''नागरानी ने मुझे बताया था कि दिसंबर, 1983 के अंत में काव ने मुझे अपने दफ़्तर में बुला कर भिंडरावाले का अपहरण करने के लिए एसएफ़एफ़ के हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी. भिंडरावाले का ये अपहरण स्वर्ण मंदिर की लंगर की छत से किया जाना था जहाँ वो रोज़ शाम को अपना संदेश दिया करते थे. इसके लिए दो एमआई हेलीकॉप्टरों और कुछ बुलेटप्रूफ़ वाहनों की व्यवस्था की जानी थी ताकि भिंडरावाले को वहाँ से निकाल कर बगल की सड़क तक पहुंचाया जा सके. इसके लिए नागरानी ने सीआरपीएफ़ जवानों द्वारा क्षेत्र में तीन पर्तों का घेरा बनाने की योजना बनाई थी.''
सिद्धू आगे बताते हैं, ''ऑपरेशन की योजना बनाने से पहले नागरानी ने एसएफ़एफ़ के एक कर्मचारी को स्वर्ण मंदिर के अंदर भेजा था. उसने वहाँ कुछ दिन रह कर उस इलाक़े का विस्तृत नक्शा बनाया था. इस नक्शे में मंदिर परिसर में अंदर घुसने और बाहर निकलने की सबसे अच्छी जगहें चिन्हित की गईं थीं. उसे भिंडरावाले और उनके साथियों की अकाल तख़्त पर उनके निवास से लेकर लंगर की छत तक सभी गतिविधियों पर भी नज़र रखने के लिए कहा गया था.''
''इस शख़्स से ये भी कहा गया था कि वो हेलीकॉप्टर कमांडोज़ द्वारा भिंडरावाले का अपहरण करने के सही समय के बारे में भी सलाह दे. तीन या चार दिन में ये सभी सूचनाएं जमा कर ली गई थीं. इसके बाद स्वर्ण मंदिर परिसर के लंगर इलाक़े और बच निकलने के रास्तों का एक मॉडल सहारनपुर के निकट सरसवा में तैयार किया गया था.''
रस्सों के ज़रिए उतारे जाने थे कमाँडो
नागरानी ने सिद्धू को बताया था कि हेलीकॉप्टर ऑपरेशन से तुरंत पहले सशस्त्र सीआरपीएफ़ के जवानों द्वारा मंदिर परिसर के बाहर एक घेरा बनाया जाना था ताकि ऑपरेशन की समाप्ति तक आम लोग परिसर के अंदर या बाहर न जा सकें.
एसएफ़एफ़ कमाँडोज़ के दो दलों को बहुत नीचे उड़ते हुए हेलीकॉप्टरों से रस्सों के ज़रिए उस स्थान पर उतारा जाना था जहाँ भिंडरावाले अपना भाषण दिया करते थे. इसके लिए वो समय चुना गया था जब भिंडरावाले अपने भाषण का अंत कर रहे हों क्योंकि उस समय भिंडरावाले के आसपास सुरक्षा व्यवस्था थोड़ी ढीली पड़ जाती थी.

भिंडरावाले पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के साथ
योजना थी कि कुछ कमाँडो भिंडरावाले को पकड़ने के लिए दौड़ेंगे और कुछ उनके सुरक्षा गार्डों को काबू में करेंगे. ऐसा अनुमान लगाया गया था कि भिंडरावाले के गार्ड कमाँडोज़ को देखते ही गोलियाँ चलाने लगेंगे. ये भी अनुमान लगा लिया गया था कि संभवत: कमाँडोज़ के नीचे उतरने से पहले ही गोलियाँ चलनी शुरू हो जाएं.
इस संभावना से निपटने के लिए एसएफ़एफ़ कमाँडोज़ को दो दलों में बाँटा जाना था. एक दल स्वर्ण मंदिर परिसर में ऐसी जगह रहता जहाँ से वो भिंडरावाले के गर्भ गृह में भाग जाने के रास्ते को बंद कर देता और दूसरा दल लंगर परिसर और गुरु नानक निवास के बीच की सड़क पर बुलेटप्रूफ़ वाहनों के साथ तैयार रहता ताकि कमाँडोज़ द्वारा पकड़े गए भिंडरावाले को अपने क़ब्ज़े में लेकर पूर्व निर्धारित जगह पर पहुंचाया जा सके.
हेलीकॉप्टर के अंदर और ज़मीन पर मौजूद सभी कमाँडोज़ को ख़ास निर्देश थे कि भिंडरावाले को किसी भी हालत में हरमंदिर साहब के गर्भ गृह में शरण लेने न दी जाए क्योंकि अगर वो वहाँ पहुंच गए तो भवन को नुक़सान पहुंचाए बिना भिंडरावाले को क़ब्ज़े में लेना असंभव होगा.
नागरानी के अनुसार स्वर्ण मंदिर के मॉडल को मार्च 1984 में एसएफ़एफ़ कमांडोज़ के साथ दिल्ली शिफ़्ट कर दिया गया था ताकि सीआरपीएफ़ के साथ उनका बेहतर सामंजस्य बैठाया जा सके. तब तक ये तय था कि इस ऑपरेशन में सिर्फ़ एसएफ़एफ़ के जवान ही भाग लेंगे. सेना द्वारा बाद में किए गए ऑपरेशन ब्लूस्टार की तो योजना तक नहीं बनी थी.
काव और नागरानी ने इंदिरा गांधी को योजना समझाई
अप्रैल, 1984 में काव ने नागरानी से कहा कि इंदिरा गाँधी इस हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के बारे में पूरी ब्रीफ़िंग चाहती हैं. नागरानी शुरू में इंदिरा गाँधी को ब्रीफ़ करने में हिचक रहे थे. उन्होंने काव से ही ये काम करने के लिए कहा क्योंकि काव को इस योजना के एक-एक पक्ष की जानकारी थी. बाद में काव के ज़ोर देने पर नागरानी काव की उपस्थिति में इंदिरा गाँधी को ब्रीफ़ करने के लिए तैयार हो गए.

इंदिरा गांधी रॉ के पूर्व प्रमुख रामनाथ काव, गैरी सक्सेना और जीबीएस सिद्धू के साथ
उस ब्रीफ़िंग का ब्योरा देते हुए नागरानी ने जीबीएस सिद्धू को बताया था, "सब कुछ सुन लेने के बाद इंदिरा गाँधी ने पहला सवाल पूछा कि इस ऑपरेशन में कितने लोगों के हताहत होने की संभावना है? मेरा जवाब था कि हो सकता है कि हम अपने दोनों हेलीकॉप्टर खो दें. कुल भेजे गए कमाँडोज़ में से 20 फ़ीसदी के मारे जाने की संभावना है."
इंदिरा ने ऑपरेशन को मंज़ूरी नहीं दी
नागरानी ने सिद्धू को बताया कि इंदिरा गाँधी का अगला सवाल था कि इस अभियान में कितने आम लोगों की जान जा सकती है. मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था. ये ऑपरेशन बैसाखी के आसपास 13 अप्रैल को किया जाना था. मेरे लिए ये अनुमान लगाना मुश्किल था कि उस दिन स्वर्ण मंदिर में कितने लोग मौजूद रहेंगे. आख़िर में मुझे ये कहना पड़ा कि इस ऑपरेशन के दौरान हमारे सामने आए आम लोगों में 20 फ़ीसदी हताहत हो सकते हैं.

स्वर्ण मंदिर, अमृतसर
इंदिरा गाँधी ने कुछ सेकेंड सोच कर कहा कि वो इतनी अधिक तादाद में आम लोगों के मारे जाने का जोख़िम नहीं ले सकतीं. 'ऑपरेशन सनडाउन' को उसी समय तिलाँजलि दे दी गई.
'ऑपरेशन सनडाउन' को इस आधार पर अस्वीकार करने के बाद कि इसमें बहुत से लोग मारे जाएंगे, सरकार ने सिर्फ़ तीन महीने बाद ही ऑपरेशन ब्लूस्टार को अंजाम दिया जिसमें कहीं ज़्यादा सैनिकों और आमलोगों की जान गई और इंदिरा गाँधी को इसकी बहुत बड़ी राजनीतिक क़ीमत चुकानी पड़ी. (bbc)
ज़िंदा क़ौमें पाँच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं.
उत्तर पूर्वी दिल्ली के सोनिया विहार में दो दिन बिताने के बाद समाजवादी नेता डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की कही ये बात बार-बार ज़हन में घूमती हैं.
लोहिया का कहना था कि बुनियादी अधिकारों के लिए पाँच बरस तक इंतज़ार नहीं किया जा सकता लेकिन बिहार के लाखों प्रवासी न जाने कितने दशकों से इंतज़ार ही कर रहे हैं.
वैसे तो बिहार के लोग पूरे देश और पूरी दिल्ली में हैं लेकिन यमुना तट के क़रीब बसा सोनिया विहार, दिल्ली में बिहारी प्रवासियों के घर जैसा है.
सात लाख से ज़्यादा आबादी वाले इस इलाक़े में बड़ी संख्या बिहारियों की है.
ये वो आबादी है जो ज़िंदा रहने के लिए 1,500 किलोमीटर से भी ज़्यादा लंबा सफ़र तय कर दिल्ली चली आती है.
यहाँ किराए के एक कमरे में रहने वाले बिहार के लोग भी हैं और वो लोग भी जो कई वर्षों के संघर्ष के बाद किसी तरह 33 गज का घर ख़रीदने में कामयाब रहे.
बिहार में होने वाले चुनाव की धमक दिल्ली तक सुनाई देती है मगर सवाल ये है कि क्या कमाई, दवाई और पढ़ाई की तलाश में दिल्ली आए इन लोगों की पुकार उनके अपने ही गृहराज्य तक पहुँच पाती है?
बिहार के उन लोगों का क्या जो विधानसभा चुनाव में वोट देने घर नहीं जा पाए? सरकार चुनने के अधिकार का इस्तेमाल ये क्यों नहीं करना चाहते?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमने सोनिया विहार में रहने वाले कई प्रवासी बिहारियों से बात की. इनमें से कुछ लोगों के मन की बात हम यहाँ साझा कर रहे हैं.
दीपक कुमार भोलानाथ, दिहाड़ी मज़दूर (पटना)
26 साल के दीपक को महज़ सात बरस की उम्र में दिल्ली आना पड़ा था. वजह-पेट पालने की मजबूरी. आठवीं तक पढ़े दीपक के लिए बिहार में न अपनी ज़मीन थी और न कमाई का कोई ज़रिया. अब वो दिल्ली में दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं.
दीपक अपनी गर्भवती पत्नी के साथ एक 2,500 रुपये प्रतिमाह किराए वाले एक छोटे से कमरे में रहते हैं. कमरे में लगे बिस्तर पर दीपक की पत्नी सजावट का कुछ सामान बनाती नज़र आती हैं.
कोने में खाना बनाने का इंतज़ाम किया गया है और खिड़की पर बनी सँकरी सी जगह में बर्तन सँभालकर रखे हुए हैं. कमरे की दीवार पर नवजात शिशुओं की चार-पाँच तस्वीरें लगी हुई हैं, जिनकी ओर देखकर दीपक की पत्नी मुस्कुरा देती हैं.
दीपक बताते हैं कि दिल्ली में रहते हुए सबसे ज़्यादा मुश्किल उन्हें लॉकडाउन के दौरान हुई जब काम पूरी तरह ठप हो गया. अपने कई साथियों के उलट दीपक ने लॉकडाउन में बिहार वापस न जाकर दिल्ली ही रुकने का फ़ैसला किया.

वजह पूछने पर वो कहते हैं, “जाते भी तो फिर लौटकर यहीं आना पड़ता. जाने की कोशिश भी करते तो कोई साधन नहीं था. घरवाली पेट से थी. उसे साथ लेकर कैसे जाता?”
लॉकडाउन के समय घर में न पैसे थे और न राशन. पास के एक स्कूल में कभी दिल्ली सरकार तो कभी कुछ एनजीओ चावल-गेहूँ पहुंचाते थे, जिनके सहारे गुज़ारा हुआ.
दीपक बताते हैं, “जो राशन मिलता था वो खाने लायक नहीं था. चावल में कीड़े निकलते थे. कई बार बना हुआ खाना मिलता था. वो भी आधा कच्चा रहता था. लेकिन भूखे तो नहीं मर सकते थे इसलिए वही खा लेते थे.”
लॉकडाउन की पाबंदियों में ढील के बाद दीपक को अब थोड़ा-बहुत काम मिलने लगा है लेकिन अब भी ऐसा होता है जब तीन-चार दिन लगातार उन्हें घर बैठना पड़ता है.
दीपक एक कर्मठ नौजवान हैं लेकिन ग़रीबी और तकलीफ़ों ने उनका लोकतंत्र, सरकार, राजनीति और चुनाव जैसी चीज़ों से भरोसा उठा दिया है.
वोट के सवाल पर वो कहते हैं, “क्या करेंगे वोट देकर? कोई हमारे लिए काम नहीं करता. सरकार ही हमारे पेट पर लात मारती है. हम ठेला लगाते हैं तो पुलिस वाला आ जाता है.''
दीपक अर्थशास्त्र की ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ और उसकी आलोचनाओं से भले वाकिफ़ न हों लेकिन वो ज़ोर देकर कहते हैं, “सरकार ऐसे काम करती है कि अमीर और अमीर हो जाता है, ग़रीब और ग़रीब हो जाता है.”
दीपक के पास कोई बीमा भी नहीं हैं. वो बताते हैं, “मैं एलआईसी का एक बीमा लेना चाहता था लेकिन उसका फ़ॉर्म ही मुझसे भरा नहीं गया. इस चक्कर में मेरे कुछ पैसे भी डूब गए.”
क्या उन्हें बिहार की याद आती है? क्या चीज़ें ठीक होने पर वो बिहार वापस जाना चाहेंगे?
इन सवालों पर दीपक नाराज़गी और दुख भरे स्वर में कहते हैं, “हमें बिहार की कोई याद नहीं आती. क्यों जाएंगे वहाँ? कोई बीमार पड़े तो अस्पताल पहुँचते-पहुँचते मर जाता है. क्या फ़ायदा बिहार में रहने से?”

सरिता और बबीता देवी
सरिता और बबीता, गृहिणी (खगड़िया)
बिहार के खगड़िया ज़िले की सरिता और बबीता देवी हमें परचून की एक दुकान पर ख़रीदारी करती हुई मिलीं. दोनों हाथों में मेहँदी की लाली थी.
वैसे तो बिहार में करवा चौथ के व्रत का प्रचलन नहीं है लेकिन इसे दिल्ली का माहौल कहें या बॉलीवुड का असर, अब बिहार की कई महिलाएँ भी करवा चौथ का व्रत रखने लगी हैं. सरिता और बबीता देवी ने भी व्रत किया था.
दोनों के ही पति तकरीबन 20 साल पहले काम की तलाश में दिल्ली आए थे और फिर वो दिल्ली के ही होकर रह गए. वो तो दिल्ली के हो गए लेकिन शायद दिल्ली उनकी नहीं हुई.
सरिता और बबीता दोनों को इस बात का दुख है कि दिल्लीवाले उनकी गिनती ‘अपने जैसों’ में नहीं करते.
बबीता देवी कहती हैं, “उन्हें लगता है कि ये बिहार से आए हैं. भूखे हैं, ग़रीब हैं.”
सरिता कहती हैं, “वो हमें अपने से नीचा समझते हैं.”
हालाँकि दोनों का ये सुकून भी है कि दिल्ली में कम से कम उन्हें भरपेट खाना तो मिल रहा है.
चार बच्चों की माँ सरिता देवी कहती हैं, “हमारे आदमी मज़दूरी करते हैं लेकिन दोनों वक़्त का खाना मिलता है. यही बहुत है. बिहार में मेरे ससुर हैं, देवर हैं. दोनों घर बैठे हैं. कोई काम नहीं है. यहाँ कम से कम कुछ काम तो है.”
बबीता को वोट देने न जा पाने का दुख है लेकिन वो इसके लिए कुछ कर नहीं सकतीं. वो कहती हैं, “बिहार जाने के लिए किराया-भाड़ा चाहिए. पूरा एक दिन लगता है ट्रेन से जाने में. जाएंगे तो इधर मज़दूरी का भी नुक़सान होगा. हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते.”
दोनों कहती हैं, “दस आदमी वोट देता है तो हमारा भी मन होता है. हम सरकार से बस यही चाहते हैं कि हम गरीबों को साधन-सुविधा धे. हमारे-खाने कमाने का इंतज़ाम करे.”
सरिता को बिहार में छूट गए घर-परिवार की याद तो आती है लेकिन बच्चों की भलाई के लिए वो अभी दिल्ली में ही रहना चाहती हैं.
वो कहती हैं, “अभी दिवाली आ रहा है, छठ आ रहा है, पैसे वाले घर जाएंगे. हमारा आत्मा रोएगा...’’
सरिता देवी छठ गीत की कुछ लाइनें गुनगुनाती हैं- बहँगी लचकत जाय...

धर्मेंद चौधरी
धर्मेंद चौधरी, दिहाड़ी मज़दूर (सहरसा)
धर्मेंद चौधरी को दिल्ली आए अभी कुछ ही महीने हुए हैं. उनके 20 साल का बेटा पिछले चार-पाँच साल से दिल्ली में रहकर पेंट का काम करता था लेकिन लॉकडाउन के दौरान वो बीमार पड़ा और उसकी मौत हो गई.
धर्मेंद बताते हैं, “बेटा डेड कर गया तो घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा. फिर हम यहाँ आ गए और ठेला चलाने लगे.”
धर्मेंद कहते हैं कि बिहार में रोज़गार की कमी तो है ही साथ ही भ्रष्टाचार की समस्या भी काफ़ी बड़े पैमाने पर है.
वो कहते हैं, “हम तो बस कमाने-खाने इधर हैं. बिहार में काम मिलेगा तो वहां चले जाएंगे. सरकार वहाँ कोई कारखाना खोल दे. नौकरी दे दे. हमें कमाने-खाने का साधन दे दे. हम वहीं चले जाएंगे.”
धर्मेंद कहते हैं कि बीते कुछ समय में बिहार में बिजली, पानी, सड़क और स्कूलों की स्थिति में तो थोड़ा सुधार आया है लेकिन बात जब इलाज की आती है तो हालात जस के तस हैं.
वो कहते हैं, “गाँव के अस्पताल कैसे होते हैं, सब जानते ही हैं. जब किसी को बड़ी बीमारी होती है, कोई मरने लगता है तो हमें ट्रेन बुक कराके दिल्ली ही आना पड़ता है. एक बार हमारी माँ की तबीयत ख़राब हुई. वहां खेत गिरवी रखकर 40 हज़ार खर्चा किया तब भी ठीक नहीं हुईं. यहाँ जीबी पंत में उनका जान बचा. ”
हालाँकि इन सभी तकलीफ़ों और दुश्वारियों के बावजूद धर्मेंद्र आशावादी बने हुए हैं. वो कहते हैं, “इस बार बोला तो है इतना नौकरी-नौकरी. देखिए, शायद कुछ हो जाए.”
न यहाँ के न वहाँ के
पिछली जनगणना (2011) में दिल्ली में बिहारी प्रवासियों की संख्या 2,172,760 बताई गई थी.
महानगरों और विकसित राज्यों में प्रवासी कामगरों, ख़ासकर प्रवासी मज़ूदरों को लेकर अक्सर राजनीति होती रहती है.
लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों को घर पहुँचाने को लेकर दिल्ली में केजरीवाल और बिहार में नीतीश सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगे थे.
दिल्ली की सीमाएँ बंद करते समय भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह तर्क दिया था कि अगर यूपी-बिहार के लोग इलाज के दिल्ली आ जाएंगे तो यहाँ के बेड भर जाएंगे.
लॉकडाउन में पैदल, साइकिल और ठेले पर हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय कर अपने गृहराज्य पहुँचते मज़दूरों को देखकर भी बार-बार यही बात सामने आई कि जो मज़दूर शहरों को चलाते हैं, मुसीबत में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है.

दुलारी देवी
पलायन और प्रवास का चक्र
इसी तरह दिल्ली स्थित एम्स में बिहार से बड़ी संख्या में लोगों के आने को लेकर भी विवाद होता रहता है.
कांग्रेस नेता और दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साल 2007 में कहा था कि दिल्ली में सुविधाओं में लगातार इज़ाफ़ा किया जाता है लेकिन हर साल यूपी-बिहार के लाखों लोग आ जाते हैं और उन्हें रोकने के लिए कोई क़ानून नहीं है.
बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में बिहार के लोगों के पलायन से जुड़े एक सवाल में कहा था कि बिहारियों को दूसरी जगह जाकर काम करने में मज़ा आता है.
उन्होंने कहा, ''बिहार के लोगों का यह स्वभाव है. उन्हें बाहर जाकर काम करने में आनंद आता है. हाँ, अगर कोई सिर्फ़ रोज़ी-रोटी कमाने बाहर जाता है, तो ये ग़लत है.''
इस बार के चुनाव में उम्मीदवारों रोज़गार और नौकरियों का मुद्दा बार-बार उठाया. आरजेडी की ओर से तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों का वाद किया तो नीतीश कुमार ने इसे ‘बोगस वादा’ बताया.
अब सवाल ये है कि क्या इन वादों के भरोसे बिहार लौटेने की हिम्मत जुटा पाएंगे? क्या उन्हें कभी पलायन और प्रवास के चक्र से मुक्ति मिल सकेगी? (bbc)
बच्चियों में शिक्षा के प्रसार के कारण युवकों और युवतियों के बीच सामाजिक संबंध का बढ़ना स्वाभाविक है और इसके चलते अंतरधार्मिक विवाहों को रोका नहीं जा सकता। महिलाओं को पुरूषों के नियंत्रण में रखना साम्प्रदायिक राजनीति का अभिन्न अंग है।
-राम पुनियानी
इलाहबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक हालिया निर्णय में कहा है कि दो विभिन्न धर्मो के व्यक्तियों के परस्पर विवाह के लिए धर्मपरिवर्तन करना अनुचित है क्योंकि विशेष विवाह अधिनियम में अलग-अलग धर्मों के व्यक्तियों के बीच विवाह का प्रावधान है। मामला एक मुस्लिम महिला के हिन्दू पुरूष से विवाह करने के लिए धर्मपरिवर्तन करने का था।
इस निर्णय के उपरांत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिम पुरूषों के विरूद्ध एक अभियान छेड़ दिया है। उनके अनुसार, मुस्लिम युवक अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर हिन्दू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं और फिर उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के विरूद्ध सख्त कार्यवाही की जाएगी और उनकी अर्थी निकाली जाएगी (राम नाम सत्य है)। सख्त चेतावनी देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह की घटनाएं नहीं होने दी जाएंगी और इसके लिए शीघ्र ही एक कानून बनाया जाएगा।
उन्होंने यह घोषणा भी की कि जो लोग इस तरह की गतिविधियों में संलग्न होंगे उनके पोस्टर सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाएंगे। उनसे प्रेरित होकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भी घोषणा की कि उनकी सरकार इस तरह के अंतर्धार्मिक विवाहों पर प्रतिबंध लगाने के लिए शीघ्र ही एक कानून बनाएगी। मुस्लिम युवकों और हिन्दू युवतियों के विवाह को लांछित करने के लिए इन्हें ‘लव जिहाद’ कहा जाता है। इस तरह की शब्दावली के प्रयोग के चलते ऐसे विवाहों के बाद हिंसक घटनाएं आम हैं। ऐसा ही कुछ सन् 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुआ था।
बीजेपी नेता चाहे जो कहें, हकीकत यह है कि अंतरधार्मिक विवाहों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है। सच पूछा जाए तो ऐसी शादियां दोनों प्रकार की हुई हैं। अभी हाल में तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां ने एक हिन्दू से शादी की। इसका विरोध करते हुए उन्हें ट्रोल किया गया। इसी तरह का एक मामला निकिता तोमर का है, जिनकी एक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी। इस सिलसिले में तौसीफ और रेहान नामक दो व्यक्तियों की गिरफ्तारी हुई है। ‘क्षत्रिय लाईव्स मैटर’ हैशटैग के साथ इस घटना को लव जिहाद बताते हुए प्रचारित किया जा रहा है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि संसद में आधिकारिक वक्तव्य देते हुए केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा था कि लव जिहाद जैसी कोई चीज नहीं है। उन्होंने यह बात केरल के एक सांसद द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में कही थी। सांसद ने यह जानना चाहा था कि क्या केरल में लव जिहाद की घटनाएं हुई हैं। रेड्डी ने यह भी सूचित किया था कि लव जिहाद के आरोप की वास्तविकता जानने के लिए जांच-पड़ताल की गई और यह आरोप बेबुनियाद पाया गया।
लव जिहाद शब्द अकीला नामक महिला के अंतरधार्मिक विवाह के बाद चलन में आया। इस हिन्दू लड़की ने एक मुस्लिम युवक से शादी की और अपना नाम बदलकर हादिया रख लिया। इस मुद्दे को लेकर एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में केरल उच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए हदिया को अपने पति के साथ रहने की इजाजत दे दी।
इसी तरह का विवाद तनिष्क के विज्ञापन के बाद उभरा। इस विज्ञापन में एक हिन्दू वधू यह देखकर आश्चर्यचकित और प्रसन्न नजर आ रही है कि एक मुस्लिम परिवार में गोद भराई की हिन्दू रस्म अदा करने की तैयारी हो रही है। साम्प्रदायिक तत्वों ने न केवल इस विज्ञापन की निंदा की वरन् तनिष्क के उत्पादों के बहिष्कार की घोषणा भी कर डाली। इस धमकी के चलते कंपनी ने घुटने टेक दिए और विज्ञापन वापस ले लिया। यह आरोप लगाया गया कि इस तरह के विज्ञापन लव जिहाद को प्रोत्साहित करते हैं।
‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए उत्तरप्रदेश और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने अनेक कदम उठाने की घोषणा करने के साथ-साथ लगे हाथों हिन्दू अभिवावकों को यह सलाह भी दी कि वे यह नजर रखें कि उनकी बेटियां किस से मिल रही हैं और मोबाइल पर किन लोगों से बात कर रहीं हैं। वे यह भी देखें कि उनकी लड़कियां कहाँ आती-जाती हैं।
कुल मिलाकर, हिन्दू युवतियों और महिलाओं पर नियंत्रण रखने की रणनीति तैयार की जा रही है। स्पष्ट है कि साम्प्रदायिक राजनीति का प्रमुख एजेंडा है हिन्दू महिलाओं और लड़कियों पर पूर्ण नियंत्रण. अल्पसंख्यकों - मुस्लिम और कुछ हद तक ईसाईयों - से घृणा इस तरह की साम्प्रदायिक राजनीति का मुख्य आधार है। इस तरह की राजनीति का मुख्य लक्ष्य लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के पूर्व के जातिवादी समीकरणों और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना है। यदि ऐसा होता है तो इससे सामाजिक स्वतंत्रता कमजोर होगी।
बच्चियों में शिक्षा के प्रसार के कारण युवकों और युवतियों के बीच सामाजिक संबंध का बढ़ना स्वाभाविक है और इसके चलते अंतरधार्मिक विवाहों को रोका नहीं जा सकता। महिलाओं को पुरूषों के नियंत्रण में रखना साम्प्रदायिक राजनीति का अभिन्न अंग है। चाहे साम्प्रदायिकता मुस्लिम हो या ईसाई, पुरूषों का महिलाओं पर नियंत्रण सभी का अभिन्न अंग है।
जहां तक हिन्दू साम्प्रदायिकता का प्रश्न है, उसके द्वारा बार-बार यह प्रचारित किया जाता है कि हिन्दू महिलाओं को इस्लाम कुबूल करने के लिए बाध्य किया जाता है। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि हिन्दुत्व के मुख्य चिंतक सावरकर ने छत्रपति शिवाजी, जो हिन्दू सम्प्रदायवादियों के आराध्य हैं, की इसलिए निंदा की थी कि उन्होंने बसेन के मुस्लिम सूबेदार की बहू को आजाद कर दिया था जिसे उनके सिपाही उपहार के रूप में उन्हें भेंट करने के लिए लाए थे। इसी कारण सावरकर, जो वैसे शिवाजी के प्रशंसक थे, ने शिवाजी के शासनकाल को अपनी पुस्तक ‘सिक्स ग्लोरियस ऐपक्स ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री’ में शामिल नहीं किया था।
आज से बहुत पहले, सन 1920 के दशक के आसपास, जब मुस्लिम सम्प्रदायवाद के समानांतर हिन्दू सम्प्रदायवाद विकसित हो रहा था, तब भी मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या को हिन्दुओं के लिए खतरा बताया जाता था। चारू गुप्ता अपनी पुस्तक ‘मिथ ऑफ़ लव जिहाद’ में एक दिलचस्प टिप्पणी करते हुए कहती हैं कि ‘हिन्दू औरतों की लूट’ जैसे भड़काऊ शीर्षक वाले पम्फलेट, जिनमें मुसलमानों द्वारा हिन्दू महिलाओं का धर्मपरिवर्तन करवाने की निंदा की गयी थी, उस समय प्रकाशित किये गए थे। उसी दौरान एक आर्य समाजी द्वारा तैयार किये गए एक प्रकाशन में हिन्दू स्त्रियों की लूट के कारण गिनाये गए थे और उन्हें मुसलमान बनने से रोकने के उपाय भी. आज का लव जिहाद अभियान भी इसी तरह के तर्कों और भाषा का उपयोग कर रहा हैय़
इसी बीच आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि महिलाओं को घर- गृहस्थी के कामों तक स्वयं को सीमित रखना चाहिए और पुरूषों को कमाई करनी चाहिए।
हमारे वृहद समाज में अलग-अलग तरह की जीवन पद्धतियाँ हैं। विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच मेलमिलाप एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस तरह के मेलमिलाप से लोग एक दूसरे के नजदीक आते हैं और कभी-कभी इनका अंत शादी-विवाह में होता है। डॉ अम्बेडकर ने अंतरजातीय विवाहों को जातिप्रथा के उन्मूलन का सबसे प्रभावशाली उपाय बताया था। भारत में अंतरजातीय विवाह कम ही होते हैं। अंतरधार्मिक विवाहों के मामले में तो स्थिति और भी खराब है। हिन्दू धर्म के तथाकथित रक्षक और मुस्लिम कट्टरवादी उन लोगों के खून के प्यासे हो जाते हैं जो धर्म की सीमाओं को लांघकर प्रेम और विवाह करते हैं।
-राकेश दीवान
आखिर लोकतंत्र का जरूरी कर्मकांड चुनाव हो ही गया। भारत के एक बडे और महत्वपूर्ण राज्य बिहार की विधानसभा, सरकार बनाने-बचाने की कशमकश वाले मध्यप्रदेश विधानसभा के 28 चुनाव-क्षेत्र और सुदूर अमरीका में वहां के राष्ट्रपति के चुनावों में किस्मत आजमाने वाले अपनी-अपनी वैतरणी पार कर चुके हैं। अब इस महीने के दूसरे सप्ताह में सभी जगह के परिणामों के उजागर होने का इंतजार है। कहा जाता है कि आज के लोकतंत्र में रोटी और सर्कस, दो ही महत्वपूर्ण धतकरम होते हैं और इस लिहाज से भी ये तीनों चुनाव अपनी-अपनी अहमियत बताते रहे हैं।
शब्दकोष के मुताबिक ‘घोडों का चलता-फिरता घेरा’ माना जाने वाला सर्कस व्यवहार में ऐसे करतबों के प्रदर्शन का स्थान होता है जहां इंसान और जानवर मिलजुलकर या अकेले हैरतअंगेज कारनामों से दर्शकों का मन लुभाते हैं। इस लिहाज से बिहार की बानगी लें तो तेजस्वीे यादव द्वारा उछाले गए दस लाख रोजगार के झुनझुने के अलावा कुल मिलाकर समूचे चुनाव बेहतरीन सर्कस-तमाशे से अधिक कुछ नहीं रहे। साढे चार में साढे पांच जोडकर दस लाख रोजगार का जादू बताने वाले तेजस्वी के इस झुनझुने ने भाजपा सरीखी राष्ट्रीय पार्टी को भी जबावी सर्कस करने पर मजबूर कर दिया। जिस भाजपा के आला नेताओं ने तेजस्वीे की रोजगार की घोषणा की एक दिन पहले खिल्ली उडाई थी, उसी भाजपा की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने, ठीक अगले दिन 19 लाख रोजगारों के सृजन की खुद बढकर घोषणा कर दी। अलबत्ता, पक्ष-विपक्ष की इन दोनों घोषणाओं में सरकारी नौकरियों के अलावा राज्य के भावी औद्यौगिकीकरण से आस बंधाई गई थी। अब इस पर किसी ने, हमेशा की तरह कोई ध्यान नहीं दिया कि औद्यौगिकीकरण रोजगार-सृजन में सर्वाधिक फिसड्डी साबित होता है, खासकर आज के मशीनीकरण यानि ‘मैकेनाइजेशन’ और स्वचालितीकरण यानि ‘ऑटोमेशन’ के दौर में उद्योगों से रोजगार पैदा करना टेढी खीर माना जाता है और यह बाकायदा आंकडों ने बार-बार साबित भी किया है।
डाक्टर-दवा-उपकरण विेहीन चिकित्सा व्यवस्था, शिक्षक-स्कूल-परीक्षा-नौकरी विहीन शिक्षा व्यवस्था और खाद-दवा-बाजार-भूमि विहीन कृषि सरीखी पारंंपरिक व्याधियों के अलावा अस्पताल-जांच-दवा विहीन कोविड-19 का आसन्न संकट और इसी संकट की चपेट में फंसे देशभर के परिवहन-भोजन-इलाज विहीन प्रवासी मजदूर जैसी अनेक समस्याएं बिहार के सामने मुंह बाए खडी रही हैं, लेकिन चुनाव को इन सबसे कोई मतलब है, ऐसा कतई महसूस नहीं होता। औपचारिक रूप से संसद में सरकार ने बता दिया था कि उसके पास देशभर के शहरों से वापस लौटे मजदूरों की कोई गिनती नहीं है, लेकिन अनौपचारिक रूप से माना जा रहा था कि मार्च के बाद से कुल एक करोड चार लाख मजदूरों ने अपने-अपने गांवों-देहातों की ओर ‘रिवर्स-माइग्रेशन’ किया था। कई शोधार्थियों ने आधे से अधिक प्रवासी बिहारी मानकर यह आंकडा करीब 14 करोड तक का बताया था। कमाल यह है कि राज्य की विधानसभा के चुनाव में अभी सात-आठ महीने पहले की इस बदहाली को किसी ने कोई मुद्दा ही नहीं माना। शहरों, उद्योगों से वापस लौटी विशाल श्रम-शक्ति के साथ क्या और कैसे करना है, इस पर कोई बहस नहीं चलाई गई। चुनाव लडने वाले सभी ‘पहलवान’ उद्योगों से रोजगार पैदा करने की माला जपते रहे, बिना यह जाने कि उद्योगों से आजकल बेरोजगारी ही पैदा होती है।
मध्यप्रदेश की 28 सीटों पर इससे भी बदहाल चुनाव हुए। सभी जानते हैं कि भाजपा के नाम से ‘पंजीकृत’ सरकार गिराने की पद्धति का उपयोग करते हुए बहुमत वाली 13 महीनों की कमलनाथ सरकार गिराई गई थी और ये चुनाव इसी उठा-पटक के नतीजे में हुए थे। यहां गद्दार बनाम वफादार के मुद्दे पर चुनाव लडा गया था। लगभग सभी सीटों पर पाला बदलने वाले पूर्व कांग्रेसी भाजपा की ओर से लड रहे थे और उनके पास अपनी हवस को सही साबित करने के अलावा कहने को कुछ भी नहीं था। दूसरी तरफ कांग्रेस में भी कुछ जगहों पर पूर्व-भाजपाई और कुछ ठेठ कांग्रेसी उम्मीदवार थे जिन्हें अपनी राजनीति को वैध ठहराना था। नतीजे में चुनाव के नाम पर जो हुआ वह सर्कस से बेहतर तो नहीं ही था। चाहते तो डेढ साल बनाम 15 साल के विकास के कामकाज पर वोट गिरवाई जा सकती थी, भाजपा ने 15 साल के अपने राज में ऐसे अनेकानेक मुद्दे उपलब्ध भी करवाए थे, लेकिन इसकी बजाए तरह-तरह के बेशर्म जुमलों, फूहड चुटकुलों और निजी आरोप-प्रत्यारोपों के सर्कस से काम चलाया गया।
दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र भारत की टक्कर में सबसे पुराने लोकतंत्र अमरीका की हालत इससे तो बेहतर ही थी, लेकिन प्रमुख रूप से उठने वाले पांच सवालों पर घिरे मौजूदा राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की प्रतिक्रिया सर्कस से बेहतर नहीं कही जा सकती। कोविड-19 से निपटने में नाकामी, इसकी वजह से बढी आर्थिक बदहाली, नस्लीय-रंगभेदी तनाव, जलवायु परिवर्तन और अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों-नातों पर पूछे गए सवालों पर ट्रम्प का जबाव आमतौर पर बचकाना और मजाकिया ही रहा। अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव की समूची प्रक्रिया में ट्रम्प आमतौर पर अपने विरोधी जो बाइडेन पर हलके फिकरे कसते और छिछोरा सर्कस करते ही दिखाई देते रहे हैं। अब तक दो लाख 16 हजार अमरीकियों की जान लेने वाली कोविड-19 बीमारी पर काबू करने की बजाए राष्ट्रपति ट्रम्प उसकी खिल्ली उडाते रहे और अपनी शुरुआत की चुनावी रैलियों में मॉस्क-विहीन दिखाई देते रहे। सत्तावादी चीन का नाम न लेते हुए ट्रम्प ने जिस ‘अदृष्य दुश्मन के खिलाफ’ अमरीका को ‘युद्ध-मोर्चे’ पर दिखाया था, उससे निपटने में कोविड-19 पैदा करने वाले उसी चीन ने कमाल की रणनीति बनाई और कुल 4750 लोगों की बलि देकर हालातों पर काबू पा लिया।
शब्दकोष में सर्कस के लिए ‘घोडों के’ जिस ‘चलते-फिरते घेरे’ की बात की गई है उसमें मनोरंजन होना एक जरूरी शर्त है। ध्यान से देखें तो सबसे बडे और पुराने, दोनों तरह के छोरों पर लोकतंत्र यही करता दिखाई देता है। चुनावों को अपनी सम-सामयिक, बुनियादी और अत्यावश्यक समस्याओं को सत्ता और समाज के सामने रखने का अवसर मानने वालों को भारत के बिहार, मध्यप्रदेश और अमरीका के हाल के चुनावों को देख लेना चाहिए। उन्हें सर्कस के साथ कभी-कभार रोटी भी दिखाई दे तो लोकतंत्र सफल माना जाना चाहिए। पत्रकार शेखर गुप्ता ने गठबंधन सरकारों की तुलना ‘अश्वमेध यज्ञ’ के घोडे से की है, यानि अहमियत खत्म हो जाने के बाद, ‘अश्वमेध’ के घोडे की तरह गठबंधनों की बलि चढा दी जाती है। क्या हमारे चुनावों में सम-सामयिक मुद्दे भी यही हैसियत नहीं रखते? यानि जरूरत हो तो चुनाव-प्रक्रिया में कुछ मुद्दों को उछालकर चुनाव निपटते ही उनकी बलि चढा दी जाए? हालांकि ताजा चुनावों में तो यह भी होता नहीं दिखता।
एनआरसी के मुद्दे पर असम में भारी हिंसा हो चुकी है और कई लोग आत्महत्या भी कर चुके हैं. बावजूद इसके एनआरसी पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है.
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असम में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की शिनाख्त कर उनको निकालने के लिए शुरू हुई नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस यानी एनआरसी पर शुरू से ही विवाद रहा है. एनआरसी की अंतिम सूची से 19 लाख लोगों के नाम बाहर रखे गए थे. पहले इसके सटीक होने का दावा किया गया. लेकिन उसके बाद राज्य में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार ने ही इसे कठघरे में खड़ा कर दिया. इससे एनआरसी की पहेली सुलझने की बजाय लगातार उलझती जा रही है.
इससे पहले गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी एनआरसी की कवायद पर सवाल उठाते हुए तीन सप्ताह के भीतर इस पर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था. सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट से एनआरसी की अंतिम सूची में 15 फीसदी नामों के दोबोरा सत्यापन की अनुमति देने की मांगी है.
उसका कहना है कि सूची में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के नाम भी शामिल हैं. इससे एनआरसी की पूरी कवायद कठघरे में है. पहले भी तमाम पार्टियां और संगठन ऐसे आरोप लगाते रहे हैं. वरिष्ठ मंत्री और बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा सरमा ने माना है कि अंतिम सूची में कई अवैध बांग्लादेशियों के नाम शामिल हैं.
उलझी समस्या
तमाम विवादों और आरोपों के बीच तैयार एनआरसी की अंतिम सूची भी असम में बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या का समाधान नहीं कर सकी है. उलटे इस सूची ने घुसपैठ के मुद्दे को और उलझा दिया है. अब राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अंतिम सूची में शामिल कम से कम 15 फीसदी नामों का दोबारा सत्यापन जरूरी है.
इस बीच, असम के वरिष्ठ बीजेपी नेता और राज्य के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एनआरसी को मौलिक रूप से गलत बताते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी तो विधानसभा चुनावों के बाद दोबारा नए सिरे से एनआरसी की कवायद शुरू की जाएगी.
सरमा ने अवैध बांग्लादेशियों को आधुनिक मुगल करार दिया है. वह कहते हैं, "ऐसे मुगल असमिया जनजीवन के हर पहलू में प्रवेश कर चुके थे और उनको रोकने के लिए एक लंबी राजनीतिक लड़ाई जरूरी थी. अगले पांच साल तक इसे जारी रखने की स्थिति में उनको हराया जा सकेगा. इस लड़ाई में एनआरसी और परिसीमन सबसे मजबूत हथियार हैं.”
दरअसल, एनआरसी की अंतिम सूची में बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशियों के नाम निकलकर सामने आए हैं. इसी के बाद असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अंतिम सूची में शामिल नामों का दोबारा सत्यापन करने और 10 प्रतिशत नामों को हटाने की अनुमति मांगी है. हिमंत का आरोप है कि एनआरसी के तत्कालीन प्रदेश संयोजक प्रतीक हजेला ने पूरी प्रक्रिया को गलत तरीके से संचालित किया था. यही तमाम विवादों की जड़ है.
असम सरकार पहले से ही कहती रही है कि वह एनआरसी की अंतिम सूची को दोबारा सत्यापन के लिए कृतसंकल्प है. खासकर सीमावर्ती इलाकों में शामिल लोगों में से 20 फीसदी नामों का दोबारा सत्यापन जरूरी है. मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने डिब्रूगढ़ में एक रैली में कहा था, "हम सही एनआरसी चाहते हैं. अभी तैयार एनआरसी की सूची में कई गलतियां हैं. राज्य के लोग इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे. इसमें कई अवैध विदेशियों के नाम भी शामिल हैं.”
गुवाहाटी हाईकोर्ट की लताड़
इससे पहले बीते महीने के आखिर में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान एनआरसी के प्रदेश संयोजक को जमकर लताड़ते हुए सवाल उठाया था कि आखिर इतनी कड़ी प्रक्रिया के बावजूद एनआरसी में विदेशियों के नाम कैसे शामिल हो गए? अदालत ने हलफनामे के जरिए तीन सप्ताह के भीतर इस सवाल का जवाब मांगा है.
न्यायमूर्ति मनोजित भुइयां और न्यायमूर्ति सौमित्र सैकिया की खंडपीठ ने एनआरसी के प्रदेश संयोजक को उन वजहों को बताने का निर्देश दिया है जिनके चलते अयोग्य लोगों के नाम भी सूची में शामिल हो गए. यह याचिका नलबाड़ी जिले की रहीमा बेगम ने दायर की थी. विदेशी न्यायाधिकरण ने उनको विदेशी घोषित कर दिया था. लेकिन उसके बाद घोषित एनआरसी की अंतिम सूची में उनका नाम शामिल था.
दूसरी ओर, बीते साल 31 अगस्त को जारी एनआरसी की अंतिम सूची से जिन 19 लाख लोगों के नाम बाहर रखे गए थे उन्हें अब तक इससे संबंधित कागजात यानी रिजेक्शन स्लिप नहीं दिए गए हैं. नतीजतन उनका भविष्य भी अनिश्चित है. इस कागजात के मिलने के बाद ही ऐसे लोग विदेशी न्यायाधिकरणों में अपील कर सकते हैं. एनआरसी अधिकारियों की दलील है कि कोरोना की वजह से अब तक यह स्लिप जारी नहीं की जा सकी है. इसके साथ ही राज्य सरकार ने भी फिलहाल इस मामले की जांच पूरी नहीं होने तक स्लिप जारी करने पर रोक लगा दी है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि असम में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान यह सबसे प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभरेगा. एक पर्यवेक्षक जितेन हजारिका कहते हैं, "बीजेपी इस मुद्दे को चुनावों तक खींचना चाहती है. इसके जरिए वह खुद को राज्य के लोगों की सबसे बड़ी हितैषी साबित कर इसका सियासी फायदा उठाना चाहती है. साथ ही इसके गलत होने का दावा कर वह विपक्ष के हाथों से उसके मजबूत हथियार की धार को कुंद करने का भी प्रयास करेगी.”
गिरीश मालवीय
अमेरिका के 48 प्रतिशत वोटर्स ने ट्रम्प को वोट किया है और ट्रम्प की कोरोना के संबंध में क्या सोच है यह हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। इसका मतलब साफ है कि अमेरिका जिसे बेहद समझदार मुल्क माना जाता है जो तकनीक और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया को लीड करता है वहाँ की 48 फीसदी आबादी कोरोना को फर्जी महामारी मानती है, उसे हॉक्स मानती है! वो भी तब जब दुनिया में सबसे अधिक कोरोना केस अमेरिका में ही पाए गए हैं और मौतें भी सबसे अधिक वहीं हुई है। 48 फीसदी अमेरिकी जनता का ट्रम्प का साथ देना एक बहुत बड़ी घटना है क्योंकि पश्चिमी मीडिया यहाँ हमें अब तक यही बात बता रहा था कि ट्रम्प तो बुरी तरह से हारने वाले हैं जबकि सच्चाई अब हमारे सामने है और वो यह है कि वोट काउंटिंग को तीन दिन हो चुके हैं और आज भी वह मुकाबले में बने हुए हैं ओर डर है कि वह कही वापसी नही कर जाए
यहाँ भारत में यह पोस्ट पढक़र बहुत से लोग हंसेंगे लेकिन उससे सच्चाई नहीं बदल जाएगी। आप 48 फीसदी आबादी के समर्थन को खारिज नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि भारत का आम आदमी इस बात को नहीं समझता, लेकिन वह इस बारे में खुलकर अपने विचार व्यक्त नहीं करता। उसे लगता है कि उसने खुलकर अपनी बात रखी जोर-शोर से कोरोना को हॉक्स कहा, लॉकडाउन जैसे मूर्खतापूर्ण उपायों का विरोध किया तो उसे पुलिस पकड़ कर ले जाएगी जबकि पूरे यूरोप में लॉक डाउन का प्रयोग करने के विरोध में जनता स्वस्फूर्त प्रदर्शन कर रही है।
ऐसा क्यों है? क्या आपने कभी जानने की कोशिश की?
दरअसल आधुनिक युग में भारत में कोई महामारी की बात पहली बार ही सामने आई है लेकिन यूरोप में महामारियों के नाम पर डराने का सिलसिला बहुत पुराना है। सबसे पहले पाश्चात्य जगत में एड्स का भय फैलाया गया, ( एड्स पर अलग से पोस्ट लिखूंगा कभी) फिर 2002 में सार्स आया जो तेजी से 29 देशों में फैल गया। कमाल की बात यह है कि ये भी कोरोना वायरस परिवार से ही संबंधित बीमारी थी लेकिन यह वायरस आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गया शायद तब विश्व की आर्थिक परिस्थितियां इस बीमारी का बोझ उठाने के काबिल नही थी
2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद आई स्वाइन फ्लू चर्चा में आया 2009 में इस पैनडेमिक को बहुत बड़ी आपदा के रूप में देखा जा रहा था इस बीमारी का भी यूरोप अमेरिका में बहुत हल्ला मचा यूरोप की सरकारों ने हजारों करोड़ की डील दवा निर्माताओं कम्पनियों से वैक्सीन ओर दवाओं के लिए की बाद में पता चला कि यह बीमारी उतनी बड़ी बिल्कुल भी नही थी जितना कि उसे बताया गया। बड़े पैमाने पर सरकारी भ्रष्टाचार के प्रकरण सामने आए। वहाँ का आम आदमी समझ चुका था कि यह सिर्फ डराने की ही बात थी।
2012 में एक और जानलेवा कोरोना वायरस मर्स-कोव (मिडल ईस्ट रेसिपेरिटरी सिंड्रोम) का प्रकोप सामने आया अब लोग वहाँ ऐसे वायरस की सच्चाई के बारे में अवेयर हो चुके थे।
फिर आया इबोला वायरस जिसके बारे में भी अनेक दुष्प्रचार किए गए लेकिन इतने सारे महामारियों के अनुमान से यूरोप अमेरिका की जनता में एक समझ विकसित हो गई थी ।
और जब 2020 में जब कोविड 19 का खौफ फैलाया गया और और कुछ बिके हुए पब्लिक हैल्थ एक्सपर्ट लॉकडाउन जैसे बेवकूफाना उपायों की अनुशंसा की तो शुरुआत में तो कोई कुछ नहीं बोला लेकिन बाद में बड़ी संख्या में जनता ऐसे उपायों के खिलाफ हो गई और अपने अनुभवों के आधार पर कोरोना को हॉक्स बताने लगी। लेकिन भारत की जनता तो छोडि़ए यहाँ का बुद्धिजीवी वर्ग भी इसके बारे कोई स्पष्ट सोच विकसित नहीं कर पाया इसलिए यहाँ शुरुआत में हम सभी बिलकुल हक्के-बक्के रह गए, और अभी बहुत से लोग सारी सिचुएशन को जानते-बुझते भी चुप्पी साधे हुए हैं।
लेकिन यूरोप-अमेरिका में लोग अवेयर है और ट्रम्प ऐसी ही जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उन्हें इतना बड़ा जन समर्थन मिलना यह दिखाता है उनकी बात में भी दम हैं और भारत के बुद्धिजीवियों को कोरोना के बारे में दुबारा सोचना होगा।
ओम थानवी
अर्णब गोस्वामी को ज़मानत नहीं मिली। अफ़सोस होता है कि एक पत्रकार- भले इस बीच पथभ्रष्ट पत्रकारिता करने लगा हो-जेल में है। इस बीच बहुत से संजीदा पत्रकार भी (जैसे हाल में हाथरस में) पुलिस ने पकड़े। तब पकडऩे वालों के विवेक पर तरस आया था। पर अर्णब पर किसी का देय धन डकार जाने और लेनदार माँ-बेटे को आत्महत्या के लिए मजबूर करने जैसे संगीन आरोप हैं। ऐसे ही सुधीर चौधरी, तरुण तेजपाल आदि जेल गए थे। हालाँकि उन पर लगे आरोप अलग तरह के थे। पर थे बुरे और निपट आपराधिक।
बहरहाल, अर्णब की गिरफ्तारी पर पत्रकारों में दो मत हैं- अपराध किया है तो उनका बचाव कैसा। दूसरा तबका कहता है कि यह तो अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है।
अभिव्यक्ति वाली दलील देने वालों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, देश के गृहमंत्री, रक्षामंत्री, सूचना-प्रसारण मंत्री, कपड़ा मंत्री आदि से लेकर भाजपा-शासित विभिन्न प्रदेशों के मुख्यमंत्री शामिल हैं। पार्टी की ट्रोल टुकड़ी भी। एबीवीपी वाले विभिन्न शहरों में गिरफ़्तारी के विरोध में सडक़ों पर उतरे हैं। किसी ने लिखा है कि ऐसा लगता है गोया भाजपा का अपना कोई कार्यकर्ता गिरफ़्तार कर लिया गया हो। और तो और, योगी आदित्यनाथ भी सहसा ‘अभिव्यक्ति’ के हिमायती हो गए हैं, जिनके प्रदेश में पत्रकारों पर अत्याचार का कीर्तिमान बन चुका है।
कुछ भाजपा-समर्थक पत्रकार भी-स्वाभाविक ही-अर्णब की गिरफ्तारी से आहत हैं। कुछ पहले से गंडा-बंध थे; कुछ अपनी बौखलाहट में पहचान लिए गए हैं। उनकी प्रतिक्रिया ऐसे भडक़ी है मानो उनका सगा धर लिया गया हो। कुछ (संघ-मोह के चलते) अपने फासिस्ट-समर्थक तेवर के बावजूद वॉल्तेयर की दुहाई दे रहे हैं। इतना ही नहीं, वे अर्णब की गिरफ़्तारी को वाजिब बताने वालों के खिलाफ मोर्चा ले उन्हें कांग्रेस के (शिवसेना के नहीं) प्रवक्ता ठहराने में भी लगे हैं।
लेकिन अगर आप फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग आदि टटोलें तो अधिकांश पत्रकार मुखर और न्यायप्रिय मिलेंगे। वे इस गिरफ्तारी से विचलित नहीं, बल्कि मामले की समुचित जाँच के हक में हैं। वे पत्रकारिता (जैसी भी हो) और अपराध को अलग करके देखते हैं, अभिव्यक्ति के नाम पर संगीन अपराध के आरोपी का बचाव नहीं करना चाहते।
बहुत-से पत्रकारों ने लिखा है कि अपराध अपराध है; मुलजिम भले पत्रकार हो, पर उसकी हिमायत में पत्रकारिता को आड़ की तरह नहीं ताना जा सकता। मैं भी अपने आप को इसी मत का पाता हूँ।
इसका मतलब यह नहीं कि सरकार को बदले की भावना से काम करना चाहिए या पुलिस को ससम्मान पेश नहीं आना चाहिए। मगर मुल्क की हकीकत क्या हमें नहीं मालूम? इज्जतदार पत्रकारों पर देश में राजद्रोह तक के मुकदमे दर्ज हुए हैं। पुलिस ने ‘जी-जी’ वाला नहीं, शातिर अपराधियों जैसा बरताव पत्रकारों के साथ किया है।
लेकिन एक जगह का गलत आचरण दूसरी जगह औचित्य नहीं बन सकता। अगर शासन या पुलिस ज़्यादती करें तो इसकी आलोचना होनी चाहिए। आत्महत्याओं का मामला दुबारा खोलने में सरकार ने दुराग्रह रखा हो या पुलिस ने पत्रकार या उसके परिजनों से दुव्र्यवहार किया हो तो मुझे भी इसकी आलोचना में शरीक समझें। पर हम आत्महत्याओं और पत्रकार के यहाँ डूबे भुगतान से आहत माँ-बेटियों के प्रति भी मानवीय रवैया जाहिर करें।
पत्रकारिता स्वयं न्याय, संवेदनशीलता, ईमानदारी और मानवीय अधिकारों जैसे मूल्यों की वाहक होती है। किसी ‘अपने’ पर आ पड़ी तो सभी मूल्यों को तिलांजलि दे बैठना हद दरजे की नादानी होगी।
अर्णब की हाल की पत्रकारिता सांप्रदायिकता (याद करें पालघर) और चरित्रहत्या (उदाहरण रिया चक्रवर्ती) की तरफ़ जाने लगी थी। शायद चैनल चलाने (दूसरे शब्दों में विज्ञापन बटोरने) के लिए ऐसे हथकंडे काम आते हैं। टीआरपी के आपराधिक जुगाड़ पर उन पर अलग से मुक़दमा दायर है। लेकिन उस पर अभी बात नहीं; अभी बात अलग मसले की है।
बताया यह जा रहा है कि भाजपा काल में मुख्यमंत्री फडनवीस ने अर्णब की मदद की, जबकि मामला व्यवसाय में लेन-देन का था और कर्ज में डूबी कम्पनी के निदेशक माँ-बेटे ने तीन नाम जि़म्मेदार बताकर आत्महत्या कर ली थी।
जैसा कि मृतक की विधवा (कितनी जुझारू महिला है) ने कहा है, सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या में कहीं रिया का नाम नहीं लिया गया था, पर अर्णब अपने चैनल पर रिया को गुनहगार मानकर उसकी गिरफ्तारी का अभियान चला रहे थे। अब जब अदालत के आदेश से वह मामला फिर से खुल गया जिसमें अर्णब का नाम मृतक के हस्तलेख में दर्ज था, तो उस मामले में सहयोग न कर उसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोडऩा कहाँ की समझदारी है?
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस बार दिवाली कैसे मनाई जाए, यह बहस सारे देश में चल पड़ी है। पश्चिम एशिया के देशों ने ईद मनाने में सावधानियां बरतीं और गोरों के देश क्रिसमिस पर उहापोह में हैं। दिवाली बस एक सप्ताह में ही आ रही है लेकिन उसके पहले ही देश में धुआंधार हो गया है।
दिल्ली शहर का हाल यह है कि लोग कोरोना से भी ज्यादा प्रदूषण से डर रहे हैं। मुखपट्टी लगाकर भी लोग घर से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं, क्योंकि हवा कितनी ही छनकर नाक के अंदर आएगी, वह होगी तो गंदी ही। अब कोरोना का कोप भी दुबारा फैल रहा है। इसके अलावा इस दिवाली पर लक्ष्मीजी की कृपा भी कम ही है तो क्या किया जाए? दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने 7 नवंबर से 30 नवंबर तक पटाखेबाजी पर रोक लगा दी है। ऐसी रोक प. बंगाल में पहले से लगी हुई है। देश के लगभग 100 शहरों में ऐसी रोक की भी तैयारी है।
मैं कहता हूं कि देश के सभी शहरों और गांवों में ऐसी रोक क्यों नहीं लगा दी जाए ? यदि एक साल पटाखे नहीं छुड़ाएंगे तो क्या बिगड़ जाएगा? दिवाली तो हर साल आएगी। जो संकट इस साल आया है, बस वह इसी साल का सिरदर्द है। अंधाधुंध बिजली जलाने के बजाय यदि आप घर पर एक—दो दिये या बल्ब जला लें तो क्या वह काफी नहीं होगा? यदि आप ऐसा करेंं तो क्या होगा?
हमारी जनता सरकारों से भी आगे निकल जाएगी। अपनी मन:स्थिति में हम उल्लास रखें लेकिन परिस्थिति उदास रहती है तो वैसी रहने दें। यदि मन:स्थिति उल्लासपूर्ण रखने की आपकी आदत पड़ जाए तो रोज ही आपकी दिवाली है। दिवाली के मौके पर लोग दूसरे के घर मिठाइयां और तले हुए नमकीन भेजते हैं। इनकी बजाय आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के यहां फल, मेवे, काढ़े के मसाले और भुने हुए नमकीन भेजें तो सबको स्वास्थ्य लाभ भी होगा। इस बार आप कुछ भी नहीं भेजें तो भी कोई बुरा नहीं मानेगा, क्योंकि सभी कडक़ी में हैं और एक-दूसरे के घर आने-जाने में भी खतरा है। जहां तक लक्ष्मीजी की पूजा का सवाल है, वह भी बिना किसी पंडित-पुरोहित और बिना धूमधाम घर में ही संपन्न हो सकती है।
मंदिरों और एक-दूसरे के घरों में भीड़ लगाए बिना सारा क्रियाकर्म पूर्ण किया जा सकता है। दिवाली के दूसरे दिन अन्नकूट और भाई दूज के सिलसिलों में भी इस बार भीड़ सेे बचने का प्रयास किया जाए तो बेहतर रहेगा। हम भारतीय लोग दिवाली के मौके पर ऐसा आचरण कर सकते हैं, जो क्रिसमस पर दुनिया के ईसाई राष्ट्रों के लिए भी अनुकरणीय बन सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बिहार में शनिवार को विधान सभा का अंतिम चरण का चुनाव हो रहा है. 78 सीटों पर सात नवंबर को होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के तीसरे व आखिरी चरण में जिस पार्टी की रणनीति कामयाब होगी, सत्ता उसी के हाथ आएगी.
डायचे वैले मनीष कुमार की रिपोर्ट
विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण में बिहार के पंद्रह जिलों में होने वाले 78 सीटों पर लड़ रहे 1204 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला सात नवंबर को हो जाएगा. उम्मीदवारों में 1094 पुरुष तो 110 महिलाएं हैं. इससे पहले दो चरणों में हुए मतदान में वोटरों ने 165 सीटों पर अपना फैसला ईवीएम में दर्ज कर दिया है. नए गठजोड़ों के कारण इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सामने अपनी 43 सीटिंग सीटें बचाने की तो महागठबंधन के सामने अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने की चुनौती है. जिन पंद्रह जिलों में चुनाव होना है, उनमें सीतामढ़ी, समस्तीपुर, पूर्वी व पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, कटिहार, किशनगंज, सहरसा, दरभंगा, अररिया, मधेपुरा, पूर्णिया, मधेपुरा व सुपौल शामिल हैं. इन जिलों में कुल 2,35,54,071 मतदाता है जिनमें 1,23,46,799 पुरुष व 1,12,06,378 महिलाएं तथा 894 ट्रांसजेंडर हैं. ये सभी 33,782 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे. उम्मीदवारों की सबसे अधिक संख्या मुजफ्फरपुर के गायघाट में हैं जहां से 31 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं.

मतदाताओं की संख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा विधानसभा क्षेत्र सहरसा तो सबसे छोटा हायाघाट (दरभंगा) है. जिन इलाकों में चुनाव होना है उनमें अल्पसंख्यकों, महिलाओं व प्रवासियों की संख्या अधिक है. किशनगंज में सर्वाधिक 68, कटिहार में 45, अररिया में 43 तो पूर्णिया में 38 फीसद मुस्लिम आबादी है. सीमांचल की 24 सीटों पर मुस्लिम वोटरों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है. इस चरण में महागठबंधन की तरफ से राजद ने 46, कांग्रेस ने 25, सीपीआई (एमएल) ने पांच तथा सीपीआई ने दो उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं जबकि एनडीए की ओर से जदयू से सर्वाधिक 37, भाजपा से 35, विकासशील इंसान पार्टी से पांच व जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा से एक प्रत्याशी ताल ठोक रहे हैं. इसके अलावा एनसीपी ने 31, लोजपा ने 42, असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम ने 21, मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने 19 तथा उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा ने 25 उम्मीदवार खड़े किए हैं. वहीं निबंधित 131 दलों के 561 एवं 382 निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में हैं. 2015 में इन 78 सीटों पर जदयू को 23, भाजपा 20, राजद को 20, कांग्रेस को 11, भाकपा (माले) को एक सीट पर विजय हासिल हुई थी. इस बार 23 सीटों पर राजद का जदयू से तथा 20 सीटों पर भाजपा से कड़ा मुकाबला है.
12 मंत्रियों के भाग्य का होगा फैसला
विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण में सीमांचल, मिथिलांचल, तिरहुत व कोसी की 78 सीटों पर नीतीश सरकार के बारह मंत्रियों के भाग्य का फैसला होगा. उनमें विजेंद्र प्रसाद यादव (सुपौल), रमेश ऋषिदेव (सिंहेश्वर), नरेंद्र नारायण यादव (आलमनगर), मदन सहनी (बहादुरपुर), विनोद नारायण झा (बेनीपट्टी), महेश्वर हजारी (कल्याणपुर), खुर्शीद आलम (सिकटा), प्रमोद कुमार (मोतिहारी), सुरेश शर्मा (मुजफ्फरपुर), लक्ष्मेश्वर राय (लौकाहा), कृष्ण कुमार ऋषि (बनमनखी) व बीमा भारती (रूपौली) शामिल हैं. दिवगंत मंत्री कपिलदेव कामत की बहू मीना कामत (बाबूबरही) व विनोद सिंह की पत्नी निशा सिंह (प्राणपुर) अपनी विरासत बचाने को जूझ रही हैं.

इनके अलावा विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी समस्तीपुर जिले के सरायरंजन से चुनाव मैदान में हैं. पूर्व मंत्री अब्दुलबारी सिद्दीकी (केवटी), विनय बिहारी (लौरिया), लेसी सिंह (धमदाहा) और रंजूगीता मिश्रा (बाजपट्टी) की किस्मत का फैसला भी इसी चरण में होना है. इनके अलावा अन्य प्रमुख लोग जो मैदान में हैं उनमें सीपीआई के राज्य सचिव रामनरेश पांडेय (हरलाखी), रमई राम (बोचहां), लवली आनंद (सहरसा), जदयू के प्रदेश प्रवक्ता निखिल मंडल (मधेपुरा), सिंहवाहिनी पंचायत की चर्चित मुखिया रीतू जायसवाल (परिहार), पूर्व मंत्री इलियास हुसैन की पुत्री आसमां परवीन (महुआ) व शरद यादव की बेटी सुभाषिणी शामिल हैं. ब्लॉक डेवलपमेंट आफिसर (बीडीओ) की नौकरी छोड़ गौतम कृष्णा महिषि से, नियोजित शिक्षक रहे अविनाश रानीगंज (सुरक्षित) से तथा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष रहे मंसूर अहमद दरभंगा के जाले विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं.
31 फीसद प्रत्याशियों का क्रिमिनल रिकॉर्ड
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) व बिहार इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के अनुसार तीसरे चरण में माननीय बनने की लालसा रख चुनाव लड़ने वाले कुल 1204 प्रत्याशियों में 31 प्रतिशत यानी 371 उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. दागी उम्मीदवारों की सर्वाधिक संख्या राजद में हैं. इसके 32 प्रत्याशी आपराधिक चरित्र के हैं जिनमें 22 के खिलाफ हत्या व बलात्कार जैसे गंभीर आरोप हैं. वहीं भाजपा के 26 प्रत्याशियों ने दायर हलफनामे में क्रिमिनल रिकॉर्ड की सूचना दी है जिनमें 22 पर गंभीर अपराध के मामले दर्ज हैं. जबकि जदयू के 21, जाप के 22, लोजपा के 18, कांग्रेस के 19 तथा रालोसपा के 16 उम्मीदवारों के खिलाफ किसी न किसी तरह अपराध में लिप्त रहने का आरोप है. इसके अतिरिक्त क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले 233 प्रत्याशी ऐसे हैं जो अन्य निबंधित छोटे दल से या बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं.
कुर्सी बचाने की कोशिश
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 371 उम्मीदवारों में से 282 पर गंभीर अपराध के आरोप हैं. इनमें 37 के खिलाफ महिला अपराध में संलिप्त रहने का मामला दर्ज है जबकि इनमें से पांच पर बलात्कार का मुकदमा है. वहीं करीब 20 प्रत्याशियों पर हत्या तथा 73 पर हत्या की कोशिश का मामला चल रहा है. इनमें सर्वाधिक 14 मामले सीपीआई (एमएल) प्रत्याशी महबूब आलम के खिलाफ दर्ज हैं. स्थिति ऐसी है कि इस चरण की 78 सीटों में से 72 रेड अलर्ट क्षेत्र है, तात्पर्य यह कि इन सीटों पर आपराधिक चरित्र वाले तीन या उससे अधिक प्रत्याशी मैदान में हैं.
30 प्रतिशत प्रत्याशी करोड़पति
तीसरे चरण में चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में 30 प्रतिशत यानी 361 उम्मीदवार करोड़पति हैं. इनमें सर्वाधिक अमीर वारिसनगर से रालोसपा प्रत्याशी बिनोद कुमार सिंह हैं जिनके पास 85.89 करोड़ की संपत्ति है. वहीं दूसरे नंबर पर मोतिहारी से चुनाव लड़ रहे राजद उम्मीदवार ओम प्रकाश सिंह हैं, जो 45.37 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं. भाजपा के 31, बसपा के 10, कांग्रेस के 17, राजद के 35, लोजपा के 31, जदयू के 30 प्रत्याशी करोड़पति हैं. इन प्रत्याशियों की औसत संपत्ति 1.46 करोड़ है. वहीं दरभंगा से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे शंकर कुमार झा ने अपने पास 32.19 करोड़ की संपत्ति होने की घोषणा की है.
नीतीश का मास्टर स्ट्रोक
चुनाव प्रचार के अंतिम दिन पूर्णिया जिले के धमदाहा में आयोजित अपनी आखिरी जनसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बार के चुनाव को अपना अंतिम चुनाव बताया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अंत भला तो सब भला. जानकार बताते हैं कि "यह नीतीश का मास्टर स्ट्रोक है जो एंटी इंकमबैंसी फैक्टर को ध्यान में रखकर चलाया गया है." दरअसल इस इमोशनल कार्ड के पीछे उनकी नजर आखिरी चरण की 35 सीटों पर है जहां पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियां खासी असरदार हैं. कोसी व सीमांचल की जिन 20 सीटों पर जदयू चुनाव लड़ रहा, उनमें 12 उनकी सीटिंग सीट है और इनमें नौ सीटों पर पार्टी लगातार दो बार से चुनाव जीत रही है. जैसा कि अपेक्षित था,
नीतीश के ऐसा कहते ही सियासत गर्म हो गई. तेजस्वी यादव ने कहा, "मेरी बात सच साबित हुई. नीतीश जी थक चुके हैं. बिहार उनसे संभल नहीं रहा." वहीं लोजपा प्रमुख चिराग पासवान का कहना था, "जेल जाने के डर से वे ऐसा कह रहे. पांच साल का हिसाब दिया नहीं और यह भी बता दिया कि आगे का हिसाब भी नहीं देंगे." कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी तंज कसते हुए कहा, "अब उन्हें हार दिख रही है इसलिए मैदान छोड़ रहे हैं." हालांकि जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, "नीतीश कुमार ने प्रचार का संदर्भ लेते हुए कहा कि यह उनकी आखिरी सभा है. आज तीसरे चरण के चुनाव प्रचार का अंतिम दिन था इसलिए उन्होंने यह बात कही. राजनेता कभी रिटायर नहीं होता."

खेल बिगाड़ने की जुगत में छोटे दल
तीसरे चरण में बड़े राजनीतिक दल आपस में दो-दो हाथ तो कर ही रहे हैं, छोटे दल भी गठबंधन की छांव में उन्हें चुनौती दे रहे हैं. सीमांचल व कोसी प्रक्षेत्र में उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा, असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम तथा मायावती की बहुजन समाज पार्टी बड़े दलों का खेल बिगाड़ने की भरपूर कोशिश कर रही है. जानकार बताते हैं कि इन दोनों इलाकों में मिली जीत ही एनडीए का मार्ग प्रशस्त करेगी. वैसे भी सीमांचल की 24 सीटों पर 40 फीसद से ज्यादा मुसलमान एनडीए के लिए परेशानी का सबब बने हैं.
यही वजह है कि प्रचार के अंतिम चरण में भाजपा ने अपने फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ तथा गिरिराज सिंह जैसे नेताओं को उतारा. एनआरसी व सीएए के मुद्दे उछाले गए तथा घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात कही गई. ओवैसी पहले से ही इन मुद्दों को उठाते रहे हैं. दोनों का मकसद मतों का ध्रुवीकरण करना ही है. अल्पसंख्यक वोट बैंक में ओवैसी की सेंध ही महागठबंधन खासकर राजद के लिए चिंता का कारण है. वैसे अपने मकसद में कौन कितना कामयाब हो सका, यह तो दस नवंबर को ही पता चलेगा, जब मतपेटियां खुलेंगी.(dw.com)
- मौलाना अरशद मदनी
नई दिल्ली, 7 नवंबर । फ्रांस एक ऐसा देश है, जिसने वर्षों तक मोरक्को, ट्यूनीशिया और अल्जीरिया जैसे मुस्लिम देशों पर शासन किया। कई मुसलमान अपनी आजीविका कमाने के लिए फ्रांस भी गए हैं और देश के वैध नागरिक बनने के लिए वहां बस गए हैं।
इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के मद्देनजर भी कई मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग फ्रांस गए और वहां बस गए, क्योंकि बहुत से लोग अपने देशों में आने वाली कठिनाइयों के कारण यूरोप और अमेरिका चले गए।
इन लोगों के पास विशेष रूप से यूरोप में कमोबेश यूरोपीय लोगों से अधिक या कम अधिकार हैं और अगर उनके पास अभी समान अधिकार नहीं है, तो वे कुछ समय बाद इन्हें प्राप्त कर लेंगे।
वहां की सरकारों ने उन्हें स्वीकार कर लिया और उन्हें वैसी ही सुविधाएं मुहैया कराईं जैसी यूरोपवासियों के पास हैं। प्रवासियों में से कई ने अपने शिल्प (क्राफ्ट) में कड़ी मेहनत की और धीरे-धीरे बड़ी सफलता हासिल की, जिससे लोगों के एक वर्ग में ईष्र्या पैदा हुई, जिससे उनके बीच एक सांप्रदायिक मानसिकता पैदा हुई।
यह घटना कमोबेश हर जगह देखी जाती है। कुछ लोग ईष्र्या करते हैं, जब वे देखते हैं कि कल के अजनबी या अश्वेत लोग आगे बढ़ रहे हैं और प्रगति कर रहे हैं। यह चंद ईष्यार्लु लोगों का तबका है, जो मस्जिदों को ध्वस्त कर रहा है, उन्हें आग लगा रहा है और निर्दोष उपासकों को मार रहा है।
यह ध्यान देने योग्य है कि इस समय फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, उसके दो पहलू हैं : एक सरकार का पक्ष है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब भाषा और कलम की असीमित स्वतंत्रता है, जो पुरुष, महिलाओं, बुजुर्गों और पूर्वजों के सम्मान और गरिमा को नष्ट करने की अनुमति देती है। यह स्वतंत्रता किसी को भी दुनिया के किसी भी विशुद्ध (पवित्र) व्यक्ति के कार्टून बनाने की अनुमति देती है।
इसके अलावा, यह अधिक आश्चर्य की बात है कि भारत जैसा देश अभिव्यक्ति की समान स्वतंत्रता का समर्थन करता है, बिना यह समझे कि अगर यह भारत जैसे विभिन्न धर्मों वाले देश में प्रबल होता है, तो यह शांति और सद्भाव को प्रभावित कर सकता है। सरकार इसके बुरे परिणामों पर विचार किए बिना भाषण की असीमित स्वतंत्रता का समर्थन करती है, भले ही देश की कुछ अदालतों ने कुछ पक्षपाती मीडिया घरानों को किसी विशेष धर्म को लक्षित करने की असीमित स्वतंत्रता का समर्थन करने के लिए फटकार लगाई हो।
जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से इस संबंध में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। यह उम्मीद की जाती है कि अदालत का आदेश बोलने की असीमित स्वतंत्रता के खिलाफ होगा, जिसके बाद किसी धर्म के अनुयायियों को चोट पहुंचाने की प्रक्रिया को कानूनी रूप से रोक दिया जाएगा।
सिक्के का दूसरा पहलू चाकू के हमले हैं, जो फ्रांस और दुनिया के अन्य देशों में एक के बाद एक हो रहे हैं, जिनमें अपराधी कम और निर्दोष पुरुष एवं महिलाएं अधिक मर रहे हैं।
क्या किसी को देश के कानून को अपने हाथों में लेने की अनुमति दी जा सकती है? और क्या कुछ लापरवाह मुसलमानों द्वारा कानून को अपने हाथों में लेना दुनिया के ईसाई देशों में रहने वाले लाखों मुसलमानों के लिए अच्छा हो सकता है?
अगर इस तरह की घटनाओं के बाद, इन देशों में बढ़ रहे सांप्रदायिक संगठन मुस्लिम अल्पसंख्यक के खिलाफ सक्रिय हो जाते हैं, तो इन देशों में रहने वाले लाखों मुसलमानों और उनके बच्चों का क्या होगा?
फ्रांस में मुस्लिम आबादी लगभग 57 लाख (करीब नौ प्रतिशत) है, जबकि जर्मनी में 50 (लगभग छह प्रतिशत), ब्रिटेन में 41 लाख (लगभग 6.3 प्रतिशत), स्वीडन में 80 लाख (करीब 8.1 प्रतिशत), ऑस्ट्रिया में 70 लाख (लगभग आठ प्रतिशत), इटली में 29 लाख (लगभग पांच प्रतिशत), नीदरलैंड में 80 लाख (लगभग 5.1 प्रतिशत) है। (स्रोत: विकिपीडिया)
अब फिर से सोचें, अगर कुछ नाराज मुसलमान कानून तोड़ते हैं और वहां की सांप्रदायिक ताकतें ताकत हासिल करती हैं और पर्दे के पीछे से सरकारों का संरक्षण पाती हैं, तो पूरे यूरोप में फैले मुसलमानों की आबादी का भविष्य क्या होगा?
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आपको किसी शिक्षक या कंपनी की घृणित विचारधारा के खिलाफ विरोध नहीं करना चाहिए, लेकिन कानून को तोड़ना, अशांति फैलाना या लोगों को मारना इन देशों में इस्लाम की सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व नहीं करता है और न ही इससे वहां रहने वाले लाखों मुसलमानों का भविष्य शांति से सुरक्षित है।
मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि हम 50 साल से अपने देश में इसी तरह की राजनीति झेल रहे हैं। भारत में हिंदू गायों की पूजा करते हैं। मगर गाय की हत्या के आरोप में यहां लोग कानून अपने हाथों में लेते हैं और मुस्लिमों को मार दिया जाता है।
अगर हम यहां कानून को अपने हाथ में लेने का विरोध करते हैं, तो हम फ्रांस में इसका विरोध क्यों नहीं करेंगे? मुझे लगता है कि जिस तरह से आज दुनिया भर के मुसलमान फ्रांस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, यह बहुत अच्छा होता कि वे पहले भी वहां बोलने की असीमित स्वतंत्रता के खिलाफ खड़े होते।
(लेखक जमीयत उलेमा-ए-हिंद, नई दिल्ली के अध्यक्ष हैं)(आईएएनएस)
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
पांच अक्टूबर को उत्तर प्रदेश में गिरफ्तार किए गए पत्रकार सिद्दीक कप्पन को अभी तक किसी वकील से बात नहीं करने दिया गया है. उनकी जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहली सुनवाई गिरफ्तारी के लगभग डेढ़ महीने बाद 16 नवंबर को करेगा.
कप्पन को पांच अक्टूबर को मथुरा में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था जब वो हाथरस में सामूहिक बलात्कार की पीड़िता के परिवार के सदस्यों से मिलने उनके गांव जा रहे थे. उनके साथ अतीक-उर-रहमान, मसूद अहमद और आलम नामक तीन एक्टिविस्टों को भी गिरफ्तार किया गया था और चारों के मोबाइल, लैपटॉप और कुछ साहित्य को जब्त कर लिया गया. पुलिस ने दावा किया था कि चारों पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) नामक संस्था के सदस्य हैं.
केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (केयूडब्लयूजे) ने उसी समय कहा था कि सिद्दीक कप्पन पत्रकार हैं और संगठन की दिल्ली इकाई के सचिव भी हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले से पीएफआई के खिलाफ रहे हैं. उन्होंने संस्था को राज्य में नागरिकता कानून के खिलाफ पिछले साल शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों का जिम्मेदार ठहराया था और उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.
लेकिन कप्पन के पीएफआई के सदस्य होने का सार्वजनिक रूप से कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है. इसके बावजूद उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 124ए (राजद्रोह), 153ए (दो समूहों के बीच शत्रुता फैलाना), 295ए (धार्मिक भावनाओं को आहत करना), यूएपीए और आईटी अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं. बाद में उनके खिलाफ जाति के आधार पर दंगे भड़काने की साजिश और राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश के आरोप भी लगा दिए गए.
नहीं मिलने दिया जा रहा परिवार और वकील से
कप्पन तब से मथुरा जेल में बंद हैं और इस बीच उन्हें उनके परिवार के सदस्यों और उनके वकीलों से भी मिलने या बात नहीं करने दिया जा रहा है. केयूडब्लयूजे के वकील विल्स मैथ्यूज ने डीडब्ल्यू को बताया कि उन्हें उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कप्पन से मिलने और फोन पर बात करने की अनुमति नहीं दी. मैथ्यूज का कहना है कि यह पूरी तरह से गैर कानूनी है क्योंकि हर आरोपी को अपने वकील से मिलने का पूरा अधिकार होता है
हाथरस गैंगरेप के विरोध में प्रदर्शन.
कई दिनों तक कप्पन को उनकी 90 वर्षीया मां, उनकी पत्नी और उनके बच्चों से भी बात करने की अनुमति नहीं दी गई थी और उनकी कोई भी जानकारी उनके परिवार तक पहुंचाई भी नहीं गई थी. अभी तक उन्हें सिर्फ अपनी मां से बात करने दिया गया है और वो भी सिर्फ एक बार.
पिछले सप्ताह केयूडब्लयूजे ने कप्पन को न्याय दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन सर्वोच्च अदालत से भी उन्हें तुरंत राहत नहीं मिली. छह नवंबर को अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई की पहली तारीख तय की. सुनवाई 16 नवंबर को होगी. हैबियस कोर्पस के तहत दायर किए गए आवेदन में यूनियन ने कप्पन की जमानत की याचिका पर तुरंत सुनवाई करने की अपील की है और साथ ही उन्हें नियमित रूप से अपने परिवार और अपने वकीलों से वीडियो कॉल करने की अनुमति देने की भी अपील की है.
क्या होता है छोटी जगहों के पत्रकारों के साथ
कप्पन के साथ जो हो रहा है वो यह दर्शाता है कि देश में छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकारों के साथ क्या क्या होता है. वरिष्ठ पत्रकार महताब आलम ने डीडब्ल्यू से कहा कि रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्नब गोस्वामी को मुंबई पुलिस ने जब गिरफ्तार किया तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसकी निंदा करते हुए दो ट्वीट किए, लेकिन कैसी विडम्बना है कि उन्हीं के प्रदेश में दर्जनों पत्रकार या तो कप्पन की तरह जेल में हैं या उन पर हमले हो रहे हैं या उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दायर किए गए हैं.
वैसे गिरफ्तारी के दो दिन बाद गोस्वामी भी अभी तक जेल में हैं, लेकिन उनके और कप्पन के मामलों में कई बड़े अंतर हैं. एक तो कप्पन के खिलाफ लगाए गए आरोपों का कोई स्पष्ट आधार नहीं है जबकि गोस्वामी का नाम उस व्यक्ति की आखिरी चिट्ठी में है जिसकी आत्महत्या के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया है. दूसरा अंतर यह कि गोस्वामी भले ही अभी तक जेल में हों, लेकिन उन्हें एक दिन के अंदर ही अदालत तक पहुंचने का मौका और फिर सुनवाई की तारीख भी मिल गई.(dw.com)
- प्रभाकर मणि तिवारी
बिहार विधानसभा चुनावों के पूरा होने से पहले ही पड़ोसी पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति गरमाने लगी है. पश्चिम बंगाल के दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा नेता अमित शाह ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में राज्य के 294 में से दो सौ सीटें जीतने का दावा कर राजनीति के ठहरे पानी में हलचल मचा दी है.
हालांकि अब यह भी सवाल उठने लगा है कि शाह का दावा हकीकत के कितने क़रीब है और क्या भाजपा अपनी मौजूदा सांगठनिक ताक़त के बूते इस लक्ष्य तक पहुंच सकेगी? शाह के दौरे और उनके दावों से यह भी साफ़ है कि पार्टी के लिए बिहार से ज़्यादा अहमियत पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की है.अमित शाह बिहार में तो एक बार भी नहीं गए. लेकिन अचानक तीन दिनों के दौरे पर बंगाल पहुंच गए.
भाजपा नेता ने अपने दौरे की शुरुआत भी उस आदिवासी-बहुल बांकुड़ा ज़िले से की जहां बीते पंचायत और लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा था.
बुधवार की रात को कोलकाता पहुंचने के बाद शाह अगले दिन सुबह ही बांकुड़ा पहुंचे. झारखंड से सटे इस आदिवासी-बहुल इलाके में उन्होंने बिरसा मुंडा की मूर्ति पर फूल-माला चढ़ाई. वहां उन्होंने स्थानीय नेताओं के साथ बातचीत की, दोपहर में एक आदिवासी के घर ज़मीन पर बैठकर भोजन किया और उसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित किया.
बाद में उन्होंने एक रैली में भी भाषण दिया. शाह के साथ राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, उपाध्यक्ष मुकुल राय और प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष भी थे. पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक और उसके बाद रैली में उन्होंने लोगों से अगले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने की अपील की.
शाह ने कार्यकर्ताओं से कहा, "जोश से नहीं होश से काम करो. वर्ष 2018 में जब मैंने लोकसभा की 22 सीटें जीतने का दावा किया तो विपक्ष ने खिल्ली उड़ाई थी. लेकिन हमने 18 सीटें जीत लीं और 4-5 सीटें बहुत कम अंतर से हमारे हाथों से निकल गईं."
उन्होंने दावा किया कि बिरसा मुंडा के आशीर्वाद से अगले चुनाव में पार्टी कम से कम दो सौ सीटें जीतेंगी.
"इस दावे पर जिनको जितना हंसना है, हंस सकते हैं. लेकिन अगर हमने सुनियोजित तरीके से काम किया तो दौ सौ से ज़्यादा सीटें भी जीत सकते हैं. राज्य के लोग बदलाव के लिए बेचैन हैं."
शाह ने शुक्रवार को कोलकाता में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक में सांगठनिक तैयारियों का जायजा लिया और चुनावी रणनीति पर भी विस्तार से बातचीत की.
उधर, शाह के बयान पर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है. तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद सौगत राय कहते हैं, "भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं है. पार्टी के पास न तो काडर हैं और न ही ज़मीनी समर्थन. राय ने दावा किया कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से साबित हो जाएगा कि नरेंद्र मोदी का करिश्मा भी अब फीका पड़ गया है. बंगाल में दो सौ सीटें जीतने का अमित शाह का दावा महज दिवास्वप्न है."
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी शाह को बाहरी करार देते हुए कहा है कि अगले चुनाव में लोग बंगाल से तृणमूल कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा को उखाड़ फेंकेंगे. ममता ने गुरुवार को शाह का नाम लिए बिना कहा, "वह हमें उखाड़ फेंकने का दावा कर रहे हैं. लेकिन होगा ठीक इसका उल्टा. शिष्टाचार मत भूलें वरना बंगाल के लोग बाहरियों को बर्दाश्त नहीं करेंगे."
अगले चुनावों के लिए हाथ मिलाने वाली कांग्रेस और वाममोर्चा ने भी शाह के दावे को हक़ीक़त से परे बताया है. माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "भाजपा का यह सपना कभी पूरा नहीं होगा. जाति और धर्म के आधार पर राजनीति की परंपरा बंगाल में कभी नहीं रही है. लोग चुनावों में भगवा पार्टी को माकूल जवाब देंगे."
कांग्रेस नेता अब्दुल मन्नान ने भी यही बात कही है. मन्नान कहते हैं, "भाजपा के पांव पसारने के लिए तृणमूल कांग्रेस ही ज़िम्मेदार है. लेकिन अबकी लोग इन दोनों दलों को आइना दिखा देंगे. यहां सांप्रदायिक राजनीति के सहारे सत्ता हासिल नहीं की जा सकती. लोग बदलाव भले चाहते हों, यहां कांग्रेस-वाममोर्चा गठबंधन ही तृणमूल कांग्रेस का विकल्प है, भाजपा नहीं."
अमित शाह के दौरे और दावों के बाद राज्य में चुनावों से पहले राष्ट्रपति शासन की अटकलें भी तेज़ होने लगी हैं. लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता मुकुल राय कहते हैं, "बंगाल में आखिरी बार 40 साल पहले राष्ट्रपति शासन लगा था. इसलिए फिलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी करना संभव नहीं है. लेकिन यह सही है कि लोग अब मौजूदा सरकार के भ्रष्टाचार और आतंक से तंग आ चुके हैं और इसे बदलने का मन बना चुके हैं."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि शाह का दो सौ सीटें जीतने का दावा फिलहाल ज़मीनी हक़ीक़त से दूर लगता है. इससे पहले लोकसभा चुनावों में भी पार्टी के 22 सीटें जीतने के दावे को हल्के में लिया गया था. राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "लोकसभा चुनावों के नतीजों के आधार पर भाजपा को 120 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी. शायद शाह का दावा उस पर ही आधारित है. ऐसे दावों पर भरोसा कर कशमकश में रहे कुछ वोटर भाजपा के पाले में जा सकते हैं."
राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर मनोरंजन माइती कहते हैं, "भाजपा फिलहाल अंदरूनी गुटबाजी से जूझ रही है. यह सही है कि सीमावर्ती इलाकों और उत्तर बंगाल के चाय बागान के इलाकों में उसका प्रदर्शन बेहतर रहा था. लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग होते हैं. एक के नतीजे के आधार पर दूसरे के बारे में पूर्वानुमान अक्सर ग़लत साबित होता है. इसके अलावा लोकसभा में लगे झटकों के बाद तृणमूल कांग्रेस ने भी उन इलाकों में वोटरों को लुभाने की कवायद तेज़ कर दी है. ऐसे में भाजपा का दौ सौ सीटें जीतने का दावा मौजूदा परिस्थिति में संभव नहीं लगता."
तमाम राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों की नज़र भले ही अमित शाह के दावे को लेकर अलग अलग हों लेकिन बिहार चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल में भी चुनावी राजनीति के जोर पकड़ने की संभावना है. शाह के दौरे ने इसकी शुरुआत तो कर ही दी है.(bbc)
-हॉली यंग
इस हिमखंड का नाम ए68ए है और यह दक्षिण अटलांटिक में ब्रिटेन के नियंत्रण वाले दक्षिणी जॉर्जिया द्वीप से टकरा सकता है. ए68ए दक्षिणी महासागर में इस समय सबसे बड़ा हिमखंड है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह हिमखंड टूट सकता है या संभव है कि अपना रुख बदल ले. लेकिन इस बात की बहुत संभावना है कि हिमखंड द्वीप से टकराएगा और वह वहां की जैव विविधता को अस्त व्यस्त कर सकता है.
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे से जुड़े प्रोफेसर गेरैंट टार्लिंग ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह ऐसा इलाका है, जहां भरपूर वन्यजीवन पनप रहा है. वहां पेंगुइन और सीलों की बड़ी आबादी है. वहां ये जीव इतनी संख्या में रहते हैं, कि अगर ये ना हों तो इन प्रजातियों की संख्या में बहुत बड़ी गिरावट आ सकती है." इस द्वीप पर हंपबैक और ब्लू व्हेल की संख्या भी बढ़ रही है. इसके अलावा समुद्री पक्षियों अल्बाट्रोस की सबसे ज्यादा संख्या भी इसी द्वीप पर पाई जाती है.
हिमखंडों का कब्रिस्तान
वैज्ञानिकों ने उम्मीद की थी कि 2017 की गर्मियों में अंटार्कटिक प्रायद्वीप के पूर्वी तट पर पानी में तैरने वाले हिम पर्वत लार्सन सी से टूटने के बाद ए68ए बिखर जाएगा. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) का कहना है कि इस हिमखंड से दो हिस्से अलग भी हो चुके हैं, लेकिन अब भी यह आकार में यूरोपीय देश लग्जमबर्ग के दोगुने के बराबर है. हालांकि ए68ए द्वीप से टकराने वाला सबसे बड़ा हिमखंड होगा, लेकिन इस इलाके में यह ऐसी पहली घटना नहीं है. पहले भी ऐसा यहां कई बार हो चुका है और इसीलिए इस इलाके को "हिमखंडों का कब्रिस्तान" कहा जाता है.
2004 में ए68ए से छोटा एक हिमखंड द्वीप से कुछ किलोमीटर दूर तक आ गया था. टार्लिंग कहते हैं कि मौजूदा हिमखंड को लेकर चिंता उसके आकार की वजह से नहीं है, बल्कि इसका आकार छिछला है. ईएसए के अनुसार यह सिर्फ कुछ सौ मीटर मोटा है.
टार्लिंग कहते हैं, "हो सकता है कि यह हिमखंड तट के पास जाकर ठहर जाए. इसकी वजह से वहां रहने वाले जीवों के लिए अपने खाने तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है. या फिर खाना लेकर लौटते वक्त वे अपने बच्चों तक ना पहुंच पाएं." टार्लिंग कहते हैं कि इसकी वजह से समुद्री शैवाल भी प्रभावित हो सकते है जो वहां की खाद्य श्रृंखला में सबसे नीचे हैं.
देखो और इंतजार करो
उत्तरी इंग्लैंड की शेफील्ड यूनिवर्सिटी में भूतंत्र विज्ञान के प्रोफेसर ग्रांट बिग इस हिमखंड के सकारात्मक प्रभावों का भी जिक्र करते हैं. वह कहते हैं कि चूंकि यह हिमखंड अब भी पानी में तैर रहा है, इसलिए इसके साथ बहुत सारा आयरन भी होगा. इससे महासागर की उपजाऊ क्षमता बढ़ेगी और कई सूक्ष्म जीवों को पनपने का मौका मिलेगा.
यह हिमखंड अब तक 1,600 किलोमीटर का सफर तय कर चुका है. अगर यह एक घंटे में एक किलोमीटर आगे बढ़ने की मौजूदा रफ्तार से चलता रहा तो अब से 10 से 20 दिन के भीतर द्वीप तक पहुंच सकता है. प्रोफेसर बिग कहते हैं, "यह इतना बड़ा है कि हम इसे लेकर कुछ नहीं कर सकते. बस हमें इंतजार ही करना पड़ेगा. उम्मीद करते हैं कि धारा उसका रुख द्वीप के दक्षिण की तरफ कर दे या फिर वह विखंडित हो जाए."(DW.COM)
-शिवप्रसाद जोशी
कोरोना महामारी की वजह से किए गए लॉकडाउन के दौरान केंद्र और पंजाब सरकार के निर्देशों की आलोचना के लिए राजद्रोह के आरोप में बंद एक व्यक्ति को रिहाई का आदेश देते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि राजद्रोह और धार्मिक मनमुटाव से जुड़े कानूनों का इस्तेमाल करते हुए राज्य को ज्यादा सहिष्णु और सजग रहने की जरूरत है. खबरों के मुताबिक छह महीने से जेल में बंद एक अभियुक्त की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले दिनों कोर्ट ने ये कहा. जसबीर नाम के उस व्यक्ति पर राष्ट्र की एकता और अखंडता के विरुद्ध और धार्मिक वैमनस्य पैदा करने वाले बयान देने के आरोप लगे थे. जमानत देते हुए जस्टिस सुधीर मित्तल ने कहा कि अभियुक्त लॉकडाउन से नाराज था और भारत सरकार और पंजाब सरकार ने जिस तरह महामारी पर काबू पाने के लिए कदम उठाए उन्हें लेकर भी नाखुश था और उसने उक्त सरकारों की कार्यप्रणाली की आलोचना की थी.
जस्टिस मित्तल के कोर्ट ने माना कि सरकारों के उच्च अधिकारियों और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के प्रति अनर्गल और निंदात्मक भाषा जरूर इस्तेमाल की गयी लेकिन उसमें सरकार के प्रति नफरत या वैमनस्य भड़काने जैसी कोई बात नहीं है. इससे सामुदायिक सद्भाव बाधित नहीं हुआ और न ही धार्मिक मनमुटाव पैदा हुआ. जज के मुताबिक ये सरकार के कामकाज के तरीकों पर असंतोष और उसकी नीतियों की आलोचना की अभिव्यक्ति है. कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना करना या अपना मत प्रकट करना हर नागरिक का अधिकार है, हालांकि ये आलोचना सभ्य तरीके से की जानी चाहिए और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
राजद्रोह के आरोप पर संयम का मशविरा
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की तरह पहले भी अदालतें कई मौकों पर और खुद सुप्रीम कोर्ट भी अपनी हिदायतों, मशविरों और आदेशों के जरिए सरकारों और पुलिस प्रशासन को राजद्रोह के कानून के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर आगाह कर चुका है लेकिन देखने में आता है कि सरकारें अपनी आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पाती और मौका मिलने पर राजद्रोह कानून का धड़ल्ले से इस्तेमाल करने से नहीं चूकती. तमिलनाडु के कुडनकुलम एटमी संयत्र का विरोध कर रहे किसान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 2011 में राजद्रोह के 8856 मामले ठोक दिए गए थे. इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार अरुण जनार्दन की सितंबर 2016 में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु का इदिनिथाकराई गांव तो राजद्रोह कानून का ग्राउंड जीरो है जहां के किसान आंदोलनकारियों पर सबसे ज्यादा राजद्रोह मामले दर्ज बताए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक जेल भले ही न हो लेकिन बड़ी तादाद में मामले किसानों को डराए रखने के लिए भी लादे रखे जाते हैं.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2014 से 2018 के बीच 233 लोगों पर इस कानून का इस्तेमाल किया जा चुका है. सबसे ज्यादा 37 लोग असम और 37 झारखंड में गिरफ्तार किए गए हैं. 2018 में 70, 2017 में 51, 2016 में 35, 2015 में 30 और 2014 में 47 लोग इस भीषण कानून की चपेट में आ चुके है. एनसीआरबी ने 2014 से राजद्रोह के मामलों पर आंकड़े जुटाना शुरू किया है. लेकिन इनसे ये भी पता चलता है कि राजद्रोह के आरोपों में सिर्फ गिनती के मामलों में ही अदालतों में दोष सिद्ध हो पाया है. 2016 में सिर्फ चार मामले ही अदालतों में ठहर पाए. भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत ब्रिटिश दौर में बनाया राजद्रोह कानून अभी तक चला आ रहा है. जबकि खुद ब्रिटेन अपने विधि आयोग की सिफारिश के बाद 2010 में इस कानून से मुक्ति पा चुका है.
राजद्रोह के आरोप का अत्यधिक इस्तेमाल
आंदोलनकारियों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, किसानों, मजदूरों, लेखकों, पत्रकारों, कवियों, कार्टूनिस्टों, राजनीतिज्ञों और एक्टिविस्टों पर तो इसकी गाज गिरायी ही जाती रही है और उन्हें गाहेबगाहे विरोध न करने और चुप रहने के लिए इस तरह धमकाया जाता है. दिल्ली में जेएनयू और जामिया विश्वविद्यालयों के छात्रों पर भी इस कानून की तलवार लटक रही है. कर्नाटक में तो एक स्कूल पर ही ये मामला सिर्फ इसलिए दर्ज हो गया क्योंकि वहां बच्चे सीएए से जुड़ा एक नाटक खेल रहे थे. राजद्रोह एक गैरजमानती अपराध है और इसकी सजा भारीभरकम मुआवजा राशि के साथ न्यूनतम तीन साल और अधिकतम उम्रकैद रखी गयी है. सरकारें भले ही इस कानून को खत्म करने के बजाय उसे बनाए रखने की वकालत करती हैं लेकिन न्यायपालिका इस कानून की संवैधानिक वैधता को विभिन्न मौलिक अधिकारों और उन पर लगे निर्बंधों की रोशनी में विश्लेषित करती आयी है.
1962 के केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के विख्यात मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार के बारे में, या उसके कदमों के बारे में नागरिक को टिप्पणी या आलोचना के जरिए कुछ भी करने या लिखने का अधिकार है, जब तक कि वो विधि द्वारा स्थापित सरकारों के खिलाफ लोगों को हिंसा के लिए न उकसाता हो या पब्लिक ऑर्डर को बिगाड़ने का इरादा न रखता हो. कोर्ट का कहना था कि राजद्रोह की दंडात्मक कार्रवाई, अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर संवैधानिक रूप से वैध निर्बंध के रूप में तभी मान्य होगी जबकि जो शब्द कहे गए हैं वो हिंसा के जरिए सार्वजनिक शांति को भंग करने के मकसद से कहे गए हों. मुश्किल ये है कि पब्लिक ऑर्डर के दायरे में कौन सी अभिव्यक्ति या ऐक्शन होगा या नहीं होगा, ये भी बहुत स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है. शब्दों की अर्थवत्ता की जांच कैसे होगी. इस तरह सरकारें अपनी सुविधा से इस कानून का इस्तेमाल कर लेती हैं. और मामला अंततः कोर्ट में आकर ही सुलझ पाता है.
आजादी से पहले से ही विवादों में है ये कानून
वैसे आजादी से पहले से ही इस कानून को रद्द करने की मांग की जाती रही है और सबसे प्रमुखता से इस मांग को महात्मा गांधी ने उठाया. 1922 में राजद्रोह का मामला अपने ऊपर थोपे जाने के बाद उन्होंने कहा था कि राजद्रोह, नागरिकों की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए बनाया गया कानून है. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा था कि जितना जल्दी इस कानून से मुक्ति पा ली जाए उतना अच्छा. लेकिन भारत में आजादी के सात दशक पूरे हो जाने के बाद भी ये नहीं हो पाया है.
कांग्रेस की सरकारें हों या बीजेपी की सरकारें इस कानून के प्रति सरकारों का मोह लगता है नहीं जाता. अब सवाल यही है कि आखिर प्रतिरोध के प्रति लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकारें इतनी असंवेदनशील और भयभीत सी क्यों दिखती हैं और क्यों उन्हें इस कानून की जरूरत है. राजद्रोह की गतिविधियों और सार्वजनिक-व्यवस्था भंग होने का खतरा इतना तीव्र और वास्तविक होता तो फिर न्यायपालिका क्यों समय समय पर इसके इस्तेमाल को गैरवाजिब ठहराती और इसकी कमियों को रेखांकित करती रहती.(DW.COM)


