सूरजपुर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
सूरजपुर, 26 मार्च। एसईसीएल बिश्रामपुर क्षेत्र की गायत्री भूमिगत खदान इन दिनों उत्पादन नहीं, बल्कि कोयले की गुणवत्ता को लेकर विवादों में है। खदान से जुड़े डीओ होल्डरों ने आरोप लगाया है कि उन्हें बड़े पैमाने पर पत्थर मिश्रित कोयला दिया जा रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
व्यापारियों का कहना है कि पिछले एक महीने से खदान प्रबंधन लगातार 2-3 दिन में स्थिति सुधारने का आश्वासन दे रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस सुधार नजर नहीं आया। खदान से निकलने वाला अधिकांश कोयला पत्थर मिश्रित होने के कारण बाजार में बेचने लायक नहीं है। इसके चलते परिवहन और मजदूरी का खर्च भी अलग से उठाना पड़ रहा है, जबकि ग्राहक भी ऐसे कोयले को लेने से इनकार कर रहे हैं।
डीओ होल्डरों ने बताया कि एसईसीएल की नीति के तहत पहले कोयले का ऑक्शन होता है, जिसमें व्यापारी पूरी राशि जमा कर कोयला खरीदते हैं। इसके बाद उन्हें कोयला उठाने के लिए 45 दिनों की समय-सीमा दी जाती है। मौजूदा हालात में यह समय-सीमा ही व्यापारियों के लिए परेशानी बन गई है, क्योंकि खराब गुणवत्ता वालों के कारण वे कोयला उठाने में असमर्थ हैं।
व्यापारियों का आरोप है कि यदि 45 दिनों में कोयला नहीं उठाया जाता, तो वह लेप्स हो जाता है और राशि वापस करते समय प्रति टन 150 रुपये की कटौती की जाती है। ऐसे में उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ रही है—एक ओर खराब कोयला, दूसरी ओर आर्थिक कटौती।
नाराज डीओ होल्डरों ने प्रबंधन से मांग की है कि खदान में गुणवत्ता सुधार के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं, लेप्स कोयले पर कटौती समाप्त की जाए । साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की भी मांग की गई है।
वहीं इस मामले में खदान प्रबंधन ने आरोपों को निराधार बताया है।
खदान के मैनेजर जनार्दन सिंह ने कहा कि कोयले की आपूर्ति नियमानुसार की जा रही है। कभी-कभी मशीनों के ब्रेकडाउन के कारण समस्या आती है, लेकिन उसे सुधार कर बेहतर कोयला ही सप्लाई किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कोयले के साथ आने वाले पत्थरों को अलग कर दिया जाता है।


