राजपथ - जनपथ
हकीकत के इतर रेलवे का नया लोगो
स्टेशन, गंदगी भरे ट्रेनों की लेटलतीफी, उनमें चोरियां, टीटीई द्वारा बेटिकिट यात्रियों को बोगी से धकेलने और दोयम दर्जे की यात्री सुविधाओं की हकीकत से इतर रेलवे ने अपनी पहचान बदल रहा है। बोर्ड ने हालांकि इस बदलाव पर दावा किया है कि उसने हमेशा से अपने लोगो और पहचान को समय के साथ अपडेट किया है, ताकि वह आधुनिकता के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। नए लोगो के माध्यम से, रेलवे ने यह संदेश दिया है कि वह अपने ग्राहकों की अपेक्षाओं को समझता है और उन्हें बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस नए लोगो के साथ, भारतीय रेल ने अपने ब्रांड को और अधिक आकर्षक और पहचानने योग्य बनाने का प्रयास किया है। नए लोगो के माध्यम से, यात्रियों को एक नई पहचान और अनुभव मिलेगा, जो उन्हें भारतीय रेल के साथ जुडऩे में मदद करेगा। चेंज आफ लोगो को लेकर जारी सूचना के अनुसार अब पुराने और नीले रंग के 17 स्टार वाले लोगो की जगह लाल रंग का 18 स्टार वाला लोगो इस्तेमाल होगा। अब एक स्टार अधिक वाले लोगो के साथ नई पहचान बनाने जा रहा है। आगामी एक जून से इसे पूरे देश में जारी कर दिया जाएगा।
भारतीय रेल ने दक्षिण तट रेलवे विशाखापट्टनम के गठन के बाद अपने आधिकारिक लोगो में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। रेलवे बोर्ड ने रेल इंजन के फ्रंट फोटो को घेरे हुए 18 लाल सितारों वाले संशोधित लोगो को मंजूरी दे दी है। रेलवे बोर्ड द्वारा जारी आदेश के अनुसार, दक्षिण तट रेलवे को भारतीय रेल का 18वां दक्षिण तट रेलवे जोन एक जून से औपचारिक रूप से परिचालन शुरू करेगा। बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे, उत्पादन इकाइयों, पीएसयू और प्रशिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे एक जून से नए लोगो का उपयोग करें।
आस्था से अधिक समरसता की तस्वीर

ऐसे समय में जब देश में धर्म और पहचान को लेकर बहसें अक्सर तनाव का रूप ले लेती हैं, यह तस्वीर एक अलग और सकारात्मक संदेश देती दिखाई देती है। सूरजपुर कलेक्टर रेना जमील सुशासन तिहार के मौके पर मुख्यमंत्री के प्रवास की तैयारी को देखने के लिए कुदरगढ़ गई थीं। वहां के मंदिर में उन्होंने श्रद्धा के फूल चढ़ाए और लोगों ने यह तस्वीर कैद कर ली। मुस्लिम समुदाय से आने वाली महिला अधिकारी का परंपरा और संस्कृति के प्रति सम्मान के नजरिये से भी इसे देखा गया। समाज की खूबसूरती उसकी विविधता में निहित है, इस भाव को उन्होंने मजबूत किया।
2019 बैच की, रेना जमील की आईएएस के मुकाम तक पहुंचने की कहानी भी संघर्ष और धैर्य की मिसाल है। धनबाद, झारखंड में पिता मैकेनिक थे। आठवीं तक ही मां की भी पढ़ाई थी और खुद उनकी शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई। यूपीएससी की ओर रुझान बढ़ा तो पहले प्रयास में सन् 2016 में इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस मिली। दूसरे प्रयास में प्रारंभिक भी पास नहीं कर पाईं। लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा और अंतत: तीसरी बार में आईएएस बनने का सपना पूरा किया।


