राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : इतना किया, सोनवानी के बच्चों पर भी रहम कर देते !
17-May-2026 5:40 PM
राजपथ-जनपथ : इतना किया, सोनवानी के बच्चों पर भी रहम कर देते !

इतना किया, सोनवानी के बच्चों पर भी रहम कर देते !

सीजी पीएससी 2021 भर्ती घोटाले में क्या सिर्फ नाममात्र की गड़बडिय़ां थीं? क्या केवल तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी के कुछ रिश्तेदारों का चयन ही गलत था और बाकी सभी नियुक्तियां पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता पर  थीं? अगर ऐसा ही था, तो फिर पूरे प्रदेश में इतना बड़ा राजनीतिक तूफान क्यों खड़ा किया गया? चुनावी मंचों से लेकर सीबीआई जांच तक जिस मामले को युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी लूट बताया गया, वह दो चार रिश्तेदारों तक सिमटकर कैसे खत्म हो गया?

सीजी पीएससी में दो सौ के आसपास पदों के लिए लाखों युवा अपनी जवानी झोंक देते हैं। गांवों के गरीब घरों से लेकर शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों तक, अभ्यर्थी वर्षों तक किताबों में सिर खपाते हैं। लेकिन 2021 की चयन सूची सामने आते ही ऐसा लगा जैसे प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि सत्ता, पहुंच और रिश्तेदारी का बंद कमरा खुल गया हो। लोगों ने देखा कि कई मलाईदार पद प्रभावशाली अफसरों, नेताओं और रसूखदार परिवारों के बच्चों से भर गए हैं।

पूर्व मंत्री ननकी राम कंवर ने सबसे पहले दो दर्जन से ज्यादा संदिग्ध नाम सार्वजनिक किए। वे मामले को हाईकोर्ट ले गए। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और विधानसभा चुनाव सिर पर था। मामला धीरे-धीरे इतना विस्फोटक बन गया कि भाजपा ने इसे चुनावी हथियार बना लिया।

तत्कालीन सीजी पीएससी चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी, जो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सचिव भी रह चुके थे, आरोपों की गोलाई में आए। सीबीआई की जांच और चार्जशीट में दावा किया गया कि ऐसे सवाल तैयार कराए गए जिनके जवाब केवल चुनिंदा लोगों को ही पता हो सकते थे। पेपर लीक की गई, नियमों में बदलाव किया गया, रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने और चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने जो जतन करना था किया गया।

इसके बाद परिणाम में जो नाम सामने आए, उसने पूरे सिस्टम की साख हिला दी, जो 2003 से ही दरक रही थी। चेयरमैन साहब का बेटा नितेश सोनवानी डिप्टी कलेक्टर, भतीजा साहिल सोनवानी डीएसपी, बहू मीशा कोसले डिप्टी कलेक्टर और रिश्तेदार दीपा आदिल जिला आबकारी अधिकारी बन गए। तत्कालीन पीएससी सचिव जीवन किशोर ध्रुव आईएएस के बेटे सुमित ध्रुव को भी डिप्टी कलेक्टर बना दिया गया। बजरंग पॉवर वाले उद्योगपति श्रवण कुमार गोयल पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने बेटे शशांक गोयल और बहू भूमिका कटियार को डिप्टी कलेक्टर बनवाने के लिए 45 लाख रुपये रिश्वत दी। उनको भी बुक किया गया।

सीबीआई की लगभग 400 पन्नों की चार्जशीट में 29 आरोपी नामजद किए गए। इनमें पीएससी अधिकारी, कारोबारी, कोचिंग संचालक और चयनित अभ्यर्थी शामिल थे। टॉप-20 चयनितों में से 13 प्रभावशाली परिवारों से जुड़े पाए गए। बारनवापारा के जंगल में विशेष तैयारी कराई गई। और बताएं तो गवर्नर के सचिव अमृत खलखो के एक ही पते पर रहने वाले दो बच्चे एक ही बार में, एक ही परीक्षा में डिप्टी कलेक्टर बन गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री के करीबी आईपीएस अधिकारियों के बच्चे, कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदार और कई ताकतवर परिवारों के नाम सूची में मिले। यही वे नाम थे, जिन पर चुनाव अभियान के दौरान पूरे प्रदेश में सवाल उठे। मगर आज स्थिति यह है कि सोनवानी के कुछ रिश्तेदारों को छोडक़र लगभग सभी को नियुक्ति और पोस्टिंग मिल चुकी है।

यहीं पर एक जरूरी सवाल खड़ा होता है। अगर बाकी सब पाक-साफ थे, तो फिर पूरे प्रदेश को यह क्यों बताया गया कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हुआ है? अगर चयन निष्पक्ष थे, तो चुनावी मंचों से लेकर टीवी डिबेट तक इसे बिग स्कैम क्यों कहा गया? बीजेपी के तमाम प्रवक्ताओं के चुनाव से पहले दिए गए बयानों को निकालें और आज सवाल करें, कि भाई सब फुस्स क्यों हो गया है। अगर केवल दो-चार लोग दोषी थे, तो फिर सीबीआई जांच, गिरफ्तारियां, छापेमारी और राजनीतिक भाषणों का इतना बड़ा तमाशा क्यों खड़ा किया था?

विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। भाजपा ने युवाओं के गुस्से को राजनीतिक मुद्दा बनाया। सत्ता में आते ही मामला सीबीआई को सौंपा गया। शुरुआत में लगा कि अब पूरी परतें खुलेंगी। गिरफ्तारियां हुईं। सरकार ने जीरो टॉलरेंस का नारा दिया। लेकिन धीरे-धीरे जांच की धार कुंद पड़ती गई। मामला सिमटता गया। बड़े नाम गायब होते गए। और आखिर में कहानी वहीं आकर खत्म हुई, जहां अक्सर खत्म होती है। कुछ लोगों पर कार्रवाई, बाकी सब क्लीन।

सीबीआई कई संदिग्ध चयनितों के खिलाफ ठोस चार्जशीट तक पेश नहीं कर सकी। अदालत में पर्याप्त सबूत नहीं रखे जा सके। इसके बाद चयनित उम्मीदवार हाईकोर्ट पहुंचे। सरकार ने टालमटोल की, लेकिन हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जॉइनिंग देने का आदेश दे दिया। अब दो दिन पहले ज्यादातर चयनित अभ्यर्थी डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर बैठ चुके हैं। उसी तरह जैसे 2003 के पीएससी में गलत तरीके से चुने गए स्टे वाले अयोग्य लोग, काबिल पदों पर बैठे हैं। ईमानदार प्रतिभाशालियों का हक एक बार फिर लुट गया है।

वादा किया गया था कि यूपीएससी जैसी कड़ी और पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी। कहा गया था कि सीजी पीएससी का पूरा ढांचा बदला जाएगा। लेकिन आज तक न ठोस गाइडलाइन दिखी, न संरचनात्मक सुधार। पीएससी की विश्वसनीयता पहले से दांव पर थी, जो अब लगभग ध्वस्त हो चुकी है।

सीबीआई पर शक नहीं है। उसे कुछ मिला ही नहीं होगा। इतनी चालाकी से काम किया होगा कि गलत चयन के खिलाफ सबूत ही जुटाने में संस्था नाकाम रह गई हो। और यह पहली बार नहीं है। बिरनपुर हत्याकांड को भी चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव का बड़ा मुद्दा बनाया गया। कई सीटों पर राजनीतिक फायदा लिया गया। लेकिन बाद में सीबीआई जांच में मामला सांप्रदायिक नहीं, बल्कि आपसी विवाद का निकला।

नए वनबल प्रमुख को लेकर अटकलें तेज

प्रदेश में नए वनबल प्रमुख की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। मौजूदा वनबल प्रमुख वी. श्रीनिवास राव 31 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन अब तक नए प्रमुख की नियुक्ति के लिए डीपीसी की तारीख तय नहीं हो पाई है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सरकार फिलहाल चार पीसीसीएफ में से किसी एक वरिष्ठ अधिकारी को वन बल प्रमुख का अतिरिक्त प्रभार सौंप सकती है।

वनबल प्रमुख की नियुक्ति में अब केवल वरिष्ठता ही निर्णायक नहीं रह गई है। इसका उदाहरण मौजूदा प्रमुख वी. श्रीनिवास राव हैं, जिन्हें पांच पीसीसीएफ में सबसे जूनियर होने के बावजूद यह जिम्मेदारी दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक सरकार इस बार जल्दबाजी में फैसला लेने के मूड में नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि श्रीनिवास राव के साथ 1989 बैच के पीसीसीएफ तपेश झा भी 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में नए वनबल प्रमुख की दौड़ में लघु वनोपज संघ के एमडी अनिल साहू, कौशलेन्द्र कुमार और पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं। हालांकि 31 मई के बाद ओपी यादव भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं।

ओपी यादव फिलहाल एपीसीसीएफ हैं, लेकिन उन्हें पीसीसीएफ पद पर पदोन्नति देने के लिए डीपीसी पहले ही हो चुकी है। संभावना जताई जा रही है कि 31 मई को ही उनके पीसीसीएफ पदोन्नति आदेश जारी हो सकते हैं।

दूसरी ओर, अनिल साहू सबसे वरिष्ठ दावेदार माने जा रहे हैं, लेकिन वे 31 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसी वजह से प्रशासनिक स्तर पर यह सुझाव भी सामने आया है कि फिलहाल किसी अधिकारी को अस्थायी तौर पर वनबल प्रमुख का प्रभार दिया जाए और जुलाई के बाद नियमित नियुक्ति की जाए। इससे पहले डीजीपी के मामले में भी ऐसा प्रयोग किया जा चुका है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार वन विभाग की इस अहम नियुक्ति को लेकर क्या फैसला करती है।

चीप रेंज की शराब चाहिए...

सुशासन तिहार चल रहा है। सीएम और सरकार के मंत्री, जिलों का दौरा कर जनसमस्याओं के निराकरण के लिए पहल कर रहे हैं। सभी 33 जिलों का प्रशासन तिहार में जुटा हुआ है। इसी बीच सुशासन तिहार में कुछ मांगे ऐसी भी आई है कि जो चर्चा का विषय बन गया है। मसलन, पिथौरा में ग्रामीणों ने आबकारी अफसरों को बकायदा ज्ञापन सौंपकर चीप रेंज की गोवा ब्रांड की शराब उपलब्ध कराने की मांग की है।

यह कहा गया कि शराब दुकानों में महंगी विदेशी शराब ही उपलब्ध है। जबकि ग्रामीण इलाकों में सस्ती शराब पसंद की जाती है। दरअसल, सरकार ने कांच की बोतल में शराब बेचने का नियम बनाया है। इसके चलते देशी शराब की आपूर्ति कम हो रही है। देशी शराब निर्माताओं ने प्लास्टिक की बोतल में शराब के लिए 31 मई तक का समय मांगा है। सरकार ने सहमति दे दी है। प्लास्टिक की बोतल के लिए बाटलिंग प्लांट लगाए जा रहे हैं। एक जून से देशी शराब प्लास्टिक की बोतल में उपलब्ध हो सकेगी। तब ग्रामीणों की शिकायतों का निराकरण भी हो जाएगा।


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