राजपथ - जनपथ
एक जज और इतने काम
कहा जाता है कि व्यक्ति रिटायर्ड होता है टायर्ड नहीं। यह उक्ति सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना देसाई पर शत प्रतिशत सही साबित होती है। देसाई देश की अब तक की ऐसी एक मात्र रिटायर्ड जज होंगी जो एक साथ 4 अहम कार्य करेंगी। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष श्रीमती देसाई को पहले आठवें वेतन आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया।
आयोग ने काम करना शुरू कर दिया है। कर्मचारियों का पक्ष, मांग जानने आयोग राज्यों का दौरा कर रहा है। नए वेतनमान की रिपोर्ट अगले साल तक सौंपना है। इसके बाद विधिवेत्ता देसाई को छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछली कैबिनेट की बैठक में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने का फैसला किया। सरकार ने इसके लिए रंजना देसाई को यूसीसी एक्ट बनाने वाली कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया है।
फिर केंद्र सरकार ने दो दिन पहले ही देसाई को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का अध्यक्ष का प्रभार दिया। अब तक वह काउंसिल में सदस्य रही हैं। इसके बाद मप्र सरकार ने भी यूसीसी लागू करने का निर्णय लिया और रंजना देसाई को कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इससे पहले उत्तराखंड के लिए भी देसाई कमेटी ने ही यूसीसी नियम बनाए थे जो पिछले एक साल से लागू है। हालिया वर्षों में उत्तराखंड इसे लागू करने वाला देश का पहला राज्य भी है। इसके बाद गुजरात में भी इसी वर्ष से रंजना देसाई के बनाए यूसीसी नियम प्रभावशील हैं।
वैसे बता दें कि भारत में सबसे पहले गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से यूसीसी लागू हो चुका है, और वर्तमान में ये सभी भाजपा शासित राज्य हैं। देखना होगा आने वाले दिनों में हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक , तमिलनाडु जम्मू कश्मीर को छोड़ और कौन-कौन से राज्य यूसीसी की जिम्मेदारी रंजना देसाई को सौंपते हैं।
जब लकड़बग्घा फैमिली मेंबर होता था...
आज विश्व लकड़बग्घा दिवस है। धारीदार लकड़बग्घा जंगल का मुर्दाखोर सफाईकर्मी होता है। यह मौकापरस्त शिकारी भी है। इसका जबड़ा इतना मजबूत और ताकतवर होता है कि हड्डियों को भी चबा सकता है। यह मृत जानवरों के अवशेषों को साफ करके पर्यावरण को स्वच्छ रखता है और बीमारियों के फैलाव रोकता है। लेकिन दुर्भाग्य से, यह प्रजाति तेजी से लुप्त होने के संकट से जूझ रही है।
वरिष्ठ पत्रकार, वन्यजीव प्रेमी और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर प्राण चड्ढा ने सन् 1970 के पहले की, लकड़बग्घे से जुड़ी एक याद साझा की है। बिलासपुर के कंपनी गार्डन की लॉन में एक ग्रामीण दो नन्हे लकड़बग्घे के शावक बेचने लाया। वह उन्हें बाघ के बच्चे बताकर बेच रहा था। चड्ढा को लकड़बग्घे की पहचान थी। उन्होंने अपने एक मित्र श्रीप्रकाश त्रिपाठी के साथ मिलकर 600 रुपये में दोनों शावक खरीद लिए। एक शावक श्रीप्रकाश के पास रहा, जो शनिचरी बाजार के पास मटन मार्केट के करीब रहते थे, और दूसरा प्राण चड्ढा के पास। शावक सीपत क्षेत्र से लाए गए थे। दोनों तेजी से बड़े हुए। वे चमड़े, जूते या ब्लैड को चबाने के लिए मांगते। साफ-सुथरा रखने के लिए उन्हें साबुन से नहलाया जाता। उनकी पीठ पर लंबे फरदार बाल लहरों की तरह हिलते। रिक्शे में बैठाकर उन्हें घुमाने ले जाते। वे घूमने के बड़े शौकीन थे और कूदकर रिक्शे पर चढ़ जाते। रात में उनका स्वभाव थोड़ा उग्र हो जाता। प्राण चड्ढा का लकड़बग्घा करीब तीन साल जिया। श्रीप्रकाश का शावक कुछ समय बाद नहीं रहा, लेकिन एक और लकड़बग्घा शनिचरी बाजार के मछली व्यवसायी बशीर के दरवाजे पर कुछ साल और बंधा दिखता रहा। उस समय बिलासपुर के पास उसलापुर में, जहां आज नेचर सिटी और सागर परिसर कालोनी है, चड्ढा परिवार के खेत थे। एक रात ट्रैक्टर चलाते हुए उनके भाई सागर को हेडलाइट में लकड़बग्घा दिखा। पास आने पर वह ट्रैक्टर के चक्के के नीचे दब गया। सुबह जब परिवार उठा तो ट्रैक्टर के कल्टीवेटर पर मरा हुआ लकड़बग्घा पड़ा मिला।
ग्रामीण इलाकों के कम होने और बिगड़ते जंगलों में लकड़बग्घा का दिखना अब बहुत दुर्लभ हो गया है। छत्तीसगढ़ में भी कभी-कभी भिलाई, दुर्ग या अन्य क्षेत्रों में साइटिंग की खबरें आती हैं, लेकिन ये दुर्लभ घटनाएं ही हैं।
वैश्विक स्तर पर धारीदार लकड़बग्घा को लुप्तप्राय के करीब श्रेणी में रखा गया है। दुनिया भर में परिपक्व लकड़बग्घों की संख्या 10 हजार से भी कम है और यह संख्या लगातार घट रही है।
भारत में यह प्रजाति देश के अधिकांश हिस्सों में पाई जाती है, लेकिन उत्तर-पूर्व और दक्षिण के नम क्षेत्रों को छोडक़र। अनुमान के अनुसार भारत में इसकी संख्या एक हजार से तीन हजार के बीच हो सकती है, हालांकि सटीक गिनती मुश्किल है क्योंकि यह जंगलों के बाहर भी खेतों और झाड़ीदार इलाकों में रहता है। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची तीन में शामिल है। खाल, हड्डी या जीवित अवस्था में इसका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी प्रतिबंधित है।
छत्तीसगढ़ में तो स्थिति और चिंताजनक है। विकास, खेती-बाड़ी के विस्तार, सडक़ों और बस्तियों के कारण प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष, प्रत्यक्ष या जहर फंदे से शिकार और उसके शिकार के काम आने वाले जानवरों की कमी से इसकी संख्या तेजी से घट रही है।
लकड़बग्घा रात का जीव है, एकाकी और शर्मीला। इसकी वजह से लोग इसे कम समझते हैं और अक्सर गलतफहमी में इसे खतरनाक मान लेते हैं, जबकि प्राण चड्ढा जैसे अनुभवी वन्यजीव प्रेमियों की यह याद हमें बताती है कि उसे पाल कर भी रखा जा सकता है।
बांध से पानी छोडऩे में भी दिक्कत
महानदी पर गंगरेल बांध से रायपुर, धमतरी और आसपास के जिलों को पानी की आपूर्ति की जाती है। गर्मियों में तालाबों के निस्तारी के लिए भी नियमित रूप से पानी छोड़ा जाता है। इस बार भी पूर्व की तरह पानी छोड़ा गया, लेकिन अचानक प्रवाह कम कर दिया गया। बताते हैं कि नहर में डूबने की घटनाओं के कारण पानी का बहाव रोका या घटाया गया। पिछले दो महीनों में 4-5 बार ऐसी स्थिति सामने आ चुकी है। आमतौर पर इस तरह अचानक पानी कम किए जाने की घटनाएं कम ही होती हैं।
सिंचाई अफसरों का कहना है कि नहर में डूबने की स्थिति में शव की तलाश और बरामदगी के लिए पानी का प्रवाह कम करना जरूरी हो जाता है। यह कदम पुलिस के अनुरोध पर उठाया जाता है। हालांकि इससे कई व्यावहारिक दिक्कतें भी सामने आती हैं।
पानी की धार टूटने से शव की रिकवरी में मुश्किल होती है, वहीं तालाबों को भरने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। खासकर नहर के अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने में परेशानी बढ़ जाती है। इससे किसान परेशान हो रहे हैं। एक बार प्रवाह कम करने के बाद उसे फिर से सामान्य स्तर पर लाने में करीब 8 से 10 घंटे का समय लगता है।
यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें कोई बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं होता।


