राजपथ - जनपथ
जीएसटी और पहेली
जीएसटी की जटिलताएं कम नहीं रहतीं। किसी कंपनी या कारोबार को उसके लिए खरीदे गए मोबाइल फोन पर जीएसटी रिफंड मिलना चाहिए या नहीं, इसके नियम खासे जटिल हैं। अगर उस फोन का जरा भी इस्तेमाल किसी निजी काम से हो रहा है, तो फिर बाकी कारोबारी काम की वजह से जीएसटी रिफंड का दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा बहुत सारे सामानों के साथ है जिन्हें कारोबारी माना जाए, या निजी? कई लोग थोड़ा सा खतरा मोल लेकर रिफंड का दावा कर लेते हैं, और कोशिश करते हैं कि उनका दावा खप जाए।
अभी सोशल मीडिया पर लोगों ने जीएसटी को लेकर कुछ मजे लिए। एक सवाल रखा गया कि पनीर-बटर-मसाला पर कितना जीएसटी लगेगा? पनीर पर जीएसटी पांच फीसदी है, बटर पर बारह फीसदी, और मसाला पर फिर पांच फीसदी। तो पनीर-बटर-मसाला को किस दर्जे में गिना जाए? आप भी दिमाग लगाकर देखिए!
ऐसी गलती, गलती नहीं, गलत काम है
सरकारें विज्ञापन एजेंसियों को सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना का काम देती हैं, इसके बाद भी अगर कोई एजेंसी लापरवाही करती है, तो वह हैरानी की बात रहती है। खुद सरकार के अलग-अलग विभाग कई बार ऐसी चूक करते हैं, और पिछले कम से कम दस-बीस बरस से इंटरनेट रहने के बावजूद, उस पर चीजों को जांच-परख लेने की मुफ्त सहूलियत होने के बावजूद अगर बड़ी-बड़ी गलतियां सरकारी पोस्टर, कैलेंडर, और इश्तहारों में होती हैं, तो वे माफी के लायक नहीं रहतीं। ऐसा केन्द्र सरकार, और बहुत सी राज्य सरकारों के साथ होते आया है। ताजा मामला मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसके इस बरस के कैलेंडर में प्रदेश के हिरण बताते हुए जो तस्वीर छापी गई है, वे हिरण-चीतल न होकर अफ्रीका में पाए जाने वाले इम्पाला हैं, और यह तस्वीर इस कैलेंडर के बहुत पहले से दुनिया के वन्यजीवन पर्यटन में जगह-जगह छपती रही है। यूगांडा के क्वीन एलिजाबेथ नेशनल पार्क में पर्यटकों को आमंत्रित करने वाला इश्तहार इस तस्वीर को काफी अरसे से इंटरनेट पर दिखा रहा है, और ये इम्पाला वहीं के हैं।
सरकारें विज्ञापन एजेंसियों को, डिजाइनरों और सलाहकारों को खासा पैसा देती हैं, और इस तरह की गलतियां जो करें, उन पर सरकार को कुछ तो करना चाहिए। पहले भी केन्द्र और राज्य सरकारों की योजनाओं की सफलता की कहानियों में किसी दूसरे प्रदेश के लोगों की तस्वीरें आती रही हैं, या कई मामलों में तो किसी दूसरे देश के फ्लाईओवर जैसे ढांचे भी हिन्दुस्तान के बताकर छापे जाते रहे हैं। इससे परले दर्जे की लापरवाही साबित होती है, जिसका भुगतान उसी को करना चाहिए जिसे इस काम का भुगतान मिल रहा है।
होली पर डांस, और पुलिस
होली के मौके पर रायपुर पुलिस कमिश्नरेट क्षेत्र कुल मिलाकर शांत रहा। पुलिस ने किसी भी तरह के हुड़दंग या अव्यवस्था पर नजर रखने के लिए ड्रोन से निगरानी की व्यवस्था कर रखी थी। कहीं-कहीं छिटपुट घटनाएं सामने आईं, लेकिन उन पर भी तुरंत कार्रवाई कर दी गई।
इसी बीच शहर के एक पुराने और प्रतिष्ठित क्लब की होली पार्टी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में एक व्यापारी नेता शर्ट उतारकर डांस करते नजर आ रहे थे। वीडियो पुलिस तक पहुंचा तो मामला जांच का विषय बन गया।
पुलिस ने यह पड़ताल शुरू की कि संबंधित क्लब के पास आबकारी विभाग से बार लाइसेंस है या नहीं। आबकारी विभाग ने पुलिस को बताया कि क्लब को बार लाइसेंस जारी नहीं किया गया है। इसके बाद सोमवार को पुलिस टीम क्लब पहुंची और वहां काफी देर तक जांच-पड़ताल की। हालांकि जांच में कोई आपत्तिजनक बात सामने नहीं आई, इसलिए पुलिस टीम वापस लौट गई। लेकिन क्लब के पदाधिकारियों को सख्त हिदायत दी गई है कि आगे इस तरह की कोई घटना सामने आई तो क्लब को सील करने के साथ ही कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।
दिल्ली का नया सियासी रास्ता
अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में छत्तीसगढ़ की राजनीति का रास्ता भोपाल होकर दिल्ली जाता था। सत्ता का समीकरण भी ऐसा ही था कि भोपाल की सीढ़ी चढ़े बिना दिल्ली के दरवाजे तक पहुंचना आसान नहीं होता था। समय बदला, छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया और भोपाल का सियासी बैरियर अपने आप खत्म हो गया। उसके बाद छत्तीसगढ़ के नेता सीधे दिल्ली की उड़ान भरने लगे। लेकिन अब लगता है कि राजनीति के नए समीकरण में दिल्ली का रास्ता शायद पटना होकर गुजर सकता है।
चौंकिए मत, यह किसी विमान सेवा का नया रूट मैप नहीं है, बल्कि राजनीति के बदलते गणित की कहानी है। दरअसल कुछ महीने पहले तक छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रभारी रहे नितिन नबीन अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। वे बिहार से आते हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि दिल्ली के साथ-साथ पटना भी अब राजनीतिक समीकरणों का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाए। नितिन नबीन का छत्तीसगढ़ के लगभग हर नेता से सीधा संवाद और समीकरण रहा है।
इसी बीच छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा को बिहार में राज्यसभा चुनाव के लिए ऑब्जर्वर बनाया गया। सामान्य तौर पर ऐसी नियुक्तियां संगठनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं, लेकिन राजनीति में सामान्य शब्द अक्सर असामान्य संकेत भी दे जाता है। खास बात यह है कि बिहार के जिस राज्यसभा चुनाव की जिम्मेदारी विजय शर्मा को दी गई है, उसमें खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी उम्मीदवार हैं। ऐसे में इस हाई-प्रोफाइल चुनाव में उन्हें जिम्मेदारी मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है।
सवाल यह है कि इतने नेताओं के बीच से ऑब्जर्वर के रूप में विजय शर्मा ही क्यों? विजय शर्मा पहली बार विधायक बने और सीधे उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। छत्तीसगढ़ की राजनीति में उन्हें भाजपा के मुखर हिंदुत्व चेहरे के तौर पर भी देखा जाता है। अब जब बिहार के चुनावी मैदान में उन्हें जिम्मेदारी दी गई है, तो विश्लेषक यह जोड़-घटाव भी कर रहे हैं कि क्या यह महज चुनावी ड्यूटी है या फिर नई राष्ट्रीय टीम की संभावित झलक? क्योंकि राजनीति में कई बार पद से ज्यादा भूमिका मायने रखती है और कई बार कोई जिम्मेदारी बड़े रास्ते की शुरुआत बन जाती है।
कहते हैं दिल्ली की राजनीति में पहुंचने के कई रास्ते होते हैं। कोई सीधे राजधानी से जाता है, कोई संगठन के रास्ते और कभी-कभी कोई रास्ता पटना होकर भी गुजर जाता है। अब देखना यह है कि उपमुख्यमंत्री का यह बिहार प्रवास सिर्फ एक चुनावी जिम्मेदारी बनकर रह जाता है या आने वाले दिनों में किसी बड़ी राजनीतिक पटकथा का पहला दृश्य साबित होता है।
ट्रांसजेंडर्स के लिए वाश रूम
छत्तीसगढ़ का नया विधानसभा भवन देश के सबसे आधुनिक और सुविधा संपन्न विधानसभाओं में गिना जा रहा है। संभवत: यह देश का ऐसा अनूठा विधानसभा भवन है, जहां हर तरह की सुविधाओं और नियमों का ध्यान रखते हुए इसे उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा उतारने की कोशिश की गई है। यह एक ग्रीन बिल्डिंग है, जो सौर ऊर्जा से संचालित होती है और वर्षा जल संचयन प्रणाली से भी सुसज्जित है। करीब 51 एकड़ क्षेत्र में फैले इस विधानसभा भवन के निर्माण पर लगभग 300 करोड़ रुपये की लागत आई है। अभी भी कुछ कार्य बाकी हैं, जिनके लिए बजट का प्रावधान किया गया है।
यह भवन अन्य राज्यों की विधानसभाओं की तुलना में इसलिए भी अलग माना जा रहा है, क्योंकि यहां कई ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हैं जो अधिकांश जगहों पर नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर यहां पुरुषों, महिलाओं और दिव्यांगों के लिए अलग-अलग वाशरूम बनाए गए हैं। खास बात यह है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए भी अलग वाशरूम है। इससे पहले किसी विधानसभा भवन में ट्रांसजेंडरों के लिए ऐसी व्यवस्था सुनने में नहीं आई थी। सदन की कार्यवाही देखने आने वाले ट्रांसजेंडर दर्शकों को भी यहां सुविधा मिल सके, इसका विशेष ध्यान रखा गया है।
दिलचस्प बात यह भी है कि मंत्रालय और विभागाध्यक्ष भवनों में भी कई सुविधाएं ऐसी नहीं हैं, जैसी इस नए विधानसभा भवन में उपलब्ध हैं। इस भवन का निर्माण आने वाले लगभग सौ वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया गया है। हालांकि इतनी आधुनिक सुविधाओं के बावजूद कुछ लोग अब भी पुराने विधानसभा भवन को बेहतर मानते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि नए परिसर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक आना-जाना अपेक्षाकृत लंबा और थकाऊ हो जाता है। सत्र के दौरान यहां काफी चहल-पहल रहती है, लेकिन बाकी दिनों में परिसर अपेक्षाकृत शांत और सुनसान नजर आता है।
इस परिसर में आने वाले माननीय लोगों को यह जानकारी देना जरूरी है कि दुनिया में सेहत विशेषज्ञ कहते हैं कि हर किसी को हर दिन 10 हज़ार कदम पैदल चलना चाहिए। सत्र के दौरान इसकी आदत डालने का अच्छा मौका है। विधायकों के इलाज का खर्च भी इससे घट सकता है।


