राजपथ - जनपथ
बैज से खफा कई जिला अध्यक्ष
प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अधिकांश जिला अध्यक्षों में प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के प्रति नाराजगी बढ़ती दिख रही है। इसकी मुख्य वजह संगठनात्मक नियुक्तियों का क्रम माना जा रहा है।
दरअसल, प्रदेश नेतृत्व ने जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से पहले ही ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी थी। अब हालात यह हैं कि कई ब्लॉक अध्यक्ष स्वतंत्र तरीके से काम कर रहे हैं और जिला अध्यक्षों के निर्देशों को नजरअंदाज कर रहे हैं। इसका सीधा असर संगठन की सक्रियता और समन्वय पर पड़ रहा है।
बताते हैं कि हाल ही में हुई जिला अध्यक्षों की बैठक में एक अध्यक्ष ने खुले तौर पर ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर प्रदेश अध्यक्ष को आड़े हाथों लिया। इतना ही नहीं, रायपुर शहर जिला अध्यक्ष द्वारा तैयार की गई वार्ड अध्यक्षों की सूची को भी प्रदेश स्तर पर निरस्त कर दिया गया, जिससे असंतोष और गहरा गया है।
मौजूदा स्थिति में कई जिला अध्यक्ष सीधे तौर पर प्रदेश नेतृत्व को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। चूंकि प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्ति की ओर है, इसलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रभाव भी सीमित माना जा रहा है। दूसरी तरफ , चयन प्रक्रिया से गुजरकर आए नए जिला अध्यक्ष खुद को पहले से अधिक सशक्त महसूस कर रहे हैं।
कहा जा रहा है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो असंतुष्ट जिला अध्यक्ष प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ खुला मोर्चा भी खोल सकते हैं। पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों के चुनावी व्यस्तता खत्म होने के बाद प्रदेश कांग्रेस का यह आंतरिक विवाद खुलकर सामने आ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
ताकि नाम शर्मिंदगी की वजह न बने...
स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों पर भर्ती, बुनियादी सुविधाएं, शिक्षा के स्तर या गुणवत्ता में सुधार करना किसी भी राज्य की सरकार के लिए आसान नहीं है। इसलिये दूसरी तरफ ध्यान खींचने वाली घोषणाएं होती रहती हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प खबर राजस्थान से है। यहां सार्थक नाम अभियान मुहिम शुरू की गई है। उद्देश्य यह है कि बच्चों के ऐसे नाम बदल दिए जाएं, जो स्कूल या बाहर उनकी शर्मिंदगी, चिढ़ाने और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं। विभाग के मंत्री का कहना है कि रीति रिवाज, अंधविश्वास या अनजाने में माता-पिता कई बार बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं, जिसकी शर्मिंदगी बच्चों को जीवन भर भोगनी पड़ती है। इसलिए प्राइमरी स्कूल में उनका कोई अच्छा सा नाम बदलकर रख दिया जाए। विभाग ने ऐसे 3000 अच्छे नामों की सूची भी बनाई है। माता-पिता अपनी पसंद का नाम चुन सकते हैं।हां, यह काम दबाव में नहीं होना है, बल्कि स्वैच्छिक है। यह स्थिति छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों में है। लेकिन कुछ सवाल भी उठते हैं, जैसे बच्चे की गरिमा का असली आधार नाम नहीं, बल्कि स्कूल का माहौल, शिक्षक का व्यवहार और साथियों का सम्मान है। अगर स्कूल में शिक्षक ही बच्चे को उसके नाम से नहीं, बल्कि जाति-गांव-आर्थिक स्थिति से जोडक़र बुलाते हों, तो नाम बदलने से क्या फर्क पड़ेगा? बहुत से बच्चे कक्षा 5 तक पहुंचकर भी बुनियादी पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाते।
राजस्थान का जिक्र यहां इसलिये हो रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। वहां के शिक्षा मंत्री की एक दूसरी घोषणा भी है। उन्होंने कहा कि स्कूलों और विभाग के दफ्तरों में उन कर्मचारियों की पहचान करने के लिए एक अलग सूची तैयार की जाएगी, जो नशीले पदार्थों, गुटखा जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं या धूम्रपान में लिप्त होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को नशे की लत से उबरने में मदद करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि ये आदतें छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव न डालें। ऐसे अभियान की जरूरत तो छत्तीसगढ़ में भी है।
डीजीपी और सुप्रीम कोर्ट

देश में कार्यवाहक डीजीपी की परंपरा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च को अहम निर्देश जारी किए थे। यह निर्देश पुलिस सुधार से जुड़े प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार (2006) के तहत दिए गए, जिनका उद्देश्य पुलिस नेतृत्व में पारदर्शिता और स्थिरता सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने राज्यों और यूपीएससी को दो सप्ताह के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। हालांकि एक माह बीतने के बाद भी छत्तीसगढ़ समेत दर्जन भर राज्यों में इसका पालन नहीं हो सका है। तेलंगाना, बिहार, पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भी स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। तमिलनाडु में जरूर चुनाव आयोग ने चुनावी दृष्टिकोण से अस्थायी नियुक्ति की है, लेकिन अन्य राज्यों में अब भी अनिश्चितता कायम है।
छत्तीसगढ़ में लंबी प्रक्रिया और कई स्तर की आपत्तियों के बाद दो नामों को शॉर्टलिस्ट किया हैं उनमें कार्यवाहक डीजीपी अरुण देव गौतम और डीजी (जेल) हिमांशु गुप्ता हैं। पंजाब ने अपने कार्यवाहक डीजीपी गौरव यादव सहित डीजी और एडीजी स्तर के कुल 14 आईपीएस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेज दिए हैं।
हल्ला है कि प्रदेश में एक प्रभावशाली मंत्री की अलग पसंद भी इस नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है, जबकि सरकार फिलहाल मौजूदा व्यवस्था में बदलाव के पक्ष में नहीं दिख रही है। संकेत हैं कि नियमित डीजीपी की नियुक्ति अब 4 मई को पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद ही संभव हो पाएगी।
फिलहाल केंद्र और राज्य दोनों ही चुनावी व्यस्तताओं में उलझे हुए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद डीजीपी नियुक्ति को लेकर स्थिति ‘ढाक के तीन पात’ जैसी बनी हुई है।


