राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : फ्री बीज़ पर बेअसर अदालतों की फटकार
12-Apr-2026 6:13 PM
राजपथ-जनपथ : फ्री बीज़ पर बेअसर अदालतों की फटकार

फ्री बीज़ पर बेअसर अदालतों की फटकार

 जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, महिलाओं और युवाओं के लिए जिस तरह नगद हस्तांतरण या एकमुश्त आर्थिक मदद की बड़ी-बड़ी घोषणा की जा रही है, उससे लगता है कि छत्तीसगढ़ इन सबसे पीछे रह गया है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने सामान्य श्रेणी की महिलाओं के लिए हर माह 1500 रुपये और एससी एसटी वर्ग की महिलाओं को 1700 रुपये देने का ऐलान किया है। बंगालर युवा साथी योजना के तहत 21 से 40 साल के युवाओं को 1500 रुपये देने की घोषणा की गई है। भाजपा, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह पश्चिम बंगाल में टीएमसी को कड़ी टक्कर दे रही है, हर वयस्क महिला तथा बेरोजगार युवाओं के खाते में हर माह 3000 रुपये देने की घोषणा कर दी है। कांग्रेस ने भी 2000 रुपये देने की घोषणा कर रखी है।

तमिलनाडु में डीएमके ने महिलाओं को दी जा रही मौजूदा राशि 1000 रुपये को बढ़ाकर 2000 रुपये करने की घोषणा की है। एक इल्लाथरासी कूपन जारी किया जा रहा है। इससे गृहणियां 8000 रुपये के घरेलू उपकरण खरीद सकती हैं। चुनाव से पहले यहां 1.31 करोड़ महिलाओं के खाते में 5000 रुपये ट्रांसफर किए गए हैं। यह रकम तीन महीने का एडवांस है और 2000 रुपये का विशेष पैकेज है। बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू-भाजपा गठबंधन के लिए इसी तरह का एकमुश्त ट्रांसफर ट्रंप कार्ड बना था।

असम में महिलाओं को अरुनोदोई योजना 1250 रुपये की मदद पहुंचाती है। इसे एनडीए ने सत्ता में लौटने पर 3000 रुपये करने की घोषणा की है। महिला उद्यमिता योजना के तहत प्रत्येक महिला के लिए एक बड़ी रकम 72 हजार 500 रुपये देने का ऐलान किया गया है। कांग्रेस ने भी मासिक नगद के अलावा व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रत्येक महिला को 50 हजार रुपये देने का ऐलान किया है। एक अलग गारंटी में 25 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा शामिल है।

केरल में दोनों प्रमुख गठबंधन बराबरी पर हैं। एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ने 60 लाख से अधिक सामाजिक सुरक्षा पेंशन धारियों को 2000 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करने का ऐलान किया है। एनडीए ने यहां 70 प्लस के वरिष्ठ नागरिकों को हर माह 3000 रुपये देने का ऐलान किया है। महिलाओं को 2500 रुपये प्रतिमाह और हर साल दो फ्री एलपीजी सिलेंडर भी दिए जाएंगे। फ्री-फ्री की घोषणा चुनाव से पहले थमने का नाम नहीं ले रही है, जिनकी सरकार है वह आचार संहिता लगने के ठीक पहले मोटी रकम मतदाताओं के खाते में डाल रही हैं।

इधर, मुंबई हाईकोर्ट ने दो दिन पहले महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई। कहा कि यदि वह अपने कर्मचारियों को पेंशन नहीं दे सकती, तो माझी लडक़ी बहन स्कीम को रोक देना चाहिए। बीएमसी की एक रिटायर्ड महिला कर्मचारी की याचिका पर कोर्ट सुनवाई कर रही थी, जिसे 7वें पे कमीशन के हिसाब से पेंशन का भुगतान नहीं किया जा रहा है। सरकार ने वित्तीय स्थिति का हवाला दिया तो कोर्ट ने कहा- सरकार का पहला दायित्व अपने कर्मचारियों को उनके हक की राशि देना है। महाराष्ट्र में नगद हस्तांतरण का बजट 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है।

वैसे, छत्तीसगढ़ में भी आकार व बजट के हिसाब से राशि कम नहीं है। यहां इस योजना में 8200 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद कि केवाईसी के बाद सैकड़ों नाम काटे गए और दूसरी पेंशन योजनाओं का लाभ लेने वालों को कम भुगतान किया जा रहा है या नहीं किया जा रहा है।

केंद्रीय बजट के दौरान पेश किए जाने वाले आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्यों द्वारा फ्रीबीज और नकद हस्तांतरण पर कुल खर्च 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच रहा है। राज्यों का मिला-जुला राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.2 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और कर्ज 28 प्रतिशत के करीब। ऐसी योजनाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि पैसे कहां से जुटाएंगे, पता नहीं होता। इसका असर विकास की योजनाओं पर तो पड़ता ही है, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं पर भी दिखता है।

सुप्रीम कोर्ट में भी फ्री बीज़ को लेकर सुनवाई हो ही रही है। फरवरी 2026 में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि भारी राजस्व घाटे के बावजूद राज्य अपीलमेंट पॉलिसी चला रहे हैं। क्या राज्य रोजगार सृजन, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्कूल हॉस्पिटल बनाने के बजाय मुफ्त राशन, नगद, मुफ्त बिजली बांटने में लगे रहेंगे? कोर्ट ने राज्यों से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने पूछा है कि विकास के लिए पैसा कहां से आएगा, केवल जरूरतमंदों के लिए स्कीम क्यों नहीं चलाई जाती? राज्यों का जवाब आना बाकी है। राज्यों की वित्तीय स्थिति चरमरा रही है, बड़ी-बड़ी अदालतें इस पर चिंता जताकर फटकार लगा रही है, मगर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों को और कोई जरिया दिखाई नहीं दे रहा है।

आरटीआई के बाद अब क्यूआर कोड

सरकार ने गांवों में विकास कार्यों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए पंचायत स्तर पर क्यूआर कोड लगाने की पहल की है। इन क्यूआर कोड को स्कैन कर मनरेगा के पिछले पांच वर्षों में हुए कार्यों की पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। बीते छह महीनों में करीब पांच लाख लोगों ने इन क्यूआर कोड का उपयोग कर अपनी पंचायतों में हुए कार्यों की जानकारी ली है।

क्यूआर कोड लागू होने के बाद विकास कार्यों को लेकर शिकायतों में उल्लेखनीय कमी आई है। पहले आरटीई के तहत पंचायतों में सबसे अधिक जानकारी विकास कार्यों को लेकर मांगी जाती थी, लेकिन अब इसमें गिरावट देखी जा रही है। इस पहल की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना भी हो रही है।

हालांकि, इस व्यवस्था के बाद कुछ नए विवाद भी सामने आए हैं। कई पंचायतों में एक ही कार्य को मनरेगा और अन्य योजनाओं के तहत दिखाए जाने के मामले उजागर हुए हैं, जिससे अनियमितताओं की आशंका बढ़ी है। जनपद स्तर पर अब पूर्व सरपंचों के खिलाफ शिकायतें सामने आ रही हैं। गड़े मुर्दे उखड़ रहे हैं। दर्जनों पंचायतों में मनरेगा कार्यों में अनियमितता की शिकायतों पर कार्रवाई की मांग हुई है।

इसी बीच डीएमएफ के कार्यों की जानकारी के लिए भी क्यूआर कोड लगाने की मांग उठने लगी है। पिछली सरकार के दौरान डीएमएफ मद में खर्च को लेकर गड़बडिय़ों के आरोप लगे थे, जिसकी जांच केंद्र और राज्य स्तर की एजेंसियां कर रही हैं। अब देखना है कि आगे इस दिशा में क्या कदम उठाए जाते हैं।

फ्लाइओवर का विरोध ही विरोध

राजधानी रायपुर में तात्यापारा से शारदा चौक तक प्रस्तावित फ्लाईओवर योजना का विरोध तेज होता जा रहा है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और रायपुर के चारों विधायक पहले ही इस योजना के खिलाफ हैं, अब नगर निगम के पार्षद भी मुखर हो गए हैं।

चर्चा है कि भाजपा के करीब 40 पार्षदों ने फ्लाईओवर के बजाय सडक़ चौड़ीकरण के पुराने प्रस्ताव को लागू करने का सुझाव दिया है। इस सिलसिले उन्होंने मेयर मीनल चौबे से चर्चा की मांग भी की है।

इस मार्ग पर फ्लाईओवर बनाने की घोषणा आम बजट में की गई थी, जिसके लिए 10 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था। पार्टी के भीतर ही विरोध के चलते अब इस योजना के क्रियान्वयन पर संशय की स्थिति है।

इस परियोजना की लागत पिछले 16 वर्षों में चार गुना तक बढ़ चुकी है। वर्ष 2008 के आसपास मुआवजा और चौड़ीकरण के लिए लगभग 40 करोड़ रुपए का अनुमान था, जो पिछले वर्ष बढक़र 137 करोड़ रुपए हो गया। वर्तमान में गाइडलाइन रेट बढऩे के कारण चौड़ीकरण या फ्लाईओवर, दोनों ही विकल्पों पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

चर्चा है कि फ्लाईओवर के निर्णय में बदलाव की संभावना भी जताई जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इसी मार्ग पर आगे स्काईवॉक का निर्माण जारी है। ऐसे में फ्लाईओवर बनने पर यातायात व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। अब अंतिम निर्णय क्या होता है, इस पर नजर बनी हुई है।

ऐसा एक सरकारी स्कूल

सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर बनी नकारात्मक धारणाओं के बीच बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड स्थित एक शासकीय हाई स्कूल का अनुभव अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। यहां प्राचार्य के नेतृत्व में शिक्षकों के सामूहिक प्रयास ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद नवाचार और समर्पण से शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है। विद्यालय में प्रवेश द्वार से लेकर कक्षाओं, प्रयोगशालाओं और अन्य कमरों तक दीवारों को शिक्षण सामग्री के रूप में उपयोग किया गया है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति, तीज-त्योहार, व्यंजन, खेल, लोककला और दर्शनीय स्थलों से जुड़े चित्र और जानकारी इस तरह प्रदर्शित हैं कि विद्यार्थी निरंतर उनसे सीखते रहें। विज्ञान प्रयोगशालाओं में प्रमुख वैज्ञानिकों के चित्र और उनके योगदान को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, वहीं पर्यावरण जैसे विषयों को रोचक तरीके से समझाने के लिए सांप-सीढ़ी जैसे माध्यम अपनाए गए हैं।


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