राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : हरियाणा और छत्तीसगढ़
06-Sep-2024 5:35 PM
राजपथ-जनपथ : हरियाणा और छत्तीसगढ़

हरियाणा और छत्तीसगढ़

हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस में प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया चल रही है। इनमें पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव अहम भूमिका निभा रहे हैं। हाईकमान ने उन्हें एक उच्च स्तरीय उपसमिति का सदस्य बनाया है। यह समिति, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस की छानबीन समिति की अनुशंसाओं का परीक्षण कर सभी सीटों के लिए एक नाम का पैनल तैयार करने की जुगत में लगी है।

उपसमिति के मुखिया पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महामंत्री केसी वेणुगोपाल हैं। सिंहदेव की हरियाणा कांग्रेस के दिग्गज भूपिंदर सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा, और अन्य नेताओं से मधुर संबंध हैं। सिंहदेव की बहन, और हिमाचल सरकार की पूर्व मंत्री आशा कुमारी हरियाणा की प्रभारी रही हैं।

दूसरी तरफ, टिकट को लेकर हरियाणा कांग्रेस के दिग्गजों में ठनी हुई है। इन सबके साथ समन्वय बनाकर सभी सीटों के लिए वेणुगोपाल, और सिंहदेव व अजय माकन गुरुवार सुबह से माथापच्ची कर रहे हैं। आज भी बैठकों का दौर जारी है। बताते हैं कि हुड्डा और सैलजा व अन्य नेताओं से सिंहदेव सीधे चर्चा कर रहे हैं। शनिवार को केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक है। इससे पहले हरियाणवी दिग्गजों के बीच एक राय बनाने की कोशिश हो रही है। अब इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह तो एक-दो दिनों में स्पष्ट हो पाएगा।

कार्यकर्ता रह गए कद्दावर नेता

राजनीति में दशकों खपाने वाले नेता भी कई बार जनता के मिजाज को पहचानने में चूक कर जाते हैं। भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक नंदकुमार साय ने 30 अप्रैल 2023 को भाजपा से इस्तीफा दिया था और अगले दिन वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस सरकार ने उन्हें तुरंत राज्य औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाकर राज्य मंत्री का दर्जा भी दे दिया। लैलूंगा, कुनकुरी और पत्थलगांव में से किसी एक सीट से वे कांग्रेस की टिकट पर  विधानसभा चुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन उनकी दावेदारी चयन समिति ने खारिज कर दी। उसी वक्त तय हो गया कि कांग्रेस में साय के लिए जगह नहीं है। कांग्रेस की भारी पराजय से रही-सही कसर पूरी हो गई। चुनाव परिणाम के 15 दिन बाद ही उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद वापस भाजपा में लौटने का सही मौका देख रहे थे। भाजपा का सदस्यता अभियान शुरू होते ही उन्होंने पार्टी में वापसी कर ली। मिस्ड कॉल सिस्टम ऐसा है जिसमें किसी के सामने उन्हें जाने की जरूरत नहीं पड़ी। चूंकि उन्होंने खुद ही पार्टी छोड़ी थी, पार्टी ने उनके खिलाफ निलंबन या निष्कासन जैसी कोई कार्रवाई नहीं की थी इसलिये तकनीकी रूप से उनकी सदस्यता लेने में कोई बाधा ही नहीं थी। अब प्रदेश और पार्टी में उन्हें बहुत कुछ बदला-बदला सा लग रहा होगा। डॉ. रमन सिंह, जिनके खिलाफ वे पार्टी में रहते हुए भी आरोप लगा चुके थे, कि मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया- अब वे भी सत्ता के केंद्र में नहीं है। साय चाहते थे कि प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री हो, खुद को इसका विकल्प के तौर पर पेश भी करते थे। आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग तो पूरी कर दी गई है, भले ही मौका उनको नहीं मिला। कांग्रेस में जाने के बाद वे उसे फायदा नहीं पहुंचा पाए, भाजपा को भी नुकसान नहीं हुआ। कभी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे, पर आज वे उसी पार्टी में कार्यकर्ता के रूप में फिर सफर शुरू करेंगे, जिसे खड़ा करने में कभी पसीना बहाया था।

गुटखा खाने का पाठ पढ़ाते गुरुजी

छत्तीसगढ़ के स्कूलों की दुर्दशा इस कदर बढ़ चुकी है कि अब यहां की शर्मनाक घटनाएं सुर्खियों में भी जगह नहीं बना पातीं। शिक्षकों की हरकत आने वाली पीढिय़ों को गर्त में धकेल रही हैं। यह तस्वीर मस्तूरी की है, जहां एक शिक्षक ने स्कूल के पास की दुकान से गुटखा मंगवाने के लिए बच्चों को भेज दिया। हाल ही में प्रदेश का एक और मामला सामने आया था, जिसमें छात्राओं ने खुलासा किया कि उनका शिक्षक गुटखा चबाते हुए स्कूल आता है, जिसकी बदबू से उनको कमरे में बैठने में तकलीफ होती है। मस्तूरी की यह तस्वीर बता रही है कि राज्य के कई स्कूलों में शिक्षक बच्चों को संस्कार नहीं दे रहे, बल्कि बिगाडऩे का काम कर रहे हैं।

हाल ही में स्कूल शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किया  था कि स्कूलों के 100 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार की पान-तम्बाकू की दुकान नहीं होनी चाहिए। यह हर साल जारी होने वाला औपचारिक निर्देश है। जमीन पर इन आदेशों का पालन कहीं नजर नहीं आता। इसी मस्तूरी में कुछ महीने पहले एक और शर्मनाक घटना हुई थी जब एक शिक्षक स्कूल के स्टाफ रूम में बैठकर शराब के पैग चढ़ा रहा था। वह वीडियो वायरल हुआ और उसे नौकरी से बाहर भी कर दिया गया, पर ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के नाम पर कुछ नहीं हो रहा है। सवाल है कि इन शिक्षकों का गुटखा और शराब प्रेम इन बच्चों को कैसा भविष्य देगा?

अब बढ़ेगा शिक्षक भर्ती का दबाव

बीएड अभ्यर्थियों को सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिलने की खुशी ज्यादा दिन टिक नहीं पाई। सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी। अब लगभग 3000 बीएड डिग्रीधारकों की नौकरी खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन होने पर इनकी नियुक्तियां रद्द होंगी और उनकी जगह डीएड अभ्यर्थियों को नियुक्त किया जाएगा। बीएड अभ्यर्थियों ने चयन परीक्षा पास की है, और स्कूलों में हज़ारों शिक्षक पद ख़ाली भी हैं, फिर भी ये फिर बेरोजगार होने जा रहे हैं।

भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में 57,000 शिक्षकों की भर्ती का वादा किया था। विधानसभा के पहले सत्र में तत्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने 33,000 रिक्त पदों पर भर्ती के विज्ञापन निकालने की घोषणा भी की थी। अब बीएड अभ्यर्थियों की मांग है कि उन्हें पात्रता वाले खाली पदों पर समायोजित किया जाए। लेकिन 3000 शिक्षकों का समायोजन कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। लाखों बीएड और डीएड डिग्रीधारी चुनावी वादों और विधानसभा में की गई घोषणाओं पर अमल के लिए दबाव बना रहे हैं। यह दबाव अब प्रदर्शन के रूप में जिला मुख्यालयों में दिखाई देने लगा है। 15 सितंबर तक का अल्टीमेटम दिया गया है। इसके बाद 21 सितंबर से रायपुर में धरना प्रदर्शन की योजना बनाई गई है।

स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधरे, इसके लिए शिक्षक भर्ती अनिवार्य है। बच्चे तक जिला मुख्यालयों में जाकर शिक्षकों की मांग कर रहे हैं। राजनांदगांव में तो ऐसे बच्चों को जेल भेजने की धमकी तक दी गई। भाजपा ने अपनी हर चुनावी घोषणा को मोदी की गारंटी के हैशटैग के साथ पेश किया था, लेकिन अब सारा मामला वित्तीय प्रबंधन में अटका हुआ है। हाल ही में वित्त मंत्री ओपी चौधरी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे वैकेंसी नहीं निकाल पाने की विवशता जताते नजर आ रहे हैं।


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