रायगढ़
स्थानीय अवकाश मिलने से लोगों में उत्साह
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायगढ़, 27 अगस्त। किसान मजदूरों का खास एकता व भाई बंधुत्व का प्रतीक नुआखाई त्यौहार गणेश चतुर्थी के बाद शुक्ल पक्ष पंचमी यानी ऋषि पंचमी तिथि पर पश्चिम ओडिशा सहित छत्तीसगढ़ के ओडिशा बोर्डर से लगे जिलों में जहां बहुतायत उत्कल संस्कृति को मानने वाले हैं, उनका यह खास त्यौहार नुआखाई 28 अगस्त को मनाया जा रहा है।
ओडिशा में इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहती है। इस बार छत्तीसगढ़ सरकार ने भी छत्तीसगढ़ के अनेक जिलों में स्थानीय अवकाश घोषित कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान कृषि उत्पादन के प्रथम अन्न जो पककर तैयार हो जाता है, उसी नए अन्न का भोग अपने ईस्ट देवी, देवताओं को लगाया जाता है। संबलपुर में मां समलाई को यह भोग लगाया जाता है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में अपने अपने गांव के ग्राम देवताओं, देवालय तथा अपने घरों में माता लक्ष्मी को यह भोग लगाने के बाद लोग नवान्न ग्रहण करते हैं। नुआखाई का खास महत्व यह है कि इस दिन अलग अलग रह रहे परिवार, कुटुंबी जन एक घर जो कुटुंब का मुखिया होता है के निवास पर यह आयोजन करते हैं और सहभोज में शामिल होते हैं।
बाहर नौकरी अथवा रोजगार के लिए दूसरे स्थानों पर बसने वाले लोग भी अपने घर परिवार में आते हैं। उन्हें भी हफ्ते भर पहले ही सूचित कर दिया जाता है। प्राय: सभी गांवों में एक निश्चित तिथि और दिवस पर नवान्न भक्षण करनें की परंपरा है। ओडिशा में ऋषि पंचमी को नुआखाई त्यौहार सुनिश्चित है। पहले छत्तीसगढ़ के ओडिशा संस्कृति बाहुल्य गांवों में गांव के मुखिया और सयाने लोगों के साथ मिलकर अपने पंडित जी से शुभ दिवस तय किया जाता था और मुनादी कराई जाती थी लेकिन अब ऋषि पंचमी को ही मनाए जाने का निर्णय सभी ग्रामीणों ने लिया। इसकी मुनादी भी हफ्ते भर पहले कर दी जाती है ताकि लोग तैयारी कर सकें और इष्ट मित्रों को सूचित कर सकें। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने भी ओडिय़ा बाहुल्य सभी जिलों में ऋषि पंचमी के दिन स्थानीय अवकाश घोषित किया है।
नुआखाई त्यौहार पर बैगा घर घर जाकर नया धान देता है बदले में उसे अडि़हा और पियाई दी जाती है। अडि़हा का मतलब होता है, थाली में चावल, दाल और सब्जी नमक (बिना पका) और नगद राशि दी जाती है। ग्राम पुरोहित , रिश्तेदारों पुजारी तथा अपने काम करने वाले लोगों को भी अडि़हा दी जाती है।घरों की लिपाई पुताई कर के प्रात: काल में महिलाएं नहा धोकर रसोई और पूजा की व्यवस्था करते हैं।
नवान्न तैयार होने के बाद घर में लक्ष्मी जी की पूजा कर नवान्न की भोग लगाई जाती है। बैगा गांव के देवालय में पूजा अर्चना कर भोग लगा कर गांव और देश की खुशीहाली के लिए अच्छी फसल की कामना करता है। वही किसान अपने खेतों में जाकर खड़ी लहलहाती धान के फसल की पूजा करता है। इसे गौरस रूकाई कहते हैं।
गांव के मंदिर में पुजारी नवान्न भोग लगाता है। सभी सदस्य नवीन वस्त्र पहने घर पर एक साथ बैठ कर पहले नवान्न फिर भोजन ग्रहण करते हैं। प्राय: अनेक घरों में घर का बुजुर्ग सभी को नवान्न वितरित करता है। इस अवसर पर अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। भुजिया सब्जी , मखना पत्ते की सब्जी ,अरबी की सब्जी के साथ साथ कोलता समाज के लोगों में लेथा बनाए जाने की परंपरा है। नवान्न भक्षण के बाद सभी एक जगह इक_े होते हैं, पहले ग्राम देवता का दर्शन करने के बाद अपने से रिश्ते में बड़े सभी लोगों को पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। यह परम्परा नुआखाई के दिन देखते ही बनती है। नुआ खाई ऐसी त्यौहार है जिससे वर्षों पुराने गिले शिकवे मिट जाते हैं। परिवार में एकत्व की भावना जगती है। गांव में एक दूसरे से भेंट मुलाकात नुआखाई जुहार के साथ होती है।


