आजकल
उत्तरप्रदेश में अभी एक पुलिस सबइंस्पेक्टर चन्द्रदीप निषाद के प्रयागराज स्थित मकान पर गंगा का पानी दरवाजे तक पहुंचा, तो इस अफसर ने वर्दी में पानी पर फूल छिडक़कर, दूध चढ़ाकर पूजा-अर्चना की। गंगा का उत्तर भारत से परे भी बहुत महत्व है, और इस अफसर का खुद का बनवाया हुआ यह वीडियो चारों तरफ फैल रहा है। मानो यह काफी नहीं था, तो दरोगाजी के घर में पानी जब सीने तक भर गया, तो वे अगले वीडियो में गंगामैया का अहसान मानते दिख रहे हैं कि वे चलकर उनके घर तक आई हैं, और इसके बाद वे डुबकी लगा-लगाकर प्रार्थना करते दिखते हैं। यह वीडियो कुछ आगे बढ़ता है तो वे घर के बाहर निकलकर पूरे मोहल्ले या इलाके में तैराकी करते भी दिखते हैं। जाहिर है कि जब पानी घर के भीतर छाती तक भर गया था, तो बाहर तो इससे ऊंचा ही रहा होगा, और तैराकी में मजा आ रहा होगा। जहां तक नाले-नाली की गंदगी की बात है, तो वह आस्था के फिल्टर प्लांट से दूर हो जाती है।
लेकिन प्रयागराज और गंगा से परे भी देश में आज जगह-जगह कई प्रदेशों के सैकड़ों शहरों में पानी इसी तरह भरा हुआ दिख रहा है, और हर जगह न तो गंगा है, और न ही लोग घर के भीतर चार-पांच फीट भर चुके पानी की बर्बादी को झेलने की हालत में हैं। कोई सरकारी अधिकारी ही ऐसे हो सकते हैं जो घर के हर सामान को डुबा चुकी गंगा का इस तरह आनंद ले रहे हों। अभी जब दिल्ली के दिल, कनॉटप्लेस की सडक़ों पर नदी की तरह लहरें दिख रही थीं, तो वह वीडियो देखकर मुझ जैसे दूर बैठे व्यक्ति को यही लग रहा था कि शटर के नीचे से घुस चुके पानी से बर्बादी कितनी होती होगी, और क्या उसकी कोई भरपाई हो सकेगी? गुजरात के सूरत जैसे शहर में इसी तरह पानी भरने से जो बर्बादी हुई वह भी लोगों ने अभी देखी है, और वह किसी नदी की बाढ़ से नहीं आई थी, वह कम समय में अधिक बारिश होने से शहर में भरा हुआ पानी था।
अब यहां एक दिलचस्प बात सूझती है कि लोग नदियों के किनारे अवैध कब्जे, अवैध निर्माण करते चल रहे हैं, लोगों की बसाहट नदियों के किनारों पर कब्जे कर रही हैं, नदियों के किनारे के जंगलों पर इंसान काबिज हो चुके हैं। यह कुछ उसी किस्म का है जिस तरह जंगलों में इंसान घुसते चले जा रहे हैं, और जंगली-जानवर मानो मजबूरी में गांव-कस्बे, और शहरों तक आ रहे हैं। इसी तरह इंसान तालाबों को पाट रहा है, जमीन के नीचे का पूरा पानी खींच ले रहा है, नालों को कचरे से भर रहा है, नदियों के किनारों पर कब्जा कर रहा है, नदियों के किनारे के जंगलों को काट रहा है जिससे नदियों में गाद भर रही है, और उनकी जलभराव क्षमता कम हो रही है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि जंगलों में जानवरों के गुजारे की क्षमता कम हो रही है। क्या यह सोचकर देखना ठीक नहीं होगा कि इंसान जंगलों पर कब्जा कर रहा है, तो जंगली-जानवर बसाहट में आ रहे हैं, खेत और झोपड़े तबाह कर रहे हैं, ठीक इसी तरह इंसान जलस्रोतों पर कब्जा कर रहा है, तो जल इंसान के शहरों में भरकर बदला चुका रहा है!
इसके पीछे के जटिल विज्ञान का मैं यहां अतिसरलीकरण करना नहीं चाहता, लेकिन यह सब कुदरत का हिसाब चुकता करने का अपना एक तरीका और मिजाज है। इंसान ने अपनी नाजायज हरकतों से प्रकृति को इतना नुकसान पहुंचाया है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है, और उसकी वजह से मौसम की सबसे बुरी और सबसे कड़ी मार अब हो रही है बार-बार, और इस बेकाबू मार से कुदरत बिना कुछ कहे हिसाब को ब्याज सहित चुकता कर रही है। अब यह सोचने की जरूरत है कि शहर आसमान की तरफ ऊपर बढ़ रहे हैं, एक-एक फीट पर पहले के मुकाबले अब अधिक इंसानों की बसाहट हो रही है, जिनका पैदा किया हुआ कचरा पहले के मुकाबले अब प्रति वर्ग किलोमीटर पर बहुत अधिक पैदा हो रहा है, जमीन की पानी सोखने की क्षमता कांक्रीट से सील कर दी जा रही है। ऐसे में पुराने बने हुए नाले-नालियों की क्षमता अब बढ़े हुए कचरे से पट जा रही है, और जमीन से तेजी से निकालकर खपत किए गए पानी को बाहर ले जाने की क्षमता भी जमीन की रह नहीं गई है। फिर बड़ा खतरा यह है कि ये दोनों-तीनों चीजें खूनी रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं। शहरों में प्रति वर्ग किलोमीटर आबादी अब कई गुना बढऩे जा रही है, इमारतों में जुड़तीं हर मंजिल आबादी को दुगुना कर देती है। इंसानों के अनुपात में पानी की खपत, और निकासी, और कचरे की पैदाइश दोनों ही बढ़ते चलते हैं। शहरों में इनके लिए कोई क्षमता नहीं रह गई है। म्युनिसिपलों जैसी स्थानीय संस्थाएं गले-गले तक भ्रष्टाचार और निकम्मेपन में डूबी रहती हैं, और वे सत्तारूढ़ नेताओं की मनमानी और उनके शक्ति-प्रदर्शन का औजार अधिक रहती हैं। ऐसे में शहरों का नियोजित विकास शहरी विकास योजना का एक शब्द भर रह गया है।
अगर लोगों की आस्था किसी नदी के पानी के साथ नाली-नाले सबका पानी घर के भीतर छाती तक भर जाने पर भी, सारा सामान बर्बाद हो जाने पर भी कायम है, तो ऐसे लोगों को ऐसी शहरी बाढ़ का कोई भी नुकसान नहीं। अकेले इंसानों के बस में तो बस आस्था को इस तरह मजबूत बनाना ही है, बाकी तो शहरी विकास किसी नागरिक के बस का काम नहीं है, बल्कि राज्य सरकार और स्थानीय शासन के बुलंद इरादों और हौसलों से ही उसे किया जा सकता है, जो कि आसान बात नहीं है। इसके लिए शहरी विकास और नियोजन के विशेषज्ञों की सुनना पड़ेगा, और अपने देश में अनसुने रहने के बाद वे दूसरे देशों में जाकर वहां कामयाबी, और अपने हुनर पर अमल देख पाते हैं। इस देश के औसत शहरों का हाल लगातार और बुरा होना है, जलवायु परिवर्तन का हाल और बुरा होना है। इस बार देश की राजधानी दिल्ली के सरहदी इलाके में गुरूग्राम जैसे बड़े कारोबारी शहर में लोगों की करोड़ों की गाडिय़ां जिस तरह पानी में डूब गई हैं, उससे भी लोगों की आंखें खुलनी चाहिए। सत्ता की आंखें झोपड़ों के डूबने से तो कभी नहीं खुलतीं, लेकिन बड़ी-बड़ी विदेशी कारों के डूबने से उसे फिक्र हो सकती है। देश में शासन, और स्थानीय शासन-प्रशासन का जो मौजूदा हाल है, उस पर जब जलवायु परिवर्तन की मार आसमानी बिजली की तरह थोक में पड़ेगी, तो उससे बचाव का कोई रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि जो भी पानी घर में घुस रहा है, उसकी आस्थापूर्वक आराधना की जाए।


