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उस दिन भारत को खुद कुछ सीखने दूसरे ग्रहों की तरफ ही देखना होगा..
सुनील कुमार ने लिखा है
05-Oct-2025 3:28 PM
उस दिन भारत को खुद कुछ सीखने दूसरे ग्रहों की तरफ ही देखना होगा..

भारत के बहुत से राष्ट्रवादी नेता समय-समय पर इस देश के विश्वगुरू बनने के बारे में काफी कुछ कहते हैं, और कई नेता तो भारत के विश्वगुरू बन चुकने की बात भी कहते हैं। भारत की संस्कृति, और उसके इतिहास पर गर्व करने वाले नेताओं के नाम की लंबी फेहरिस्त बन सकती है जो कि इसे विश्वगुरू की कुर्सी पर बैठे देखना चाहते हैं। बिना लोगों के नाम के अगर सिर्फ उनकी टिप्पणियां मैं यहां लिखूं, तो किसी ने कहा है कि महत्व इस बात में है कि भारत विश्वगुरू बने, और अब दुनिया के प्रति भारत के योगदान देने की घड़ी आ गई है। एक और बयान में कहा गया कि भारत को एक ऐसी भूमिका निभाने की ओर बढऩा चाहिए, जहां वह ज्ञान, नैतिकता, संस्कृति आदि में विश्वगुरू की मिसाल बन सके। एक बयान में कहा गया कि भारत के विश्वगुरू बनने से रोकने के लिए वैश्विक और आंतरिक स्तर पर गलत धारणाएं फैलाई जा रही है। देश के कुछ बड़े-बड़े चर्चित मंत्री यह कहते हैं कि भारत को विश्व नेतृत्व के लिए तैयार रहना चाहिए, कुछ यह भी कहते हैं कि भारत विश्व नेतृत्व बन चुका है।

ये बयान किसके हैं, और कब दिए गए हैं, यह अहमियत नहीं रखता। फिर हमें इस देश के विश्वगुरू बनने से भी कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि दुनिया में गुरू शिष्य प्रणाली हमेशा से रहती आई है, और आज भी किसी न किसी रूप में यह जारी है। अब ऐसे में हर कोई गुरू बनना चाहेंगे, और अगर भारत के लोग यह चाहते हैं कि उनका देश बाकी देशों के शिष्य बनने की कीमत पर खुद गुरू बने, तो इस चाहत में कुछ भी अटपटा नहीं है। बस यही सोचने की जरूरत है कि क्या इस चाहत को पूरा करने के लिए यह देश तैयार है? क्योंकि अधूरी चाहत के चलते राहत नहीं मिल पाती है।

अब हम थोड़ा सा गुरू शिष्य प्रणाली को देखें, तो हर गुरू कभी न कभी शिष्य रहते हैं, और जब वे एक ईमानदार और गंभीर शिष्यभावना से सीखते हैं, तो ही वे आगे चलकर कभी गुरू बनने के लायक हो सकते हैं। गुरू बनने के लिए कोई परमाणु रहस्य नहीं लगता, लेकिन अपने आपको शिष्य मानकर खासा अरसा सीखना जरूर पड़ता है, तभी कोई गुरू बन सकते हैं। भारत में पहली-दूसरी के बच्चों को पढ़ाने के लिए भी लोगों को खुद बारह बरस स्कूल, और कम से कम छह बरस कॉलेज की पढ़ाई करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर वे प्रायमरी के गुरू बन सकते हैं। अब ऐसे में दुनिया का गुरू बनने के लिए दुनिया से थोड़ा सा अधिक समझदार, अधिक जानकार, और अधिक सरोकार वाला होना तो चाहिए ही।

किसी को भी शिष्य बनने के लिए यह जरूरी है कि उनके दिमाग में यह बड़ा साफ रहे कि उनका क्या-क्या सीखना बाकी है। अब मिसाल के तौर पर हम एक सभ्य, और गुरू बनने के अभिमान से ग्रस्त इंसान को देखें, तो उन्हें साफ-सुथरा रहना, और आसपास को साफ-सुथरा रखना आना चाहिए। जिस कुदरत के बनाए हुए कुत्ते-बिल्ली भी अपने बैठने की जगह को साफ करके बैठते हैं, उसी कुदरत के बनाए हुए इंसान योरप जैसे सभ्य इलाकों में तो हर जगह को साफ-सुथरा रखते हैं, लेकिन इस विश्वगुरू को अपनी दीवारों पर जगह-जगह लिखना पड़ता है कि देखो गधा पेशाब कर रहा है। चारों तरफ जब तक गंदगी फैलाने का हक न मिल जाए, उसका इस्तेमाल न हो जाए, तब तक लोगों को यह भरोसा ही नहीं होता कि सार्वजनिक सम्पत्ति उनकी अपनी है। अपने आपको यह आत्मविश्वास दिलाने के लिए लोगों को हर साफ-सुथरी जगह को गंदी करने का हक लगता है, ऐसा गंदा विश्वगुरू दुनिया के साफ-सुथरे हिस्सों को गुरू मानने के लिए कुछ अटपटा लगेगा।

दुनिया का एक बड़ा हिस्सा बड़ा सभ्य है, और जहां पर लोगों को बारी-बारी से कुछ लेना या देना रहता है, वहां लोग कतार में लगते हैं। जापान की ट्रेनों की तस्वीरें आती हैं कि किस तरह ट्रेन के बाहर लोग कतार लगाए खड़े रहते हैं, और आखिरी मुसाफिर के उतर जाने के बाद चढऩे वाले चढऩा शुरू करते हैं। देश के दर्जनों सभ्य देशों में यही हाल है। भारत में राशन से लेकर सिनेमा टिकट तक, और ट्रेन से लेकर बस तक जिस तरह की धक्का-मुक्की चलती है, वह विश्व गुरू में थोड़ी सी अटपटी लगेगी, और विश्वगुरू का नियुक्ति-पोस्टिंग ऑर्डर लेकर काम संभालने के पहले कतारों के बारे में थोड़ा सोचना पड़ेगा।

जिस देश की 99 फीसदी गंभीर और वजनदार गालियां माँ और बहन पर केन्द्रित हैं, और उनके भी बदन के कुछ खास हिस्सों तक, और बची एक फीसदी गालियां देश के एक खास प्रदेश में बेटी पर केन्द्रित हैं, तो विश्वगुरू के मुंह से यह सब शिष्यों को थोड़ा सा अटपटा लगेगा। शिष्यों के सामने अच्छी मिसाल पेश करनी पड़ेगी, और 2047 में विश्वगुरू बनने के पहले तक इस आदत को छोडऩे के लिए नई पीढ़ी के सामने अभी से बेहतर मिसाल रखनी होगी। महिलाओं के साथ इस देश में जो सुलूक होता है, उसे योरप और पश्चिम के बाकी देश थोड़ा सा अटपटा पाएंगे, और उम्मीद करेंगे कि गुरूजी जिंदा महिलाओं की उतनी इज्जत तो करें, जितनी कि वे मिट्टी-पत्थर की प्रतिमाओं की करते हैं। हालांकि शिष्यों की विश्वगुरू से ऐसी उम्मीद कुछ ज्यादती होगी, फिर भी पश्चिम की सोच में कुछ खोट है, और वहां के छात्र-देश विश्वगुरू की क्लास में पीछे से चॉक वगैरह फेंक भी सकते हैं, इसलिए लैंगिक समानता के बारे में कुछ सोचना चाहिए।

जिन देशों में ईमानदारी से टैक्स पटाने, बिना किसी के देखे टिकट खरीदने की बुरी आदत पड़ी हुई है, उन्हें भी यह विश्व गुरू शुरू में कुछ निराश कर सकता है, जब तक कि विश्व गुरू उन देशों को भी टैक्स चोरी न सिखा दे, और बारह बरस के बच्चे को दूध पीता बताकर बिना टिकट सफर करना न सिखा दे। विश्वगुरू और शिष्य देशों के बीच रिश्तों की एक बुनियाद बनाना जरूरी रहेगा, और उसके लिए विश्वगुरू को दूसरे देशों को अपने टक्कर का भ्रष्ट बनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी, यह काम आसान नहीं रहेगा।

दुनिया के कई देश धर्म, जाति, नस्ल, और रंग जैसे जरूरी बुनियादी मुद्दों को भूल गए हैं। उन्हें वापिस इन बातों के महत्व को गिनाने के लिए विश्वगुरू को अपनी वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के कई कोर्स चलाने पड़ेंगे, और नफरत का अक्षर ज्ञान भूल गए लोगों को एक बार फिर साक्षर बनाना पड़ेगा। यह खासी मेहनत का काम रहेगा, और कई देश तो बहुत ही जिद्दी भी हो सकते हैं, जो कि साक्षरता अभियान में शामिल होना न चाहें, ऐसे में 2047 तक विश्वगुरू बनने का लक्ष्य हासिल करने के लिए इन देशों को ट्रम्प के अंदाज में ही बांह मरोडक़र तैयार करना पड़ेगा, एक छोटी सी समस्या यह है कि भारत के पास ट्रम्प की तरह का बाहुबल नहीं है, और वह देशों पर दबाव कैसे डालेगा, यह कल्पना करना अभी मुश्किल है।

विश्वगुरू भारत के साथ एक छोटी सी चीज यह है कि देश भर में नफरती हिंसा करने वाले लोग, आर्थिक असमानता की खाई खोदने वाली व्यवस्था, इन सबका खूब बोलबाला है, और बहुत से गोरे शिष्य ऐसे रहेंगे, जो कि विश्वगुरू की इन बातों को ठीक नहीं मानेंगे, ऐसे उद्दंड और अराजक छात्र-छात्राओं को किस झंडे-डंडे से ठीक किया जाएगा, वह भी सोचना पड़ेगा।

अभी हम चैटजीपीटी की मदद से यह लिस्ट बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत के विश्वगुरू बनने में उसकी आज की कौन-कौन सी बातें आड़े आएंगी, तो वह लिस्ट आज के इस कॉलम की लंबाई से कई गुना अधिक लंबी बन जा रही है, और ऐसा लगता है कि पश्चिम का बनाया हुआ चैटजीपीटी पूरब के इस देश को विश्वगुरू मानने से इंकार कर रहा है, और उसके बनने की राह में रोड़े कुछ अधिक गिना रहा है। पश्चिम ने सैकड़ों बरस इस विश्वगुरू को आगे बढऩे से रोका है, इसके हर आविष्कार पर खुद पेटेंट करा लिया है, इसलिए पश्चिमी एआई की मदद से विश्वगुरू बनने की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश काम आ नहीं पाएगी। ऐसे में इस गुरूकुल के तमाम लोगों को सोचना पड़ेगा कि ट्रम्प जैसी ताकत कैसे हासिल की जाए ताकि दुनिया से अपने को विश्वगुरू कहलवाया जा सके। लेकिन विश्वगुरू बन जाने के बाद आगे कुछ सीखने के लिए, ओरिएंटेशन, और रिफ्रेशर कोर्स करने के लिए भारत को दूसरे ग्रहों की तरफ देखना पड़ेगा, क्योंकि इस ग्रह पर तो उसके सिर्फ शिष्य ही रह जाएंगे।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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