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आप अपने तोहफे से लोगों को कर सकते हैं शनिगुजार भी...
सुनील कुमार ने लिखा है
19-Oct-2025 4:35 PM
आप अपने तोहफे से लोगों को कर सकते हैं शनिगुजार भी...

शहरों में गाड़ियां तोहफों से लदी हुई दिख रही हैं, पीछे की सीटें तरह-तरह के बक्सों से भरी हुई हैं और सरकारी कॉलोनियों, संपन्न बस्तियों, (बड़े पत्रकारों के घरों पर भी) तोहफे पहुंच रहे हैं। जो लोग ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए हैं उनके पड़ोसी भारी मन के साथ देखते ही रह जाते हैं कि चुनिंदा पड़ोसियों के घर किस तरह आवाजाही लगी हुई है। यह तो दुनिया का रीति-रिवाज है कि जब तक जो लोग किसी प्रभाव के पद पर रहें, उन्हें उगते, और उगे हुए सूरज की तरह सलामी मिलती रहती है, रिटायर होते ही, या ताकत के किसी ओहदे से हटते ही जिस तरह लोगों के यहां आना-जाना खत्म हो जाता है, उससे भी शायद रिटायर्ड लोग अधिक रफ्तार से बूढ़े होने लगते हैं। ताकत की अधिक चर्चा का कोई मतलब नहीं है, लेकिन तोहफों की चर्चा जरूर की जा सकती है।

कई लोगों के तोहफे ऐसे रहते हैं कि जिनमें पैकिंग ही सबकुछ रहती है। बड़े-बड़े बक्से, भीतर मखमली कपड़ों से बने हुए खांचे में रखी हुई कांच की बोतलों में मानो नमूने के लिए थोड़ा-थोड़ा सा मेवा रखा रहता है। मेवे और पैकिंग के अनुपात को देखें तो छाती बैठने लगती है और लगता है कि इस पैकिंग की जगह सिर्फ मेवा ही भेज दिया जाता तो वह दस गुना हो सकता था। जितने अधिक संपन्न लोगों की तरफ से, और जितने ताकतवर लोगों को तोहफे जाते हैं, उनमें पैकिंग का अनुपात उतना ही अधिक होता है। बड़ी सी डोली के भीतर छोटी सी नाजुक और छरहरी दुल्हन जिस तरह एक कोने में सिमटी रहती है, कुछ उसी तरह काजू-किशमिश बड़ी सी पैकिंग में किनारे बैठे रहते हैं। बच्चों की छीना-झपटी में कुछ मेवा, कुछ चॉकलेट और कुछ मिठाई जिस रफ्तार से खत्म होते हैं, उतने ही लंबे वक्त तक ये पैकिंग छाती पर बैठकर मूंग दलती रहती है। महंगी और खूबसूरत पैकिंग को फेंकते बनता नहीं, किसी को तोहफे में दी नहीं जा सकती, और वह घर के एक कोने में सहेजी हुई, और साथ-साथ उपेक्षित भी पड़ी रह जाती है। उसकी जिंदगी दीवाली की रौशनी में कुछ मिनट मंडराकर जलकर गिर जाने और फिर मर जाने वाले पतंगों सरीखी ही रहती है। कुछ मिनटों में मेवा पेट में और पैकिंग छाती पर।

त्यौहारों के दिखावे से परे अगर पर्यावरण के हिसाब से देखा जाए तो सारे ही महंगे तोहफे धरती पर बड़ा महंगा बोझ बढ़ाते हैं, और छोड़ जाते हैं। इतनी पैकिंग को बनाने में जितने सामान लगते हैं, और जितनी बिजली खर्च होती है, उससे धरती पर कार्बन फुटप्रिंट खासा बढ़ता है। कम से कम उसके भीतर के खाने-पीने के माल-मत्ते के अनुपात में। सौ ग्राम खाओ और पांच सौ ग्राम छाती पर ढोते रह जाओ।

मुझे सबसे अच्छे तोहफे वे लगते हैं जो किसी जूट की, या रेशमी कपड़े की मामूली सी थैली में रखे हुए मेवे के मामूली से पैकेट रहते हैं। सौ ग्राम पैकिंग और नौ सौ ग्राम मेवा। यह जरूर हो सकता है कि अभी-अभी एक अंबाइन की एक फोटो आई थी जिसमें वह एक ऐसा बटुआ थामे हुए थी जिसमें मेवा तो सौ ग्राम भी नहीं आया रहता, लेकिन जिसका दाम 15 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। 18 कैरेट वाइट गोल्ड से बना हुआ यह बटुआ ताश की एक गड्डी भी नहीं समा सकेगा, लेकिन जिसके ऊपर हीरे ही हीरे जड़े हैं, और जिसे दुनिया का सबसे महंगा बटुआ बताया जा रहा है। मुझे आने वाले तोहफों में से कई इसी दर्जे के लगते हैं। हो सकता है कि अंबाइन को अपने दो-चार क्रेडिट कार्ड और एक मोबाइल फोन के लिए 15 करोड़ की यह पैकिंग अच्छी लगती हो, लेकिन मेरे लिए तो दीवाली के बाद ये खाली बक्से काजू-किशमिश के गिने-चुने दानों की याद दिलाते हुए मुंह चिढ़ाते बैठे रहते हैं।

पता नहीं यह नासमझी का सिलसिला किस पैकिंग वाले कारोबारी के दिमाग की उपज था जिसे जेब वालों ने लपक लिया और ताकत वालों को भेज दिया। दिखावे का यह कारोबार बड़ी दुकान थोड़ा सा पकवान नाम की एक नई कहावत के लायक है। कितना अच्छा होता कि इस देश में लिफाफों में गिफ्ट वाउचर का चलन रहता जिससे लोग बाजार जाकर अपनी मर्जी, जरूरत और पसंद का सामान ले सकते। लक्ष्मी ने तो कभी कहा नहीं होगा कि उसकी पूजा के मौके पर घड़ा इतना बड़ा दो कि जिसमें छोटे-छोटे दो-चार सिक्के खड़खड़ाते रहें, वे भी सोने-चांदी के नहीं, रिजर्व बैंक के ढाले हुए पांच-दस रूपए के सिक्कों की तरह। अब सोचें कि बीस-बीस के पांच सिक्कों को डालकर पांच सौ का घड़ा कोई तोहफे में भेजे तो सिक्कों की किस्मत पर तरस आएगा और घड़े की किस्मत से रश्क होगा। लक्ष्मी की तस्वीर में जो घड़ा वे थामे हुए दिखती हैं, उसमें से निकलते सोने के सिक्के तो यह सुझाते हैं कि पैकिंग और माल का क्या अनुपात होना चाहिए। पीतल के घड़े में सोने के सिक्के भरे हों तो ही पीतल की पैकिंग अच्छी लगती है। दो सौ ग्राम मेवे के साथ दो किलो की पैकिंग देखकर पर्यावरणवादी लोग दीवाली पर भी गम मनाने बैठ जाते हैं।

दरअसल त्यौहारों का माहौल ही कुछ ऐसा रहता है। पैकिंग बड़ी रहती है उसके भीतर तोहफा छोटा सा रहता है, ठीक वैसे ही जैसे कि दीवाली पर खूब धन बरसने की शुभकामना दूसरों को दी जाती है, और हसरत अपने लिए रहती है। लोगों को मालूम है कि धन बरसने की शुभकामना का कोई असर होता तो वे दूसरे को ऐसी शुभकामना का एक शब्द भी नहीं देते और पूरी की पूरी खुद ही निगल जाते। लेकिन त्यौहार है, उसका माहौल ही दिखावे का रहता है, और उसमें रंगारंग, चकाचक, झिलमिल पैकिंग का ही बोलबाला रहता है।

अगली बार किसी को कोई तोहफा देना हो तो न्यूनतम पैकिंग में, सिर्फ कागज के लिफाफे में, या किसी प्लास्टिक थैली में सामान रखकर देकर देखें, उनके चेहरे आपके लिए सचमुच ही शुक्रगुजार तो क्या शनिगुजार हो जाएंगे।

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