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लोहिया को याद करते अंग्रेजी पर उनकी कही बातों के बहाने
सुनील कुमार ने लिखा है
12-Oct-2025 3:50 PM
लोहिया को याद करते अंग्रेजी  पर उनकी कही बातों के बहाने

आज 12 अक्टूबर को राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि है, आज ही के दिन वे 1967 में 57 बरस की उम्र में गुजर गए थे। वे भारत की कुछ सबसे प्रमुख यूनिवर्सिटी, बीएचयू, और कलकत्ता में पढ़े थे, और उसके बाद तीन-चार बरस जर्मनी में भी। वे अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं से अनजान व्यक्ति नहीं थे, लेकिन गांधीवादी परिवार के होने के नाते वे शुरू से ही गांधी के आंदोलन से जुड़ गए, और कांग्रेस से भी। वे जर्मनी में रहते हुए भी उस वक्त के अविभाजित भारत के लाहौर में भगत सिंह को फांसी दिए जाने के खिलाफ वहां पर प्रदर्शन करते रहे, और बर्लिन विश्वविद्यालय से पीएचडी हासिल करने के बाद भारत आकर राजनीतिक आंदोलनों, और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे। नेहरू-गांधी और सुभाषचन्द्र बोस जैसे अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों के साथ उनका लगातार जीवंत राजनीतिक संपर्क रहा, इन लोगों से लोहिया की सहमति-असहमति के दौर भी चलते रहे, वे नेपाल से लेकर गोवा तक के आंदोलनों में उनकी ऐतिहासिक भागीदारी रही।

और एक वक्त ऐसा भी आया जब आजाद भारत में लोहिया जनसंघ के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे।

लेकिन किसी की जन्मतिथि, या पुण्यतिथि पर लिखने की मेरी कोई नीयत रहती नहीं है। लोहिया का अंग्रेजी भाषा के बारे में लिखा गया एक बयान आज सामने आया जिससे यह लिखने का सूझा। उनका कहना था- ‘अंग्रेजी हिन्दुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिए नहीं पहुंचा रही है कि वह विदेशी है, बल्कि इसलिए कि भारतीय प्रसंग वह सामंती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह इसे सत्ता या स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जनसमुदाय पर अधिकार कर शोषण करने का अधिकार है अंग्रेजी।’

अंग्रेजी भाषा के बारे में लोहिया के कहे हुए को उनके नाम से परे भी एक तथ्य और तर्क के रूप में सोचने की जरूरत है। फिलहाल तो चूंकि उनके नाम के साथ यह किताबों में अच्छी तरह दर्ज है कि उन्होंने इस विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा था, इसलिए मैं उनके नाम के साथ ही कुछ और बातें यहां पर दे रहा हूं। उनका मानना था- अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि सत्ता का औजार बन चुकी है, जिसने भारत के लोकतंत्र, और समानता दोनों को कमजोर किया। उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी शासन की भाषा बनी रही, इसलिए सत्ता उन्हीं लोगों के हाथ में रही, जो अंग्रेजी जानते थे। उन्होंने लिखा था भारत में अंग्रेजी जानने वाले लोग नए गोरे बन गए हैं। उनका कहना था अंग्रेजी से समाज में एक भाषाई वर्ण व्यवस्था बन गई है जिसमें ऊपर अंग्रेजी बोलने वाले सत्ता और नौकरशाही से जुड़े वर्ग हैं, और नीचे हिन्दी, उर्दू, तमिल, बंगला आदि बोलने वाले लोग। लोहिया ने कहा था कि अगर सरकार की भाषा जनता की भाषा न हो, तो लोकतंत्र एक मजाक बन जाता है, जिस लोकतंत्र की भाषा जनता न समझे, वह लोकशाही नहीं, अफसरशाही है।

वे चाहते थे कि संसद, अदालत, विश्वविद्यालय, और प्रशासन सभी जनभाषाओं में चलें ताकि जनता खुद निर्णय प्रक्रिया में भाग ले सके। उनका कहना था कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा में गरीबों को हमेशा नीचे, और अमीरों को ऊपर रखा क्योंकि जो बच्चे अंग्रेजी नहीं जानते, उनकी योग्यता कभी साबित ही नहीं हो सकती। लोहिया का कहना था कि अंग्रेजी से न सिर्फ आर्थिक बल्कि मानसिक गुलामी भी पनपी है जिससे एक वर्ग खुद को दूसरों से ज्यादा समझदार समझने लगा। उन्होंने इसे मानसिक स्वतंत्रता से जोडक़र कहा- जो अपनी भाषा छोड़ देते हैं वे सोचने की आजादी खो देते हैं। अंग्रेजी में सोचने वाले भारतीय, भारतीय नहीं रह जाते, वे अंग्रेज मानसिकता वाले बन जाते हैं। अदालतों में अंग्रेजी देखकर लोहिया ने नाराजगी से कहा था- जहां न्याय की भाषा जनता की नहीं, वहां न्याय जनता का नहीं। उन्होंने कहा कि अदालतों की अंग्रेजी भाषा में गरीबों को न्याय पाने से वंचित रखा, क्योंकि वे न मुकदमा समझ सकते थे, न दलीलें।

1950-60 के दशक में लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया। वे मानते थे कि अंग्रेजी हटाना सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई है। उनका अंग्रेजी विरोध कोई संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं था, बल्कि समानता का आंदोलन था।

दरअसल, 1967 में लोहिया के जाने के बाद से अब तक गंगा में बहुत सा गंदा पानी बह चुका है, इसलिए उनके सारे तर्कों को आज तथ्यों की तरह नहीं सोचा जा सकता। जब उन्होंने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया, तो भारत में तीन चौथाई से अधिक लोग पूरी तरह निरक्षर थे, और अंग्रेजी पढऩे-लिखने वाले लोग एक फीसदी से भी कम थे। आज तीन चौथाई से अधिक लोग साक्षर हैं, और दस-बारह फीसदी लोग अंग्रेजी को अलग-अलग स्तर तक जानते-समझते हैं। फिर यह भी कि 1951 में अंग्रेजी जानने वाली आधा फीसदी आबादी अब 20-25 गुना बढक़र 10-12 फीसदी हो चुकी है। लेकिन एक बात जो उस वक्त से आज तक नहीं बदली है, वह यह है कि बड़ी अदालतों, और सरकार के ऊंचे स्तर के सारे कामकाज आज भी अंग्रेजी में होते हैं।

यह भी बहुत साफ-साफ दिखता है कि हर दिन देश भर में मुहल्ला स्तर के छोटे-छोटे हजारों नए अंग्रेजी स्कूल खुलते हैं, और गरीब तबका भी पेट काटकर अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना चाहता है, क्योंकि उसे इस देश में भविष्य उसी भाषा में दिखता है, और देश के बाहर तो वही एक भाषा हिन्दुस्तानियों के काम की है।

हम भारतीय भाषाओं से लगाव, और विदेशी शासकों की अंग्रेजी भाषा से भारत की समानता को होने वाले नुकसान, इन दोनों को एक साथ या अलग-अलग जैसे भी रखकर देखें, यह साफ समझ पड़ता है कि भारत में, खासकर हिन्दीभाषी इलाकों में कमजोर लोगों पर अंग्रेजी के बोलबाले का कैसा नुकसान हुआ है। फिर भी हम लोहिया की तरह के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के हिमायती तो नहीं हैं, इतना जरूर सोचते हैं कि अंग्रेजी को एक वैकल्पिक माध्यम के रूप में लोगों के लिए मुहैया कराने के अलावा सरकारी कामकाज किस तरह, किस हद तक भारतीय भाषाओं में किया जा सकता है। यह बात लोहिया के समय से आज तक एक ही तरह से लागू है कि किस तरह अंग्रेजी जानने वाले एक ताकतवर तबका बन चुके हैं, और अंग्रेजी न जानने वाले वंचित तबका रह गए हैं। अंग्रेजी को आम लोगों के लिए पढ़ाई के माध्यम के लिए एक मजबूत विकल्प की तरह सामने रखना जरूरी है, ताकि वे अपनी पसंद से दुनिया भर में अपनी संभावनाओं को देखते हुए किसी भारतीय भाषा, या अंग्रेजी में, जिसमें चाहें उसमें पढ़ाई करें। लेकिन भारत का सारा सरकारी, संसदीय, और अदालती कामकाज भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के मुकाबले कहीं भी कम नहीं होना चाहिए। भाषा पर बहस आज के एक कॉलम में नहीं हो सकती, लेकिन हम इस चर्चा को छेडक़र छोड़ दे रहे हैं। आज दक्षिण और उत्तर के बीच भाषा का विवाद चल रहा है, हिन्दी और गैरहिन्दी भारतीय भाषाओं में खींचतान मची हुई है, और इन सबके बीच गोरी जुबान अंग्रेजी तो राज कर ही रही है! (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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