आजकल
फोटोग्राफर : राजकुमार के पी
दुनिया के वन्यजीवन छायाकारों के बीच अभी एक नई बहस शुरू हुई है कि अपनी फोटोग्राफी को यादगार बनाने के लिए उन्हें वन्यजीवन में कितना दखल देना चाहिए? हुआ यह कि अभी केरल में मिलने वाला एक दुर्लभ मेंढ़क फोटोग्राफरों के उत्साह का निशाना बन गया। गैलेक्सी फ्रॉग नाम का यह मेंढक अपनी चमड़ी पर चमकीले दागों की वजह से आसमान के तारों की तरह दिखता है, और वह बहुत ही गिनी-चुनी संख्या में है इसलिए उनकी अच्छी फोटो पाना भी नामुमकिन सा रहता है। ऐसे मेंढक की तस्वीर के लिए कुछ फोटोग्राफरों ने उनकी जगह पर उलटफेर किया, उन्हें पकड़कर एकसाथ रखना चाहा ताकि एक अधिक दुर्लभ तस्वीर मिल जाए, और इस चक्कर में उनमें से कुछ मेंढक मर गए। यह दुर्लभ वन्यजीवन का एक बड़ा नुकसान था, और मेंढक तो शहरी फोटोग्राफरों का मुकाबला या विरोध करने की ताकत शेर-चीतों की तरह रखते नहीं थे। 4 चीतों या 6 शेरों को एकसाथ बिठाने का हौसला तो किसी फोटोग्राफर ने किया नहीं होता।
इस पर इंटरनेशनल मीडिया में एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि यादगार तस्वीर पाने के लिए फोटोग्राफर प्राकृतिक जीवन में किस हद तक दखल दें। बहुत से फोटोग्राफर नाराज हैं कि उनके कुछ साथी फोटोग्राफी के मुकाबलों में अवॉर्ड जीतने के लिए कई किस्म की अनैतिक हरकतें करते हैं, जो कि कई देशों के कानून के मुताबिक जुर्म भी है। लेकिन नेशनल जियोग्राफिक जैसी पत्रिका में छपने के लिए, या अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में वन्यजीवन फोटोग्राफी का अवार्ड पाने के लिए लोग नैतिकता को घर छोड़कर जंगल में पैर रखते हैं।
इस खबर और बहस से मुझे याद पड़ता है कि कोई 25 बरस पहले पेरिस के एक विश्वविद्यालय से एंथ्रोपोलॉजी का एक शोधछात्र छत्तीसगढ़ के बस्तर आया था। वह संगीत-एंथ्रोपोलॉजी का छात्र था, और बस्तर के एक लोकवाद्य, तुरही पर शोध कर रहा था कि उसे कैसे-कैसे सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में इस्तेमाल किया जाता है। इस सिलसिले में वह बस्तर के एक हिस्से में एक आदिवासी-ग्रामीण संगीत पार्टी के साथ डेढ़-दो बरस तक रहा। उन्हीं के साथ घूमता था, उन्हीं के साथ रहता, खाता, सोता था। और इस बैंड के लोगों को मालूम था कि उसका शोधकार्य उन्हीं पर टिका है, इसलिए गांवों में संगीत बजाने पर मिलने वाले मुर्गे या बकरे को काटने की जिम्मेदारी भी इसी गोरे फिरंगी को दे दी जाती थी। खैर, वह आदिवासियों की समझदारी का एक अलग किस्सा है जिस पर अधिक बात आज के मुद्दे को भटका देगी। इसलिए मुद्दे पर लौटें तो वह यह कि यह शोधछात्र इस म्यूजिक पार्टी के लोगों से बार-बार अनुरोध करते रहा कि वे उसके लिए ऐसी एक तुरही बना दें जिसे वह ले जाकर विश्वविद्यालय में अपने विभाग में लगा सके, उसने इसके लिए भुगतान की बात भी कही थी। उसे हर बार वायदा किया गया कि वे कुछ दिन में तुरही बना देंगे, धीरे-धीरे उसके जाने का वक्त भी आने लगा, लेकिन तुरही बनी नहीं। अंत में इस बैंड के लोगों ने उसे कहा कि वे उन्हीं की तुरही ले जाए, और उसी का भुगतान कर दे। लेकिन उसने मना कर दिया क्योंकि सामाजिक शोधकार्य के उनके सिद्धांत और नैतिकता इस बात की इजाजत नहीं देते कि किसी जगह से उनकी संस्कृति का कोई हिस्सा ले जाया जाए। हो सकता था कि वह इस तुरही को लेकर चले जाता, और उसके साथ ही इस गांव में संगीत की वह परंपरा खत्म हो जाती। इसलिए वह खाली हाथ ही उदास और निराश लौटा, दूसरी तरफ बैंड के लोग भी उदास और निराश थे क्योंकि उन्हें परदेसी से इस तुरही के अच्छे दाम मिलने की उम्मीद थी जो कि पूरी नहीं हुई।
ये दो मिसालें एक-दूसरे के ठीक सामने खड़ी हुई हैं कि सामाजिक सरोकार किस तरह लोगों को गलत काम करने से रोकते हैं, लेकिन बाजारू मुकाबले की दौड़ लोगों से कैसे-कैसे गलत काम करवा बैठती है।
इन्हीं दो घटनाओं को लेकर मुझे 25 बरस पहले जर्मनी के एक फिल्म समारोह की याद आ रही है जिसमें हफ्तेभर मैंने दुनियाभर से आई हुई शोधछात्राओं की, और कुछ दूसरे निर्देशकों की भी फिल्में देखी थीं। जब सामाजिक स्थितियों में जाकर कोई लंबा शोध करते हैं, तो उन्हें अपने विषय से इतना लगाव भी हो जाता है कि वे इस पर कोई फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसा ही माहौल उस फिल्म समारोह का था जहां पर फिल्मों के साथ शोधकर्ता भी जवाब देने को मौजूद थे।
इस फिल्म समारोह में योरप की एक बड़ी ही चर्चित और प्रमुख डॉक्यूमेंट्री मेकर की एक फिल्म थी जिसका सारे जानकार लोग बड़ा इंतजार भी कर रहे थे। अफ्रीका जंगलों में एक किसी गांव में एक महिला बच्चे को जन्म देने वाली थी, और इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा उस महिला के बदन पर ही केंद्रित था, और सिनेमा के बड़े पर्दे पर जब जन्म देते हुए उसका बदन खुलासे से दिख रहा था, तो उसे देखना भी कई लोगों को दिक्कत की बात लग रही थी।
जब यह फिल्म पूरी हुई और सवाल करने का मौका मिला, तो सवाल करने के लिए सबसे अधिक बदनाम हो चुका मैं खड़ा हुआ, और इस फिल्म निर्देशक से पूछा कि जिस महिला के अंतरंग बदन का इतना विशाल नजारा उन्होंने स्क्रीन पर दिखाया है, क्या यह उस महिला के निजी जीवन में एक नाजायज दखल नहीं है? क्या उस महिला को जंगल में रहते हुए इस बात का अहसास था कि उसके बदन का कौन सा हिस्सा सैकड़ों वर्गफीट की स्क्रीन पर इस तरह से दिखाया जाएगा? मैंने वहां पर बहुत से सवाल किए थे, जो कि मेरे अज्ञान से भी उपजे थे क्योंकि मुझे डॉक्यूमेंट्री के तौर-तरीकों के मुकाबले जिंदगी के नैतिक तौर-तरीकों की समझ अधिक थी। मेरे सवाल-जवाब कुछ इतने लंबे चले थे, और इतने तल्ख हो गए थे कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों पर योरप की एक प्रमुख ऑनलाइन मैगजीन ने मुझसे इस पर एक लेख लिखने के लिए कहा। मैंने इस फिल्म को लेकर अपनी सारी आपत्तियां एक लंबे लेख में लिखीं। मजेदार बात यह रही कि इस फिल्म निर्देशिका ने इसी ऑनलाइन पत्रिका में मेरे लेख के जवाब में एक और लंबा लेख लिखा।
मैं बहस में जीत-हार से अधिक इस बात को महत्व देता हूं कि अगर उसमें कुछ नैतिक बातें उठती हैं, लोगों को कुछ सोचने का मौका मिलता है, तो वह बहस का सबसे बड़ा हासिल रहता है। व्यक्तियों की जीत-हार कहीं महत्वपूर्ण नहीं रहती। दुनिया की सबसे बड़ी अदालतों में भी कई लोग हार जाते हैं, लेकिन हारते-हारते भी वे जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे कानून के इतिहास में महत्वपूर्ण तरीके से दर्ज होते हैं। इसलिए वन्यजीवन फोटोग्राफरों की नैतिकता को लेकर जो बात उठ रही है, जो बहस चल रही है वह अधिक महत्वपूर्ण है इस बात से कि क्या जंगल में जाकर कोई फोटोग्राफरों को रोक सकते हैं? कई फोटोग्राफर तो तितलियों की फोटोग्राफी करने के लिए उनको पकड़कर, कैद करके भी उनकी फोटो लेते हैं।
ऐसे में पेशे की नैतिकता की बात हर पेशे को लेकर हो सकती है, होनी चाहिए। चिकित्सा के पेशे में नैतिकता की बात अस्पताल के हर बिल के साथ खड़ी हो जाती है कि क्या अस्पतालों का इतना बिल बनाना नैतिक है, क्या डॉक्टरों का इतने किस्म की जांच करवाना नैतिक है, क्या अपनी लिखी गई जांच पर डॉक्टरों का कमीशन लेना नैतिक है?
लेकिन इसके साथ-साथ यह बहस भी तो हो सकती है कि अखबार और टीवी चैनल अपने कार्यक्रमों में मंच पर जिन कारोबारियों का सम्मान करते हैं, वे कारोबारी सम्मान के लायक हों या न हों, वे उनके विज्ञापनदाता तो रहते हैं, और यही एक वजह उन्हें सम्मान का पात्र बनाती है। फिर अखबार और चैनल ऐसे लोगों को प्रदेश का गौरव या जाने क्या-क्या विशेषण लगाकर पेश करते हैं, और बड़े-बड़े सत्तारूढ़ लोगों से उनका सम्मान करवाते हैं। आज मीडिया का कोई बड़ा संगठन अगर मीडिया-कारोबार पर नैतिकता के कोई सवाल करने की हालत में रहता, तो इस बात पर भी सवाल कर सकता था।
जब खबरों के गलाकाट मुकाबले में सत्य और तथ्य का कीमा बना दिया जाता है, तब कुछ मेंढकों की फोटो खींचने के लिए उन्हें उठाकर अगर एक साथ रख दिया गया, और कुछ अच्छी तस्वीरें हासिल हो जाने के बाद उनमें से कुछ मर भी गए, तो इससे फोटोग्राफर के अवॉर्ड पाने की संभावना तो खत्म नहीं हो गई। दुनिया कुछ इसी किस्म की है, नैतिकता एक दुर्लभ नस्ल का प्राणी है, इतिहास है, उस पर अच्छी चर्चा जारी रहनी चाहिए जैसे कि इतिहास के कई पहलुओं पर होती ही रहती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


