आजकल
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया को लेकर अभी कुछ सख्त सोच जाहिर की है, और इन्हें चलाने वाली कंपनियों के साथ-साथ सरकार पर भी थोड़ी अधिक जिम्मेदारी डाली है। एक मामले की सुनवाई चल ही रही है कि अदालत ने इस बारे में कहा कि अब सोशल मीडिया सिर्फ निजी अभिव्यक्ति का मंच नहीं रहा, उस पर लिखी बातें नफरत, हिंसा, या अफवाह को फैलाने की ताकत रखती है। उसने पारंपरिक मीडिया के बारे में कहा कि अखबार में छपने वाली बात की जिम्मेदारी तय होती है, लेकिन सोशल मीडिया पर पांच सेकेंड में झूठ देश भर में फैल जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान की अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन यह आजादी सीमाविहीन नहीं है। अदालत ने कहा कि झूठ, नफरत, मानहानि, और धार्मिक उकसावा, इन सब पर सीमा लागू होती है। अदालत ने सरकारी कामकाज के बारे में भी कहा कि सोशल मीडिया ने अफसरों को डराने-धमकाने के नए तरीके बना लिए हैं। जायज सरकारी काम करने पर भी सोशल मीडिया की टिप्पणियां अधिकारियों को मानसिक रूप से तोड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि क्या मौजूदा आईटी कानून काफी है, क्या और नियमों की जरूरत है?
जब सुप्रीम कोर्ट ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जरूरी सीमा रेखा खींचने लगे, तो फिर सरकार को भला और क्या चाहिए? सरकार तो लोगों की अभिव्यक्ति पर तरह-तरह की सीमा रेखा खींचने की शौकीन ही रहती है। परंपरागत मीडिया पर काबू थोड़ा आसान रहता है, और ऐसे में अराजकता की हद तक आजाद सोशल मीडिया पूरी तरह बेकाबू रहता है। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट खुद होकर सरकार से पूछ रही है कि क्या उसे इस अराजकता पर काबू पाने के लिए कोई नए नियम-कानून चाहिए, तो सरकार के लिए तो मानो उसका पसंदीदा संगीत बजा दिया गया। लेकिन बात सिर्फ सरकार तक सीमित नहीं है कि सोशल मीडिया से वही अकेली परेशान है। सरकार के पास तो आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई करने के लिए बहुत सारे अधिकार हैं, लेकिन अगर सरकार किसी हमलावर दस्ते पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, तो फिर ऐसे दस्ते के हमले के शिकार लोग अपने को बचा नहीं पाते। आज भारत में सोशल मीडिया पर सरकार से बेकाबू लोग अराजक हो रहे हों, ऐसी नौबत कम है। सरकार को पसंद लोग अराजक अधिक हो रहे हों, ऐसी नौबत अधिक है। ऐसे में इन लोगों पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती है।
सोशल मीडिया के साथ जाने किसने और कब मीडिया शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। पहले ही परंपरागत प्रेस बाद में प्रचलित हुए मीडिया शब्द के भीतर एक अल्पसंख्यक हो चुका है, अपने नीति-सिद्धांतों की पोटली थामे हुए, दबा-सहमा सा बैठा रहता है प्रेस, और मीडिया के दायरे में आने वाले बाकी लोग सडक़ों पर बेकाबू जानवरों की तरह मटरगश्ती करते हैं। अब मानो मीडिया नाम का यह बेकाबू और अराजक तबका काफी नहीं था, अब सोशल मीडिया नाम का एक और बड़ा तबका खड़ा हो गया है जिसमें दुनिया के हर ऑनलाईन नागरिक शामिल हैं। समंदर के पानी की भला कौन सी बूंद बाकी बूंदों के प्रति जवाबदेह हो सकती है? सोशल मीडिया का हाल कुछ ऐसा ही है। ऐसे में भारत के सुप्रीम कोर्ट को इस देश की सरहद के भीतर से सोशल मीडिया पर कहा और लिखा जाने वाला अगर खटक रहा है, तो वह सरकार के लिए कुछ हद तक काबू का हो सकता है, और बहुत हद तक बेकाबू बना रहेगा क्योंकि इंटरनेट की टेक्नॉलॉजी की बुनियादी खूबी या खामी यही है।
लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि जब कभी सरकार के हाथ किसी चीज को रोकने के लिए कोई अधिकार लगता है, तो जुर्म तो बाद में रूकते हैं, पहले तो उन जायज बातों को रोका जाता है जो कि सरकार को नापसंद रहती हैं। आज भी आईटी एक्ट के तहत देश भर में सरकारें उन्हीं बातों को अधिक रोकती हैं जो राजनीतिक रूप से उन्हें व्यक्तिगत तौर पर नापसंद रहती हैं। फिर सरकार चाहे किसी भी पार्टी की क्यों न हो, उसका बर्दाश्त तब एकदम कम हो जाता है जब बात उस पर आ जाती है। हमने ममता को भी कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार करते देखा है। सरकार की व्यक्तिगत पसंद और नापसंद को तानाशाही की हद तक ले जाने के लिए आज किसी भी राज्य की पुलिस अंग्रेजीराज की पुलिस के मुकाबले कहीं अधिक अलोकतांत्रिक होकर काम करती हैं। देश में एक सुप्रीम कोर्ट भी है, और उसके सामने एक जवाबदेही की नौबत आ सकती है, यह आशंका भी किसी राज्य की पुलिस की अराजकता को कम नहीं करती।
अब यह एक दिलचस्प नौबत है कि इंटरनेट पर जनता की अभिव्यक्ति की अराजकता का मुकाबला करने के लिए जमीन पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की चापलूस रह गई पुलिस की अराजकता को तैनात किया जा रहा है। जब कभी अदालत इस तरह की किसी बात को लागू करने की चर्चा करती है, वह जाहिर तौर पर पुलिस के मार्फत ही लागू होती है। इसलिए जनता की अराजकता के मुकाबले सत्तारूढ़ राजनीति के हाथों की औजार पुलिस की अराजकता एक दिलचस्प मुकाबला हो सकता है। आज भी अधिकतर राज्यों में पुलिस सत्ता के हाथों गीली मिट्टी की तरह रहती है, और वह क्या काम करे, इसे सत्ता ही तय करती है। अधिकतर जगहों पर पुलिस सत्तारूढ़ दलों की चापलूस-फौज के मुकाबले भी अधिक चापलूस साबित होती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की कोई भी नई व्यवस्था सरकारों के कानूनी हाथों को मजबूत नहीं करेगी, वह सरकारों की राजनीतिक मनमानी को मजबूत करेगी। ऐसा लगता है कि सरकारों के हाथ मजबूत किए बिना अगर सोशल मीडिया कंपनियों पर अधिक कड़ाई लादी जाए, उनकी जिम्मेदारी बढ़ाई जाए, तो शायद उसका बुरा असर कम होगा। किसी अच्छे असर के लिए किए जाने वाले काम के साथ अगर बाईप्रोडक्ट की तरह अच्छे से अधिक बड़ा बुरा असर भी पैदा हो रहा है, तो वह एक किस्म से प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) साबित होता है। सुप्रीम कोर्ट को इस पूरी बहस को सरकार के हाथ और औजार देने तक नहीं ले जाना चाहिए। सरकार के पास आज भी देश को अराजकता से बचाने के लिए भरपूर अधिकार है, और उनका इस्तेमाल इस मकसद में कम ही होता है। इन अधिकारों को और बढ़ा देना, अदालत के मकसद से परे उनका इस्तेमाल बढ़ाने के अलावा शायद ही कुछ और होगा। सुप्रीम कोर्ट की मर्जी और उसके हुक्म की सील-मुहर के साथ यह नई सरकारी व्यवस्था अधिक अलोकतांत्रिक होने का खतरा है। अदालत को भी लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकारों को और अधिक अराजक नहीं होने देना चाहिए, सरकारें कानून के लचीलेपन को नाजायज हद तक खींचकर भी अपने अधिकार क्षेत्र बढ़ाने की कोशिश वैसे भी करती हैं, और उनसे लोकतंत्र खतरे में पड़ता है।


