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अपनी विधा, और अपनी शैली से परे सरोकार और एकजुटता के शब्द भी..
सुनील कुमार ने लिखा है
28-Sep-2025 4:22 PM
अपनी विधा, और अपनी शैली से परे सरोकार और एकजुटता के शब्द भी..

नेपाल में हुए बड़े जनआंदोलन के बाद के सत्तापलट को लेकर भारत में भी यह सुगबुगाहट चल रही थी कि श्रीलंका के बाद बांग्लादेश, और बांग्लादेश के बाद नेपाल, इन सत्तापलटों के बाद क्या भारत में भी उसका कुछ असर हो सकता है? भारतीय संसद के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संविधान बचाने, और चुनाव आयोग का भांडाफोड़ करने के अभियान के तहत भारत में भी नौजवानों के बारे में यह कहा कि वे लोग संविधान बचाएंगे। नेपाल के जनआंदोलन से शुरू शब्दावली, जेन-जी, यानी 25-30 बरस उम्र के नौजवान, जेन-जी का इस्तेमाल राहुल गांधी ने किया, तो उस पर बड़ी जलती-सुलगती प्रतिक्रिया आई कि वे इस देश में लोगों को बगावत के लिए उकसा रहे हैं। लेकिन अभी उस राजनीतिक विवाद पर मैं बात नहीं कर रहा। मैं लद्दाख में चल रहे जनआंदोलन में अचानक हिंसा आने, और आगजनी करने के बाद वहां के अहिंसक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी से उपजे माहौल की बात कर रहा हूं। सोनम को लेह के 15 डिग्री तापमान से गिरफ्तार करके राजस्थान के जोधपुर में 36 डिग्री तापमान पर ले जाकर वहां की जेल में रखा गया है, और इसे लोग आंदोलन को तोडऩे की एक सरकारी हरकत बता रहे हैं।

अब फेसबुक पर एक पत्रकार-साहित्यकार दोस्त, दिनेश श्रीनेत ने आज ही यह लिखा है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अलग-अलग हिन्दी साहित्यकारों के फेसबुक पेज पर जाकर देखा कि इस ताजा जलते-सुलगते मुद्दे पर कौन क्या लिख रहे हैं, तो उन्हें बड़ी निराशा हुई कि हिन्दी साहित्यकार अपने आपमें मगन पड़े हुए हैं, अपनी किताबों, आयोजनों, और मंच की बात कर रहे हैं, रॉयल्टी और पुरस्कार की बात कर रहे हैं, लेकिन वे देश के सबसे ज्वलंत मुद्दों, और उनके पीछे के आंदोलनों पर कुछ भी नहीं लिख रहे हैं। उनकी निराशा हम आज इसी पेज पर इस कॉलम के नीचे देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उससे परे कुछ और बातों पर सोचने की जरूरत है।

हिन्दी साहित्य में कई बड़े-बड़े साहित्यकारों को लेकर यह चर्चा उठती है कि जिंदगी के असल मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती, और लोग अपनी-अपनी पसंदीदा विधा में गुलमोहर के सुर्ख रंग से लेकर बादलों तक पर लिखते रहते हैं, और बस्तियों को जलाने से उठे काले बादल उन्हें नहीं दिखते, और न ही बिखरा हुआ सुर्ख लहू उनकी कोई टिप्पणी पाता। बहुत से लोग नामी-गिरामी साहित्यकारों की वकालत करते हैं कि वे अखबारों के लिए रिपोर्टिंग तो कर नहीं रहे हैं कि हर ताजा घटना पर उन्हें लिखना ही है। वे अपनी विधा में लिखी गई कविताओं और कहानियों में भी अपने ‘किस्म से, अपनी शैली में’ प्रतिरोध दर्ज करते हैं।

मैं इन दोनों बातों के बीच एक अलग ही शून्य में देखकर यह सोचता हूं कि किसी कवि या साहित्यकार को, या उपन्यासकार को आसपास हो रही घटनाओं पर साहित्य की रचना करना जरूरी न लगे, वहां तक तो बात ठीक है, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हुए भी जो लोग आज की दुनिया के जुल्म और ज्यादती पर कुछ भी नहीं लिखते, क्या वे किसी भी किस्म का लेखक होने का हक रखते हैं? मैं कविता पढ़ता नहीं, समझता भी नहीं, लेकिन इतना समझता हूं कि जिस कवि के पास कविता लिखने को शब्द हैं, भाव हैं, उसके पास फिलीस्तीन के बारे में, नेपाल के बारे में, किसी भीड़त्या के बारे में, अफगानिस्तान की महिलाओं के बारे में कुछ भी, एक टिप्पणी भी लिखने लायक शब्द तो रहते होंगे? जो लेखक, कवि, साहित्यकार ऐसे ऐतिहासिक जुल्म के बारे में, बेइंसाफी के बारे में अगर कोई टिप्पणी लिखना भी जरूरी नहीं समझते, तो यह समाज को उनसे मिलने वाली एक आम निराशा है, इसका उनकी साहित्यिक विधा से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

मैं कुछ और अधिक खुलासे से अपनी बात रखूं, तो वह यह है कि कोई कवि कवि होने के अलावा साक्षर भी तो है, और कवि होने के अलावा इंसान भी तो है, उसके लिए कविता से परे भी कुछ शब्द लिखना मुमकिन है। इसके बावजूद अगर गाजा को लेकर, अपने देश की साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर कुछ वाक्यों की कोई छोटी सी टिप्पणी लिखने के बजाय अगर वे अपने ही सम्मान, अलंकरण, पुरस्कार, और काव्यपाठ में मगन हैं, तो फिर वे कवि हो सकते हैं, मेरी नजर में इंसान नहीं हो सकते। मेरा तो यही मानना है कि इंसान और जानवरों में शायद सामाजिक समझ और सरोकार का ही एक बड़ा फर्क है जो कि इंसानों को अधिक अहंकार का हकदार बनाता है। लोग अगर आसपास बिखरे लहू के लालरंग के बजाय किसी सुहागन के सिंदूर के लालरंग पर कविता लिखते हैं, तो यह उनका बुनियादी हक तो है, लेकिन यह मुझे हक्का-बक्का भी करता है।

जिनके पास आंखें हैं, और जो देख सकते हैं, जिनके पास कान हैं, और जो सुन सकते हैं, जिनके पास नाक है, और जो आसपास जलती हुई चीजों को सूंघ सकते हैं, जिनके पास दिमाग है, और वे आसपास की हिंसा और बेइंसाफी को समझ सकते हैं, वे अगर अपने होठों और जुबान का इस्तेमाल इन मुद्दों पर न करें, अपनी की-बोर्ड पर दौड़ती उंगलियों से दुनिया के जख्मों के लिए म र ह म टाईप न कर सकें, तो इसमें उनके भीतर के कवि की कोई कमी नहीं है, उनके भीतर की तथाकथित इंसानियत की ही कमी है। मैंने दिनेश श्रीनेत के जिस लेख के कुछ हिस्से पढक़र ही इस मुद्दे पर लिखना तय किया, हो सकता है कि मैं उससे कहीं पर प्रभावित रहूं, और कहीं मैं उससे अलग भी सोच और लिख रहा होऊंगा। लेकिन मेरा यह मानना है कि जिन लोगों के पास अक्षर हैं, वे दुनिया के कुछ सबसे गहरे जख्मों के हिज्जे भी न लिख सकें, तो उन्हें साक्षर क्यों माना जाए? साक्षर होना तो पढऩे-लिखने की एक बड़ी छोटी सी तकनीकी क्षमता है, जिसे कोशिश करके तोते को भी सिखाया जा सकता है। लेकिन तोते को सामाजिक-सरोकारी शायद नहीं बनाया जा सकता।

कुल मिलाकर मेरा यही कहना है कि हम किसी रचनाकार से दुनिया में चारों तरफ घट रही घटनाओं पर रचना लिखने की उम्मीद न भी करें, तो भी बोलने की उम्मीद तो कर सकते हैं, चार लाईनें लिखने की उम्मीद तो कर सकते हैं? एक शायर जुल्म के खिलाफ गजल चाहे न लिखे, गद्य के दो वाक्य तो वह लिख ही सकता है? पाकिस्तान में जियाउल हक की फौजी हुकूमत के दौरान फैज की क्रांतिकारी गजल, हम देखेंगे गाने वाली इकबाल बानो ने वे शब्द नहीं लिखे थे, महज गाए थे। एक का हुनर लिखना था, एक का हुनर गाना था, और उस स्टेडियम में बैठकर फौजी तानाशाह से डरे बिना जिन लोगों ने उसे सुना था, वे भी क्रांतिकारी थे। इसलिए हर क्रांतिकारी, हर सरोकारी का लिखना जरूरी नहीं होता, गाना जरूरी नहीं होता, वे महज साधारण सी बात भी लिखकर एकजुटता दिखा सकते हैं। लेकिन जिन लोगों में एकजुटता दिखाने की जरूरत के मौके पर महज अपने आपका बाजार बढ़ाने की हवस हो, तो वह बात तो मुझे खटकती है। आज इतनी बातें लिखने के लिए मेरे पास अखबार का संपादकीय कॉलम है, अपना खुद का साप्ताहिक कॉलम है, एक वीडिटोरियल है, लेकिन इन सबके बिना भी मैं दस-बीस शब्दों में किसी सरोकार से एकजुटता भी दिखा सकता हूं, अपने अखबार और यूट्यूब चैनल से परे।

जब लोगों से एक साधारण सी एकजुटता के शब्दों की उम्मीद की जाती है, और वैसे में भी जब लोग साहित्य की अपनी शैली और विधा की आड़ ले लेते हैं, तो वैसे लोग मुझे वैसे ही लगते हैं जो कि उस गली से आ-जा रहे थे जहां एक नौजवान, एक लडक़ी को दर्जनों बार चाकू मार रहा था, और उसे मार ही डाला, लोग आते-जाते ही रहे। लोगों की यह आवाजाही एक कविता हो सकती है, लेकिन वह सरोकार नहीं हो सकती। आते-जाते लोग यह दावा कर सकते हैं कि उनका काम महज आवाजाही है, लेकिन उनके बगल में होते हुए खुले कत्ल से अगर उनके माथे पर बल नहीं पड़ता, तो वैसा माथा किसी सम्मान के तिलक का हकदार कम से कम मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है  कि कुदरत ने इंसानों को जो पांच इन्द्रियां दी हैं, वे प्रतिरोध और प्रतिकार की ताकत भी रखती है, उनके लिए किसी छठी इन्द्रिय की जरूरत नहीं पड़ती है, महज मामूली से सरोकार और हौसले की जरूरत पड़ती है। इस सरोकार के बिना आपकी लिखी कविता शब्दों के घूरे से अधिक कुछ और हो सकती है?

जिनके पास शब्द हों, भाव हों, कागज-कलम और की-बोर्ड हो, उसके बाद भी अगर उनके पास आसपास गिरती लाशों पर कहने को कुछ न हो, तो उनके सोचने, और शौचने में क्या फर्क है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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