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हर पल के मेहनती चुनाव प्रचारकों के मुकाबले पार्टटाईम लीडर कैसे चलेगा?
सुनील कुमार ने लिखा है
07-Dec-2025 3:52 PM
हर पल के मेहनती चुनाव प्रचारकों के मुकाबले पार्टटाईम लीडर कैसे चलेगा?

एक वक्त जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे, और अब सिर्फ कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अभी भारत की चुनावी हकीकत के बारे में कुछ गंभीर बातें कही हैं। वे देश के एक छोटे बना दिए गए प्रदेश के हैं, लेकिन उन्होंने जो बात कही है वह देश के आज के विपक्ष के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक जायज और जरूरी हैं। वे गिनीचुनी लोकसभा सीटों के सीएम हैं, लेकिन उन्होंने यूपी, बिहार, महाराष्ट्र जैसे बड़े प्रदेशों के विपक्षी नेताओं के सोचने-विचारने का एक मुद्दा सामने रखा है। उन्होंने कहा कि विपक्षी ‘इंडिया गठबंधन’ अभी वेंटिलेटर पर है, दूसरी तरफ भाजपा की चौबीसों घंटे चलने वाली चुनावी मशीन से मुकाबला करने की चुनौती उसके सामने है। उन्होंने कहा कि वे अपने पिता की ईवीएम की धांधली वाली बात से सहमत नहीं हैं। वे ईवीएम पर शक नहीं करते। दूसरी तरफ उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि भाजपा हर चुनाव ऐसे लड़ती है मानो उसकी जिंदगी दांव पर लगी हो, और हम (विपक्ष) कभी-कभी चुनाव ऐसे लड़ते हैं मानो हमें कोई परवाह ही नहीं है। उन्होंने पीएम नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम के चौबीस घंटे राजनीति के मॉडल की चर्चा करते हुए कहा कि वे एक चुनाव होते ही अगले क्षेत्र में चले जाते हैं, दूसरी तरफ भाजपाविरोधी पार्टियां चुनाव के दो महीने पहले पांव धरती हैं, और अगर नामांकन की आखिरी तारीख तक भी इन पार्टियों में चुनावी गठबंधन हो जाए, तो विपक्ष किस्मत का बुलंद होगा। उन्होंने भविष्य के लिए कहा कि भाजपा को गंभीर चुनौती देने का अकेला तरीका विपक्ष के सबसे बड़े घटक दल कांग्रेस के इर्द-गिर्द एकजुट होना है क्योंकि भाजपा के अलावा वह अकेली ऐसी पार्टी है जिसकी पूरे देश में मौजूदगी है। उमर अब्दुल्ला ने मंजूर किया कि क्षेत्रीय दलों की सीमित भौगोलिक पहुंच की सीमाएं हैं।

आज जब भाजपा विरोधी पार्टियां बिहार में औंधेमुंह गिरी हुई हैं, बंगाल के चुनाव को वामपंथी और कांग्रेसी मानो अपनी-अपनी आराम कुर्सियों पर अधलेटे पड़े हुए दूर से देख रहे हैं, तब भाजपा ने बंगाल की एक-एक विधानसभा सीट के लिए देश भर से अपने संगठन के नेता तय कर दिए, जैसे कि उसने बिहार में किए थे। मोदी और शाह की अगुवाई में भाजपा इस अंदाज में बिहार का चुनाव लड़ी है कि एक भी सीट हार जाने पर देश की सत्ता ही उनके हाथ से निकल जाएगी। दूसरी तरफ राहुल-पार्टी, और लालू-पार्टी मतदान खत्म हो जाने तक दोस्ताना मुकाबले में लगे हुए थे, और जीत के किसी गणित या समीकरण से उन्हें ऐसा ही परहेज था जैसा कि गणित नापसंद करने वाले किसी छात्र का होता है। भाजपा की बंगाल की तैयारी का हाल यह है कि आज कोलकाता में रामदेव और धीरेन्द्र शास्त्री की मौजूदगी में गीता पाठ होने जा रहा है जिसमें पांच लाख लोगों के आने की उम्मीद जताई गई है, और तैयारी की गई है।

किसी राज्य की सत्ता में रहने पर भी भाजपा के सबसे बड़े केन्द्रीय नेता चुनाव के पहले के महीनों में वहां इतनी बार दौरा करते हैं कि पार्टी के हर कार्यकर्ता चौकन्ने होकर खड़े हो जाते हैं। यह पार्टी एक समय संसद में लोकसभा में दो सदस्यों की रह गई थी, वहां से लेकर अभी तक उसने लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने का एक रिकॉर्ड बनाया है, साथ ही विपक्ष को कई तरह से मटियामेट भी कर दिया है।

उमर अब्दुल्ला की यह बात तो सही है कि इंडिया गठबंधन की पार्टियों को कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही एकजुट होना पड़ेगा, क्योंकि वही एक राष्ट्रीय पार्टी इस गठबंधन में है, बाकी तमाम पार्टियां एक या दो प्रदेशों तक ही सीमित हैं। लेकिन कांग्रेस का हाल देखने लायक है। उसके आज के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी पार्टी के किसी पद पर नहीं हैं, वे लोकसभा में विपक्ष के नेता जरूर हैं, लेकिन अपने संगठन में वे सबसे बड़े पदाधिकारी नहीं हैं। दूसरी तरफ मल्लिकार्जुन खरगे सरीखे जैसे बुजुर्ग और दलित नेता पार्टी के अध्यक्ष जरूर बनाए गए हैं, लेकिन वे पार्टी की नीतियां तय नहीं करते, उनकी घोषणा नहीं करते, यह सारा काम राहुल गांधी करते हैं, जो कि अपने पार्टी संगठन के प्रति किसी तरह जवाबदेह नहीं हैं। यूपीए सरकार के दौरान वे मनमोहन मंत्रिमंडल के विधेयक के मसौदे को दिल्ली प्रेस क्लब में फाडक़र फेंक चुके हैं, और गठबंधन सरकार को मंत्रिमंडल से पास उस विधेयक को खारिज करना पड़ा था। वे कांग्रेस के राजकुमार हो सकते हैं, वे विपक्ष के सबसे चर्चित नेता भी हो सकते हैं, लेकिन इन दोनों बातों से वे मोदी और शाह के मुकाबले के नेता नहीं बन सकते।

मोदी और शाह को देखें, तो वे रात-दिन राजनीति करते, चुनावी तैयारी करते, और प्रचार करते ही दिखते हैं। इस बीच वे बंद कमरे में जितनी भी देर सरकारी काम करते हों, उसका जो हिस्सा सार्वजनिक होता है, वह मतदाताओं को प्रभावित करने वाला होता है। देश की अर्थव्यवस्था, लोगों की जमीनी दिक्कत, बेरोजगारी, या आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को मोदी और शाह उसी तरह अनदेखा करते हुए भावनात्मक प्रचार में लगे रहते हैं जैसा अनदेखा करने के लिए कहा जाता है कि कुत्ते भौंके हजार, हाथी चले बजार। न तो हम मोदी-शाह को हाथी कह रहे, न ही विपक्ष को कुत्ता कह रहे, लेकिन भाजपा के नेताओं को देखें तो वे किसी भी वास्तविक संकट या समस्या से अपने को पूरी तरह निर्लिप्त रखते हुए प्रचार में जुटे रह सकते हैं।

दूसरी तरफ दो चुनाव प्रचारों के बीच राहुल गांधी कब किस देश चले जाते हैं, किसलिए जाते हैं, वहां क्या करते हैं, यह सब रहस्य बना रहता है।  अब बाकी तमाम तिकड़म और तैयारी के साथ-साथ 365 दिन चौबीसों घंटे चुनावी राजनीति करने वाले मोदी और शाह के मुकाबले राहुल गांधी की राजनीति पार्टटाईम शौकिया काम करने वाले की दिखती है। कुछ तो पारिवारिक विरासत की वजह से, और कुछ अपनी पार्टी की पूरे देश में मौजूदगी की वजह से कांग्रेस और राहुल गांधी अपने विपक्षी गठबंधन के केन्द्र में बने रहते हैं, फिर चाहे वे फिल्म में अतिथि कलाकार की तरह कुछ देर के लिए ही क्यों न आते हों।

भारत जैसे विशाल देश में मोदी और शाह जैसे मेहनतकश प्रचारकों का मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी एक गैरगंभीर नेता हैं, जो अधिक मेहनत नहीं कर पाते हैं, और न ही उन्होंने बीते बरसों में इंडिया गठबंधन को बचाने के लिए सार्वजनिक रूप से कुछ किया। जब भाजपा महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी जैसी पार्टियों को तोड़ रही थी, और कांग्रेस वाले गठबंधन को खोखला कर चुकी थी, उस वक्त भी राहुल गांधी बिना किसी जरूरत के उद्धव ठाकरे की पार्टी को शर्मिंदगी दिलाते हुए सावरकर के खिलाफ बेमौके का एक बयान देते हैं, और गठबंधन-धर्म को लात मारते हैं। इतिहास में सच तो बहुत कुछ था, लेकिन उसमें से हर सच को, हर मौके पर दोहराना आज जरूरी तो नहीं होता। राहुल गांधी की वजह से इंडिया-गठबंधन बचा हुआ नहीं है, वह राहुल के बावजूद बचा हुआ है, यह गौर करने की बात है। भाजपा भारत में आज जिस तरह पूरे पांच बरस चुनावी राजनीति करने वाली एक मंजी हुई मशीन बन चुकी है, उसके मुकाबले राहुल गांधी अभी वैसे ही हैं जैसे किसी खेल की राष्ट्रीय टीम के मुकाबले उस देश की कोई सबजूनियर टीम हो।

अभी हम मोदीराज में देश की संवैधानिक संस्थाओं के हाल के बारे में कुछ कहना इसलिए नहीं चाहते कि अभी भी देश में उनके मुद्दों पर गौर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट बचा हुआ है। और लोकतंत्र में उससे परे की तो कोई व्यवस्था हो नहीं सकती। फैसले या तो जनता की अदालत में तय हो सकते हैं, या देश की सबसे बड़ी अदालत में। राहुल और उनका विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ इन दोनों ही अदालतों में नहीं जीत पाया। फिर यह भी है कि कभी ईवीएम, कभी वोटर लिस्ट, कभी कोई और मुद्दा ढूंढकर उसके सिर पर हार का ठीकरा फोड़ा जाए, तो इससे एक सहूलियत का बहाना मिल जाता है, और विपक्ष को अपनी हार की असली वजह तलाशने की जहमत नहीं उठानी पड़ती।

उमर अब्दुल्ला की यह बात सही है कि इंडिया-गठबंधन की पार्टियों को कांग्रेस के इर्द-गिर्द एकजुट होना पड़ेगा, लेकिन साल में छह महीने इन पार्टियों को राहुल को ढूंढते दुनिया के कौन से देशों में जाना पड़ेगा, इसकी कोई राह भी उमर अब्दुल्ला बता सकते हैं?

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