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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में देरी पर नाराजगी
एक साल में 33 मौत, 22 मामलों में अब तक नहीं आई पीएम रिपोर्ट
एनएचआरसी ने भी चार साल में 285 मौतों पर मांगा है जवाब
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 8 अप्रैल। छत्तीसगढ़ की जेलों में एक साल के भीतर 33 कैदियों की मौत के मामले को लेकर हाईकोर्ट ने जेल महानिदेशक (डीजी) से व्यक्तिगत शपथ-पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में सुनवाई में लिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले को गंभीर बताते हुए 15 अप्रैल को अगली सुनवाई तय की है।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 33 में से 22 मृत कैदियों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अब तक प्राप्त नहीं हुई है। दुर्ग जेल के एक मामले में तो एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट लंबित है। इस पर हाईकोर्ट ने नाराज़गी जताई है और जवाबदेही तय करने कहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बिलासपुर सेंट्रल जेल में सबसे अधिक 10 कैदियों की मौत हुई। इसके बाद दुर्ग सेंट्रल जेल में 8 और अंबिकापुर सेंट्रल जेल में 5 मौतें दर्ज की गईं। इसके अलावा जगदलपुर और गरियाबंद में 2-2 तथा धमतरी, बलरामपुर, मुंगेली, कोरबा, रायगढ़ और कांकेर में एक-एक कैदी की मौत हुई।
बीमार होने पर कई कैदियों को बिलासपुर के सिम्स और रायपुर के डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
मालूम हो कि इसी मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सख्ती दिखाई है। आयोग ने बीते 26 मार्च को राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार वर्षों में 285 कैदियों की मौत पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
आयोग ने जेलों में भीड़ भाड़, डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों की कमी तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि संक्रमण और मानसिक तनाव के कारण कैदियों की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
वर्ष 2022 में सबसे अधिक 90 मौतें दर्ज हुईं, जबकि जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच 66 कैदियों की जान गई।


