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युवती को भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार दिया
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 2 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम से संबंधित एक मामले में साफ किया है कि मौसेरे भाई-बहनों के बच्चों के बीच विवाह निषिद्ध संबंधों की श्रेणी में आता है और ऐसा विवाह कानूनी रूप से शून्य माना जाएगा। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की खंडपीठ ने जांजगीर-चांपा जिले के इस मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है।
अभियोजन के अनुसार, जांजगीर-चांपा निवासी युवक ने 20 अप्रैल 2018 को पास के गांव की युवती से विवाह किया था। विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की। उसका तर्क था कि उसकी मां और पत्नी की मां सगी बहनें हैं, जिससे दोनों आपस में मौसेरे भाई-बहन हैं।
फैमिली कोर्ट ने यह मानते हुए कि पटेल समाज में ब्रह्म विवाह नामक प्रथा के तहत ऐसे विवाह होते हैं, इस विवाह को वैध ठहराया था। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रथा को कानून का दर्जा देने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि वह प्राचीन, सतत और सार्वजनिक नीति के अनुरूप हो। इस मामले में ऐसा कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह सिद्ध हो सके कि निषिद्ध संबंधों में विवाह की कोई वैध परंपरा मौजूद है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(4) के अनुसार ऐसे रिश्तों में विवाह अवैध है। इसी आधार पर विवाह को शून्य घोषित किया गया।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह निरस्त होने के बावजूद प्रभावित पक्ष को धारा 25 के तहत स्थायी भरण-पोषण (परमानेंट एलिमनी) के लिए आवेदन करने का अधिकार रहेगा।


