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दुष्कर्म और हत्या मामले में मौत की सजा रद्द, पर पूरी जिंदगी जेल में रहेगा दोषी
02-May-2026 11:46 AM
दुष्कर्म और हत्या मामले में मौत की सजा रद्द, पर पूरी जिंदगी जेल में रहेगा दोषी

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 2 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक कर्मचारी के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी को दी गई मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौत की सजा केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही दी जा सकती है, और जब यह कठोर मानक पूरा नहीं होता, तब सजा को उम्रकैद में परिवर्तित करना जरूरी हो जाता है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि यह उम्रकैद दोषी के पूरे प्राकृतिक जीवन तक प्रभावी रहेगी।

अभियोजन के अनुसार बेमेतरा की फैमिली कोर्ट में कार्यरत 25 वर्षीय महिला कर्मचारी  9 अगस्त 2022 को छुट्टी लेकर अपने गांव खैरमुड़ा गई थी। 14 अगस्त की सुबह करीब 9 बजे वह एक्टिवा से बेमेतरा जाने के लिए निकली, लेकिन रास्ते में ही लापता हो गई। अगले दिन उसके पिता ने डभरा थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई।

जांच के दौरान संदेह आरोपी शंकर निषाद पर गया, जो पीड़िता का परिचित था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड और परिजनों के बयानों से यह सामने आया कि दोनों के बीच लगातार संपर्क था। जांच में यह भी सामने आया कि घटना के दिन आरोपी पीड़िता को पलागड़ा घाटी की ओर ले जाते देखा गया, जबकि वापसी में वह अकेला था।

पुलिस पूछताछ में आरोपी ने अपराध कबूल करते हुए बताया कि उसने बारिश का बहाना बनाकर पीड़िता को दूसरे रास्ते से ले जाने की बात कही और उसे खरसिया स्टेशन होते हुए जंगल क्षेत्र में ले गया। वहां उसने पीड़िता के हाथ बांधकर दुष्कर्म किया और ब्लेड से नसें काटकर उसकी हत्या कर दी। आरोपी के बयान के आधार पर पुलिस ने जंगल से शव बरामद किया।

इस मामले में जांजगीर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी को मौत की सजा सुनाई थी। राज्य सरकार ने इसकी पुष्टि के लिए हाईकोर्ट में संदर्भ भेजा था, वहीं आरोपी ने भी सजा के खिलाफ अपील दायर की थी।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की पुनः सुनवाई करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने परिस्थितियों के संतुलन का सही आकलन नहीं किया। साथ ही रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी में सुधार की कोई संभावना नहीं है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दोष सिद्ध होना पूरी तरह से सही है, लेकिन यह मामला रेयरेस्ट ऑफ रेयर श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मौत की सजा को बरकरार रखना कानूनी रूप से उचित नहीं है। इस आधार पर सजा को बदलते हुए उम्रकैद कर दिया गया।


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