कोण्डागांव
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
कोण्डागांव, 1 सितंबर। जिलेभर में 1 सितम्बर को बस्तर की आस्था और परंपरा से जुड़ा नवा खाई पर्व धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर जिला प्रशासन ने हर वर्ष की तरह इस बार भी शासकीय व निजी विद्यालयों के लिए अवकाश घोषित किया था, ताकि सभी विद्यार्थी और परिवारजन इस पर्व को पारंपरिक उत्साह से मना सकें। लेकिन जिले के चावरा स्कूल ने प्रशासनिक आदेश की अनदेखी करते हुए इस दिन कक्षाएं संचालित कीं, जिससे ग्रामीणों और अभिभावकों में नाराजगी देखी गई।
बस्तर की लोकसंस्कृति में नवा खाई पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व खेतों में धान की नई फसल आने पर मनाया जाता है। ग्रामीण इस दिन खेत से नई बालियां तोडक़र देवी-देवताओं को अर्पित करते हैं और उसके बाद बड़े हर्षोल्लास से घर-घर में पर्व का आयोजन होता है। यही कारण है कि जिला प्रशासन इस पर्व को देखते हुए शासकीय अवकाश घोषित करता है।
कोण्डागांव स्थित चावरा स्कूल, जो कि ईसाई मिशनरी संस्था द्वारा संचालित है, ने इस पारंपरिक पर्व को महत्व न देते हुए विद्यालय खुला रखा। स्थानीय लोगों का कहना है कि विद्यालय प्रबंधन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण हिंदू परंपराओं और बस्तर की संस्कृति को नजरअंदाज करता है।
जब इस संबंध में विद्यालय की प्राचार्या एसआर सिसलिया से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि नवा खाई का अवकाश विद्यालय में 3 सितंबर को रखा गया है। उन्होंने दावा किया कि इस विषय पर फोन पर कलेक्टर से चर्चा की गई है, हालांकि लिखित में कोई अनुमति नहीं ली गई है।
जिला शिक्षा अधिकारी भारती प्रधान ने स्पष्ट किया कि शासन द्वारा घोषित अवकाश का पालन सभी विद्यालयों को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चावरा स्कूल ने लिखित अनुमति नहीं ली है और केवल फोन पर बात को अनुमति नहीं माना जा सकता। डीईओ ने यह भी कहा कि जब पूरा जिला परंपरा और आस्था से जुड़े पर्व को मना रहा है, तब विद्यालय को नियमों का पालन करते हुए बच्चों को घर पर अवकाश देना चाहिए था।
स्थानीय सर्व आदिवासी युवा प्रभाग जिलाध्यक्ष यतीन्द्र सलाम छोटू का कहना है कि, यह घटना सिर्फ प्रशासनिक आदेश की अवहेलना नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति भी असम्मान है। चावरा स्कूल का रवैया इस ओर संकेत करता है कि धर्म विशेष की आड़ में स्थानीय संस्कृति और पर्व-त्योहारों को दरकिनार किया जा रहा है। इससे न केवल विद्यार्थियों को अपने समाज की परंपराओं से दूर करने का खतरा है, बल्कि भविष्य में सामाजिक समरसता पर भी असर पड़ सकता है।


