संपादकीय
घूम-फिरकर बात अमरीका पर ही आ टिकती है कि आज वह खुद अपनी फौजों की ताकत से, और अपने मवाली-साथी इजराइल के साथ मिलकर दुनिया पर किस तरह का कहर ढा रहा है। अभी सालभर ही हुआ है कि डॉनल्ड ट्रंप ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया, और ऐसी मनमानी चालू की कि अमरीकी संसद से लेकर अमरीकी सुप्रीम कोर्ट तक, सब हिल गए। संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह खारिज करते हुए ट्रंप ने एक कोई अपना घरेलू शांति का बोर्ड बना लिया है, जिसमें भुगतान करके लोग स्थायी सदस्य बन सकते हैं। भारत के लिए अब तक इज्जत बचने की एक बात यह है कि ट्रंप के बांह मरोडऩे के बावजूद भारत इसमें शामिल नहीं हुआ है। लेकिन ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप जिस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, वह अभी दस दिन पहले तक की उसकी खुद की गुंडागर्दी को बहुत पीछे छोड़ चुका है। आज या तो उसकी शह पर, या अपनी किसी मनमर्जी से इजराइल सरकार अपनी वेबसाइट पर यह घोषणा कर रही है कि ईरान जिसे भी अपना अगला सुप्रीम लीडर बनाएगा, इजराइल उसका कत्ल कर देगा! दुनिया के इतिहास में किसी देश ने लोकतांत्रिक होने का ढकोसला करते हुए इस तरह की बातें नहीं की थीं, जैसी ट्रंप और इजराइल आज कर रहे हैं। यह ट्रंप खुद अपनी संसद को यह नहीं समझा पाया कि ईरान पर हमला क्यों जरूरी था, उसका क्या न्यायोचित कारण है। लेकिन पहली बार दुनिया को यह समझ में आ रहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति को वहां के संविधान में मिले हुए अघोषित, असीमित, और धुंध से घिरे हुए अधिकारों के चलते उसके तानाशाह बन जाने का इतना बड़ा खतरा है। ट्रंप अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा तानाशाह-राष्ट्रपति साबित हो चुका है, और अभी उसका कार्यकाल एक तिहाई भी नहीं गुजरा है।
हम आज सिर्फ अमरीका, इजराइल, और ईरान को लेकर बात नहीं कर रहे हैं, हम इस जंग से प्रभावित दूसरे देशों को लेकर भी बात करना चाहते हैं। आज दुनिया इस बात पर भी हैरान है कि रूस और चीन, ईरान के जो दो सबसे ताकतवर दोस्त दिखते आ रहे थे, वे अचानक चुप बैठ गए हैं। अमरीका और इजराइल के, इतिहास के सबसे नाजायज हमलों पर भी वे ईरान के साथ नहीं खड़े हैं, बल्कि कोई कड़े बयान तक इन दो महाशक्तियों से नहीं आए हैं। चीन के बारे में आज सुबह एक अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक कह रहे थे कि अगले महीने ट्रंप चीन जा रहा है, और चीन ऐसे नाजुक मौके पर ईरान के बारे में कोई कड़ी या कड़वी बात कहकर ट्रंप का मूड खराब करना नहीं चाहता है। दुनिया का सबसे बड़ा मवाली जाने किस बात से भडक़ जाए, या गब्बर किस बात पर आपा खोकर गोलियां चलाने लगे, यह किसे पता है।
ऐसे माहौल में भारत के भीतर सरकार की खासी आलोचना हो रही है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल से लेकर आज तक कभी उनकी इतनी आलोचना नहीं हुई थी जितनी ट्रंप के सामने उनकी चुप्पी को लेकर हो रही है। मोदी एक नेता के रूप में ही नहीं, भारत एक देश के रूप में भी ट्रंप के बकवासी बयानों पर असाधारण चुप्पी साधे हुए है। कई लोगों का ऐसा मानना है कि यह भारत के राष्ट्रीय सम्मान के खिलाफ है, लोग 1971 की इंदिरा गांधी को याद करते हैं जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाते हुए अमरीका की किसी धमकी को नहीं सुना था। दो मिसालों को जोडऩे से एक बड़ी दिक्कत यह रहती है कि उन दोनों के बीच की समानताएं गिनाने के पहले उनके बीच की असमानताएं उभरकर सामने आ जाती हैं। 1971 की दुनिया अलग किस्म की थी, उस वक्त अमरीका के ईर्द-गिर्द दुनिया एकध्रुवीय नहीं घूम रही थी, उस वक्त रूस रूस नहीं था, वह सोवियत संघ था, और उसकी बड़ी ताकत थी, दुनिया में गुट-निरपेक्ष आंदोलन बहुत मजबूत था, और भारत नेहरू की वैश्विक लीडरशिप की रौशनी में बना हुआ था, उनके बाद इंदिरा गांधी उसी लीडरशिप की विरासत को आगे बढ़ा रही थीं। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बहुत रफ्तार से अमरीका ने एकध्रुवीय साम्राज्य कायम कर लिया, और अब तो उसके बाद से गंगा में बहुत पानी बह चुका है, और अमरीका के सामने दुनिया में कुछ नहीं बचा है। ऐसे में जब अमरीका का राष्ट्रपति अपने नाटो के साथी देशों से भी हिकारत दिखाते हुए, उन्हें धमकियां देते हुए, कहीं ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मुनादी करते हुए गुंडागर्दी कर रहा है, तो भारत उसके सामने सीना तानकर खड़ा हो, यह एक देश के रूप में तो अच्छी बात होगी, लेकिन यह अमरीका में बसे हुए लाखों कामकाजियों के लिए भी अच्छी बात होगी या नहीं, अमरीका से आयात-निर्यात पर जिंदा लाखों भारतीय कारोबारियों के लिए अच्छी बात होगी या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। इंदिरा गांधी के वक्त दुनिया के देशों के रिश्तों में कारोबार का इतना दखल नहीं रहता था, जितना कि हाल के बरसों में हुआ है। इंदिरा के वक्त आर्थिक उदारीकरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन बाद के बरसों में राजीव गांधी, नरसिंह राव, और फिर मनमोहन सिंह के कार्यकालों ने भारत की आर्थिक फिलॉसफी को बदलकर रख दिया था। आज भारत के लोग भी देश के भीतर उस पुरानी अर्थव्यवस्था में वापिसी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए न सिर्फ भारत, बल्कि रूस और चीन जैसी सरकारों को, और योरप के तमाम नाटो-सदस्य देशों को भी ट्रंप को बर्दाश्त करना पड़ रहा है। हम इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोडक़र तो देखते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक बिफरे हुए गैंगस्टर की बंदूकों के सामने खड़े होते हुए बरती जा रही सावधानी से भी जोडक़र देखते हैं। आज दुनिया में अमरीका का सबसे बड़ा मुकाबला जिस चीन से है, वह चीन भी ईरान के बारे में कुछ बोलने के पहले सौ बार सोच रहा है, और याद रख रहा है कि अगले ही महीने यह गैंगस्टर चीन पहुंचने वाला है।
ट्रंप ने दुनियाभर में जो कार्रवाई की है, उसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों, संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र, और वैश्विक परंपराओं, सबको रौंदकर रख दिया है। उसने 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय वैश्विक अनुबंधों को तोड़ दिया है, और अमरीका की वैश्विक जवाबदेही, उसके सरोकार, सबको खत्म कर दिया है। आज उसके हाथ दुनिया की सबसे ताकतवर फौज है, वह दुनिया का सबसे बड़ा ग्राहक है, औसत अमरीकी दुनिया में सबसे अधिक खपत करते हैं, और दुनिया के तमाम देश अगर किसी एक देश के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर सबसे अधिक मोहताज हैं, तो वह अमरीका ही है। ऐसे में आज दुनिया के सारे गरीब देश यूएस-एड खत्म हो जाने से उन्हें मिलने वाली मदद खो चुके हैं, दर्जनों देशों में न टीकाकरण हो पा रहा है, न गंभीर बीमारियों की जांच हो पा रही है, और न ही एड्स जैसी बीमारी की दवाई मरीजों को मिल पा रही है। ट्रंप ने दुनिया के लिए अमरीका की जिम्मेदारी को जिस अंदाज में खत्म किया है, उसे भी दुनिया के कोई जिम्मेदार देश अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं। आज इक्का-दुक्का नेता ही ऐसे हैं जो कि ट्रंप के मनमाने फैसलों के खिलाफ अपने देश को खड़ा कर पा रहे हैं, बाकी किसी की कोई हस्ती बची नहीं है। आज हाल यह है कि अमरीकी फौजों को भेजकर ट्रंप वेनेजुएला से वहां के राष्ट्रपति का अपहरण करवा ले रहा है, उसे कैदी बनाकर अमरीकी अदालत में पेश कर रहा है, और जेल भेज दे रहा है। अमरीकी एयरफोर्स वेनेजुएला पर हमले कर रही है। ट्रंप की यह फौज अफ्रीका के एक देश पर यह कहते हुए हमला करती है कि वहां एक प्रदेश में ईसाइयों पर हमला हो रहा है। इस तरह ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों, और व्यवस्था को पूरी तरह बुलडोज कर दिया है। इस बुलडोजर के सामने खड़े होकर कोई स्वाभिमानी स्वाभिमान तो बचा सकते हैं, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों को वे किस हद तक बचा पाएंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है। जिस रूस को हम बड़ा ताकतवर मानते हैं, वह अपने और यूक्रेन की चल रही जंग को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति के बेटे या दामाद से समझौता वार्ता करने को मजबूर है। यह नौबत दुनिया को एक अभूतपूर्व खतरनाक और नाजुक मौके पर ले जाकर खड़ी कर चुकी है। किसी को ट्रंप की बद्दिमागी को कम नहीं आंकना चाहिए, अपने पर खतरा कम नहीं आंकना चाहिए। दुनिया में अपने सबसे करीबी साथी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को ट्रंप ने अभी दो दिन पहले जिस घटिया अंदाज में झिडक़ा है, और कहा है कि खाड़ी में अब ब्रिटिश फौजों की जरूरत नहीं है, और ब्रिटिश सैनिकों के आने के पहले अमरीका यह जंग जीत चुका है, ऐसे बद्जुबान नेता के सामने किसी जिम्मेदार देश के नेता को अपना मुंह नहीं खोलना चाहिए, और शायद मोदी यही कर रहे हैं। हम मोदी के साथ हमदर्दी ही जता सकते हैं कि वे आज कुछ भी करें, वे हार के अलावा कुछ हासिल नहीं करेंगे। हम फूलों के हार की बात नहीं कर रहे हैं, हम शिकस्त की बात कर रहे हैं, मोदी ट्रंप से जुबानी जंग में उलझेंगे, तो उससे करोड़ों हिंदुस्तानियों का नुकसान होगा, और आज की दुनिया में ट्रंप का कोई विकल्प नहीं है, उसकी वजह से आए हुए और छाए हुए खतरे का कोई इलाज नहीं है। भारत सरकार के सामने जो सार्वजनिक चुनौतियां हैं, हम सिर्फ उन्हीं की चर्चा कर रहे हैं। इसके अलावा कई और अप्रिय चर्चाएं भी हवा में हैं, लेकिन वहां तक पहुंचे बिना भी भारत सरकार की चुप्पी समझ में आती है, इसलिए हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं। वैसे भारत एक देश भी है, सरकार से पारे, और उसके ऊपर भी। इस देश के बाकी लोग ट्रम्प का विरोध कर ही रहे हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


