संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अगली पीढ़ी को मिल रही एक बहुत जहरीले सोशल मीडिया की विरासत
सुनील कुमार ने लिखा है
28-Feb-2026 9:30 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अगली पीढ़ी को मिल रही एक बहुत जहरीले सोशल मीडिया की विरासत

सोशल मीडिया आज दुनिया के किसी भी देश का या किसी भी भाषा का ऐसा सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच बन चुका है, जहाँ आम से लेकर खास लोग तक अपनी राय, अपने विचार और अपनी भावनाएँ बिना किसी रोक-टोक, बिना किसी संपादन के जब चाहे तब पोस्ट कर सकते हैं। जब चाहे तब उसे मिटा सकते हैं। दूसरे लोग जब चाहे तब उसे आगे बढ़ा सकते हैं, उसकी तारीफ कर सकते हैं, उसकी कॉपी करके उसे अपने नाम से आगे बढ़ा सकते हैं। बात यहाँ तक रहती तब भी ठीक रहता, लेकिन दिक्कत यह है कि नफरत की बातें सोशल मीडिया पर जंगल की आग की रफ्तार से फैलती हैं। चाहे वह दूसरे देश के लोगों से नफरत हो, दूसरे रंग, दूसरी नस्ल, दूसरे धर्म, दूसरी भाषा, दूसरे प्रदेश या दूसरी राजनीतिक पसंद के लोगों से नफरत, यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है।

सोशल मीडिया पर जिन लोगों को ट्रोल कहा जाता है, वे लोग एक पेशेवर अंदाज़ में किसी के भी पीछे लग जाते हैं, उसे घेरकर परेशान करने के अंदाज में। हम यह तो नहीं जानते कि ऐसे सारे लोग हर पोस्ट पर, हर नफरत पर, किसी के पीछे पडऩे पर, किसी को पसंद या नापसंद करने पर कोई भुगतान पाते हैं या वे अपनी सोच के चलते समर्पित कार्यकर्ता हैं। इनमें जो भी बात हो, लेकिन जो सामने दिखता है वह यह है कि नफरत, उत्तेजना और भडक़ाने वाली बातें लगातार सोशल मीडिया पर अधिक बढ़ावा पाती हैं। शायद नकारात्मक बातों को पसंद करने वाले लोग अधिक होते हैं और इसलिए सोशल मीडिया के एल्गोरिथ्म नकारात्मक बातों को तेजी से आगे बढ़ाते हैं। यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते अब बहुत से गंभीर लोगों को, जो सकारात्मक या किसी काम की बात सोशल मीडिया पर करते हैं, हतोत्साहित करने लगा है। अब लोगों को कोई न्यायसंगत और दर्द से जुड़ी बात लिखने से पहले यह सोचना पड़ता है कि कितने लोग उन्हें गालियाँ देने लगेंगे। सच यह है कि हर किसी में इतनी गालियाँ बर्दाश्त करने की क्षमता भी नहीं होती। आज हालात यह हैं कि हिंदुस्तान में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार 2024 में साइबर अपराधों में सबसे अधिक संख्या नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट की थी, जिनमें धार्मिक उन्माद, जातिगत टिप्पणियाँ, महिलाओं के खिलाफ गालियाँ और क्षेत्रीय भेदभाव की बातें सबसे आम थीं।

सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानने में हमें कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन यह इस हद तक अराजक हो चुकी है और अधिकतर देशों में इस पर कोई प्रभावी कानूनी काबू नहीं है। सरहदों के आर-पार फैले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी एक देश के कानून के तहत बाँध लेना आसान भी नहीं है। भारत का ही तजुर्बा यह है कि ऐसे प्लेटफॉर्म लगातार सरकार के नोटिस झेलते रहते हैं कि किस पोस्ट को हटाया जाए। अब सरकारों का, चाहे वह किसी प्रदेश की हों या किसी देश की, अपना तंग नज़रिया और राजनीतिक एजेंडा होता है, और वे अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कुछ पोस्ट हटवाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। लेकिन दूसरी तरफ हम देखते हैं कि भारत जैसे देश में ही सत्ता के विरोधियों के खिलाफ जिस हद तक हिंसक और अश्लील बातें लिखी जाती हैं, जिन पर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, वहाँ अक्सर कुछ भी नहीं होता। इस तरह सत्ता अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आजादी और अराजकता के दो हिस्सों में बाँट देती है। लेकिन दूसरी बात भी है, सरकार तो केवल कानूनी कार्रवाई के समय सामने आती है या उससे बचती है। दूसरी तरफ जनता के वे लोग, जो अपने नाम से सामने हैं, जो अपनी असली तस्वीरें लगाते हैं, अपने बच्चों की तस्वीरें लगाते हैं या अपने ईश्वरों की तस्वीरें भी लगाते हैं, जिनका हर चौथा-पाँचवाँ पोस्ट धर्म, आध्यात्मिक गुरु या पसंदीदा राजनेता के बारे में होता है, ऐसे लोग भी लगातार हिंसा फैलाने, अश्लील बातें लिखने और गंदी गालियाँ देने से परहेज़ नहीं करते। सोशल मीडिया आने से पहले तक इस किस्म की गंदी बातें लोग सिर्फ सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों के भीतर वाले हिस्सों में लिखते थे, और कहीं और ऐसी बातें लिखने का हौसला बिना नाम के भी नहीं होता था। अब हालात यह हो गए हैं कि लोग सोशल मीडिया पर अपने नाम से दूसरों को धमकियाँ देते हैं, महिलाओं को बलात्कार की धमकियाँ देते हैं। कई बड़े क्रिकेटरों और फि़ल्मी सितारों की छोटी बच्चियों तक को बलात्कार की धमकियाँ सोशल मीडिया पर दी गईं, और कार्रवाई कुछ भी नहीं हुई।

कहने को हिंदुस्तान का आईटी कानून इतना कठोर है कि लोगों के बच निकलने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर एक बार कोई पोस्ट हो जाए तो वह इतना पुख्ता डिजिटल या साइबर सबूत बनकर मौजूद रहता है कि मिटा देने के बाद भी खत्म नहीं होता। फिर भी देश में हर दिन लाखों लोग हजारों लोगों के खिलाफ अश्लील और हिंसक बातें लिखते रहते हैं और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं होती। नतीजा यह होता है कि लोगों को लगने लगा है कि यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसे चाहे बलात्कार की धमकियाँ दो, उनकी माँ-बहनों को, बेटियों को गालियाँ दो, और यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है। अब समाज को सोचना होगा कि ऐसे लोगों का क्या किया जाए। समाज उन्हें घेरकर मार नहीं सकता, वह गैरकानूनी होगा। लेकिन क्या समाज ऐसे हिंसक और अश्लील पोस्ट करने वालों के खिलाफ कोई लोकतांत्रिक विरोध भी नहीं कर सकता? और अगर नहीं कर सकता, तो फिर वह कैसा समाज है? उसकी जरूरत किसे है? क्या वह सिर्फ जिंदगी और मौत के जलसों पर इकट्ठा होने वाला समाज है, या इस समाज की कोई सामूहिक या राजनीतिक चेतना भी है? क्या उसकी राजनीति इसका जवाब देगी और जिम्मेदारी भी लेगी?

यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र में बड़ी निराशा पैदा करता है। दूसरी दिक्कत यह है कि किसी संक्रामक रोग की तरह यह नई पीढ़ी को इस तरह प्रभावित कर रहा है कि वे इसे ही नया सामान्य मानकर गालियाँ देने लगे हैं। सोशल मीडिया अपने मिजाज की वजह से जवाबदेही से मुक्त भी रहता है और गैर-जिम्मेदार भी। आज इस मंच पर जिम्मेदारी की बात करने वाले, मोहब्बत की बात करने वाले, गालियाँ देकर चुप करा दिए जाते हैं। दूसरी तरफ नफरत की बात करने वालों के इतने समर्थक खड़े हो जाते हैं कि उन्हें लगता है कि वही इंसानियत की बात है। यह पूरा सिलसिला गहरी निराशा पैदा करता है। भारत की अदालतों से भी इस पूरे मामले में दखल को लेकर पूर्ण भरोसा नहीं दिखता। ऐसे में समाज के ही जागरूक तबके को सोशल मीडिया पर सामने आना होगा, सही और गलत में फर्क करना होगा और अश्लील व हिंसक बातों का विरोध करना होगा। ऐसा किए बिना हम अगली पीढ़ी को एक बहुत ही जहरीला सोशल मीडिया देकर जा रहे हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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