संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जलसों में गुजरती जिंदगी, महिला दिवस की कहानी
सुनील कुमार ने लिखा है
08-Mar-2026 8:56 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : जलसों में गुजरती जिंदगी, महिला दिवस की कहानी

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर चारों तरफ जलसे चल रहे हैं। इन दो दिनों में इतने अधिक कार्यक्रम हमारे इर्द-गिर्द हो रहे हैं कि वे किसी बिना सोची-समझी साजिश जैसे अधिक लग रहे हैं कि महिलाओं को निरर्थक समारोहों में इतना व्यस्त कर दिया जाए, कि वे काम का कोई काम न कर सकें। इसमें नई बात कुछ नहीं होगी क्योंकि बनने-संवरने के पैमाने, गहने और कपड़ों की फैशन, मेहंदी से लेकर दूसरी साज-सज्जा तक, अनगिनत ऐसे तरीके अनंतकाल से चले आ रहे हैं, जिनमें महिलाओं को व्यस्त रखा जाता है। ऐसा शायद इसलिए भी किया जाता रहा होगा कि अगर वे काम करने लगेंगी, तो मर्दों के दबदबे के एकाधिकार का टूटना तय हो जाएगा। आज मुल्लाओं की मनमानी वाले ईरान में भी उच्च शिक्षा, और सरकारी कामकाज, दूसरे ओहदों तक पहुंचने में महिलाओं ने गजब का कमाल किया हुआ है। जब दबी-कुचली महिलाएं भी पढऩे का मौका मिलने पर इतना कुछ कर सकती हैं, तो जाहिर है कि पड़ोस के जाहिल तालिबान दहशत में रहते होंगे कि लडक़ी पढ़ेगी, तो मुसीबत बनेगी। अभी महिला दिवस पर एक-एक सरकारी और गैरसरकारी संगठन महिलाओं के सम्मान, और उनकी भागीदारी के जितने कार्यक्रम कर रहे हैं, उनका एक प्रतीकात्मक आडंबर से परे महिलाओं की भलाई से कोई लेना-देना नहीं है। इस सिलसिले से महिलाएं कैसे बचेंगी, और कैसे उबरेंगी, यह पता नहीं है। एक किसी पुराने गाने की तर्ज पर ऐसा लगता है कि मर्दों की दुनिया चाहती यही है कि औरतों की, उम्र जलसों में गुजर हो...

आज दुनिया के सबसे खूंखार तालिबानियों से लेकर सबसे संपन्न और विकसित अमरीका तक को देखें, जो कि अपने आपको लोकतंत्र का मुखिया कहता है, और दादा बनकर चलता है, तो वहां भी लड़कियों और महिलाओं की हालत भयानक दिखती है। एपस्टीन फाइलों को देखें, तो न सिर्फ अमरीका बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया से लेकर खाड़ी के शेखों तक, और हिन्दुस्तान के ताकतवर लोगों तक की जैसी यारी नाबालिग लड़कियों के भड़वे-दलाल एपस्टीन से रही है, उससे समझ पड़ता है कि लड़कियों और महिलाओं के बारे में मर्दों का क्या कहना है। आज जो ट्रम्प पूरी दुनिया का बेताज माफिया सरगना बना हुआ है, उस ट्रम्प ने लाख कोशिश की कि उसके सेक्स-हमलों की फाइलें दबी रह जाएं, लेकिन अमरीकी संसद की साफ-साफ चेतावनी के बाद अब सरकार को बहुत मजबूरी में रोते-झींकते इनमें से कुछ फाइलों को जारी करना पड़ा है। जिस देश का राष्ट्रपति नाबालिग लड़कियों से लेकर दूसरी महिलाओं तक पर सेक्स-हमले करने के लिए जाना जाता हो, अदालत में गुनहगार साबित हो चुका हो, उसके राज में लड़कियों और महिलाओं की हालत की कल्पना की जा सकती है। जब यह एपस्टीन निजी जेट विमानों में नाबालिग लड़कियों को लादकर ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रीव के लिए अमरीका से वहां पहुंचता था, तो ब्रिटिश एयरफोर्स के हवाईअड्डों पर उसके विमान का स्वागत होता था। जब दुनिया की इतनी बड़ी ताकतें नाबालिगों से बलात्कार में जुटी हुई हों, तो फिर किसी लडक़ी की देह बच कैसे सकती है? आज जब दुनिया में विश्व महिला दिवस मनाया जा रहा है, तो एक बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या महिला का एक ही दिन होना चाहिए, और साल के बाकी दिन क्या उसके नहीं होने चाहिए?

शायद हिन्दी के विख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि दिवस हमेशा कमजोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, शिक्षक दिवस, मजदूर दिवस वगैरह। उनका कहना था कि कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता। अब यह उनके नाम के साथ प्रचलित बात है, जिससे सहमत होते हुए हम और भी याद करते हैं कि भारत में सरकारी स्तर पर हिन्दी दिवस भी मनाया जाता है जो कि राष्ट्रभाषा कही जाती है, लेकिन राजभाषा भी नहीं है। इसी तरह महिलाओं के नाम पर साल में एक दिन मनाकर एक-एक जत्थे में सौ-सौ महिलाओं का सम्मान-अभिनंदन करके, उन्हें नाच-गाने, और रैलियों में व्यस्त रखकर, उन्हें छोटे-मोटे तोहफे देकर महज यही साबित किया जाता है कि उनके अस्तित्व को मान लिया गया है, उन्हें इससे ऊपर कुछ करने की जरूरत नहीं है। फिर आम हिन्दुस्तानी भीड़ में किसी को यह सुझाना तो निहायत ही फिजूल की बात होगी कि कोई उनका सम्मान कर रहे हैं, तो क्या उन्हें यह सवाल नहीं करना चाहिए कि सम्मान करने वाले लोगों का इरादा और मकसद क्या है? क्या उनका संगठन इसी काम के लिए बना है? क्या उनका कोई निष्पक्ष और निर्विवाद निर्णायक मंडल भी था जिसने ये सम्मान तय किए हों? और सम्मान लेने वाले लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि उनके कौन से काम सम्मान के लायक माने गए हैं? लेकिन भारत में न पुरूष, न महिला, किसी को भी सम्मान से परहेज नहीं रहता, और तकरीबन हर कोई इसे लेने पर उसी तरह आमादा रहते हैं, जिस तरह कई त्यौहारों पर सडक़ किनारे लगने वाले भंडारों में मुफ्त का खाते हुए लोगों को यह भी नहीं लगता कि क्या वे मुफ्त के खाने के हकदार हैं या नहीं? इसी तरह सम्मान की कतार में महिलाओं को लगाकर राजनीतिक दल, सरकारें, राजभवन, अलग-अलग संगठन सब महिलाओं के प्रति सम्मान की अपनी तथाकथित भावना को दिखा देते हैं, और अगले दिन से महिलाओं के हितों को अनदेखा करना शुरू कर देते हैं। महिला दिवस न सिर्फ भारत में, बल्कि दुनिया के अधिकतर हिस्सों में एक सालाना प्रायश्चित की तरह होता है, जो कि चर्च के कन्फेशन-चैम्बर की तरह का रहता है। साल भर मर्द, खासकर ताकतवर और ओहदेदार मर्द जिस अंदाज में बड़ी-बड़ी अदालतों के जज बने हुए, या अमरीका का राष्ट्रपति बने हुए यह साबित करते हैं कि कामयाब मर्द जिस औरत को चाहे, उसे उसके गुप्तांगों से दबोच सकता है, साल भर की ऐसी सोच का सालाना प्रायश्चित एक-एक टिफिन देकर, या एक-एक प्लेट नाश्ता देकर बहुत सारे लोग कर लेते हैं।

भारत के ही आंकड़े बताते हैं कि हाल के बरसों में औसतन साढ़े 6-7 हजार पत्नियों की ससुराल-मौतें हुई हैं, यानी हर दिन औसतन 18-20 महिलाएं। दूसरी तरफ पति की हत्या के आंकड़े 2023 में पूरे देश में तीन सौ ही रहे हैं, जिनमें नीला ड्रम नाहक बदनाम हो गया है। पूरी दुनिया में महिलाएं अपने जीवनसाथी, प्रेमी, या परिवारवालों के हाथों बड़ी संख्या में मारी जाती हैं। इनके मुकाबले मारे जाने वाले पति पांच फीसदी भी नहीं हैं। लेकिन हत्याओं से परे भी अगर हम महिलाओं के खिलाफ बेइंसाफी को देखें, तो बलात्कार के तो तकरीबन सौ फीसदी मामले लडक़ी या महिला के खिलाफ ही होते हैं। और देश में हर दिन 80-90 बलात्कार होते हैं, जिसका मतलब है हर घंटे तीन-चार। यह संपादकीय लिखने में हमें जितना वक्त लगा है, उतनी देर में हिन्दुस्तान में दो बलात्कार हो चुके हैं। अब लोगों को यह सोचना है कि महिला दिवस के जलसों में से ऐसे कितने हैं जो कि महिलाओं के साथ हो रही जुल्म-ज्यादती की चर्चा कर रहे हैं? जिंदगी के किसी असल मुद्दे पर चर्चा कहीं शुरू न हो जाए, इसलिए महिलाओं के इर्द-गिर्द ढोल-नगाड़े बंद ही नहीं होने दिए जाते। और महिलाएं इसी को अपना सम्मान मानकर मगन रहती हैं।

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