संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अपना अस्तित्व ही अधर में हो तो कौन से देश दुनिया के दादा को आईना दिखाएं?
सुनील कुमार ने लिखा है
02-Mar-2026 9:32 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अपना अस्तित्व ही अधर में हो तो कौन से देश दुनिया के दादा को आईना दिखाएं?

यूक्रेन पर रूसी हमले को जंग में तब्दील हुए पांच बरस पूरे हो गए, रूस यह मानकर चल रहा था कि यूक्रेन को जीतना गुपचुप खाने की तरह होगा, बस उठाया और मुंह में रख लिया। लेकिन एक मामूली टी-शर्ट और जींस पहने हुए यूक्रेनी राष्ट्रपति जिस अंदाज में गैरबराबरी की इस जंग में डटा हुआ है, वह देखना गजब का है। दुनिया के कई देश भारत से यह उम्मीद कर रहे थे कि वह इन दोनों देशों के बीच बीच-बचाव करने की कोशिश करेगा, लेकिन भारत के रूस के साथ हर किस्म के हित इतने जुड़े हुए हैं कि भारत इस विवाद में पंच परमेश्वर नहीं बन सकता था। और ऐसी दिक्कत महज भारत के साथ नहीं है, आज बहुत से अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर दुनिया के अधिकतर देशों के सामने नैतिकता का तकाजा कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि देशों की सरकारें और वहां की लीडरशिप अगले चार या पांच बरस के अस्तित्व की मोहताज रहती हैं, और उससे अधिक दूर का देखना, महानता हासिल करने की कोशिश करना आत्मघाती हो सकता है। आज जब अमरीका और इजराइल एकजुट होकर ईरान पर टूट पड़े हैं, और ईरान ने हाल के बरसों का अपना सबसे बड़ा नुकसान फौजी हमलों में झेला है, तो दुनिया के देशों के सामने यह चुनौती भी है कि वे किसका कितना साथ दें। अमरीका के दो सबसे बड़े दुश्मनों, और अलग-अलग वजहों से प्रतिद्वंद्वियों, रूस और चीन ने भी आज इस लड़ाई में ईरान के साथ जुबानी एकजुटता से अधिक कुछ नहीं दिया है।

आज दुनिया के देशों की नौबतों को समझना होगा। कई दशक पहले दुनिया एक से अधिक ध्रुवों में बंटी हुई थी, अमरीका और पश्चिम के नाटो-देश अलग थे, लेकिन गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शक्ल में अमरीका से परे भी एक बड़ा गठबंधन था, या एकजुटता थी। धीरे-धीरे सोवियत संघ के विघटन के बाद यह खेमा कमजोर होते चले गया, और पूरी दुनिया अमरीका के इर्द-गिर्द घूमने वाली एकध्रुवीय व्यवस्था हो गई। इसके साथ-साथ अमरीका ने फौजी गठबंधनों से लेकर दुनिया भर में अमरीकी मदद, और कूटनीतिक कोशिशों का एक ऐसा जाल बिछाया जिससे कि वह अपनी आर्थिक और फौजी ताकततले सबको ढांककर चल रहा था। यह तो दुनिया के लिए काले बादलों में भी रौशनी की एक किरण सरीखी है कि ट्रम्प की बददिमागी और बेदिमागी की वजह से योरप अपने पैरों पर खड़ा हो रहा है, भारत अब योरप और चीन के साथ नए किस्म के समीकरण बना रहा है, और बाकी की दुनिया भी ट्रम्प के अमरीका के बिना अपने दम पर जीने की कोशिश कर रही है, इस मुश्किल काम को सीख रही है। ऐसे में ट्रम्प की टैरिफ-सनक को झेल चुके देश अब अमरीकाविहीन विश्वव्यवस्था की संभावनाओं को भी कुछ हद तक तो देख ही रहे हैं।

लेकिन आज जब ईरान के साथ परमाणु हथियार रोकने की बातचीत अंतरराष्ट्रीय निगाहों के सामने ही एक किनारे पहुंच रही थी, जब अमरीका पूरी तरह ऐसे किसी संभावित समझौते को लेकर ईरान के साथ बात कर रहा था, कुछ मध्यस्थ देश भी इसकी कोशिश कर रहे थे, तब अचानक ही अमरीका और इजराइल ने जिस तरह ईरान पर हमला किया है, वह परले दर्जे की घटिया दगाबाजी है कि एक तरफ बातचीत का नाटक जारी रखो, और दूसरी तरफ जाकर बमबारी कर दो। हम इस बारे में कल ही काफी कुछ लिख चुके हैं, और उन बातों को यहां दोहराने के बजाय आज की विश्वव्यवस्था के बारे में ईरान के खास संदर्भ में बात आगे बढ़ाना चाहते हैं।

भारत में नेहरू और इंदिरा से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक तमाम सरकारें फिलीस्तीनियों के हक के लिए डटकर खड़ी रहने वाली रहीं। पिछली यूपीए सरकार के दौरान उदार अर्थव्यवस्था के हिमायती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीकी असर में, और एक होशियार ग्राहक की तरह इजराइल की तरफ झुकते चले गए, और भारत की आजादी के पहले से चली आ रही विदेश नीति, और अंतरराष्ट्रीय नीति को उन्होंने किनारे बिठा दिया था। भारत इजराइल के कुल निर्यात के शायद 50 फीसदी से अधिक का ग्राहक है, ऐसे में इजराइल के लिए भारत का बहुत अहमियत रखना तो समझ आता है, लेकिन भारत के लिए इजराइल के मोहताज होने की कोई बात नहीं है। अमरीका पर भी भारत के इतने मोहताज होने की कोई बात ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के पहले तक नहीं थी, इसलिए भारत को, मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी को अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की वजह से, और भारत की ऐतिहासिक नीतियों की वजह से भी फिलीस्तीनियों के जायज हक का जो साथ देना था, वह भारत ने नहीं दिया, और वे दुनिया के एक सबसे बड़े गुंडे और मुजरिम इजराइल के बगलगीर होते रहे। अब जब गुंडे से यारी हो ही गई है, तो आज तो ट्रम्प के टैरिफ, और दूसरे कई किस्म के दबावों के चलते भारत ने अपने दशकों पुराने दोस्त ईरान के हक में एक बयान तक नहीं दिया है।

हम इस पर हैरान इसलिए नहीं हैं कि आज दुनिया के अधिकतर देशों में सरकारों की विदेश नीति, उनकी घरेलू चुनौतियों से तय होती हैं। यह बात योरप के देशों में शरणार्थियों, और प्रवासियों को लेकर देखने में आती है, और दूसरे कई मुद्दों को लेकर भी। आज दुनिया के किसी भी देश में कोई पार्टी ऐसी नहीं है जो कि अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की बात करते हुए कोई ऐसा फैसला ले, या ऐसी कार्रवाई करे, जो कि उनके अपने देश में उनके परंपरागत मतदाताओं, या बहुसंख्यक तबके को पसंद न आए। आज हर पार्टी को अपने देश-प्रदेश के माहौल को देखते हुए ही दरियादिली, या महानता दिखाने का फैसला लेना पड़ता है। आज राजनीतिक और चुनावी दबावतले सरकारों की नैतिकता दम तोड़ देती है। वैसे भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, विदेश नीति में नैतिकता का कोई काम नहीं होता है। जब देशों को कोई नैतिकता का तकाजा देते हैं, तो वे, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है, के अंदाज में जवाब देने लगते हैं। आज हर देश के सामने राजनीतिक दलों के अस्तित्व का सवाल भी रहता है, और देशों की अपनी अर्थव्यवस्था, उनकी रणनीतिक जरूरतें, और दुनिया के चुनिंदा देशों के साथ अपनी निजी फायदे के रिश्ते जैसे कई पहलू जुड़े रहते हैं। भारत न उनसे अछूता है, न किसी भी किस्म से अनूठा है। आज दुनिया में नेताओं के महान बनने का चलन खत्म हो चुका है। आज ट्रम्प जैसे गुंडे-मवाली फौजी और कारोबारी ताकत से दुनिया के डॉन बनने की कोशिश में लगे दिखते हैं, इनके बीच में अब विश्व स्तर के महान नेताओं की इतिहास की महान परंपरा की कोई जगह नहीं है। लोग अपना घर बचाने, अपने आपको बचाने में कामयाबी को ही आखिरी मकसद मानकर चलते हैं। ऐसे में सबसे बड़े गुंडे के हमले के निशाने पर जो है, उसके अलग-थलग रह जाने का खतरा बहुत बड़ा है। अब लोगों को यह परवाह भी नहीं है कि दुनिया का दादा एक-एक करके देशों को कुचलते हुए जिस दिन उनकी दहलीज पर आकर खड़ा हो जाएगा, तब क्या होगा। उतने वक्त बाद की भी फिक्र करने का चलन अब खत्म हो गया है, और लोग अपने बकाया कार्यकाल से परे का कुछ नहीं सोचते। इसलिए आज की दुनिया में, और उससे, इंसाफ की अधिक उम्मीद करना कुछ अधिक ही मासूमियत की बात होगी। लोग मवाली के गिरोह में शामिल होकर किसी बेकसूर पर हमला करने से इंकार कर सकें, वह भी आज के पैमानों से कोई छोटी बात नहीं होगी। दुनिया में आज हर किसी को इस जंगलराज के नियम समझ आ गए हैं कि सबसे ताकतवर को ही सबसे आखिर तक जिंदा रहने का हक है। 

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