संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : भूखे-प्यासे दानवों को दावत का न्यौता देती उत्साही दुनिया
सुनील कुमार ने लिखा है
24-Feb-2026 5:54 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भूखे-प्यासे दानवों को दावत का न्यौता देती उत्साही दुनिया

अमरीका के एक बड़े डेमोक्रेटिक लीडर बर्नी सैंडर्स ने अभी सोशल मीडिया पर यह चेतावनी दी है कि एआई डेटा सेंटर्स पर रोक लगाने की उनकी कुछ महीने पहले की मांग की गूंज अब अलग-अलग जगहों से सुनाई पड़ रही है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने एआई डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम (अस्थायी रोक) का प्रस्ताव रखा था तो इसे विकास के खिलाफ, तकनीक के खिलाफ कट्टरपंथी सोच मान लिया गया था। लेकिन आज अमरीका के एक बड़े शहर डेनवर के मेयर ने देशभर के बहुत से दूसरे शहरों और वहां के निर्वाचित लोगों की राह पर चलते हुए अपने शहर में डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम की घोषणा कर दी है। बर्नी सैंडर्स ने कहा है कि एआई डेटा सेंटर्स जमीन और पानी के इस्तेमाल पर गहरा असर डालेंगे, बिजली की लागत बहुत बढ़ा देंगे, और पर्यावरण पर बुरा असर होंगे। उन्होंने आगे कहा है कि लेकिन यही अकेली वजह नहीं है, एआई का अमरीकी कामकाजी वर्क पर विनाशकारी असर पडऩे वाला है। यह हर क्षेत्र में सफेदपोश और शारीरिक मेहनत वाली, दोनों किस्म की लाखों-करोड़ों नौकरियां खत्म कर देगा। उन्होंने आगे कहा है कि एआई जिस हैरतअंगेज रफ्तार से छलांगें लगाकर आगे बढ़ रहा है, कई जानकार विशेषज्ञों को डर है कि यह क्रांतिकारी तकनीक जल्द ही इंसानों से ज्यादा होशियार हो जाएगी और इंसानी काबू से बाहर भी, और इसके विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने आखिर में कहा है कि ऐसे में लोग चुप नहीं बैठ सकते, और कुछ मु_ीभर बड़ी टेक कंपनियों के मालिकों को यह फैसला करने की इजाजत नहीं दे सकते कि वे हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे लोकतंत्र, और मानवता के भविष्य को अपनी मनमानी बदल दें। उन्होंने कहा कि इस बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर सार्वजनिक बहस और लोकतांत्रिक निगरानी की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अब कार्रवाई का समय है और अमरीका को राष्ट्रीय स्तर पर एआई डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम की जरूरत है।

दुनिया के एक सबसे विकसित और टेक्नॉलॉजी-संपन्न देश अमरीका को एआई के विकास की लीडरशिप भी हासिल है, और तबाही का खतरा बढ़ाने में भी। इसलिए बाकी दुनिया जहां अमरीकी टेक्नॉलॉजी पर अमल कर रही है, उसे अमरीका के भीतर कारोबार से परे के जनसरोकारी लोगों की उठाई गई बातों पर भी सोचने और फिक्र करने की जरूरत है। बर्नी सैंडर्स ने जो कहा है उसके पीछे का तर्क यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को बिना रुके हर पल हजारों-लाखों सर्वर चलाने पड़ते हैं। ये किसी छोटे शहर जितनी बिजली अकेले खा सकते हैं और आगे चलकर लोगों के लिए बिजली महंगी हो सकती है। बिजली की मांग बढऩे से कोयले या गैस पर आधारित बिजलीघर लगाने की नौबत आ सकती है जिसका मतलब होगा अधिक खदानें, जंगलों की अधिक कटाई, पानी की अधिक खपत, और अधिक प्रदूषण। एआई डेटा सेंटर्स सभी जगह किसी प्यासे ऊंट से अधिक पानी पीते हैं (ऊंट भाई-बहन माफ करें), उनके सर्वर इतने गर्म होते हैं कि उन्हें ठंडा रखने के लिए एक-एक डेटा सेंटर को हर दिन लाखों लीटर पानी लगता है। जिन इलाकों में पहले से पानी की कमी है वहां यह भयानक खतरा पैदा कर सकता है। इसके अलावा एआई डेटा सेंटर्स से निकलने वाली गर्मी और उसका शोरगुल आसपास के लोगों का जीना हराम करने ही लगा है। पर्यावरण के हिसाब से देखें तो लगातार भारी इस्तेमाल से सर्वर और चिप्स जल्दी बेकार होते हैं, और इनको बदलने से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ता है। लेकिन इसके भी पहले एआई के लिए बनने वाले खास किस्म के असाधारण ताकतवर चिप्स बनाने में भी अंधाधुंध ऊर्जा और साधन लगते हैं, जिससे पर्यावरण का बड़ा नुकसान होता है।

पर्यावरण के इन नुकसानों से परे देखें, तो एआई से जितने तरह की नौकरियां और रोजगार खत्म होने जा रहे हैं उनके बारे में अलग-अलग विशेषज्ञ-जानकार लगातार चेतावनियां दे ही रहे हैं। अभी-अभी एआई-विकास में लगी हुई एक सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के एआई मुखिया ने एक इंटरव्यू में कहा था कि किस तरह एक-डेढ़ बरस में ही एआई अमरीका के ऑफिस-जॉब बड़ी संख्या में खत्म कर देगा। पूरी दुनिया का यह तजुर्बा है कि बड़ी-छोटी सभी तरह की कंपनियां अपने कर्मचारियों को यह साफ कह चुकी हैं कि वे अपने काम में एआई का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। मतलब यह कि इन कर्मचारियों को यह कह दिया गया है कि अपने फंदे के लिए रस्सियां बुनें। जिन लोगों को यह बात कुछ बढ़-चढक़र कही हुई लगती है, उन्हें यह देखना चाहिए कि अब दुनिया में अनुवादकों, डिजाइनरों, कॉपी राइटरों की शायद ही कोई नौकरी निकलने वाली है। जिन देशों में मजदूर और कर्मचारी कानून मालिकों के पक्ष में है वहां लोगों को बड़े पैमाने पर निकाला जा चुका है। एआई ही कंपनियों को यह बता रहा है कि उसके कौन से कर्मचारी कम जरूरी हैं, अधिक नालायक हैं, कामचोर हैं, या एआई उस काम को मुफ्त में करने के लिए तैयार खड़ा है। जिन लोगों को अभी तक एआई से बेरोजगारी का खतरा दिख नहीं रहा है, वे रेत में सिर घुसाए शुतुरमुर्ग की तरह रेतीली आंधी के गुजर जाने की राह देख रहे हैं, हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि शुतुरमुर्ग को लेकर यह अवैज्ञानिक कहावत बनाई गई है, और वे इंसानों जितने बेवकूफ नहीं होते कि आंधी को अनदेखा करें।

भारत में अभी-अभी दुनिया की सबसे बड़ी एआई समिट निपटी ही है। प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोगों ने वहां पर शर्ट खोलकर एक चौथाई-नग्न प्रदर्शन किया है (अर्धनग्न कहना ज्यादती होगी), यह सही था या गलत था इस गुणदोष पर गए बिना हम यही कह सकते हैं कि एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में ऐसी अभूतपूर्व हरकत शायद एक फ्रॉडियन हरकत थी कि मानो इन लोगों को यह अंदाज लग गया था कि एआई जल्द ही सबको नंगा करके छोड़ेगी। कायदे की बात तो यह होती कि मजदूरों और कर्मचारियों के संगठन चौथाई, या अर्धनग्न होकर यहां पर प्रदर्शन करते कि एआई फोटो-वीडियो के अलावा रोजगार में भी उनके कपड़े उतारने जा रहा है।

भारत में भी एआई डेटा सेंटर को बहुत से प्रदेश अपनी संभावित संपत्ति मानकर उसके लिए अंधाधुंध रियायतें घोषित कर रहे हैं, और उसे एक सुनहरे सपने की तरह पेश कर रहे हैं। दुनिया के इतिहास के इस सबसे गर्म-मिजाज और सबसे प्यासे कारखाने का अंदाज जनता को नहीं है, इसलिए वह अपनी सरकारों की बातों को मुग्ध होकर सुन रही है। इसे नई औद्योगिक क्रांति का इंफ्रास्ट्रक्चर कहा जा रहा है। खासकर जो राज्य समंदर के किनारे हैं, जहां तक समुद्री केबल की कनेक्टिविटी अधिक है, जहां पर बिजली सप्लाई विश्वसनीय है, तकनीकी हुनर वाले कामगार मौजूद हैं, वहां पर एआई डेटा सेंटर्स गिद्धों की तरह मंडरा रहे हैं। जिस महाराष्ट्र में पहले ही भयानक जलसंकट चल रहा है, लोग एक-एक घड़े पानी के लिए सौ-सौ फीट गहरे कुओं में उतर रहे हैं, वहां पर देश के एआई डेटा सेंटर्स का लगभग 40 फीसदी से अधिक हिस्सा आया है। इसके बाद तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में करीब 23 फीसदी एआई डेटा सेंटर्स पहुंचे हैं जो कि टैंकरों के भरोसे गला तर करने वाला महानगर है, और अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कंप्यूटर इंसानों के हाथ से गिलास छीनकर खुद पीने लगेंगे। हालत यह है कि देश के अलग-अलग राज्य एआई डेटा सेंटर्स की दानवों की बारात को पीली चिट्ठी लिखकर न्यौता दे रहे हैं, शानदार जनवासे की तस्वीरें भेज रहे हैं, पकवानों की लिस्ट भेज रहे हैं और कह रहे हैं, पधारो सा।

दानवों को दावत के लिए न्यौता देने वाले देश-प्रदेश के लोगों को यह समझ लेना होगा कि उन्हें जल्द ही एआई डेटा सेंटर्स पर पंखा झलते हुए, खुद प्यासे रहकर कंप्यूटर-सर्वरों को पानी पिलाने की जिंदगी मिलने जा रही है। और यह सब इसलिए नहीं कि एआई बीमारी पकड़ेगा, इलाज सुझाएगा, यह सब इसलिए कि वह लोगों के रोजगार छीनेगा, लोगों की झूठी अश्लील फिल्में गढ़ेगा। जिस दानव के खान-पान से देश-प्रदेश वाकिफ नहीं हैं, वे उसे उस तरह न्यौता दे रहे हैं जैसा भेड़ों की बस्ती भेडि़ए को मुख्य अतिथि बनाने जाए।

दुनिया के मजदूरों और कामगारों को बहुत जल्द अपने बैनर-पोस्टर बदलने होंगे, अब किसी कंपनी या मालिक के खिलाफ प्रदर्शन की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि एआई अकेला ही मजदूर-कामगार का सबसे बड़ा दुश्मन रहेगा। सर्वहारा वर्ग की अगली क्रांति रूस के जार लोगों के खिलाफ नहीं होगी, एआई के खिलाफ होगी। लोगों को एआई के लिए अपने बिछाए लाल कालीन के टुकड़े ही खाने के लिए नसीब होंगे, तिलचट्टे तो कालीन के रेशे खाकर भी जिंदा रह लेते हैं, इंसानों को तो कुदरत ने इस काबिल भी नहीं बनाया है। आगे-आगे देखें, होता है क्या।

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