संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हर बार खुदकुशी से उठते कई सवाल, और ढूंढते हुए तो दिखते नहीं कोई भी...
सुनील कुमार ने लिखा है
03-Mar-2026 6:34 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : हर बार खुदकुशी से उठते कई सवाल, और ढूंढते हुए तो दिखते नहीं कोई भी...

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सूरजपुर जिले में होली के एक दिन पहले ही बड़ा बुरा हादसा हुआ। एक नौजवान ने अपनी फसल को जानवरों से बचाने के लिए किनारे बाड़ में बिजली का करंट दौड़ा दिया था। इससे उसी का चचेरा भाई करंट लगने से मर गया। जब इसे लेकर उसे लगा कि घरवाले उसे कभी माफ नहीं करेंगे, या शायद उसके साथ हिंसा होगी, तो उसने तकलीफ और दहशत दोनों से गुजरते हुए खुदकुशी कर ली। एक दिन के भीतर एक परिवार के दो चचेरे भाई इस तरह चल बसे। इस घटना को लेकर दो-तीन पहलुओं से सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि फसल बचाने के लिए आज जिस तरह लोग खेतों के चारों तरफ बिजली का करंट दौड़ाते हैं, उसका क्या इलाज है? फसल को बचाना भी जरूरी है, और यह गैरकानूनी तरीका जानलेवा रहता है। कुछ जानवर भी इससे मरते होंगे, लेकिन बीच-बीच में इंसान भी इससे मारे जाते हैं। जानवरों की बढ़ती हुई दखल से किस तरह फसल और इंसान को बचाया जाए, यह सोचना जरूरी है। लेकिन इस घटना के एक पहलू और है, और वह यह है कि किसी दुख-तकलीफ या डर की वजह से लोगों का खुदकुशी करना। अब खेती-किसानी करने वाला नौजवान कोई बहुत निराश रहा हो, ऐसा तो नहीं लगता है। एक सेहतमंद दिल-दिमाग का नौजवान ऐसे हादसे से डरकर खुदकुशी कर ले, उससे यह भी समझ पड़ता है कि समाज के लोगों में किसी सदमे या हादसे से जूझने की दिमागी तैयारी नहीं है। लोग सौ किस्म की छोटी-बड़ी बातों को लेकर खुदकुशी कर रहे हैं, और हम हर बार कुछ बुनियादी मुद्दों को लेकर यह सलाह दोहराते हैं कि समाज में सरकार और लोगों को मिलकर परेशान लोगों के मानसिक परामर्श का इंतजाम करना चाहिए।

अभी पिछले ही महीने की बात है कि दो-चार दिन के भीतर ही एक जिले कोरबा में चार छात्रों ने खुदकुशी कर ली थी। उनकी वजहें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन सारे के सारे स्कूली बच्चे थे। इस उम्र के बच्चे अगर जिंदगी से इतना निराश हो जाते हैं, तो उनके मानसिक विकास में सुधार की जरूरत है। इससे जुड़े हुए फिर कुछ पहलू सामने आते हैं। आज स्कूली उम्र से ही लडक़े-लड़कियों में मोबाइल और सोशल मीडिया के चलते असल जिंदगी से कटना हो जाता है। उनके आसपास असली दोस्त कम रह जाते हैं, और ऑनलाईन दोस्त अधिक। फिर यह भी होता है कि लगातार सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के चलते बच्चे या बड़े भी अपने परिवारों से कटने लगते हैं, और किसी मानसिक सहारे की नौबत आने पर उनके पास कोई नहीं बचते। यहीं पर यह फर्क समझने की जरूरत है कि ऑनलाईन दोस्तियां मौज-मस्ती के लिए अधिक रहती हैं, ऑनलाईन अगर कोई मोहब्बत भी लगती है, तो वह मोहब्बत न होकर कुछ वक्त के लिए दिल लगाने सरीखा रहता है। ऐसे में जब भावनात्मक सहारे की जरूरत रहती है, तो जरूरी नहीं है कि कोई हमदर्द और राजदार दर्जे का कोई दोस्त ऑनलाईन उपलब्ध हो। इसलिए हर किसी को यह समझने की जरूरत है कि ऑनलाईन-डिजिटल जिंदगी असल जिंदगी का कोई विकल्प कभी नहीं बन सकती।

यह भी समझने की जरूरत है कि जब कोई जिंदगी से निराश हो, उस वक्त उसे हौसला किसी इंजेक्शन की तरह तुरंत नहीं दिया जा सकता। अगर कोई समय रहते परिवार की जानकारी में बहुत निराश हो, और परिवार किसी परामर्शदाता तक ले जाने की हालत में हो, और परामर्शदाता आसपास कहीं मौजूद हो, तो हो सकता है कि निराश व्यक्ति को कुछ हौसला मिल सके। लेकिन अधिकतर मामलों में होता यही है कि परिवार के लोगों को भी अपने सदस्य की निराशा का अंदाज नहीं लग पाता, समझ पड़ता है तो उन्हें आसपास कोई परामर्शदाता नहीं दिखते, और अगर वे रहते भी हैं, तो भी उनकी फीस इतनी अधिक रहती है कि उच्च-मध्यम वर्ग के लोगों पर भी वह बोझ बन सकती है। ऐसे में सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह बड़े पैमाने पर परामर्शदाताओं को उपलब्ध कराए। हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि जिस तरह स्कूलों में पढ़ाने के लिए बीएड जैसी डिग्री एक अनिवार्य योग्यता रखी गई है, उसी तरह प्रदेश के स्कूली शिक्षक-शिक्षिकाओं को मानसिक परामर्श का एक कोर्स करवाना चाहिए, ताकि वे अपने स्कूल के स्तर पर ही बच्चों के व्यक्तित्व विकास में आत्मविश्वास पैदा कर सकें। इसके अलावा ऐसे परामर्शदाता स्कूली बच्चों की किसी उलझन को सुलझाने में भी काम के साबित हो सकते हैं। आज तो हमारी जानकारी में लाखों रूपए सालाना की फीस वाली स्कूलों में भी गिनी-चुनी स्कूलों में ही ऐसे परामर्शदाता हफ्ते में कुछ घंटों के लिए आते हैं। इस बात को अधिक व्यवस्थित और योजनाबद्ध बनाने की जरूरत है ताकि कोई बच्चे गहरी निराशा में फंसने के पहले ही मदद पा सकें। इसके लिए सरकार अपने शिक्षकों को एक अतिरिक्त भत्ता भी दे सकती है, और हम पहले भी सुझा चुके हैं कि राज्य के हर विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभागों में परामर्शदाता के ऐसे एक या दो साल के कोर्स शुरू करना चाहिए, और जब तक आबादी के अनुपात में इनकी एक संख्या तैयार न हो जाए, तब तक यह कोर्स चलाना चाहिए। इसके बाद भी जैसे-जैसे आबादी बढ़ती है, वैसे-वैसे परामर्शदाता भी बढ़ते चलें, वे हर शहर-कस्बे की स्कूलों में तैनात किए जाएं, और जनकल्याणकारी सरकार तो यह भी कर सकती है कि ऐसे शिक्षकों को एक भत्ता देकर स्कूल से परे के लोगों के परामर्श का भी जिम्मा दे सकती है। जिस तरह कुछ शिक्षकों को योग का, कुछ शिक्षकों का किसी और गतिविधि का जिम्मा दिया जाता है, उसी तरह प्रशिक्षित शिक्षकों को परामर्श का जिम्मा देकर सरकार न सिर्फ हर बरस दर्जनों जिंदगियों को बचा सकती है, बल्कि आत्मविश्वास पैदा करके हर बरस दसियों हजार बच्चों को एक बेहतर मानसिक स्थिति भी दे सकती है।

यह पूरा सिलसिला समाज के भीतर से निराशा को दूर करने का है। एक जवान लडक़ा भाई के गुजर जाने से सदमे और दहशत में इस तरह खुदकुशी कर ले, ऐसी नौबत नहीं आनी चाहिए। स्कूली जिंदगी से ही बच्चों में अगर आत्मविश्वास बढ़ाया जाएगा, तो आगे चलकर वे जिंदगी के बहुत सारे हादसों को पार करने के लिए बेहतर तैयार रहेंगे। समाज के लोगों को भी सरकार पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वह इस तरह की तैयारी करे।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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