संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ईरान पर हमले को लेकर अमरीकी बिफरे हुए हैं डॉनल्ड ट्रंप से
सुनील कुमार ने लिखा है
06-Mar-2026 4:41 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : ईरान पर हमले को लेकर अमरीकी बिफरे हुए हैं डॉनल्ड ट्रंप से

ईरान पर हमले को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अमरीकी संसद में अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों को तो समर्थन देने के लिए तैयार कर लिया, लेकिन इससे अमरीका के लोकतांत्रिक समाज में एक गहरी दरार पड़ गई है। जिस तरह इजराइल के गुलाम की तरह बर्ताव करते हुए अमरीकी सरकार ने ईरान पर हमला किया है, उसे अमरीका का ईरान पर हमला कहना भी जायज नहीं होगा। यह हमला ट्रंप का निजी और अकेले का फैसला है, और उसके रक्षामंत्री, या विदेश मंत्री उसकी हां में हां मिलाने वाले पिछलग्गुओं से अधिक कुछ नहीं हैं। इस फैसले का अमरीका में अकेले विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से तो जमकर विरोध हो ही रहा है, अमरीका में जितने किस्म के और लोकतांत्रिक संस्थान हैं, वे सब भी ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। लेकिन ट्रंप न सिर्फ बेदिमाग है, बल्कि बद्दिमाग भी है। इन दोनों का मेल घातक और जानलेवा रहता है, ट्रंप का खुद का तो कुछ नहीं बिगडऩा है, वह अमरीका के इतिहास, वर्तमान, और भविष्य तीनों को तबाह करने पर आमादा है। अमरीका का हर बड़ा मीडिया संस्थान ईरान पर इजराइल के साथ मिलकर हमला करने के ट्रंप के फैसले की व्याख्या करते हुए यह साफ देख रहा है कि ट्रंप और उसके मंत्रियों ने इस हमले की वजहों को गिनाते हुए हर बार अलग बात कही, हर बार झूठ बोला। इसके साथ यह भी है कि सारी बातों को मिलाकर भी ट्रंप एक जायज वजह नहीं गिना पा रहे हैं कि यह हमला किस तरह अमरीका के लिए जरूरी था, और अमरीका के हित में था। खुद ट्रंप और उनके मंत्रियों की कही बातों में यह मंजूर किया गया कि इजराइल ने ईरान पर हमला तय कर लिया था, वह करने ही वाला था, और उसके बाद ईरान मध्यपूर्व के देशों में डेरा डाले हुए अमरीकी सैनिकों पर हमला कर सकता था, इसलिए अमरीका के संभावित नुकसान को रोकने के लिए पहले ही ईरान पर यह हमला कर देना जरूरी था। इस बयान से यह भी जाहिर होता है कि इजराइल अमरीका के काबू के बाहर का एक देश हो चुका है, और अमरीकी सैनिकों पर खतरा लाने की कीमत पर भी उसने यह हमला किया। ऐसे इजराइल को अंधाधुंध समर्थन करके ट्रंप अमरीकियों के लिए एक खतरा खड़ा कर रहा है, और किसी भी देश के मुताबिक यह उसके लिए सबसे महंगा मोल लिया जाने वाला खतरा है।

दूसरी तरफ जिस तरह ईरान में लड़कियों के एक स्कूल पर हवाई हमला किया गया जिसमें 165 से अधिक बच्चियां मारी गईं, उसने भी संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया के बाकी संवेदनशील, समझदार, और जिम्मेदार देशों को हिलाकर रख दिया है। खुद अमरीका को इस जंग के बीच यह कहना पड़ा है कि वह इस बात की जांच करेगा कि स्कूल पर यह हमला किसने किया है, और कैसे हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि जब ईरानी जनता 165 से अधिक बच्चियों की लाशें सफेद कफन में लपेटे हुए राष्ट्रीय शोक मना रही थी, उसी वक्त ट्रंप उनके लिए फतवा जारी कर रहा था कि उन्हें ईरान की इस्लामी-तानाशाह सरकार को पलट देना चाहिए। इस मौके पर ट्रंप के इस बयान को अमरीका के कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों ने दुनिया की सबसे घटिया स्क्रिप्ट करार दिया है। खुद अमरीका के अनगिनत लोगों को यह याद पड़ रहा है कि यह जंग, और इस किस्म के हमले वियतनाम युद्ध की याद दिला रहे हैं जो बरसों तक चलने के बाद अमरीका को शिकस्त पाकर वहां से पीछे हटना पड़ा था। हमले के कुछ दिनों के भीतर से ही अभी अमरीका के दर्जनों बड़े शहरों में जनता सडक़ों पर उतर आई है, और बैनर-पोस्टर लेकर नारे लगा रही है कि यह नाजायज, गैरकानूनी और असंवैधानिक हमला बंद करो। लोग बैनर-पोस्टर लेकर चल रहे हैं कि अमरीका को जंग नहीं चाहिए। 2 मार्च को अमरीकी राष्ट्रपति भवन के बाहर एक बड़े प्रदर्शन में लोग ट्रंप को जंगखोर करार दे रहे थे। कुछ लोगों का कहना है कि ट्रंप इजराइल की खुशी के लिए और उसकी जिद के लिए अमरीका को जंग में झोंक रहा है। अमरीकी मीडिया में ऐसे कार्टून बने हैं जिनमें इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू हाथ में पट्टा थामे हुए हैं, और उससे बंधा ट्रंप जैसा दिखता कुत्ता ईरान पर झपट रहा है, उसके पैरों में दांत धंसा रहा है। यह सब वह अमरीकी राष्ट्रपति कर रहा है जो दुनिया में जंग खत्म करने का नारा लगाते हुए अभी सवा साल पहले ही सत्ता पर आया था, और शांति का नोबल पुरस्कार पाने के लिए उसने बिफरे हुए किसी जानवर की तरह चारों तरफ सिर मारना जारी रखा हुआ है। अभी उसने खुद होकर यह कहा है कि जब उसे नोबल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया, तो दुनिया में शांति अब उसकी जिम्मेदारी नहीं रह गई है। मतलब यह कि अब वह नोबल शांति पुरस्कार की उम्मीद रखे बिना दुनियाभर में तबाही लेकर आएगा। कुछ कार्टून ऐसे भी बने हैं जिनमें ट्रंप की फौज उससे पूछ रही है कि एक बम नोबल पुरस्कार कमेटी पर भी गिरा दें क्या?

अमरीकी संसद में अभी विपक्ष, डेमोक्रेटिक पार्टी ने ‘वॉर पॉवर्स रिजोल्यूशन’ पर मतदान करवाया। यह नया प्रस्ताव अमरीकी संविधान की इस पुरानी व्यवस्था के और अधिक खुलासे के लिए है कि राष्ट्रपति जंग की घोषणा नहीं कर सकते, यह संसद का विशेषाधिकार है, उसी की जिम्मेदारी है, उसी का हक है। दूसरी तरफ वहां के संविधान में यह धुंध भी छाई हुई है कि अमरीकी राष्ट्रपति देशहित में दुनिया में कहीं पर फौजी हमला कर सकता है, जंग का ऐलान नहीं कर सकता। यह संविधान ब्रिटिश संविधान की तरह अलिखित नहीं है, लिखित दस्तावेज है, फिर भी उसमें इतनी धुंध है कि ट्रंप उसके आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल करके पूरी दुनिया पर टैरिफ लगाते रहा, संसद इस पर कुछ न कर सकी, और अमरीकी सुप्रीम कोर्ट को इसके खिलाफ एक फैसला देना पड़ा कि ट्रंप जैसे आपातकाल का हवाला देकर यह टैरिफ लगा रहा है, वैसी कोई आपात स्थिति नहीं है। किसी भी देश में जंग से गुजरते हुए नेता का साथ देना एक किस्म की मजबूरी हो जाती है। ऐसे में संसद में लाए गए इस नए प्रस्ताव पर ट्रंप का साथ देना उसकी रिपब्लिकन पार्टी की मजबूरी हो गई थी, जबकि कई रिपब्लिकन सांसद इसके खिलाफ सार्वजनिक बयान दे चुके हैं। अमरीका लगातार चलने वाले ओपिनियन पोल्स का देश है, वहां के ताजा पोल  से पता लगता है कि 59 फीसदी अमरीकी इन हमलों से सहमत नहीं हैं, और सिर्फ एक चौथाई ही इसके साथ हैं। अभी कुल आधा दर्जन अमरीकी सैनिकों के ताबूत देश लौटे हैं, और ट्रंप और उसके मंत्री लगातार यह बोल रहे हैं कि जंग में आगे नुकसान और बहुत अधिक हो सकता है। देखना है कि जिस-जिस शहर या प्रदेश में ये ताबूत पहुंचेंगे, वहां ट्रंप के खिलाफ, जंग के खिलाफ क्या माहौल होगा। फिलहाल तो सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि ट्रंप की ईरान-नीति अमरीका को गुलाम बना रही है, जैसाकि जॉर्ज वॉशिंगटन ने चेताया था। संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन की ईरान पर दी गई जानकारी पूरी तरह नाकाफी थी, वे जंग की जरूरतों, और उसके मकसद को साफ बता भी नहीं पाए। एक सांसद ने कहा कि अमरीका सबसे पहले का नारा लगाकर जो ट्रंप सत्ता पर आया, उसने अमरीका को ऐसे गैरजरूरी जंग में फंसा दिया है। पूर्व उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने कहा है कि ट्रंप ने अमरीका को ऐसी जंग में घसीट दिया है जिसे लोग नहीं चाहते। सैनिकों की जान खतरे में हैं, और यह चुनावी जंग है। उल्लेखनीय है कि अमरीका में अगले कुछ महीनों में मध्यावधि चुनाव होने हैं, जो कि सरकार के लिए बहुत ही नाजुक हैं। जंग के बारे में यह माना जाता है कि उस दौरान कोई चुनाव होने पर सरकार के मुखिया को इसका फायदा होता है। ट्रंप की सबसे बड़ी समर्थक मीडिया, फॉक्स न्यूज के करवाए गए ओपिनियन पोल में भी सिर्फ एक चौथाई लोग जंग के समर्थक मिले हैं। एक दूसरे पोल में ट्रंप की सत्तारूढ़ पार्टी रिपब्लिकन में भी 55 फीसदी ही जंग के साथ हैं, और 42 फीसदी उससे असहमत हैं।

आज ट्रंप ने अपनी टैरिफ-दीवानगी से हजार कदम आगे बढक़र मध्य-पूर्व को एक भयानक अस्थिरता में झोंक दिया है, और पूरी दुनिया को पेट्रोलियम की महंगाई में। अमरीका की खबरें हैं कि जंग से तेल के दाम दोगुने हो गए हैं, वैसे भी टैरिफ की मार से हर अमरीकी परिवार पर बोझ बढ़ गया था। यह नरपिशाच अमरीकी जनता का चुना हुआ है, और इसकी कुछ सजा तो उन्हें मिलनी ही थी, लेकिन वह जनता भी इतनी बड़ी सजा की हकदार तो नहीं ही थी।

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