संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सूखी धरती के प्यासे लोग मरते जाएंगे तभी पानी की अंधाधुंध खपत घटेगी...
सुनील कुमार ने लिखा है
23-Feb-2026 2:52 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सूखी धरती के प्यासे लोग मरते जाएंगे तभी पानी की अंधाधुंध खपत घटेगी...

आज जब चारों तरफ कहीं नंगई की राजनीति चल रही है, कहीं ओछेपन की हिंसानियत दिखाते हुए बड़े-बड़े नेता हवा में जहर घोल रहे हैं, तब इन सब उथली और छिछली बातों को छोडक़र जिंदगी और दुनिया के कुछ असल और अहम मुद्दों पर बात करना बेहतर है। ट्रम्पियापे की शिकार आज की दुनिया में साफ हवा की तो कोई बात हो नहीं सकती क्योंकि जलवायु परिवर्तन धीमा करने की चर्चाओं को इस मूढ़मगज ने पटरी से उतारकर ही दम लिया, और अब दुनिया के एक सबसे बड़े प्रदूषक-देश अमरीका के गैरजिम्मेदार हो जाने पर दुनिया के बाकी बड़े देशों को भी यह लगने लगा है कि वे ही दुनिया को साफ रखने, और मानव प्रजाति को बचाने की महंगी जिम्मेदारी क्यों ढोएं? इसलिए हवा को लेकर अब अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती, दूसरी तरफ हवा के तुरंत बाद लोगों की जो जरूरत है, वह पानी की है। खाने की बारी पानी के बहुत बाद आती है। पानी का हाल बाकी दुनिया से कुछ आगे बढक़र हिन्दुस्तान में और भयानक इसलिए है कि जिन लोगों के पास जमीन का एक टुकड़ा है, उस पर बंगला, मकान, या कारखाना है, कोई सर्विस सेंटर है, या होटल है, उन तमाम लोगों ने यह मान लिया है कि उतनी जमीन पर खोदे गए जितने भी नलकूप मुमकिन हैं, उन सबसे धरती के पेट से पानी उलीच लेना उनका हक है। यह काम सरकार के नियमों के खिलाफ कारखानों में भी हो रहा है, और कारोबारों में भी हो रहा है। घरों में तो हो ही रहा है जहां पर लोग संपन्न कॉलोनियों में घर के बाहर की सडक़ तक तेज धारदार पानी वाले पाईप से धोते हुए दिखते हैं, और हर दिन गाड़ी धोने के लिए रखे गए लोग उन्हें धान का खेत मानकर मानो सींचते रहते हैं। लोग देश के सबसे गर्म इलाकों में भी छतों पर बगीचे लगाकर रखते हैं, क्योंकि उनके नीचे पानी है, उनके पास भारी-भरकम पंप हैं, और बिजली का बिल चुकाने की हिंसक ताकत भी है। इन सबका मिलाजुला नतीजा यह है कि जिस तरह कोई दौलतमंद बिगड़ैल अपनी गाड़ी से कुचलकर किसी को मार सकते हैं, उसी तरह ऐसे ही दूसरे कुछ दौलतमंद बिगड़ैल धरती का पूरा ही पानी निकालकर इस्तेमाल कर लेने का हिंसक इरादा रखते हैं।

हम दशकों से इस बात को लिखते आ रहे हैं कि चाहे सरकारी नलों से आने वाला पानी हो, चाहे अपनी जमीन पर नलकूप खुदवाकर उससे अपने पंप और बिजली से खींचा जाने वाला पानी हो, इन सब पर मीटर लगने चाहिए। पानी जहां से भी इस्तेमाल किया जा रहा है, अगर वह साफ-सुथरा जमीनी पानी है, या टंकियों से आने वाला फिल्टर किया हुआ पानी है, तो उसकी खपत पर काबू रखना जरूरी है। छत्तीसगढ़ के पड़ोस के नागपुर में जब पानी की सप्लाई का निजीकरण किया गया, तो निजी कंपनी ने पाईप बदले ताकि हर घर तक पानी चौबीसों घंटे पहुंच सके, रास्ते में उसका लीक होना बंद हो, पानी की चोरी बंद हो। इन सबके साथ जब मीटर लगाए गए, तो कुछ सीमा तक पानी हर परिवार को मुफ्त दिया जा रहा है, लोग बाकी का मामूली भुगतान कर रहे हैं, और अधिक खपत वाले अधिक भुगतान। इसके पहले तक महिलाओं और बच्चों को रात-रात जागकर नल या टैंकर आने की राह देखनी पड़ती थी, जैसा कि छत्तीसगढ़ के भी बहुत से शहरों में गर्मियों में देखने मिलता है। देश के लोग इतने गैरजिम्मेदार हैं कि मुफ्त में मिलने वाले पानी की कोई कदर नहीं है। इसलिए जब मामूली दाम देने पड़ेंगे, तो उस पानी की इज्जत होने लगेगी। जो लोग पानी के निजीकरण के खिलाफ हैं, और अपने आपको जनता के लिए फिक्रमंद मानते हैं, वे अगर मीटरों का विरोध करते हैं, तो वे उसी जनता को एक सूखे कल की तरफ ले जा रहे हैं, जब हिन्दुस्तान जैसे देश में भी अफ्रीका के देशों की तरह इलाका छोडक़र जाने को मजबूर होना पड़ेगा।

किसी भी देश-प्रदेश को यह समझने की जरूरत है कि गरीब को तो एक परिवार के लिए हर दिन दो-चार सौ लीटर पानी मुफ्त दिया जा सकता है, और बाकी के लिए उसे रियायती बिजली की तरह कुछ भुगतान करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ देश के एक-एक करके बहुत से शहर सूखे का शिकार होते चल रहे हैं, जहां एक दिन पैसा देने पर भी पानी नसीब नहीं होगा। नेताओं को, और अपने आपको जनता का हिमायती कहने वाले, निजीकरण के विरोधी लोगों को ऐसी नौबत लाने के लिए ओवरटाइम नहीं करना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल, या सरकार के लिए पानी की मीटरिंग एक लुभावना काम नहीं हो सकता। दूसरी तरफ पानी के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन करके कई तरह के नारे उठाना आसान काम रहता है। लेकिन इन दोनों ही तबकों के पास जनता को जिम्मेदार बनाने का और कोई भी तरीका नहीं है, सिवाय पानी की मीटरिंग के। आज भी पानी जैसी ही जरूरत बन चुकी बिजली पर मीटरिंग तो है ही, और सरकार अपने दम-खम पर जितनी यूनिट मुफ्त दे सकती है, उतनी यूनिट देती है, बाकी को रियायती दर पर देती है, और बड़ी खपत पर बड़ा ऊंचा रेट भी लगता है। ठीक ऐसा ही काम पानी को लेकर होना चाहिए, जिसमें सरकारी पाईप लाईन, और लोगों के निजी नलकूप दोनों ही शामिल हों। आज तो शहरी सडक़ों के किनारे बड़े-बड़े ऐसे सर्विस सेंटर चलते हैं जो नलकूप के पानी में तेज धार वाले जेट लगाकर कारों को धोने का काम करते हैं, और उन्हें रोकने वाले कोई नहीं हैं। यह अदूरदर्शिता लोगों के मिजाज में ऐसी अराजकता भर चुकी है कि उन्हें किसी भी चीज का पैसा देना अखरता है। वे अनाज का पैसा देना नहीं चाहते, पढ़ाई या इलाज का पैसा देना नहीं चाहते, बिजली या पानी का पैसा देना नहीं चाहते, और इनमें से हर मामले में मुफ्त में मिली रियायत में भी तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी हो रही है। सरकारी खजाने को चूना लगाने का कोई भी मौका न अमीर छोड़ रहे, न गरीब से गरीब छोड़ रहे। जिन्हें अनाज तकरीबन मुफ्त मिलता है, वे भी उसका एक हिस्सा दुकानदार को ही बेचकर उसकी दारू पी जाते हैं।

आज जिस तरह दिल्ली बिना साफ हवा के छटपटा रहा है, ठीक उसी तरह हिन्दुस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा बिना पानी के छटपटाते रहेगा, प्यासा मरने की नौबत आ जाएगी। सच तो यह है कि लाखों बरसों से चली आ रही धरती पिछले सौ-दो सौ बरस की बिजली, और पिछले 25-50 बरस के गहरे पंपों की मेहरबानी से आज सूखने के कगार पर है, और हो सकता है कि इससे मानव प्रजाति खत्म होते-होते धरती पर एक ऐसा संतुलन कायम हो जाएगा कि पानी की खपत अपने आप कम हो जाएगी। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि तबाही के इस दौर में सबसे पहले सबसे गरीब प्यासे मरेंगे, और पैसेवाले अपनी ताकत से कई बरस और जिंदा रह लेंगे। एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब पानी के लिए राह चलते लोग कत्ल करने लगेंगे। किसी एक देश को छोडक़र दूसरे देश में प्यासे लोग उसी तरह घुसेंगे जिस तरह पूर्वी पाकिस्तान को छोडक़र दसियों लाख शरणार्थी भारत में घुसे थे। ऐसे दिन की कल्पना करना भी नेताओं को अगले चुनाव के लिए नहीं सुहाता। लेकिन धरती की इतनी ताकत नहीं है कि सैकड़ों फीट गहरे पंप और पाईप लगाकर, स्ट्रॉ की तरह उसका पेट खाली कर देने वालों की हवस पूरी कर सके। आज दिल्ली की हवा से जिस तरह की इमरजेंसी खड़ी हुई है, कल पानी की कमी से हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में वैसी ही इमरजेंसी रहेगी। 

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