संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अफगान महिलाएं, जरा याद इन्हें भी कर लो, आंखों में भर लो पानी
सुनील कुमार ने लिखा है
21-Feb-2026 3:45 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अफगान महिलाएं, जरा याद इन्हें भी कर लो, आंखों में भर लो पानी

करीब 20 बरस अफगानिस्तान पर राज करने के बाद अमरीका को जब यह समझ आया कि वह किसी किनारे पहुंच नहीं रहा है, न तो अफगानिस्तान में किसी तरह का लोकतंत्र, या पिट्ठू सरकार कायम करने की गुंजाइश है, और न ही इतने लंबे खर्च को, अमरीकी सैनिकों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए जारी रखना मुमकिन है, तो उसने 2021 में दुम दबाई, और रातों-रात अफगानिस्तान छोडक़र भागा। उस दिन वहां की जो खबरें आ रही थीं, वे बता रही थीं कि किस तरह राजधानी काबुल के एयरपोर्ट से अमरीकी विमानों पर सवार होकर अमरीकी सैनिक भाग रहे थे, और तालिबान एयरपोर्ट की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। आखिर में हाल यह था कि ढेर सारे हथियार, गोला-बारूद, और फौजी हेलीकॉप्टर भी छोडक़र अमरीकी भागे थे। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका अपने तमाम अफगान मददगारों को भी धोखा देकर भागा था, जो कि इतने बरस तक अमरीकी हुकूमत की मदद कर रहे थे, उसकी फौज के साथ काम कर रहे थे, तालिबानों के खिलाफ अफगान महिला जज फैसले दे रही थीं, महिलाएं तरह-तरह के दूसरे सरकारी कामकाज में लगी हुई थीं, इन सबको छोडक़र, तालिबान के हवाले करके अमरीका भाग गया था। नतीजा यह निकला कि अभी पांच बरस होने को हैं, अफगान तालिबानों ने दुनिया की सबसे जुल्मी महिलाविरोधी सरकार कायम करके रखी है, और अमरीका सहित दुनिया के कोई भी देश उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही है।

ऐसे तालिबानों ने छांट-छांटकर उन महिलाओं के खिलाफ पहले कार्रवाई की जो कि अमरीकी फौजी शासन के साथ मिलकर काम कर रही थीं। उनमें से अधिकतर को अफगानिस्तान की कोई न कोई सरहद पार करके पड़ोसी देश के रास्ते भागना पड़ा। लेकिन जो महिलाएं वहां बच गईं, उनकी पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, कोई नौकरी करना, अकेले घर से निकलना, या घर पर भी खुली आवाज में नमाज पढऩा, इन सब पर तालिबानी रोक लग गई। एकदम से अमरीका के छोड़े गए शून्य में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अभूतपूर्व और असाधारण पैमाने लागू हो गए। विश्व समुदाय इस बात को लेकर दुविधा में फंस गया कि भूखे और बीमार मरते अफगान लोगों को मदद करने के लिए वह तालिबान हुकूमत के सामने महिला अधिकारों की शर्त रखे, या अफगान आबादी को जिंदा रहने में मदद करे? भारत जैसे बहुत से देशों के लिए रणनीतिक रूप से यह आसान नहीं था कि वह तालिबानों को महिला अधिकार का सम्मान करना सिखाए, और उस शर्त पर उनसे बातचीत करे। भारत जैसे बहुत से देशों ने तालिबानी हुकूमत को मान्यता नहीं दी है, लेकिन बहुत से देशों ने तालिबानी नेताओं के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला जारी रखा है, और लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले इस सरकार का एक बड़ा नेता भारत आया था, तो उसकी प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया था। इस पर बवाल होने के बाद अगले दिन फिर एक प्रेस कांफ्रेंस हुई जिसमें महिला पत्रकारों को भी शामिल किया गया। कई दिनों तक अफगान नेता भारत में रहा, और मान्यता दिए बिना भी भारत अफगान सरकार के साथ एक बड़े तालमेल के साथ चल रही है क्योंकि वह पाकिस्तान से लगा हुआ देश भी है, और उसका पाकिस्तान के साथ बड़ा टकराव भी चल रहा है, और यह बात भारत अनदेखी नहीं कर सकता।

आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि अफगान-तालिबान के सबसे बड़े नेता ने अभी पिछले ही महीने 90 पेज का एक नया क्रिमिनल कोड जारी किया है जो कि महिलाओं को संपत्ति की तरह मानता है, और पत्नी पर पति की हिंसा को एक बड़ी सीमा तक कानूनी दर्जा देता है। यह लिखित नियम बताते हैं कि अगर पति पत्नी को इस बुरी तरह पीटता है कि उसकी हड्डियां टूट जाती हैं, जख्म आते हैं, लहू निकलता है, तो इसके सुबूत अगर पत्नी अदालत में देती है, तो उस पर अधिकतम 15 दिनों की कैद का प्रावधान है। दूसरी तरफ जानवरों को चोट पहुंचाने पर इससे अधिक सजा है। इस क्रिमिनल कोड का एक दूसरा हिस्सा बताता है कि पत्नी अगर पति की अनुमति के बिना मायके या रिश्तेदारों के घर जारी है, और वापिस नहीं लौटती है, तो पत्नी और उसके परिवार को तीन महीने की कैद हो सकती है। कुल मिलाकर पति को ‘विवेकपूर्ण सजा’ की छूट है, जिसका मतलब है कि हड्डी तोड़े बिना, खून बहाए बिना पीटना। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने महिला पर ऐसी भयानक हिंसा को कानूनी दर्जा दे देने के तालिबानी फैसले की जमकर निंदा की है।

2021 में अफगान सत्ता पर लौटने से अब तक तालिबानों ने महिलाओं के बारे में 80 से ज्यादा हुक्म जारी किए हैं, जिनमें 54 ऐसे हैं जो महिलाओं के खिलाफ तरह-तरह की बंदिशों वाले हैं। अफगानिस्तान अब दुनिया का अकेला देश है जहां लड़कियां 6वीं कक्षा से ज्यादा नहीं पढ़ सकती। इसकी वजह से 10 लाख से अधिक लड़कियों की पढ़ाई छूट गई है, या शुरू ही नहीं हो पाई है। 2024 में तालिबान सरकार ने नया नैतिकता कानून बनाया जिसमें महिलाओं पर सार्वजनिक जगहों पर बोलना, बिना चेहरा ढांके जाना, बिना पुरूष पारिवारिक साथी के कहीं सफर करना, सब पर रोक लगा दी गई है। यूनिसेफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मुताबिक अफगानिस्तान में दसियों लाख लड़कियां शादी के पहले पुरूषों का शोषण झेलती हैं। संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान को महिलाविरोधी कानून और व्यवस्था को देखते हुए लैंगिक-रंगभेदी देश करार दिया है। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों की पिछले 20 बरस की प्रगति खत्म हो चुकी है। इस तरह की जानकारी अथाह है, अफगानिस्तान में महिलाओं के जिस पहलू को देखें, वह जुर्म की हिंसा से लहूलुहान है। ऐसे में अब यह बाकी दुनिया की जिम्मेदारी है कि वह तालिबान को किस तरह काबू में करे, किस तरह अफगानिस्तान को आर्थिक या दूसरी मदद देने के एवज में तालिबानी सरकार की बांहें मरोडक़र उसे महिलाओं को बेहतर, और अधिक हक देने पर मजबूर करे। आज दिक्कत यह है कि दुनिया भर की सरकारें न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि दुनिया के किसी भी देश के साथ नैतिकता की बात करने में दिलचस्पी नहीं रखतीं, सिर्फ अपने राष्ट्रीय हितों को देखती हैं, जिनके मुकाबले कोई नैतिकता अहमियत नहीं रखती। अफगान महिलाएं दुनिया में सबसे अधिक लैंगिक भेदभाव की हिंसा झेलने वाली हो गई हैं, और उनके हक के लिए कई सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं है, कई सरकारों को उसे अनदेखा करना सहूलियत का लग रहा है। दुनिया का इतिहास इन तमाम बातों को अच्छी तरह दर्ज करते चल रहा है, लेकिन आज दुनिया में जो नेता पांच-पांच बरस के अपने भविष्य और अस्तित्व से दूर का नहीं सोच पाते हैं, उन्हें इस बात की भला क्या फिक्र होगी कि इतिहास उन्हें कैसा दर्ज करेगा?  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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