संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : नौजवान हसरतों को कुचलने बनते कानूनों के लंबे वक्त के नुकसान
सुनील कुमार ने लिखा है
01-Mar-2026 4:33 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : नौजवान हसरतों को कुचलने बनते कानूनों के लंबे वक्त के नुकसान

गुजरात सरकार ने अभी राज्य के विवाह पंजीयन कानून-2006 में एक संशोधन का प्रस्ताव किया है जिसमें बालिगों की शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए मां-बाप को सूचना, और उनकी सहमति को अनिवार्य बनाया जा रहा है। उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने विधानसभा में कहा कि यह बदलाव लव-जिहाद जैसे मामलों को रोकने के लिए है जिनमें राज्य की बेटियों को फंसाया जाता है। प्रस्तावित नियमों में मैरिज-रजिस्ट्रेशन के लिए जोड़े को आवेदन में मां-बाप के नाम-पते, आधार कार्ड और संपर्क की जानकारी के साथ-साथ यह हलफनामा भी देना होगा कि मां-बाप को शादी की जानकारी दी गई है या नहीं। इसके बाद विवाह-पंजीयक मां-बाप को नोटिस भेजेगा, और 30 दिनों की जांच अवधि रहेगी। यह याद रखने की बात है कि दो धर्म के लोगों के बीच शादी के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में पहले से 30 दिनों के पब्लिक नोटिस का नियम है, लेकिन उसमें भी मां-बाप की सहमति जरूरी नहीं थी। अब नए नियमों के तहत तो बालिग लोगों के किसी भी धर्म या जाति के पंजीयन के लिए उनके मां-बाप को नोटिस भेजा जाएगा। पहली नजर में ही यह दिखता है कि यह संशोधन अगर सिर्फ विधर्मियों के बीच शादी पर लागू करना रहता, तो वह स्पेशल मैरिज एक्ट पर लागू किया जाता, लेकिन यह तो किसी भी तरह के विवाह के पंजीयन के 2006 के कानून में किया जा रहा संशोधन है जिसका मतलब है कि एक धर्म के भीतर के विवाह भी तभी हो सकेंगे, जब बालिगों के मां-बाप को खबर होगी। जाहिर है कि मां-बाप असहमत रहने पर अगले 30 दिन में जो कर सकते हैं, वह देश भर में जगह-जगह होने वाली ऑनर-किलिंग से अधिक और कैसे साबित हो सकता है?

आज देश के कई प्रदेशों में ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं जो कि संसद द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय कानूनों को धकेलकर बन रहे हैं। इसके बाद इनकी संवैधानिकता को चुनौती देने की लंबी पहाड़ी चढ़ाई लोगों को चढऩी पड़ती है, और राज्यों के कई कानूनों को खारिज करने में अदालत को बरसों लग जाते हैं। गुजरात के संदर्भ में यह बात भी देखने की जरूरत है कि सरकार विधानसभा में जिसे लव-जिहाद कह रही है, उसे रोकने के लिए 2021 में वहां धार्मिक स्वतंत्रता कानून में संशोधन करके ‘लव-जिहाद’ को दंडनीय बनाया है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती के बाद भी लागू रखा है। अब ऐसा अंदाज है कि यह ताजा संशोधन उसी कानूनी अभियान का अगला कदम है जो कि धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिए है, और उसके साथ-साथ सभी तरह की अंतरजातीय शादियों को रोकने के लिए भी। गुजरात में आज भी अंतरजातीय शादियां बहुत कम हैं, विवाह-पंजीयन के नए कानून जब मां-बाप को पहले से खबर करने का हलफनामा भरवाएंगे, तो जाहिर है कि प्रेम विवाह और कम हो जाएंगे। जबकि पूरे देश के अलावा गुजरात में भी 1990 से ही अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना चल रही है जिसके तहत अंतरजातीय, और अंतर-धर्म शादियों पर 50 हजार रूपए नगद प्रोत्साहन का प्रावधान है। अब वैसा प्रावधान तो किनारे धरा रह गया, अब मां-बाप की अनुमति अनिवार्य होने से सरकार का यह खर्च होना बंद सा हो जाएगा।

दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादी को लेकर बड़ा साम्प्रदायिक तनाव देश के कई राज्यों में आम बात हो गई है। ऐसे में जब बालिग जोड़े पर कई और तरह के नियम लादे जा रहे हैं, तो उससे यह बात साफ है कि यह बालिग नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों को कुचलने के अलावा कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसले यह बार-बार स्थापित कर चुके हैं कि बालिग जोड़े अपनी मर्जी से किसी भी धर्म या जाति में शादी कर सकते हैं, या बिना शादी किए भी साथ रह सकते हैं। आज देश में, खासकर उत्तर भारत और हिन्दीभाषी प्रदेशों में यह तनाव सामने आ रहा है कि साथ रहते हुए दो अलग-अलग जातियों के जोड़ों पर कुछ धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठन हमले करते हैं। कुछ ताजा हमले तो इसी सार्वजनिक रेस्त्रां में चल रही ऐसी जन्मदिन की दावत पर हुए हैं जिनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के बालिग सहकर्मी शामिल थे। ऐसे में किसी राज्य में अगर मां-बाप को 30 दिन पहले खबर देकर उनकी अनुमति या सहमति लेने को अनिवार्य कर दिया जाएगा, तो इतना मौका साम्प्रदायिक संगठनों को लाठियों में लगे हुए तेल को बालिग बदनों पर उतारने के लिए काफी होगा।

देश में बात अब सिर्फ साम्प्रदायिकता की नहीं रह गई है, हिन्दुत्व के सनातनी संस्करण को लागू करने की जिद ने हिन्दू धर्म के भीतर की जातियों में भी बड़ा भेदभाव खड़ा कर दिया है। फिर यह भी है कि किसी देश में लव-जिहाद एक नारे के लिए तो ठीक है, लेकिन उसकी गिनती का हिन्दुओं के भीतर अंतरजातीय शादियों से कोई मुकाबला नहीं है। गुजरात का यह नया कानून, या बाकी प्रदेशों में इस तरह बने हुए, या बनने जा रहे कानून सिर्फ एक धर्म को दूसरे धर्म से नहीं बचाएंगे, वे एक जाति को दूसरी जाति से भी ‘बचाएंगे’। यह रक्तशुद्धता की सोच भारत में पहरावे, खानपान, भाषा, संस्कृतियों, उपासना पद्धतियों जैसी कई बातों पर हावी होती जा रही है। देश की तीन चौथाई से अधिक की आबादी मांसाहारी है। इसमें हिन्दुओं की भी आधी या पौनी आबादी मांसाहारी है। दलित और आदिवासी तकरीबन सौ फीसदी मांसाहारी हैं। इसके बावजूद एक छोटे तबके की शाकाहार की सोच को दूसरे तबकों पर हिंसा के दम पर थोपा जा रहा है। यह सिलसिला जब देश और प्रदेशों में तरह-तरह के कानून बनाकर धार्मिक स्वतंत्रता, अंतरजातीय स्वतंत्रता, खानपान जैसी सांस्कृतिक और सामाजिक स्वतंत्रता तक पहुंच जाता है, तो देश को एक रखने के अनगिनत नारों के बावजूद उनसे देश बंटने लगता है। लोगों को दूसरों की आजादी को कुचलने के अपने हक की अपनी आजादी की सीमाओं को समझना होगा। इतना शुद्धतावादी नजरिया समाज को टुकड़े-टुकड़े में बांट दे रहा है। यह सिलसिला शुरू तो साम्प्रदायिक या जातीय तनाव से होता है, लेकिन इससे जो सामाजिक समरसता खत्म होती है, उससे देश का विकास, पूरी पीढ़ी का व्यक्तित्व विकास, और देश की आर्थिक उत्पादकता जैसे बहुत से पहलू प्रभावित होते हैं। अपनी पसंद से शादी की हसरत रखने वाले नौजवान जोड़ों को नए-नए विवाह-कानूनों में जकडऩे का मतलब उनकी हसरतों को कुचलने के अलावा और कुछ नहीं है। ऐसी कुचली हुई भावनाओं वाली पीढ़ी किसी भी समाज को उसकी संभावनाओं को छूने से रोकेगी ही रोकेगी।   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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