संपादकीय
एक अंतरराष्ट्रीय चॉकलेट कंपनी के इश्तहार का स्लोगन है- कुछ मीठा हो जाए। आज कुछ उसी तरह हम ट्रम्प और अमरीका से परे कुछ लिख रहे हैं, ताकि हमारे पाठकों और हमारे यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल के दर्शकों को थोड़ी सी ताजी हवा भी मिल सके। दुनिया में ट्रम्प से परे भी कुछ चल रहा है, ऐसा बहुत से लोगों को नहीं लगेगा, लेकिन भारत से लगे हुए नेपाल में एक नया इतिहास रचा जा रहा है। वहां पिछले बरस हुई नौजवान-क्रांति में हुए तकरीबन अहिंसक सत्तापलट के बाद के इस चुनाव में राजधानी काठमांडू के मेयर बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) की पार्टी, आरएसपी प्रचंड बहुमत पाते दिख रही है। वहां की पुरानी पार्टियां, नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, माओवादी सेंटर, इन सबका भट्ठा बैठ रहा है। इन नतीजों को इस हिसाब से भी देखने की जरूरत है कि सितंबर 2025 में बहुचर्चित जेन-जेड, यानी नौजवानों की पीढ़ी ने जो ऐतिहासिक प्रदर्शन किए थे, उनके उठाए गए भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और वंशवाद के मुद्दों ने असर दिखाया है, और परंपरागत पार्टियां सब निपट गई हैं।
35 बरस के बालेन्द्र शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी इस मायने में भी थोड़ी अटपटी है कि अभी शाह ठीक से अधेड़ भी नहीं हो पाए हैं, वे अगर हिन्दुस्तान की राजनीति में होते, तो अभी युवा मोर्चा या युवक कांग्रेस में ही रहते, लेकिन नेपाल में वे अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। वे अपने निजी चुुनाव में पिछले प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली को हराते हुए दिख रहे हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले बरस का नेपाल का जनप्रदर्शन इस मुद्दे पर शुरू हुआ था कि वहां के सत्तारूढ़ नेताओं की बिगड़ैल औलादों ने अपने सोशल मीडिया पेज पर अपनी अतिसंपन्नता का हिंसक और अश्लील प्रदर्शन किया था, और महंगाई, बेरोजगारी से जूझते हुए नौजवान उसे बर्दाश्त नहीं कर पाए थे। नेताओं की औलादें बाप के दम पर अंधाधुंध दौलत बना रही थीं, और यही बात सत्ता के जाने की वजह बनी। जनआंदोलन खुलकर ऐसे लोगों के खिलाफ था, लोग सोशल मीडिया पर इन बिगड़ैल औलादों, और वंशवाद के खिलाफ पोस्टर और गाने बनाकर डाल रहे थे, इस पर सरकार ने सोशल मीडिया पर ही प्रतिबंध लगा दिया था, और इसके खिलाफ जो प्रदर्शन हुए, उसमें आंदोलनकारियों की मौतें भी हुई थीं, और नेताओं की कई संपत्तियों को आग के हवाले भी कर दिया गया था।
अब नेपाल का यह ताजा चुनाव भारत की सरहद से लगे हुए समाज के बारे में बता रहा है कि वहां आज किस तरह वंशवाद और राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने एक बिल्कुल ही नौजवान की पार्टी को ऐतिहासिक तरह से जिता दिया है, जो कि राजनीति से परे एक लोकप्रिय रैपर सिंगर भी रहा है। आज नेपाल के चुनावी नतीजों के बारे में रूख साफ दिख रहा है कि 165 सीटों के चुनाव में बालेन्द्र शाह की पार्टी को प्रत्यक्ष, और परोक्ष, दोनों तरह से मिलाकर डेढ़ सौ से अधिक सीटें मिलने का आसार है। इसके बारे में वहां के लोग लिख रहे हैं- बालेन शाह का उदय पुरानी राजनीति का अंत है, जेन-जेड ने वोट से क्रांति की। कुल मिलाकर यह है कि नेपाल के राजनीतिक परिवारों में वंशवादी विरासत का जमकर विरोध हुआ है, जहां पर आल-औलाद, या करीबी रिश्तेदारों को ही आगे बढ़ाने का लंबा चलन चले आ रहा है। इस बार के चुनाव में, और इसके भी पहले पिछले साल के प्रदर्शन में, वंशवाद खत्म करने के जननारे लगाए गए, और वही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा।
एक बड़ी दिलचस्प बात आज दिखती है कि भारत में जिस बिहार राज्य से नेपाल की सरहद सबसे अधिक मिलती है, उस बिहार में आज दस बार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हटाए जाने के बाद उनके बेटे को उनका राजनीतिक वारिस बनाया जा रहा है। यह भारत की समाजवादी पार्टियों की एक बहुत बड़ी विसंगति और त्रासदी है, कि वे बात तो समाजवाद की करते हैं, लेकिन मुलायम, लालू, नीतीश, इन सबके पास विरासत के लिए अपनी औलादों के अलावा और कोई नहीं है। पता नहीं अपने बेटे की ताजपोशी, और जैसी कि चर्चा है उसे उपमुख्यमंत्री बनाने के बाद, नीतीश नाम का समाजवादी नेता आईने में अपना चेहरा कैसे देख पाएगा। नेपाल और बिहार के बीच छह-सात सौ किलोमीटर की साझा सरहद है, और नेपाली हवा के थपेड़े नीतीश को अपने मुंह पर किस तरह पड़ रहे होंगे, यह भी सोचने की बात है। 35 साल का नौजवान एक ऐतिहासिक बहुमत से नेपाल का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है, और उसका नारा ही है कि उसकी लड़ाई वंशवाद के खिलाफ है। पार्टी का घोषणापत्र कहता है कि उसकी सरकार वंशवाद खत्म करके नई पीढ़ी को सत्ता सौंपेगी, भ्रष्टाचारमुक्त नेपाल खड़ा करेगी।
अब भारत में हम बड़ी दिलचस्पी से इस नेपाली आंधी कहें, या ताजी हवा का झोंका कहें, जो भी कहें, उससे होने वाली किसी संभावित जागरूकता को देखते हैं। क्या भारत के अधिकतर प्रदेशों में, और वामपंथियों को छोडक़र सभी राष्ट्रीय पार्टियों में भी छाए हुए वंशवाद के खिलाफ भारत में भी कोई जनजागरूकता आएगी? कश्मीर, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड, बंगाल, एमपी, राजस्थान, आन्ध्र, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, क्या इनमें से कोई ऐसा राज्य याद पड़ता है जो कि वंशवाद की गिरफ्त में न हो? कांग्रेस पार्टी तो आधी-पौन सदी से वंशवाद की गिरफ्त में होने की तोहमतें, और बदनामी झेल रही है, लेकिन देश की उसके बाद की एक वक्त की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा भी अपने अलग-अलग नेताओं के कुनबों को टिकट दे-देकर वंशवाद की बी टीम, या कि हो सकता है कि ए टीम बन चुकी है। समाजवादी तो कुनबापरस्ती को ही समाजवाद मानते हैं, और देश की शायद ही कोई क्षेत्रीय पार्टी ऐसी हों जो कि एक रसोई, एक डायनिंग टेबिल के बाहर की हो। नेपाल की क्रांति भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए भी एक जागरूकता लेकर आए, और यहां भी हर पार्टी में वंशवाद के खिलाफ माहौल बने, और अगर पार्टियों को खुद को समझ न आए, तो कम से कम जनता उनकी अक्ल ठिकाने लगाए। हम किसी तरह की हिंसा नहीं सुझा रहे हैं, लेकिन नेपाल का इस बार का चुनाव तो पूरी तरह अहिंसक क्रांति है, और भ्रष्टाचार-वंशवाद को खारिज करने वाला है। क्या भारत में इसकी जरूरत नहीं है? फिलहाल तो बिहार-नेपाल सरहद के दोनों तरफ आज दो किस्म की ताजपोशी हो रही है, एक वंशवाद की, और एक वंशवाद के खात्मे की, यह बात कैसी रही?


