संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेरोजगारों के लिए आकर्षक साइबर जुर्म, और सरकार...
16-Jan-2026 7:24 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बेरोजगारों के लिए आकर्षक साइबर जुर्म, और सरकार...

कर्नाटक की बेंगलुरू पुलिस ने अभी साइबर जुर्म से कमाए गए पैसों को ठिकाने लगाने के एक नेटवर्क को पकड़ा है, इसमें 12 लोग गिरफ्तार हुए हैं, और पुलिस को 242 एटीएम कार्ड मिले, पांच दर्जन मोबाइल फोन, आधा दर्जन लैपटॉप, 33 चेकबुक, 21 पासबुक, और 48 सिमकार्ड मिले हैं। कॉलेज छोड़े हुए एक नौजवान मोहम्मद उजैफ, और उसकी माँ शबाना ने मिलकर खच्चर-खातों का एक नेटवर्क खड़ा किया था, जिसमें कमसमझ, या अनपढ़ लोगों के बैंक खातों के रास्ते जुए, सट्टे, या दूसरे साइबर-जुर्म के पैसों को वे आगे बढ़ाते थे। कॉलेज फेल यह नौजवान अब तक 42 सौ बैंक खातों को जुर्म के लिए इस्तेमाल कर चुका था, और करोड़ों रूपयों की अफरा-तफरी की थी। ये माँ-बेटे गरीब या नासमझ लोगों के बैंक खाते खुलवाकर उनसे पासबुक, चेकबुक, और एटीएम कार्ड ले लेते थे, और फिर इन खच्चर-खातों (म्यूल अकाउंट) का इस्तेमाल करके दिल्ली में बैठा हुआ गिरोह जुर्म की कमाई को दूसरे देशों तक भेजने का काम करता था।

देश के कई राज्यों में साइबर अपराधियों के अड्डे बन गए हैं। ऐसे राज्य जहां पर लोग कम पढ़े-लिखे हैं, या पिछड़ी हुई जगहों पर रहते हैं, वहां से भी बड़े पैमाने पर ऐसी धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले सामने आ रहे हैं। झारखंड के जामताड़ा में तो जिस तरह साइबर-अपराध कुटीर उद्योग सरीखा बन गया है, उस पर नेटफ्लिक्स ने एक फिल्म या सीरियल भी बनाया था। दिल्ली में कुछ अरसा पहले जब मोबाइल फोन चुराने वाले लोग पकड़ाए, तो पता लगा कि वहां से मोबाइल फोन जामताड़ा सप्लाई किए जाते थे, ताकि सिमकार्ड बदलने के साथ-साथ हैंडसेट भी बदल दिया जाए, और पुलिस को वहां तक पहुंचने में कुछ वक्त लगे। यह देखना भी हैरान करता है कि किस तरह कम पढ़े-लिखे लोग भी मोबाइल कॉल पर अच्छे-अच्छे दिग्गज, और रिटायर्ड अफसरों को भी बेवकूफ बना सकते हैं, और ठग सकते हैं।

भारत में ऐसा लगता है कि इस तरह के धंधे में पड़े हुए लोगों को किसी सजा का डर नहीं रह गया है। शायद कानूनी कमाई के जरिए हासिल नहीं हैं, और गैरकानूनी कमाई के आसान तरीके घर बैठे मिल जाते हैं। पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों को यह भी देखना होगा कि कौन से इलाकों के लोग, किस जात-धरम के अधिक हैं, और उन्हें ऐसे धंधों में लाने वाले लोग कौन हैं। सबसे नीचे के खच्चर किस्म के लोगों को गिरफ्तार करने से बात नहीं बनेगी, और ऐसे गिरोहों के सरगना पकड़े जाने पर ही साइबर-जुर्म कुछ कम हो सकते हैं। जब अलग-अलग कई स्तरों पर जांच होगी, तो पता लगेगा कि कई जात-धरम के लोग दूसरों को ठगने और लूटने के काम में लगे हुए हैं। बेंगलुरू के इस माँ-बेटे के साथ अभी दूसरे प्रदेशों में जो लोग गिरफ्तार हुए हैं, उनमें सिंह, यादव, राठौर, शेखावत, चौहान, पांडेय, जायसवाल, तंवर, जैसे अलग-अलग जातियों के लोग भी हैं। जांच एजेंसियों को यह भी देखना होगा कि क्या किसी समुदाय के लोग इसमें अधिक शामिल हैं, या यह एक पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष, और सर्वधर्म समभाव जैसा धंधा बन गया है?

 

भारत में लगातार बढ़ते हुए साइबर-अपराधों में से डिजिटल अरेस्ट नाम के बहुत ही प्रचलित जुर्म को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी फिक्रमंद है, और उसने ऐसे कई मामले जांच के लिए सीबीआई को भी दिए हैं। केन्द्र सरकार से भी सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि वह डिजिटल अरेस्ट पर काबू पाने के लिए क्या कर रही है। हम भी इस पर हर कुछ महीनों में लिखते हैं कि डिजिटल और साइबर-फ्रॉड में नुकसान झेलने वाले लोगों की भरपाई करने के लिए सरकारों और बैंकों को मिलकर एक साइबर-बीमा योजना शुरू करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा कोई भी जुर्म बैंकों के इस्तेमाल के बिना नहीं होता है। हमारा यह भी सोचना है कि बैंकिंग व्यवस्था में सरकार को यह फेरबदल करवाना चाहिए कि किसी भी निजी खाते से रात-बिरात किसी अनजान खातों में बड़ी रकम भेजने का संदिग्ध लेन-देन न हो। इसके लिए बैंक खातेदारों से यह सहमति ली जा सकती है कि संदिग्ध लगने पर बैंक उनके खातों से रकम आगे न बढ़ाए। अभी तो पूरे देश में डिजिटल अरेस्ट के ऐसे सैकड़ों-हजारों मामले आ चुके हैं जिनमें कई-कई दिन, या हफ्तों तक लोगों को डिजिटल अरेस्ट रखकर धोखेबाजों ने सरकारी अफसर बनकर करोड़ों रूपए उगाही कर लिए। अगर बैंकिंग में यह इंतजाम हो जाता कि इस किस्म की रकम ट्रांसफर के पहले बैंक से फोन करके पूछा जाता कि एक अनजाने खाते में इतनी बड़ी यह रकम क्यों भेजी जा रही है, तो हो सकता है कि ठगी इतनी आसान नहीं रह जाती। आज भी बैंक किसी चेक को पास करने के पहले फोन करके पूछती है कि क्या यह चेक भुगतान के लिए उस खातेदार ने ही दस्तखत करके भेजा है? इस व्यवस्था को ऑनलाइन बैंकिंग तक बढ़ाना चाहिए, और एआई के इस्तेमाल से बैंक के कम्प्यूटर बड़ी आसानी से यह अलर्ट दे सकते हैं कि किसी बैंक खाते से पहली बार किसी अनजाने खाते में बड़ी रकम जा रही है, एक से अधिक बार खातों में पैसा भेजा जा रहा है, रात-बिरात ट्रांजेक्शन हो रहा है, और जिन खातों में यह रकम जा रही है, उन खातों का पिछला रिकॉर्ड क्या है? हमें यह समझने में थोड़ी सी दिक्कत हो रही है कि आज जब भारत की पूरी बैंकिंग रिजर्व बैंक के नियमों से बंधी हुई है, हर बैंक का पूरा काम कम्प्यूटरों पर ऑनलाइन है, तब संदिग्ध लेन-देन को पकडऩे के लिए तो एआई की भी बहुत जरूरत नहीं है। बैंक के कम्प्यूटर ही यह बता सकते हैं कि कौन से खाते संदिग्ध तरीके से अचानक रकम पा रहे हैं, और उसे आनन-फानन किसी और संदिग्ध खाते में बढ़ा रहे हैं। तेजी से खाते बदलने वाली ऐसी रकम को पकडऩा कम्प्यूटरों, और एआई के लिए आसान काम होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि बैंक खातेदारों पर यह अनिवार्य शर्त लगा दे कि बैंक को संदिग्ध लगने पर बड़ी-बड़ी रकम बाहर जाना कुछ घंटों के लिए रोका जा सकेगा। जिन लोगों को ऐसी देर बर्दाश्त न हो, वे अलग से अर्जी देकर अपने खातों से तुरंत बड़ा भुगतान कभी भी करने की छूट पा सकते हैं।

आज साइबर-जुर्म से जो मोटी कमाई हो रही है, उसे देखते हुए बहुत से और लोग भी जो कि पहले मुजरिम नहीं थे, अब मुजरिम बनते जा रहे हैं। यह सिलसिला तोडऩा भी जरूरी है। इसके अलावा डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा खतरा है जिसमें दहशत में डाल दिए गए किसी व्यक्ति की मौत भी हो सकती है, क्योंकि इसके शिकार आमतौर पर अधिक उम्र वाले लोग रहते हैं, और उन्हें बदहवास करने के लिए देर रात का वक्त मुजरिम छांटते हैं, जब उनकी समझ कुछ सोती रहती है। सरकार को तेजी से कार्रवाई करनी पड़ेगी, क्योंकि मुजरिम तो बुलेट ट्रेन की रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। 

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