संपादकीय
केन्द्र सरकार ने दखल देकर सामान डिलीवर करने वाली कंपनियों के खुद के समय सीमा के दावे बंद करवाने की कोशिश की है। आज खानपान, और किराना, फल-सब्जी जैसे रसोई के घरेलू सामान, और दूसरी चीजें दस-बीस मिनट में डिलीवर करने का दावा करके कंपनियां ग्राहकों को रिझाने की कोशिश करती हैं। कुछ कंपनियां कुछ अरसा पहले तक तीस मिनट में खानपान न पहुंचाने पर उसका भुगतान नहीं लेती थीं, और इस नुकसान में ऐसी ऑनलाइन कंपनियां दुपहियों पर भाग-दौड़ करके डिलीवरी करने वाले लोगों पर भी बोझ डालती थीं। मजदूर जैसे ये गिग वर्कर कहे जाने वाले लोग डिलीवरी का पैसा तो कम पाते थे, लेकिन ऐसे नुकसान को झेलते थे। हाल के महीनों में देश भर में बिखरे ऐसे करीब एक करोड़ गिग वर्कर्स ने ऑनलाइन आंदोलन किया था, और कंपनियों से बेहतर शर्तों की मांग की थी। आज वे दिनभर सडक़ों पर रफ्तार से मोटरसाइकिलें दौड़ाते हैं, उनका कोई बीमा नहीं होता, ट्रैफिक का कोई चालान होने पर कंपनी उसकी कोई भरपाई नहीं करती। कुछ घरेलू सामान पहुंचाने वाली एजेंसियां तो इस किस्म के दावे करती थीं कि आप जब तक तेल गर्म करेंगी, तब तक जीरा डिलीवर हो जाएगा।
आनन-फानन लोकल डिलीवरी वाले ऐसे सामानों की लत लग जाती है, और लोग एक टूथपेस्ट, या एक साबुन तक बुलाने लगते हैं। एक वक्त होता था कि लोग कागज पर लंबी लिस्ट बनाकर दुकान जाते थे, और महीने-पन्द्रह दिन का राशन लेकर आते थे। अब धीरे-धीरे इस खरीददारी का कुछ हिस्सा ऑनलाइन खरीदी में चले गया, और लोकल सुपर मार्केट भी मोबाइल ऐप से किए गए ऑर्डर पर सामान घर पहुंचाने लगे। फिर मानो यह भी काफी नहीं था, तो क्विक कॉमर्स नाम का एक नया हड़बडिय़ा धंधा चालू हुआ जो कि आनन-फानन बिजली की रफ्तार से सामान पहुंचाता है। लोगों का मिजाज बढ़ती हुई सहूलियतों के साथ-साथ बिगड़ते चले गया। पहले एक पखवाड़े का सामान एक साथ आ जाता था, अब वह ऑनलाइन ऑर्डर करके सबसे सस्ते में देश भर में कहीं से भी आ रहा है, और फिर तीस मिनट में खानपान, और दस मिनट में किराना या किचन सामान की आदत पडऩे लगी। क्या सचमुच ही इंसानों को इस हद तक लापरवाह होना चाहिए कि एक-एक सामान जरूरत पडऩे पर ही उसी वक्त ऑर्डर करें? यह सहूलियत अगर है भी, तो इसका किसी इमरजेंसी-दवाई के लिए इस्तेमाल करना तो समझ में आता है, जिन सामानों को बड़ी आसानी से कई दिन पहले सोचकर बुलाया जा सकता था, उन्हें भी दस मिनट में पाना, और ऐसी नौबत आने तक लापरवाह बने रहना एक ग्राहक के अहंकार को अधिक पूरा करता है, सामान की जरूरत को कम। सामानों से परे भी लोगों का मिजाज जिम्मेदारी का रहना चाहिए, और दस मिनट में डिलीवरी की उम्मीद लोगों को पुलिस, फायर ब्रिगेड, और एम्बुलेंस से ही करनी चाहिए। ऐसी आपात-सेवाओं से परे बाकी चीजों के लिए लोगों को अपने दिल-दिमाग में एक एडवांस-तैयारी रखने की आदत डालनी चाहिए।
आज क्विक कॉमर्स के नाम पर लोगों की आदत बिगाडक़र जो लोग एक-एक सामान की डिलीवरी करते हैं, उसमें हर डिलीवरी के पीछे सडक़ पर एक गाड़ी का सफर बढ़ता है, ईंधन जलता है, और डिलीवरी के पैकेट का धरती पर बोझ भी बढ़ता है। पैकिंग का बोझ तो हर किस्म की ऑनलाइन खरीदी के साथ भी बढ़ता है, और एक-एक सामान के पैकेट जब देश में आर-पार आते-जाते हैं, तो वे किसी एक सामान से भरी ट्रक के मुकाबले बहुत अधिक बोझ बनते हैं। कारखाने से किसी शहर के गोदाम तक एक ही सामान भरकर गाडिय़ां जब जाती हैं, तो वे ट्रांसपोर्ट का सबसे कम बोझ डालती हैं। यही काम ऑनलाइन ऑर्डर से आने-जाने वाले पैकेट बहुत अधिक बोझ डालकर करते हैं। इसलिए ऑनलाइन खरीदी को स्थानीय ऑफलाइन खरीदी का बेहतर विकल्प पर्यावरण के हिसाब से तो नहीं माना जा सकता, यह एक अलग बात है कि ग्राहकों को रियायत का कुछ फायदा मिल सकता है। ऐसे सामानों की डिलीवरी करने वाले दुपहिया सवार नौजवान जितने बड़े-बड़े असंभव से आकार के बैग टांगकर और लादकर चलते हैं, उनके हिसाब से तो दुपहिया बने भी नहीं रहते, और न ही ट्रैफिक में ऐसे दुपहियों का कोई संतुलन हो सकता। कारोबार ऐसा बेरहम होता है कि वह डिलीवरी करने वाले लोगों की हिफाजत की फिक्र किए बिना उन्हें सैकड़ों पैकेट देकर रवाना करता है ताकि अधिक से अधिक तेजी से काम हो सके।
दुनिया को अपनी रफ्तार इतनी भी नहीं बढ़ानी चाहिए कि वह मानवीय क्षमता से परे की हो। अभी केन्द्र सरकार ने दखल देकर दस मिनट जैसी डिलीवरी की समय सीमा के दावे बंद करवाने की बात की है। इसके अलावा दुपहियों पर बोरों जितने बड़े बैग लेकर चलने पर भी रोक लगानी चाहिए, इसके लिए वजन और आकार दोनों की सीमा तय करनी चाहिए, क्योंकि डिलीवरी का कारोबार सडक़ सुरक्षा से ऊपर का नहीं है। इतने लदे हुए चलने वाले दुपहिए दूसरों के लिए भी खतरा हो सकते हैं, और जो लोग इतना वजन लेकर चलते हैं उनकी सेहत के लिए तो खतरा होते ही होंगे। जो कारोबार देश की आबादी के एक फीसदी लोगों को मजदूरी देता है, उस कारोबार का सुरक्षित होना बहुत जरूरी है, और इतना संगठित होना भी जरूरी है कि सरकार ऐसी कंपनियों पर अपने ऐसे ठेका-मजदूरों को बीमा और एक्सीडेंट-राहत जैसी हिफाजत देने की शर्त डाले। यह कारोबार भारत में बढ़ते ही चलना है, इसलिए इस एक सबसे बड़े हो गए मजदूरी के रोजगार को अनदेखा नहीं किया जा सकता, सरकार को इन लोगों की सुरक्षा के कानून बनाने चाहिए, सिर्फ बातचीत करके किसी एक पहलू की सुरक्षा जुटाना काफी नहीं है।


