बस्तर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
जगदलपुर, 21 सितंबर। पथरागुड़ा के भंगाराम चौक में स्थित इस गुडी (मंदिर) को काछन गुड़ी कहते है।
इसका निर्माण काकतीय (चालुक्य) वंश के राजा दलपल देव के द्वारा 18वीं शताब्दी अर्थात सन् 1772 के आसपास किया गया था। वर्ष 2005 में शासन के द्वारा जीर्णोद्वार किया गया । दशहरा पर्व के अंतर्गत काछन देवी के द्वारा कांटेदार झुले की गद्दी पर आसीन होकर दी जाने वाली कंटक जयी होने का आशीर्वाद काछन गादी पूजा विधान कहलाता है। जो आश्विन अमावस्या के दिन होता है। काछन देवी रण की देवी कहलाती है। ऐसा माना जाता है आश्विन अमावस्या को पनका जाति की कुवांरी कन्या को देवी की सवारी आती है। देवी को काछन गुड़ी के समक्ष कांटों के झुले पर लिटाकर झुलाया जाता है। इस दिन शाम के समय राजपरिवार, बस्तर बस्तर दशहरा समिति के सदस्य, देवी-देवताओं, मांझी, चालकी, ताईक, पाईक के साथ माँ दंतेश्वरी मंदिर से निकलकर मुण्डा बाजा एवं आतिशबाजी के साथ काछन गुड़ी पहुंचते है। तथा काँटो के झूले पर सोए हुए काछन देवी से दशहरा पर्व मनाने की औपचारिक अनुमति मांगी जाती है। इस दौरान पनका जाति के पुजारी और गुरु मांई के द्वारा धनकुल गीत गाया जाता है।
काछन देवी बस्तर के पनका जाति के आराध्य देवी मानी जाती है। पिछले तीन सालों से काछन देवी (पीहू )जो इस वर्ष भी काछन देवी हैं, कुरंदी के जंगलों से बेल के कांटों से काछन देवी का झूला बनाया गया है।


