संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सबसे गरीब के सबसे करीब रहने की जरूरत
सुनील कुमार ने लिखा है
23-Jan-2026 6:43 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सबसे गरीब के सबसे करीब रहने की जरूरत

छत्तीसगढ़ में अभी एक छोटी सी बच्ची के साथ उसी इलाके के एक बड़े बुजुर्ग दुकानदार ने कई दिनों तक बलात्कार किया। बाद में शिकायत होने पर गिरफ्तारी हुई, और उस बुजुर्ग के कब्जे वाले किसी निर्माण को अवैध कब्जा होने की वजह से बुलडोजर से गिरा भी दिया गया। इस गरीब बच्ची की देखरेख का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है, और समाज तो ऐसा है ही कि उसके भीतर कोई भी बच्ची सुरक्षित नहीं रह सकती। इस एक मामले से परे बहुत सी दूसरी विक्षिप्त या विचलित लड़कियां या महिलाएं ऐसी हैं जिनके साथ बलात्कार होता है, और अक्सर तो उसकी खबर तब होती है जब उनका गर्भ दिखने लगता है। अब ऐसे मामलों की सजा किसे दी जाए? कई लड़कियां मूकबधिर रहती हैं, नेत्रहीन रहती हैं, किसी और विकलांगता की शिकार रहती हैं, और गरीब तो रहती ही हैं क्योंकि ऊपर वाला भी मुसीबतों को कमजोर लोगों को ही अधिक देता है। ऐसे में इन सारे लोगों को जिन्हें समाज असहाय, या बेबस, या जरूरतमंद कहता है, उनके लिए क्या किया जाना चाहिए?

हम पहले भी कुछ मौकों पर इस बात को लिख चुके हैं कि जनकल्याणकारी शासन में सरकार की पहली जिम्मेदारी सबसे बेबस लोगों के प्रति होनी चाहिए। इसमें बेघर लोग हैं, विचलित या बेसुध किस्म के लोग हैं, फुटपाथों पर जीने वाले कमजोर और गरीब लोग हैं, बीमार हैं, घर छोड़े हुए और नशे में पड़े हुए बच्चे हैं। इन किस्मों के लोग बच्चों भी हैं, बड़े भी हैं, आदमी भी हैं, और औरतें भी। इन सबको ऊंचे दर्जे की जरूरत रहती है क्योंकि इनके सिर पर छत नहीं होती, रहने-सोने, खाने या इलाज का इंतजाम नहीं होता। इन्हें मानसिक परामर्श, या मानसिक चिकित्सा की जरूरत भी रहती है। किसी भी राज्य सरकार को यह संकल्प लेना चाहिए कि उसके राज्य में इस तरह के कोई लोग बेसहारा नहीं छोड़े जाएंगे। आज कुछ भिक्षुक गृह कहीं-कहीं पर हैं, कहीं-कहीं इक्का-दुक्का वृद्धाश्रम हैं, कहीं पर बाल सुधार गृह हैं, लेकिन इन सबके लिए अनिवार्य इंतजाम कुछ भी नहीं है।

यह सिलसिला बहुत खतरनाक है। धीरे-धीरे समाज सार्वजनिक जगहों पर बिखरी हुई ऐसी जिंदगियों को देखने का ऐसा आदी हो जाता है कि उसे इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। ठीक उसी तरह, जिस तरह कि किसी ईश्वर के दर्शन के लिए धर्मस्थल जाने पर लोग वहां बाहर दूर तक कतारों में बैठे हुए भिखारियों को देखने के आदी हो जाते हैं, इस हद तक आदी हो जाते हैं कि उन्हें ये लोग दिखते भी नहीं हैं। आज शहरों में समाज की हालत यही हो गई है कि फुटपाथों पर, रेलवे स्टेशनों, और बस अड्डों पर बिखरे और जीते हुए ऐसे लोग हमें दिखना बंद से हो गए हैं। यह संवेदनशून्यता अधिक खतरनाक है क्योंकि इसके बाद फिर सरकार पर जनमत का कोई दबाव भी नहीं रह जाता। लेकिन हमें ऐसा लगता है कि सरकार चलाने वाले नेता और अफसर, दोनों ही अब तक तो बिना एआई के, इंसान ही हैं, और यह बात उन्हें भी छूनी चाहिए कि समाज में हर कुछ किलोमीटर पर ऐसी कोई जिंदगी बिखरी हुई है, और यह अपने आपमें जनकल्याणकारी शासन की एक बड़ी असफलता है।

सरकार को अलग-अलग विभागों, या संवैधानिक संस्थाओं, निगम मंडल में बिखरी हुई जिम्मेदारियों को समेटकर एक साथ रखना चाहिए, और शहर, कस्बे, गांव तक यह इंतजाम करना चाहिए कि हर किस्म के निराश्रित लोगों के लिए एक साथ किस तरह का इंतजाम किया जा सकता है। हो सकता है कि एक ही कैम्पस में अलग-अलग तबकों के लोगों के लिए अलग-अलग इंतजाम हों, लेकिन इन सबका इलाज, इन सबका खानपान, इन सबका परामर्श तो एक साथ हो सकता है। इसके लिए सरकार को एक बेहतर शब्द भी सोचना चाहिए जिससे निराश्रित गृह, अनाथाश्रम, महिला उद्धार गृह, नारी निकेतन, वृद्धाश्रम जैसे शब्दों के बजाय एक अधिक सकारात्मक शब्द ढूंढा जाए जो कि वहां के रहवासियों के लिए आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का भी हो। जरूरी नहीं है कि सरकारें अपने भ्रष्ट सरकारी कामकाज के तहत ही ऐसी जगहों को बर्बाद होने दें, सरकारें यह भी कर सकती हैं कि समाज के लोगों को शामिल करके जनसंगठनों, या सामाजिक संगठनों को जमीन और इमारत जैसी ढांचागत सुविधा देकर उनसे भी सहयोग की अपील करे। आज भी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक समाजसेवी अपने परिचित लोगों को जोडक़र सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पास मरीजों के परिजनों के रहने-खाने का ऐसा अतिरियायती इंतजाम बरसों से चला रहे हैं जो कि सरकार खुद कभी नहीं चला पाई। इसलिए कंपनियों के सीएसआर मद को जोडक़र, जिले की डीएमएफ जैसी राशि की मदद से, सरकार को जिला मुख्यालयों के लिए तो तुरंत ही ऐसी योजना बनानी चाहिए कि कोई भी जरूरतमंद बेघर, बीमार, या विचलित व्यक्ति बिना मदद के न रहे। हम जो सुझा रहे हैं इसमें कोई परमाणु तकनीक शामिल नहीं हैं, अनंतकाल से समाज के कई लोग तरह-तरह की सेवा के काम करते आए हैं, आज जरूरत बस यही है कि जिस तरह कोई काम शुरू करने से पहले धार्मिक आराधना की जाती है, वैसे ही कोई भी सरकार योजना सोचने से पहले समाज के इस सबसे कमजोर तबकों को एक मानवीय जीवन देने की बात सोचनी चाहिए।

बात बलात्कार की शिकार एक बच्ची से शुरू हुई थी, और समय-समय पर हाईकोर्ट तक यह मामला जाता है कि कानूनी रूप से सरकारों को बलात्कार की शिकार लड़कियों या महिलाओं को जो आर्थिक मदद देनी चाहिए, वह भी बरसों तक नहीं दी जाती है। इतनी संवेदनशून्यता ठीक नहीं है। लोग अगर सरकार के राजसी तौर-तरीकों के साथ में अगर जिंदगी की इन विसंगतियों को साथ रखकर पेश करेंगे, तो सरकार चला रहे लोगों को बड़ी ही असुविधा होगी। इसलिए हमारी सलाह यही है कि सरकार को सबसे जरूरतमंद लोगों को अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। इसे ही किसी काम का श्रीगणेश मानना चाहिए, या जैसा कि कहीं-कहीं ट्रक-बस के ड्राइवर वाले दरवाजे पर  लिखा रहता है- पहले अल्लाह बोल, फिर दरवाजा खोल। मतलब यही है कि सबसे पहले अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए, उसके बाद ही पूरी की गई दूसरी जिम्मेदारियों की कोई अहमियत होनी चाहिए।

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