संपादकीय
अमरीका के फायनांस कैपिटल न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर जोहरान ममदानी ने अभी पद की शपथ ली है। वे पिछले सौ साल के सबसे कम उम्र के मेयर भी बने हैं। भारत के लोगों के लिए यह बात कुछ अटपटी हो सकती है कि न्यूयॉर्क की घड़ी के मुताबिक नए साल में दाखिल होते हुए आधी रात उन्होंने शपथ ली। और एक अलग खबर बताती है कि इसके साथ ही न्यूयॉर्क शहर के टाइम्स स्क्वेयर में नए साल का जलसा मनाने के लिए दस लाख लोगों के इक_ा होने का अंदाज था। इतनी भीड़ के बीच हवा में इस बात की तनातनी भी थी कि डेमोक्रेटिक पार्टी के इस नौजवान मेयर ने कई और रिकॉर्ड भी तोड़े थे। अमरीकी राष्ट्रपति किसी मेयर उम्मीदवार के खिलाफ अपनी पूरी ताकत से जुट गया था, और शहर को यह धमकी दी थी कि इस मुस्लिम नौजवान को अगर मेयर बनाओगे तो अमरीकी सरकार शहर की कोई मदद नहीं करेगी। इसके बावजूद ममदानी शानदार तरीके से जीतकर आए। एक भारतवंशी परिवार के होने के बावजूद भारत से बहुत लोगों ने उन्हें बधाईयां नहीं दी थीं, क्योंकि वे भारत के कुछ घरेलू मामलों को लेकर आलोचना कर चुके थे। 34 बरस के इस नौजवान ने यह गजब का मुकाबला किया था जिसमें डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से वह अकेले लड़ रहा था, और रिपब्लिकन उम्मीदवार की तरफ से राष्ट्रपति ट्रंप खुद लड़ रहे थे। जिन लोगों को पता न हो वे जान लें कि जोहरान ममदानी की मां मीरा नायर भारतीय मूल की एक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फिल्म निर्देशक हैं, और उनके पति महमूद ममदानी भी भारतीय मूल के ही हैं।
वैसे तो अमरीका के एक शहर के मेयर की कामयाबी इतनी अहमियत नहीं रखती कि हम हिंदुस्तान के अखबार में उस पर विचारों के इस कॉलम में लिखें, लेकिन किस तरह विपरीत परिस्थितियों के बीच भी कामयाबी पाई जा सकती है, सीधे आसमान में छेद करने के लिए एक पत्थर उछाला जा सकता है, यह जोहरान ममदानी की कामयाबी से सामने आया है। यह वही शहर है जहां 2001 में दुनिया के सबसे बड़े आंतकी ओसामा बिन लादेन के विमानों ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वां इमारतों को टक्कर मारकर उन्हें जमीन से मिला दिया था, और हजारों लोग मारे गए थे। दुनिया के इतिहास में उतना बड़ा कोई आतंकी हमला हुआ नहीं था, और अमरीका की उससे बड़ी कोई बेइज्जती नहीं हुई थी। ऐसे न्यूयॉर्क शहर में 25 बरस गुजरने के पहले ही एक मुस्लिम नौजवान ट्रंप की चुनौती को झेलते हुए जिस अंदाज में इस शहर का मेयर बना है, वह देखने लायक है। न्यूयॉर्क शहर दुनिया में सबसे अधिक मिलवा आबादी वाला शहर है, यानी यहां पर हर धर्म, रंग, राष्ट्रीयता के लोग हैं। यहां की मुस्लिम आबादी करीब 9 फीसदी है, जो कि ऐसा कोई चुनाव जीतने लायक नहीं है। जब तक भरपूर संख्या में दूसरे धर्मों के लोगों ने जोहरान को वोट नहीं दिया होगा, तब तक वह जीत नहीं सकता था।
आज की यह बातचीत कुछ तो इस नौजवान मेयर के बारे में है जिसने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, और उसके पहले के भी डेमोक्रेटिक पार्टी के अपने राजनीतिक इतिहास में भी कभी अपने मुस्लिम होने की बात नहीं छुपाई, कभी इस्लाम के प्रति अपनी आस्था नहीं छुपाई। उसने इन बातों को खुलकर सामने रखा, उसके बावजूद किसी मुस्लिम आतंकी के धरती पर खड़े किए गए सबसे गहरे जख्म वाले इस शहर ने एक मुस्लिम मेयर चुना। यह बात कुछ तो जोहरान की तारीफ में है, और बाकी पूरी तारीफ का हकदार यह न्यूयॉर्क शहर है जिसने 11 सितंबर के उस कुख्यात हमले के जख्म अब तक रिसना जारी नहीं रखा है, उससे ऊबर गया है।
जिन लोगों को न्यूयॉर्क शहर में एक दिन भी गुजारने का मौका मिलता है, वे यह देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि सडक़ों पर किस तरह गरीब और अमीर एक साथ पैदल चलते दिखते हैं, गोरे और काले लोगों का अनुपात समझ नहीं पड़ता, और दुनिया के जिन दूसरे देशों और नस्लों के लोग अलग-अलग रंग-रूप और कद-काठी के होते हैं, वे सब भी किस तरह एक-दूसरे से बेफिक्र और बेपरवाह साथ में चलते रहते हैं। किस तरह पूरी दुनिया के देशों से आए हुए लोग वहां के फुटपाथों से लेकर वहां की अंडरग्राउंड ट्रेन तक दिखते हैं, और किसी को किसी से कोई डर नहीं होता, नफरत या हिकारत नहीं होती। यह शहर सचमुच ही अमरीका की उस पहचान को मजबूत करता है जिसे एक मेल्टिंग पॉट कहा जाता था, दुनियाभर की संस्कृतियों को पिघलाकर एक कर देने वाला देश। हालांकि अब राष्ट्रपति ट्रंप की अगुवाई में इस पूरे देश को बदल देने की मुहिम चल रही है, लेकिन ट्रंप की सारी कोशिशों के बावजूद, अपनी निजी इज्जत दांव पर लगा देने के बाद भी ट्रंप इस शहर में तो हार ही गया। जो अमरीकी राष्ट्रपति आज पूरी दुनिया को जीतने, अपना गुलाम बनाने के अभियान पर निकला हुआ है, उसके अपने शहर में, दुनिया की इस वित्तीय राजधानी में कल के एक छोकरे ने जिस तरह उसे शिकस्त दी है, वह न सिर्फ अमरीका में एक नया इतिहास दर्ज हुआ है, बल्कि वह बाकी दुनिया के लिए भी एक सबक है।
जो डोनल्ड ट्रंप अपनी फौज से नाइजीरिया में हवाई हमले करवाता है कि वहां ईसाइयों को मारा जा रहा है, जो वेनेजुएला पर हवाई हमले करवाता है कि वहां से अमरीका के लिए नशे की तस्करी हो रही है, जो ईरान पर अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा हवाई हमला करवाता है, वह अपने ही घर में इस तरह बेबस और बेइज्जत किया जा सकता है, यह एक अनोखी और दर्शनीय बात रही। दुनिया के सबसे बड़े तानाशाहों को, उनकी बददिमागी को आईना दिखाने वाले छोटे-छोटे से काम भी बड़े-बड़े इतिहास रचते हैं। एक शहर का मेयर ऐसा निकला जिसने ट्रंप को ट्रंप-टॉवर के सामने ही पटखनी दी, जिसने यह साबित कर दिया कि ओसामा बिन लादेन की वजह से हर मुस्लिम से नफरत जायज नहीं हो सकती, जिसने यह भी साबित कर दिया कि किसी धर्म के व्यक्ति को किसी शहर में चुनाव जीतने के लिए अपने धर्म के वोटों का बहुतायत में होना जरूरी नहीं होता। अगर शहर न्यूयॉर्क हो, और उम्मीदवार अगर जोहरान ममदानी किस्म का हौसलामंद हो, तो कुछ भी हो सकता है। अमरीकी राष्ट्रपति को पिछले करीब एक बरस में सबसे बड़ी चुनावी शिकस्त यही मिली है। इस शहर चुनाव का यह मतलब कहीं नहीं है कि ट्रंप बाकी देश में भी इसी तरह हार जाएगा। यह तो दुनिया के इस अनोखे शहर का हाल है जो कि एक सचमुच का अंतरराष्ट्रीय नजरिया रखता है। इस शहर ने नफरती ट्रंप के उन्मादी अमरीका के बीच एक अलग किस्म के टापू की पहचान बना ली है कि वह अमरीका की बाकी राजनीति में बहुमत से जीत गई नफरत और कट्टरता से परे का शहर है। दुनिया के बाकी देशों को, बाकी शहरों को, शहर के बीच किसी वार्ड को अपने-आपको समझदारी और सद्भावना का ऐसा ही टापू बनकर दिखाने की एक मिसाल न्यूयॉर्क ने सामने रखी है। आज जब न सिर्फ अमरीका, बल्कि योरप के आधा दर्जन से अधिक देशों में, और भारत जैसे धरती के दूसरी तरफ के देश में भी धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर बुरा ध्रुवीकरण हो रहा है, तब दुनिया में कुछ सकारात्मक मिसालों की भी जरूरत है। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के पहले भी न्यूयॉर्क शहर ने अमरीका में आए हुए प्रवासियों को जगह देने की एक अलग मिसाल पेश की थी। उसे ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव में बहुत बड़ा मुद्दा भी बनाया था। अब इस मेयर चुनाव के बाद जो अनोखी सद्भावना इस शहर ने सामने रखी है, वह इस शहर के लिए भी फख्र की बात है, भारत में भी जो ममदानी की जीत से खुश हो सकते हैं, उनके लिए भी यह खुशी की बात है।


