संपादकीय
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में तमनार इलाके में जिंदल की एक कोयला खदान के लिए हो रही जनसुनवाई के दौरान एक महिला पुलिस अधिकारी को भीड़ ने, मोटे तौर पर महिलाओं ने बुरी तरह पीटा था। दो-तीन दिन पहले आए उसके वीडियो ने भी लोगों को हिला दिया था। लेकिन जब कई महिलाएं पीट रही थीं, वर्दी पहनी हुई थाना प्रभारी नीचे गिर गई थी, तब उसी भीड़ में से कम से कम कुछ महिलाएं दूसरों को रोक रहीं थीं, और इस महिला पुलिस अधिकारी को पानी दे रही थीं। खैर, वह जनसुनवाई प्रशासन ने भी कड़ा जनविरोध देखते हुए रद्द कर दी, खुद जिंदल ने जनसुनवाई का आवेदन वापिस ले लिया, और बात आई-गई हो गई लग रही थी। महिला अधिकारी से मारपीट करने वाले लोगों के खिलाफ जुर्म दर्ज हो गया था, उनकी गिरफ्तारी भी चल रही थी। इस बीच दो दिन पहले एक नया वीडियो आया जिसमें भीड़ के हमले से निकलकर इस मौके से हट रही एक महिला सिपाही को पुरूष हमलावरों की भीड़ ने एक खेत में घेरकर गिरा दिया, उसे बुरी तरह से मारा, इसका वीडियो भी बनाया जिसमें उसे चप्पल से मारने वाला हिस्सा भी रिकॉर्ड है। लेकिन इन सबसे परे इस महिला सिपाही के कपड़े बुरी तरह फाड़ दिए गए, और वह अपने बदन को ढांकने की कोशिश करते हुए गिड़गिड़ाती रही, रोकर कहती रही कि वह दुबारा नहीं आएगी, लेकिन हमलावर मर्द थे कि उसके कपड़े फाड़े जा रहे थे, उसे मारे जा रहे थे। जिन लोगों ने यह वीडियो देखा है, वे हिल गए हैं कि पुलिस सिपाही जैसी छोटी सी एक नौकरी करते हुए किस तरह एक महिला की जान पर बन आई, और किस तरह पेशेवर मुजरिमों ने नहीं, गांव के आम लोगों ने उसके कपड़ों के चिथड़े उड़ा दिए, और मर्दों की भीड़ एक अकेली औरत को इस बुरी तरह मारती रही।
भीड़ अगर किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस पार्टी से जूझती है, तो वह बात फिर भी समझ आती है। लेकिन एक अकेली निहत्थी महिला सिपाही को घेरकर उसके साथ जब कई लोग ऐसा हिंसक और अश्लील बर्ताव करते हैं, तो यह उनके भीतर की हैवानियत का सुबूत है। जानकार लोग बताते हैं कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता। लेकिन यहां पर भीड़ उस तरह की भी नहीं थी, यहां पर तो हमलावर प्रदर्शनकारी मर्दों का एक जत्था था, एक छोटा सा गिरोह था जो अपनी तमाम अपूरित कुंठाओं को एक महिला पर भी निकाल रहा था, और एक पुलिस पर भी। जबकि तमनार के इस पूरे प्रदर्शन में ऐसा भी नहीं कि पुलिस ने बहुत अधिक बल प्रयोग किया हो, बहुत से लोगों को मार डाला हो, और विचलित लोगों ने एक महिला सिपाही के साथ ऐसी हरकत की हो। यह तो लोगों पर कोई खतरा भी नहीं था, और किसी खेत में एक महिला को गिराकर आधा एक दर्जन मर्द उसके साथ ऐसा हिंसक बर्ताव कर रहे थे। ये प्रदर्शनकारी नक्सलियों की तरह के हिंसा के आदी भी नहीं थे, लेकिन एक जानकारी पुलिस अफसर के मुताबिक आंदोलनकारियों में से बहुत से लोग बुरी तरह नशे में थे।
नशा छत्तीसगढ़ की एक इतनी बड़ी बीमारी बन गया है कि दोस्तों के बीच कत्ल हो रहे हैं, भाई भाई को मार रहे हैं, कई जगहों पर आल-औलाद मां-बाप को मार रही है, और कुछ मौकों पर तो थके हुए मां-बाप ने नशेड़ी बेटे को भी मार डाला है। नशे में नाबालिग लडक़े भी हर किस्म की हिंसा कर रहे हैं, वे बलात्कार और सामूहिक बलात्कार कर रहे हैं, वे कत्ल कर रहे हैं, किडनैप कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ नशे में इस तरह डूब गया है कि बाप बेटी से बलात्कार कर रहा है, शिक्षक और हेडमास्टर मिलकर छात्रा से बलात्कार कर रहे हैं, और कोई लडक़ा अपनी गर्लफ्रेंड को बुलाकर अपने दोस्तों के साथ मिलकर उससे बलात्कार कर रहा है। ऐसे अधिकतर मामलों में हिंसक मुजरिम किसी न किसी नशे में डूबे हुए रहते हैं, शराब का नशा तो आसानी से दिख जाता है, लेकिन इनमें से कई लोग दूसरे किस्म का नशा भी अब करने लगे हैं जो कि छत्तीसगढ़ में धड़ल्ले से प्रचलित हो रहा है। एक जानकार का कहना है कि जब तक शराब ठेके निजी हाथों में रहते थे, तब तक हर ठेकेदार इस बात की फिक्र करता था कि उसके इलाके में किसी और तरह के नशे का धंधा न हो, क्योंकि इससे उसके पेट पर लात पड़ती थी। लेकिन अब तो सरकार खुद ही दारू बेचने पर एकाधिकार रखती है, अब अपने-अपने ठेका इलाके में नशे के धंधे पर निगरानी रखने वाले दारू ठेकेदार भी नहीं रह गए। वैसे भी पुलिस हर दिन शराब से परे के गैरकानूनी नशे के जितने कारोबारियों को रोज पकड़ती है, उससे यह समझ आता है कि पकड़ में आने वाले मामलों से कम से कम सौ गुना अधिक मामले तो पकड़ में न आने वाले रहते होंगे, और चाहे अभी तक छत्तीसगढ़ पर पंजाब की तरह की फिल्म न बनी हो, छत्तीसगढ़ उड़ रहा है।
नशे से सरकार को इतनी मोटी कमाई होती है कि सरकारों की कोई भी नीयत इस धंधे को घटाने की नहीं रहती। अगर हमारा अंदाज सही है, तो बीते बरसों में लगातार छत्तीसगढ़ की आबादी के अनुपात में भी शराब की बिक्री बढ़ती चली जा रही है। फिर यह बात भी है कि दूसरे प्रदेशों से तस्करी से आने वाली शराब, छत्तीसगढ़ के शराब कारखानों में अभी भी धड़ल्ले से बनने वाली दो नंबर की टैक्स चोरी की शराब का कोई हिसाब-किताब सरकारी आंकड़ों में तो दिखता नहीं है। इन सबको अगर जोड़ दिया जाए, तो भी ये आंकड़े भयानक हो जाते हैं। फिर दूसरे कई किस्म का नशा तो किसी भी सरकारी आंकड़ों में आ नहीं सकता। हर गली-मोहल्ले की किराना दुकान में बिकने वाले, पंचर बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायन की ट्यूब बिकती है, और कचरा बीनने वाले, बेघर फुटपाथी बच्चे इसी ट्यूब से केमिकल निकालकर सूंघकर नशा करते हैं, और सुबह से टुन्न रहते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होने तक माहिर मुजरिम हो जाते हैं, और नाबालिग रहते-रहते वे गिरफ्तार होकर बाल सुधारगृह का फेरा लगा चुके रहते हैं, जहां पर दूसरे कई किस्म के जुर्म के प्रशिक्षक नाबालिग बच्चे उनका ग्रेजुएशन करवाने के लिए तैयार रहते हैं।
शराब और दूसरे किस्म के नशों को इंसान की कमजोरी मान लिया जाए और यह कह दिया जाए कि यह तो देवताओं के वक्त से चले आ रहे सोमरस के ही अलग-अलग संस्करण हैं, तो यह समाज में नशे को एक किस्म की पौराणिक और वैधानिक मान्यता देने सरीखा हो जाएगा। दरअसल छत्तीसगढ़ में सरकार की अलग-अलग योजनाओं से लोगों को कम मेहनत की फसल के खासे अधिक दाम मिलने लगे हैं, कुछ योजनाओं की रकम सीधे बैंक खातों में पहुंचने लगी है, इन सबसे भी नशाखोरी बढ़ गई है। लोगों को जितना चावल सरकारी योजनाओं में मिलता है, उतने की खपत नहीं रहती, और लोग जरूरत से अधिक के चावल को उसी दुकानदार को बेच देते हैं, और नगद पैसा लेकर आमतौर पर नशा कर लेते हैं। एकतरफ सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और अनुदानों पर सरकार के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा जा रहा है, और सरकार के पास विकास कार्यों के लिए पैसा नहीं बच रहा है। दूसरी तरफ जरूरत और हक से अधिक सरकारी मदद की वजह से लोगों में नशे की आदत बढ़ती चली जा रही है। अर्थशास्त्र की सतही समझ रखने वाले कुछ लोग मजा लेते हुए यह भी कहते हैं कि सरकार धान के दाम और मुफ्त के चावल की शक्ल में जो पैसा देती है, वह दारू की शक्ल में वापिस ले लेती है। लेकिन अगर हम इस चक्र को सही भी मान लें, तो भी सरकारी खजाने से पैसा निकलने और सरकारी खजाने में लौटने के बीच में परिवार और समाज पूरी तरह बर्बाद हुए जा रहे हैं। हम किसी भी तरह से नशाबंदी की सिफारिश नहीं कर रहे क्योंकि उसके अलग खतरे हैं, और आधा दर्जन राज्यों से घिरे हुए छत्तीसगढ़ में ऐसी कोई योजना सफल नहीं हो सकती। सुशासन बाबू के बिहार में, और मोदी के गुजरात में भी दारूबंदी को एक धेला कामयाबी नहीं है, और लोग अपने मर्जी का ब्रांड फास्ट-फूड से अधिक रफ्तार से घर बैठे पाते हैं, नशे में सडक़ पर मारपीट करते वीडियो पर कैद होते हैं। इसलिए सरकार को नशाबंदी से परे कुछ सोचना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में सरकारी शराब से परे के आंकड़े नहीं हैं, यह तो एक बात है, दूसरी बात यह है कि प्रदेश के आदिवासी इलाकों में वहां के आदिवासी लोगों को अपने इस्तेमाल के लिए शराब बनाने की कानूनी छूट है। जब लोगों को उंगली पकडऩे की कानूनी छूट मिलती है, तो वे पलभर में कंधे तक पहुंच ही जाते हैं। प्रदेशभर में घर-घर में बनने वाली हाथभ_ी की दारू भी बिकती है, और कारखानों की शराब से सस्ती, या अधिक नशीली होने के कारण उसका भी एक बाजार है। यह राज्य नशे में मस्त डूबा हुआ है, राजधानी जैसी जगह पर जहां पुलिस कुछ अधिक है, वहां पर कभी-कभी कुछ महंगे ठिकानों से निकलने वाले धुत्त लोगों को पकड़ लिया जाता है, लेकिन पूरे प्रदेश में जिस बड़े पैमाने पर सडक़ हादसे हो रहे हैं उन सबका विश्लेषण किया जाए, तो पता लगेगा कि नशा हादसों का एक सबसे बड़ा कारण भी है। हम इस मुद्दे पर आज यहां सिर्फ चर्चा कर सकते हैं, हमारे पास समाधान कुछ भी नहीं है। लेकिन हर चीज के लिए सरकार पर तो जिम्मेदारी रहती ही है, और उसे जनता को, समाज को जोडक़र इस विचार-विमर्श को आगे बढ़ाना चाहिए कि छत्तिसगढिय़ा को सबले बढिय़ा बनने से रोकने वाले इस नशे को कैसे रोका जाए?
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