संपादकीय
भारतीय राजनीति की बोलचाल में गालियां और गंदी बातें थमने का नाम ही नहीं लेती हैं। एक किसी की बात पर बवाल थमता नहीं है, कि मानो उसे चुनौती मानते हुए कोई और नेता कहीं और गंदगी फैलाना शुरू कर देते हैं। अभी मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश के एक सबसे बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने प्रदेश के एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार के सवाल के जवाब में एक अश्लील गाली दे दी, और पत्रकार ने अपनी रीढ़ की हड्डी का इस्तेमाल करते हुए प्रदेश के इस मंत्री की भाषा को खुली चुनौती दी। नतीजा यह निकला कि चारों तरफ इस गंदी जुबान के वीडियो को देख-देखकर लोगों ने कैलाश विजयवर्गीय को इतना धिक्कारा कि सहमे और हड़बड़ाए मंत्री ने तुरंत अफसोस जाहिर कर दिया, लेकिन तब तक पूरे देश में मंत्री की बद्जुबानी का घंटा तो बज ही चुका था। अब बाकी देश में इस गूंज से कई लोगों के सामने एक चुनौती खड़ी हो गई थी, और दूसरे सर्टिफाइड बद्जुबान लोगों के बीच एक हीनभावना की लहर दौड़ पड़ी थी कि एक तरफ तो घंटे बज रहे हैं, और दूसरी तरफ वे अब तक कुछ भी नहीं बोल पाए हैं! ऐसे में भाजपा के एक दूसरे राज, उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के पति ने एक बयान देकर अपने को हीनभावना से तुरंत बाहर कर लिया। गिरधारी लाल साहू मंच और माइक से यह कहते हुए वीडियो पर दिख रहे हैं कि उत्तराखंड के नौजवानों की अगर शादी नहीं हो रही है, तो ऐसे चार-पांच नौजवान उनके साथ चलें, उनके लिए बिहार से लड़कियां ले आएंगे, जहां 20-25 हजार में लड़कियां मिल जाती हैं। बात की बात में यह वीडियो चारों तरफ फैल गया, और अब वही पुराना, तेरा बहाना के अंदाज में मंत्री-पति सफाई दे रहे हैं कि उनकी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। भाजपा के लिए असुविधा की बात यह भी है कि बिहार में वह सत्तारूढ़ गठबंधन की बराबरी की भागीदार है, और बिहार के भाजपाई गृहमंत्री इस सरकार में उपमुख्यमंत्री भी हैं। अब अगर भाजपा के राज में लड़कियां 20-25 हजार रुपए में बिक रही हैं, और दूसरे राज्य की भाजपा की महिला विभाग की महिला मंत्री का पति उन्हें थोक में खरीदने की बात कर रहा है, तो भाजपा इन दो राज्यों के बीच कौन सा स्टैंड लेगी?
न सिर्फ भाजपा, बल्कि राजनीति में कुछ दूसरी पार्टियों के कुछ दूसरे नेता भी आए दिन सार्वजनिक रूप से अपना मुंह इस तरह खोलते हैं कि मानो डॉक्टर को अपना रिसता हुआ बवासीर दिखा रहे हों। खासकर महिलाओं के बारे में बात करने का कोई मौका लगे, और कई लोग अपनी नीचता न दिखाएं, तो उन्हें मानो रात का खाना नहीं पचता होगा। एक बात तो यह समझ में नहीं आती कि किसी मंत्री के परिवार के बाकी लोगों को सार्वजनिक बद्जुबानी करने की इतनी हड़बड़ी क्या रहती है? छोटे-छोटे गांवों में तो सरपंच-पति की पुरानी और मजबूत परंपरा चली आ रही है जो कि आसानी से नहीं टूट रही है, लेकिन मोदी और शाह की पार्टी में दिल्ली के इतने करीब के राज्य की एक मंत्री का पति भी बद्जुबानी करे, यह बात कुछ अटपटी लगती है। साख तो यह है कि आज भाजपा में लीडरशिप की पकड़ फौलादी है, ऐसी साख के बीच बद्जुबानी के घंटे एमपी से उतराखंड तक बजते चले जाना कुछ अटपटा नहीं है?
फिर अब राजनीतिक दलों और राजनीति को पलभर के लिए छोड़ दें, तो भारतीय समाज में भी महिलाओं के लिए जो हिकारत है, वह गजब की है। लेकिन भारत को कोसने से भी थोड़ी देर के लिए अगर अलग हो जाएं, तो बाकी दुनिया में भी महिलाओं का हाल बहुत अच्छा नहीं है। दुनिया में जो जापान अपनी सबसे आधुनिक टेक्नोलॉजी के लिए जाना जाता है, उस जापान की एक ताजा खबर लोगों को हक्का-बक्का कर सकती है। अभी अक्टूबर के महीने में जापान को पहली महिला प्रधानमंत्री मिली है, और इस बार के संसद चुनाव में महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। लेकिन संसद की कार्रवाई शुरू होने के पहले महिला शौचालयों के बाहर सांसदों की लंबी कतारें लगती हैं, क्योंकि उनकी संख्या के मुकाबले शौचालय बहुत कम हैं। और जब संसद में यह हाल है, तो बाकी सरकारी दफ्तरों, मॉल्स, और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर हालत इससे भी अधिक खराब है। क्या हिंदुस्तान में महिलाओं की स्थिति पर हमारी तरह अफसोस जाहिर करने वाले लोगों को भी जापान की यह जानकारी पाकर हैरानी नहीं होगी कि जापान की निर्वाचित संसद की 73 महिला सांसदों के लिए दो केबिन वाला एक ही शौचालय है। मतलब यह कि एक वक्त में कुल दो महिलाएं फारिग हो सकती हैं, और यह व्यवस्था जापान की इस संसद में 1936 से चली आ रही है। अब इस देश में अधिकतर जगहों पर महिलाओं के शौचालयों को लेकर यही नौबत है। संसद भवन में महिला शौचालय बढ़ाने की मांग को लेकर महिला प्रधानमंत्री सहित करीब 60 महिला सांसदों ने एक मांगपत्र पर दस्तखत किए हैं। एक सबसे विकसित देश होने के बावजूद लैंगिक असमानता के मामले में वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में जापान इस साल 148 देशों में 118वें नंबर पर रहा। भारत की नई संसद में हालत इसके मुकाबले बहुत अच्छी है, लेकिन लोगों का अंदाज है कि अभी ताजा-ताजा बनी हुई इस इमारत में भी सुधार की गुंजाइश है। अब जब कुछ बरसों के भीतर सांसदों में से अनिवार्य रूप से 30 फीसदी महिलाएं रहेंगी, तब भारतीय संसद में महिला शौचालयों की क्षमता कहीं चुक न जाए।
जब पूरी दुनिया को एक साथ देखने की आदत हो, तो मध्यप्रदेश के घंटे की गूंज उत्तराखंड से होते हुए कब जापान के महिला शौचालयों के दरवाजे तक पहुंच जाती है, इसका पता हमको खुद को नहीं चल पाता। राजनीति की गालियों, बलात्कार की शिकार महिलाओं के खिलाफ संवेदनशून्यता से लेकर जापान की आज की इस नौबत को देखें, तो वहां के चुनाव प्रचार के उन भाषणों पर भी हैरानी होती है जिनमें महिला उम्मीदवारों को कहा जाता है कि उन्हें राजनीति में सक्रिय होने के बजाय घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करनी चाहिए। हैरानी की बात यह है कि सनाए ताकाइची के प्रधानमंत्री बनने पर भी लोगों को महिलाओं की स्थिति बहुत सुधरने की संभावना इसलिए नहीं दिख रही थी कि महिला होने के बावजूद यह नेता कई महिला विरोधी बयान देते आई थी, और जापान की महिला अधिकार आंदोलनकारियों को इससे अधिक उम्मीदें नहीं थी। यह प्रधानमंत्री ऐसे कानून में बदलाव के खिलाफ रहते आई है जिसे बदलकर महिलाएं पति के सरनेम से अलग सरनेम रखने का हक चाहती हैं। आज जापान में यह इजाजत नहीं है। यह महिला प्रधानमंत्री यह भी वकालत करती है कि परिवारों में पुरूषप्रधान उत्तराधिकार प्रथा जारी रहनी चाहिए। ऐसे कई बयानों को लेकर उनके राज में महिलाएं अधिक उम्मीद से नहीं हैं।
अब हम जापान से कुछ देर के लिए हिंदुस्तान लौटें, तो यहां पर भी राजनीति में आई हुई महिलाएं संवेदना खो बैठती हैं, और लोगों को याद रखना चाहिए कि ममता बैनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद जब वहां एक नाबालिग लड़की से बलात्कार हुआ, उसकी शिकायत पुलिस तक पहुंची, तो ममता बनर्जी ने इस लड़की से हमदर्दी रखने के बजाय इस शिकायत को उनकी सरकार के खिलाफ एक राजनीतिक साजिश करार दिया था। यह अलग बात है कि बाद में अदालत ने इस शिकायत सही पाया और बलात्कारी को सजा दी थी। लेकिन तब तक तो राज्य शासन के लिए जिम्मेदार महिला का बयान उस नाबालिग बच्ची के खिलाफ आ ही चुका था। ऐसा लगता है कि सत्ता की रगड़ सत्तारूढ़ महिलाओं की चमड़ी भी मोटी कर देती है, और उनकी संवेदनाओं को कम कर देती है। बहुत सी महिला नेताओं का यह हाल होता है।
अभी हम हाल के बरसों में ही नेताओं की कही हुई महिला विरोधी गंदी बातों की लिस्ट बनाएंगे तो यह पूरा पन्ना ही छोटा पड़ जाएगा। इसलिए आज सार्वजनिक जीवन में मध्यप्रदेश के पत्रकार अनुराग द्वारी की तरह विरोध करने वाले लोगों की जरूरत है जो कि बद्जुबानी के खिलाफ खड़े हो सकें, और इनसे भी बढ़कर ऐसे लोगो की जरूरत है जो बद्जुबानी चाहे किसी से भी हो, उसके खिलाफ खड़े हो सकें, नाजायज का विरोध कर सकें। गंदी जुबान का संक्रमण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते चलता है, किसी भी देश को, समाज को, विरासत में गंदी जुबान छोड़कर नहीं जाना चाहिए, ऐसे देश अपने-आपको न तो गौरवशाली मान सकते, और न ही उन्हें विश्वगुरू बनने का कोई सपना पालना चाहिए।


