संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : शादी में बेवफाई और हिंसा, की बुनियाद कभी नई होती है तो कभी शादी के पहले की भी
सुनील कुमार ने लिखा है
13-Jan-2026 4:52 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : शादी में बेवफाई और हिंसा, की बुनियाद कभी नई होती है तो कभी शादी के पहले की भी

यूपी के हरदोई की खबर है कि एक शादीशुदा महिला अपने प्रेमी के साथ जाने की जिद पर अड़ी थी। वह प्रेमी के साथ चली गई और पति ने पुलिस ने रिपोर्ट लिखाई। पति की जानकारी के आधार पर पुलिस पत्नी को पकड़ लाई, लेकिन थाने में वह इस बात पर अड़ी रही कि वह प्रेमी के साथ ही रहेगी। पति ने कमर से तमंचा निकाला और थाने में ही पत्नी को गोली मार दी। प्रेमी के साथ भाग जाने पर भी पति उसे अपनाना चाहता था, लेकिन पत्नी अड़ी हुई थी। नतीजा थाने में एक कत्ल की शक्ल में सामने आया।

 

देशभर में जगह-जगह सोशल मीडिया की मेहरबानी से होने वाली शादीशुदा जिंदगी की मोहब्बत तो शादी के बाद भी शुरू होती है, और वह भी खुदकुशी, कत्ल, बेवफाई, तलाक, और जेल तक चली जाती है। लेकिन बहुत से मामलों में ऐसी नौबत शादी के पहले की असल जिंदगी की मोहब्बत की वजह से आई रहती है जिसे अनदेखा करके घरवाले लडक़ी की शादी अपनी मर्जी से अपने धरम में, अपनी जात में, गोत्र देखकर, या अपनी इज्जत का मुद्दा बनाकर कर देते हैं। ऐसे में शादीशुदा जिंदगी एक लडक़ी के अधूरे रह गए प्रेम की बेचैनी की बुनियाद पर शुरू होती है, और वैसी इमारत बहुत मजबूत नहीं भी रहती। आज के वक्त में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के चलते, मैसेंजर सर्विसों की मेहरबानी से पुरानी मोहब्बतें कब्र फाड़-फाडक़र निकलती हैं, और जिंदा शादीशुदा जिंदगियों को बेचैनी से भर देती हैं। कहीं नीले रंग का कोई ड्रम किस्सा-कहानी का अहम किरदार बन जाता है, तो कहीं फ्रिज भर जाता है। कहने में यह बात कुछ अटपटी लगेगी, लेकिन कल तक जिस नारी को अबला मानकर मर्द तबला की तरह पीटता था, अब उसने हाथों में घरेलू औजारों को हथियारों की तरह उठाकर अपना हिसाब चुकता करना सीख लिया है। अपनी अधूरी मोहब्बत का हिसाब, शादी के बाद की बद्सलूकी का हिसाब, और अपनी आगे की जिंदगी को लेकर सपनों पर पूंजी निवेश करने के लिए वह कहीं-कहीं पर पति को भी राह से हटा देने लगी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक अभी भी जीवनसाथी के हाथों कत्ल होने के मामले में महिलाओं की गिनती पुरूषों से चार गुना अधिक है, लेकिन अभी कुछ दशक पहले तक तो ऐसी मौतों में सिर्फ महिलाओं की दहेज हत्या ही रहती थी, अब तस्वीर बड़ी तेजी से बदल रही है।

 

आज मां-बाप को भी यह समझना चाहिए कि अगर बेटी पढ़-लिखकर कामकाजी हो गई है, कमाने लगी है, आत्मनिर्भर हो गई है, और कहीं पर अकेले रहने जितना आत्मविश्वास उसमें आ गया है, तो अपने लिए कोई लडक़ा पसंद करने जितनी ताकत भी उसमें आ गई है। यह ताकत समझ की शक्ल में है, तजुर्बे और आर्थिक आत्मनिर्भरता की शक्ल में भी है। हो सकता है कि उसकी पसंद मां-बाप की उम्मीदों और उनके सपनों पर खरी न उतरे, लेकिन उम्मीदें तो मां-बाप के छांटे दूल्हे से भी कई बार पूरी नहीं होती हैं। ऐसे में लडक़ी की पसंद को पूरी तरह से अनदेखा करना, और परिवार की इज्जत के नाम पर, मां-बाप के मन में अपने लिए शहंशाह अकबर की तरह का अहंकार होने की वजह से, जिन वजहों से भी किसी लडक़ी को एक अनचाही शादी में धकेल दिया जाता है, तो उसे एक असफल और बेचैन जिंदगी में भी धकेल दिया जाता है, जहां से निकलने के लिए इन दिनों उनमें से कोई-कोई लड़कियां नया प्रेमी ढूंढकर कत्ल भी कर देने को एक आजादी मानती हैं।

 

शादीशुदा जिंदगी की हिंसा, रिश्तों की बेवफाई, और मरने-मारने तक की नौबत को शुरू से ही सावधानी और जिम्मेदारी बरतकर कम किया जा सकता है। अब शहरीकरण और लडक़ी की आत्मनिर्भरता की वजह से, उसके दुनिया में जाकर काम करने की वजह से वह धर्म और जाति से परे, मां-बाप की उम्मीद से परे अपनी खुद की पसंद पर चलना सीखने लगी है। अब उसे प्रेमचंद की कहानियों के युग की तरह किसी खूंटे से बांध देना मुमकिन नहीं है, अब वह अपने हक के लिए सींग मारना भी जानती है, और यह आत्मनिर्भरता महिला के सम्मानजनक जीवन के लिए भी एक बुनियाद बनती है।

 

 

पति-पत्नी के बीच भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें सुलझाने की जरूरत रहती है। अभी सोशल मीडिया पर सेक्स ग्रंथ की तरह भारत के विख्यात ग्रंथ कामसूत्र की चर्चा चल रही थी जिसमें यह बात सामने आई कि उसमें विख्यात चौरासी सेक्स आसन सिर्फ एक अध्याय हैं। बाकी बहुत से अध्याय उसमें वैवाहिक जीवन को सुखी रखने के और बहुत से पहलुओं और तरीकों को लेकर हैं। असल जिंदगी में बहुत अधिक ग्रंथों की जरूरत पड़ती हो, ऐसा भी नहीं है। दोनों जीवनसाथी एक-दूसरे को किस तरह खुश, सुखी, और संतुष्ट रख सकते हैं, इसे सामान्य समझ-बूझ से भी समझा जा सकता है, और कुछ समाजों में परिवार के भीतर भी इस तरह के विचार-विमर्श की परंपरा रहती है। लेकिन बिना बेवफाई वाले वैवाहिक जीवन भी अगर बेचैन हैं, बेमेल हैं, तो उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि शादी के पहले दोनों जीवनसाथियों के मिजाज मिलाने का काम शायद नहीं हुआ है। ऐसा मिजाज न मिलने से भी आगे बेवफाई का एक खतरा खड़ा होता है, लेकिन बिना बेवफाई के खतरे के भी बेचैन जिंदगी का खतरा तो रहता ही है। इसलिए हम इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए कई बार इस बात की वकालत करते हैं कि शादी के पहले दोनों साथियों के साथ पेशेवर परामर्शदाता बैठकर यह देखें कि उनके बीच किन-किन मुद्दों पर असहमति है, और उनमें से कौन-कौन सी असहमतियां बाद में सुलझने लायक नहीं दिखती हैं। टकराव के जो मुद्दे शादी के पहले ही बहुत मजबूत हैं, उन्हें देखते हुए भी इस तरह के रिश्ते क्यों किए जाएं जो कि आगे चलकर असफल होना तय से रहते हैं? एक वक्त था जब भारतीय समाज में लडक़ी या महिला से यह उम्मीद की जाती थी कि वह सबकुछ झेलकर भी परिवार की इज्जत के लिए, बच्चों के भविष्य के लिए शादीशुदा जिंदगी किसी तरह जारी रखे। लेकिन नई आत्मनिर्भरता के साथ अब यह आसान नहीं रह गया है कि किसी लडक़ी से अंतहीन त्याग की उम्मीद की जाए कि वह हर प्रताडऩा सहकर भी शादी को ढोती चलेगी, जैसी कि किसी महिला से गर्भ ढोने की उम्मीद की जाती है। अब तो हकीकत यह भी है कि दुनिया के कई देशों में महिलाएं गर्भ भी ढोना नहीं चाहती हैं, और हिंदुस्तान में भी लड़कियां कम से कम लगातार गर्भवती बनने से तो मना कर ही देती हैं।

 

समझ का यह पूरा सिलसिला समाज में एक व्यापक खुशहाली के लिए जरूरी है कि शादी के पहले, और शादी के बाद दोनों ही वक्त पति-पत्नी (अभी सेम सेक्स के बीच शादी हिंदुस्तान में कानूनी नहीं हुई है) को एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल रखना सीखना होगा, वरना दोनों के लिए अब बाहर की दुनिया तकरीबन बराबर ही खुली हुई है। अब कल तक की खूंटे से बंधी हुई लडक़ी घूंघट में नहीं है, आज सोशल मीडिया पर ढेर से लोग उसकी तारीफ करने को मौजूद हैं, और उन्हीं में से कब किसी से प्रेम हो जाता है, थाने में कत्ल होने पर पता लगता है।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


अन्य पोस्ट