विचार / लेख

लालच और भय में सत्ता के सूत्र खोजते राष्ट्रीय दलों के नेता
14-Oct-2023 2:51 PM
लालच और भय में सत्ता के सूत्र खोजते राष्ट्रीय दलों के नेता

 डॉ. आर.के. पालीवाल

तरह तरह की सुख सुविधाओं के गुलाम हो चुके वर्तमान नेताओं को सत्ता प्राप्ति के लिए सेवा का मार्ग बहुत लंबा और दुरूह लगता है। अब उन्हें रेल या सडक़ से यात्रा करने में भी कष्ट होता है और यह डर भी कि आम जनता के बीच यात्रा करते वक्त जनता उनसे बहुत से सवाल करेगी और देहाती स्थानीय मीडिया भी आम जनता से जुड़े तीखे और धारदार प्रश्न पूछेगा।

उडऩ खटोले की यात्रा नेताओं को इन तमाम व्याधियों से निजात दिलाती है इसीलिए दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, कलकत्ता से लेकर हैदराबाद, चेन्नई और बैंगलोर के तमाम बड़े नेता सरकारी या पूंजीपतियों के चंदे से जुटाए प्लेन से हवाई यात्रा करते हैं। जनता को मूर्ख बनाने के लिए उन्होंने सत्ता के शॉर्टकट के लिए लालच और भय के दो ब्रह्म अस्त्र खोज लिए हैं। उनका एक ही नारा बन गया हम सत्ता में आए तो तुम पर खजाना लुटाएंगे और विरोधी आए तो घोटालों और भ्रष्टाचार से जनता और देश को लूटेंगे।

 विरोधियों का भय दिखाकर और अपनी तरफ से लालच का सुनहरा जाल फेंककर जनता को जमीनी मुद्दों से भटकाना नेताओं का सबसे बड़ा शगल बन गया है। इसी शगल को आगे बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर उनकी आई टी सेल सक्रिय रहती है और इसीलिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापनों की बारिश की जाती है।

कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने लालकृष्ण आडवानी का हवाला देकर बताया था कि वे मध्य प्रदेश को आर एस एस और भाजपा की प्रयोगशाला मानते हैं। इस पर तंज कसते हुए राहुल गांधी ने आगे जोड़ा था कि मध्य प्रदेश की प्रयोगशाला में मुर्दों के इलाज के नाम पर रकम हड़पी जाती है और बच्चों के भोजन तक में घोटाला होता है। यह सच है कि मध्य प्रदेश में ऐसा शायद ही कोई विभाग है जिसमें घोटालों की खबरें न हों लेकिन ऐसे घोटालों की कांग्रेस सरकार की भी काफी लंबी सूची है।

यह भी सच है कि नवंबर में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें मध्य प्रदेश को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों सर्वाधिक ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। इस लिहाज से मध्य प्रदेश भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रयोगशाला बना हुआ है। विधान सभा चुनाव में दोनों दल लालच और भय के ब्रह्मास्त्रों का अपनी अपनी तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं। जहां तक लालच का प्रश्न है इसकी शुरुआत भाजपा सरकार की तरफ से महत्वाकांक्षी लाडली बहना योजना से शुरु हुई थी।

घर बैठे महिलाओं के खाते में एक हजार रुपए प्रति माह देने की इस योजना को आधी आबादी के बड़े वोट बैंक में बदलने की भाजपा की योजना थी ।कांग्रेस ने इसे डेढ़ गुणा लालच बढ़ाकर पंद्रह सो रुपए कर इस योजना की हवा निकाल दी थी। ऊपर से प्रियंका गांधी ने हर स्कूल जाने वाले बच्चे को पांच सौ से पंद्रह सो रुपए प्रति माह घोषित कर लालच का और भी तगड़ा पांसा फेंका है।

लालच की तरह मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में भय की भी प्रतियोगिता हो रही है। भाजपा पी एफ आई को आतंकवादी संगठन और कांग्रेस को उनका हिमायती बताती है क्योंकि दिग्विजय सिंह ने इस संगठन पर दर्ज अधिकांश मामलो को फर्जी कहा है।कांग्रेस संघ को सांप्रदायिक नफरत फ़ैलाने वाला संगठन कहती है। एक अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक समुदाय का विरोधी बताकर और दूसरा बहुसंख्यक समाज को अल्पसंख्यक समाज के प्रति आक्रोशित करने का आरोप लगा कर समाज में भय का वातावरण बनाने की कोशिश करते हैं।

फ्रीबीज की प्रतियोगिता में जिस तरह भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे को पछाडक़र आगे निकलने की कौशिश कर रहे हैं उसका सबसे ज्यादा भार देश में टैक्स चुकाने वाले पांच प्रतिशत लोगों पर पड़ता है। इस कमाऊ वर्ग, जिसे दुधारू गाय कहा जाना चाहिए,की किसी को चिंता नहीं है क्योंकि उसका कोई वोट बैंक नहीं है।

फ्रीबीज पाने वाले अस्सी प्रतिशत लोगों के लिए दोनों दल इस तरह घोषणा करते हैं जैसे उनके नेता अपनी पुस्तैनी तिजोरी से धन निकालकर बांटेंगे।यह हाल तब है जब सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर सुनवाई चल रही है कि राजनीतिक दलों में आए दिन बढ़ती इस आदत पर कैसे लगाम कसी जाए। चुनाव के बाद फ्रीबीज के लिए संसाधनों की उगाही कहीं शराब की बिक्री बढ़ाकर, कहीं कर्ज लेकर, कहीं सरकारी संपत्तियों को बेचकर और तरह तरह के टैक्स बढ़ाकर ही होगी। इन सबके दुष्परिणाम चुनाव के बाद देश की जनता को ही भोगने होंगे।


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