विचार / लेख

बहुत कुछ अजीब है
17-Oct-2023 3:36 PM
बहुत कुछ अजीब है

 कनुप्रिया

अजीब है कि जो कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की त्रासदी पर जार-जार रोते हैं, उनके लिए इंसाफ को माँग करते हैं, उन्हें फलीस्तीनियों का दुख समझ नही आता।

ये भी कि जो कल हिटलर के सताए थे और बुरी तरह बदनाम किए गए, लाखों की संख्या में गैस चेम्बरों में मारे गए, विस्थापित हुए, वो आज फलीस्तीनियों को जानवर के जैसा बोलते हैं, उनके मारे जाने के पक्ष में हैं, उनपर व्हाइट फॉस्फोरस गिराया जा रहा है ,अब उन्हें अपने पुरखों की पीड़ा और अपमान याद नहीं।

मतलब बात किसी क़ौम या धर्म की है ही नहीं, जिसके पास भी पावर होती है वो उसका गलत इस्तेमाल कर लेता है, और भूल जाता है कि जब वो पावर नही रहेगी तो क्या होगा, तब वो भी इंसाफ, इंसानियत, हक और सद्भाव की ही माँग करेंगे। जो सत्ता हाथ मे होने पर दूसरों को बुलडोजर से कुचल देते हैं वो भी पावर न होने पर रोते हुए दिख जाते हैं कि मुझे मार दिया जाएगा, मेरी सुरक्षा का इंतजाम हो।

लिंकन ने सही कहा था,  Nearly all men can stand adversity, but if you want to test a men's character, give him power

अजीब ये भी है कि आतंकी संगठन होते हैं, मगर आतंकी स्टेट्स नहीं, भले वो दूसरे देशों को नेस्तनाबूद कर दें, जापान, इराक, यूक्रेन, और फलस्तीन जैसी कार्रवाई अंजाम दें। उनके हमलों को आतंकी हमला तक करार नही दिया जाता, उसे युद्ध कह दिया जाता है, भले वो एकतरफा हमला हो।

और हमारे देश में तो सब ही अजीब है। देश का प्रधान एक स्टैंड लेता है, देश का विदेश मंत्रालय दूसरा, जो कल तक देश के स्टैंड के खिलाफ बोलने को देशद्रोह कह रहे थे, वो गोदी एंकर और भक्त गण सोशल मीडिया पर अब भी उस स्टैंड के खिलाफ धड़ल्ले से बोल रहे हैं और अब ये देशद्रोह नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।

यानी सब कुछ सत्ता से तय हो रहा है, लाठी और भैंस की तर्ज पर तय हो रहा है, और हम कहते हैं कि हम बहुत सभ्य हो गए हैं।


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