विचार / लेख
ममता सिंह
मेरे गांव में सामाजिकता के नाम पर बस भोज भात रह गया है यानि जन्म हो, मृत्यु हो या कोई और अवसर बस सब खाने के समय ही इक_े होते हैं।
महिलाएं तो शोक में, दुख में दिखाने को ही सही पर रोती चीखती उदास होती दिखती हैं पर पुरुष! वह पूरी बेशर्मी के साथ गुटखा खाते, बीड़ी पीते, फोन चलाते और राजनीति पर बतियाते दीखते हैं।
जीते जी किसी बूढ़े बीमार स्त्री-पुरुष को उसके बेटे बहू, गांव वाले भले न पूछें, सेवा करें पर उसके मरते ही सब उमड़ पड़ते हैं। एक पुत्र वालों का तब भी ठीक है कि बिना किच किच दाह संस्कार हो जाता है पर एकाधिक पुत्र वालों को मरने के बाद भी चैन नहीं।
पहले तो बेटों में ही झगड़ा होगा कि कहां दाह संस्कार होगा,कौन कितना खर्चा देगा। रिश्तेदारों,पड़ोसियों की मध्यस्थता के बाद भुनभुनाते हुए क्रियाकर्म होगा। बहू मुंह फुलाए और बेटा शहीद होने जैसी शक्ल लिए फिरेगा कि अम्मा बाबू ने मेरे लिए तो कुछ नहीं किया और हम पर ही सारा खर्चा ओढ़ा दिया लोगों ने।
मृतक के जीते जी कोई दवा को भले न ले गया हो पर दाह संस्कार के लिए बस, कार बुक होगी,पूरा गांव लदकर फुंकवाने जायेगा और दाह संस्कार के बाद समोसे,रसगुल्ले का नाश्ता करके घर आएगा। और इसके बाद शुरू होगी मृतक के जीवन की सच्ची झूठी कहानी की मीमांसा जिसमें बुरे से बुरे को अच्छा बताना है, महान दिखाना है।
तेरहवीं का आयोजन भव्य से भव्यतम होता जा रहा, अब तेरहवीं है या तिलकोत्सव अंतर नहीं पता चलता। शोक के बजाय उत्सव का माहौल रहता है रही सही कसर फोटोबाजी से पूरी हो जाती है। पनीर, पुलाव, पूड़ी ठूंसकर लोग अपने घर वापस लौट जाते हैं पीछे बचते हैं परिजन।
परिजनों के भी शोक का पैमाना मृतक की उपयोगिता के समानुपाती होता है। यानी घर का कमाऊ प्राणी गया हो तो दुखी होना है और यदि बूढ़ा, बीमार, लाचार प्राणी गया हो तो मुक्ति की सांस ली जाती है।
सब कुछ देखते हुए निराशा,वैराग्य सा उपजता है। क्या हमारे भीतर मृत्यु को लेकर सच्ची संवेदना और शोक का अभाव होता जा रहा है। क्या उपयोगी होना ही मरने के बाद इज्जत पाने का पैमाना रह गया है। जिन बेटों की संख्या पर माता पिता जि़ंदगी भर इतराते फिरते हैं वह उनकी बीमारी या अकेलेपन में कहां होते हैं।
मैं तो मरने के बाद नरक में जाऊं या मेरी आत्मा सदियों भटकती रहे मुझे परवाह नहीं पर मैं ऐसी समाज व्यवस्था को अपने जीते जी खारिज करती हूं जो मेरे मरने के बाद केवल समोसा, रसगुल्ला, पनीर, पुलाव के लिए मेरी लाश के इर्द गिर्द दिखे। मृतक भोज में लाखों खर्च करने वाला समाज किसी जिंदा इंसान पर दस रुपए भी नहीं खर्च करता है।
अब यह सार्वभौमिक सत्य नहीं कि आप बहस करने लगें कि ऐसा कहां होता है! पर जी यह भी सत्य ही है और जहां मैं हूं वहां होता है।


