विचार / लेख
-सनियारा खान
व्हाईट टॉर्चर नामक किताब को ईरान की महिला और मानवाधिकार कार्यकर्ता नरगिस मुहम्मदी ने लिखा है।
ईरान की कुख्यात एविन जेल में बंद रहने के बावजूद भी नरगिस मुहम्मदी को इस साल का शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । लेखिका की मन:स्थिति जानने के लिए इस किताब को पढऩा बेहद ज़रूरी हो जाता है। जेल में रहते हुए नरगिस ने न सिर्फ अपने अनुभवों को, बल्कि साथ में अन्य बारह ऐसी औरतों के बारे में भी बताया जिन्हें लंबे समय तक अंतहीन यातनाएं झेलते हुए जैसे तैसे जीना पड़ रहा था। किताब की शुरुवात में वे लिखती है, ‘गृहबंदी रहने के अब इस आखरी समय में मैं जानती हूं कि जल्दी मुझे फिर से जेल में पहुंचा दिया जाएगा। इस बार मुझे दोषी ठहराया गया है इस किताब को लिखने के लिए, जो शायद इस वक्त आपके हाथ में है।’
ईरान की राजनैतिक और सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ़ लगातार आवाज़ उठाकर नरगिस मोहम्मदी को बार बार कारागार पहुंच जाना पड़ता है। इस बार उनको हार्ट अटैक आने पर सर्जरी कराना ज़रूरी हो गया था। इसलिए वे बाहर आई थी। लेकिन फिर जेल गई ,वह भी अस्सी कोड़े के आदेश के साथ! उनको जेल में कई बार एकाकी भी रखा जाता है। उनकी जि़ंदगी की कुल उपलब्धि है 13 बार गिरफ्तारी,31 साल के लिए जेल की सजा और 154 कोड़े।
अब सवाल उठता है कि व्हाईट टॉर्चर यानि कि श्वेत यातना क्या है? ये एक तरह से मनोवैज्ञानिक यंत्रणा देने की तकनीक है। इसमें कैदी को एक सम्पूर्ण सफ़ेद सेल में रख कर उनके अंदर एक डरावना अकेलापन पैदा करने की कोशिश की जाती है। उन्हें वहां न कोई रोशनी दिखाई देती है और न ही कोई आवाज सुनाई देती है। कैदी अपने अलावा कुछ भी नहीं सुन पाते है। कभी कभी ऐसे कैदियों को नींद से वंचित करने के लिए उसके सेल में लगातर रोशनी का भी उपयोग किया जाता है।कई बार तो आंखों में पट्टी भी बांध दि जाती है। इस दशा में धीरे धीरे इन कैदियों के अंदर मतिभ्रम, अवसाद और पागलपन पनपने लगते हैं। वैसे तो कहा जाता है कि अमेरिका में भी 9/11 की घटना के बाद बहुत से कैदियों पर व्हाइट टॉर्चर अपनाया गया था। आयरलैंड और वेनेजुएला में भी काफी मामले सामने आए। साधारण नियम में क्रूर बलात्कारी लोगों पर भी ये तरीका आजमाया जाता है। लेकिन लगता है कि ईरान में सामाजिक और राजनेतिक कैदियों पर व्हाइट टॉर्चर किए जाने को एक बेहद साधारण प्रक्रिया के रूप में मान लिया गया है। जिन महिलाओं से नरगिस ने बातचीत की उन सभी को अपराध न करते हुए भी अपराध स्वीकार करने के लिए इसी तरह अलग अलग तरीके से मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यधिक दबाव में डालने के लिए श्वेत यातना कक्ष में रखा जाता था। अलग अलग कैदी अलग अलग दबाव के कारण अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते थे। इन कैदियों में से एक थी निगारा अफसर जादेह। वह अपने सेल में अकेलापन दूर करने के लिए चींटियों से बात करने लग गई थी। उसे खाने में जो सफ़ेद चावल मिलता था वह उस में से कुछ चावल जमीन पर फेंक दिया करती थी। इस कारण उसकी सेल में चीटियां आ जाती और वह उन चींटियों से बात करके खुद को शांत रखने की
कोशिश करती थी।व्हाइट टॉर्चर सहने वाले लोगों में से ज्यादातर लोग बाद में पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं आ पाते हैं।
नरगिस मोहम्मदी जेल में रहते हुए भी ईरान में चल रही समाजिक और राजनैतिक अन्याय के साथ साथ एकांत कारावास और श्वेत यंत्रणा के खिलाफ़ भी लगातर बोल रही है। ईरान की कट्टरपंथी सरकार से लोहा लेने वाली वे एक बहादुर औरत है।अब जब उनको नोबेल पुरस्कार मिला तो लोग ज़रूर गुगल पर उनको ढूंढ कर उनके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। लेकिन साथ में व्हाईट टॉर्चर नामक उनकी लिखी इस किताब के बारे में भी जानकारी प्राप्त करें तो और भी अच्छा होगा। एक औरत हो कर वे अपने देश और सरकार की गलत कदमों की आलोचना करते हुए जेल में ही रह कर ज्यादातर जि़ंदगी गुज़ार दी। अंत में यही लगता है कि हमारे देश के बहुत से पत्रकारों को ‘व्हाईट टॉर्चर’ खरीदकर पढऩा चाहिए। मुल्क की भलाई के लिए।


