विचार/लेख
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने घर पर गणेश चतुर्थी के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूजा में शामिल होने पर प्रतिक्रिया दी है।
अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के एक कार्यक्रम में इस संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री उनके घर पर एक निजी इवेंट में आए थे। ये कोई सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं था।
उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि इस मुलाक़ात में कुछ भी ग़लत नहीं है क्योंकि ये न्यायपालिका और कार्यपालिका बीच सामान्य मुलाक़ात है, भले ही ये सामाजिक स्तर पर क्यों न हो।’
चीफ जस्टिस डीवीआई चंद्रचूड़ 10 नवंबर को रिटायर होंगे। वो भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश हैं। जस्टिस संजीव खन्ना भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे।
इस साल 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीफ़ जस्टिस डीवीआई चंद्रचूड़ के घर गणेश चतुर्थी की पूजा में शामिल हुए थे।
लेकिन कई जाने-माने वकीलों, राजनीतिक दलों और उसके नेताओं ने इसकी आलोचना की थी। हालांकि जाने-माने वकीलों के एक वर्ग ने कहा था कि इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है।
‘हम वहाँ कोई सौदा करने के लिए नहीं थे’
प्रधानमंत्री से अपने घर में मुलाक़ात के सवाल पर चंद्रचूड़ ने कहा, ‘अदालत के कामों के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बातचीत एक सामान्य अनिवार्यता है।’
उन्होंने कहा, ‘लोगों को ये समझना चाहिए सौदे (समझौते) इस तरह नहीं होते। इसलिए प्लीज, हमारा भरोसा कीजिए। हम वहाँ सौदा करने लिए नहीं थे।’
जस्टिस चंद्रचूड़ से पूछा गया कि प्रधानमंत्री के साथ उनकी जो तस्वीरें आईं उसमें वो क्या दूसरे जजों या विपक्ष के नेताओं को शामिल करना पसंद करते। इस पर उन्होंने कहा, ‘तब ये एक सेलेक्शन कमिटी की तरह लगता।’
उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज़ में इसका जबाव देते हुए कहा, ‘मैं विपक्ष के नेता को शामिल नहीं करता क्योंकि ये कोई केंद्रीय सतर्कता आयुक्त या सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए सेलेक्शन कमिटी की बैठक नहीं थी।’
हमने ‘ए’ से ‘जेड’ तक सबको बेल दी
कई मामलों में अदालत की ओर से बेल न दिए जाने के सवाल पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘ये गंभीर चिंता का विषय है। बेल नियम है और इसे अपवाद की तरह नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन ये संदेश निचली अदालतों तक नहीं पहुँचा है। ऐसे में ये अदालतें ज़मानत देने में हिचकिचाती हैं।’
उन्होंने कहा, ‘जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैंने सबको बेल दिया है- ए से जेड तक यानी अर्नब से लेकर ज़ुबैर तक। यही मेरा फलसफ़ा है।’
उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के उनके दो साल के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में ज़मानत के 21 हज़ार केस दर्ज हुए जबकि ज़मानत के 21358 केस निपटाए गए।
उनसे पूछा गया कि इससे पहले उन्होंने कहा था कि जनता की अदालतों पर विपक्ष की भूमिका अपनाने का दबाव है। इसका क्या मतलब है।
इस पर उन्होंने कहा, ‘अपना हित चाहने वाले समूहों, प्रेशर ग्रुप और कुछ समूहों की ओर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस्तेमाल करके कुछ ख़ास नतीजों पर पहुंचने के लिए अदालत पर दबाव डालने की कोशिश की जा रही है।’
‘स्वतंत्र न्यायपालिका का मतलब हमेशा सरकार के खिलाफ फैसला देना नहीं’
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका का मतलब ये नहीं होता कि अदालत हमेशा सरकार के खिलाफ फैसला दे।
उन्होंने कहा, ‘आम तौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कार्यपालिका से आज़ादी के तौर पर पारिभाषित किया जाता है। अब न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब ये भी लगाया जाता है कि ये सरकार के प्रभाव से आज़ाद रहे। लेकिन सिफऱ् इन्हीं चीज़ों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पारिभाषित नहीं होती।’
उन्होंने कहा, ‘देखिए, आप लगातार ये देख रहे होंगे कि ऐसे समूहों के कई हिस्से कहते हैं कि अगर आप हमारे पक्ष में फ़ैसला देते हैं तो आप स्वतंत्र हैं। अगर आप हमारे पक्ष में फ़ैसला नहीं देते हैं तो आप स्वतंत्र नहीं हैं। मुझे इस पर आपत्ति है।’
जजों की नियुक्ति और कॉलेजियम-सरकार टकराव पर क्या बोले
न्यायपालिका में नियुक्तियों (जजों की नियुक्ति) के सवाल पर सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि कॉलेजियम ने अपने हिस्से का काम कर दिया है। अब सरकार को कॉलेजियम की सिफारिशों को मंज़ूरी देनी है।
इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘कॉलेजियम की ओर भेजे गए कुछ नामों को अभी तक अनुमति नहीं मिली है। आपने उनमें से कुछ नाम लिए हैं। उम्मीद है कि सरकार उन्हें मंज़ूरी दे देगी। सुप्रीम कोर्ट के अधिकार के दायरे में जो आता है वो हमने कर दिया है। हमने ये सुनिश्चित किया है कि संवैधानिक प्रक्रिया (जजों की नियुक्ति के संबंध में) का अपना हिस्सा पूरा कर दें। हम नामों का मूल्यांकन करते हैं। उन पर विचार करते हैं और फिर उन्हें सरकार को भेज देते हैं।’
उनसे पूछा गया कि क्या जजों की नियुक्ति में देरी करने का मतलब ये है कि सरकार को वीटो की ताक़त मिली हुई है। इस पर उन्होंने कहा कि कॉलेजियम भी वीटो का इस्तेमाल करता है।
उन्होंने कहा, ‘सिफऱ् सरकार ही वीटो का इस्तेमाल नहीं करती। वीटो एक ऐसी चीज़ है, जिसका कॉलेजियम भी इस्तेमाल करता है। जब तक हम मंज़ूरी ना दे दें तब तक कोई नियुक्ति नहीं हो सकती।’
कॉलेजियम को नाम भेजने में राज्य सरकार की क्या भूमिका है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘जब हम देखते हैं के कोई ख़ास उम्मीदवार नियुक्ति के लायक नहीं है तो हम वीटो लगाते हैं। भारत सरकार उस उम्मीदवार की नियुक्ति नहीं कर सकती। हमारा मानना है कि जो व्यक्ति योग्य नहीं है, उसे जज के तौर पर नियुक्त नहीं किया जा सकता।’
एक प्रमुख के तौर पर कॉलेजियम के अब तक के रिकॉर्ड पर पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 18 लोगों की सिफ़ारिश की थी। उनकी नियुक्ति हो चुकी है।
चीफ़ जस्टिस के पद के लिए जिन 42 नामों की सिफ़ारिश की गई थी। उनमें से 40 नियुक्त हो चुके हैं। हाई कोर्ट के जजों के लिए 164 नामों की सिफ़ारिश की गई थी, उनमें से 137 की नियुक्ति हो चुकी है। 27 नाम अब भी सरकार के पास लंबित हैं।
सीनियर वकीलों ने चंद्रचूड़ को लेकर क्या कहा
11 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी के मुख्य न्यायाधीश के घर जाना ख़ासा विवाद का विषय बन गया था।
वकीलों, राजनीतिक नेताओं और जानी-मानी हस्तियों ने भारत के संविधान में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के अलग-अलग होने और उनकी स्वतंत्रता को लेकर राय ज़ाहिर की थी।
उस समय सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व प्रमुख दुष्यंत दवे प्रधानमंत्री और जस्टिस चंद्रचूड़ दोनों को ग़लत ठहराया था।
दवे ने एक बार फिर इसके लिए दोनों को दोषी ठहराया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘द वायर’ को दिए एक इंटरव्यू में दवे ने कहा कि प्रधानमंत्री को अपने घर पर साथ आरती करने के लिए बुलाकर और ये अयोध्या जजमेंट लिखने के दैवीय प्रेरणा मिलने की बात कर सीजेआई चंद्रचूड़ ने ख़ुद को ‘एक्सपोज’ कर दिया। इस तरह से उन्होंने अपने न्यायिक नज़रिये का ऐसा उदाहरण पेश किया है, जो व्याख्या से परे है।
जाने-माने पत्रकार करण थापर ने दुष्यंत दवे से पूछा कि इतिहास में जस्टिस चंद्रचूड़ को कैसे देखा जाएगा? इस सवाल के जवाब में दवे ने कहा, ‘मैं आशा करता हूँ कि जस्टिस चंद्रचूड़ को इतिहास याद नहीं रखेगा। मुझे उम्मीद है कि जस्टिस चंद्रचूड़ की विरासत को लोग जल्द ही भूल जाएंगे। मैं ये बात बहुत जि़म्मेदारी से कह रहा हूँ।’
दवे ने कहा कि डीवाई चंद्रचूड़ ने राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मामलों पर कोई फैसला नहीं दिया। वो नागरिकता संशोधन क़ानून को दी गई क़ानूनी चुनौती, ‘लव जिहाद’ और हिजाब बैन जैसे जुड़े संवेदनशील मामलों पर बैठे रहे।
चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ और उनके अब तक के अहम फ़ैसले
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ के भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश हैं। इस साल 10 नवंबर को वो रिटायर हो जाएंगे। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपना अदालती करियर बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत से शुरू किया था।
1998 से 2000 तक वो भारत के एडिशनल सॉलिसीटर जनरल भी रहे। 29 मार्च 2000 से 30 अक्टूबर 2013 तक वह बॉम्बे हाई कोर्ट के जज रहे।
31 अक्टूबर को वो इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस बने। 13 मई 2016 से सात नवंबर 2022 तक वो सुप्रीम कोर्ट जज रहे और फिर 9 नवंबर 2022 से अभी तक वो भारत के चीफ जस्टिस बने हुए हैं।
उनके कुछ प्रमुख फैसले इस तरह हैं-
राइट टु प्रिवेसी
माइनिंग टैक्स रिकवरी का मामला
अनुच्छेद 370 हटाने का केस
जीएसटी काउंसिल की सिफारिश का केस
गर्भपात के अधिकार का केस
आधार एक्ट
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूजरूम की ओर से प्रकाशित) (bbc.com/hindi)
-बेन बेविंगटन
आज अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव है। जो भी सर्वे सामने आए हैं, उनके मुताबिक़ ये चुनाव इतना कऱीबी है कि एक चूक से डोनाल्ड ट्रंप या कमला हैरिस में से किसी को भी दो या तीन पॉइंट का फ़ायदा हो सकता है।
ये ट्रंप या हैरिस के आराम से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए काफ़ी है।
अगर डोनाल्ड ट्रंप फिर से राष्ट्रपति चुनाव जीत जाते हैं तो अमेरिका के 130 साल के इतिहास में पहली बार होगा कि पिछली बार चुनाव में हारने वाला तत्कालीन राष्ट्रपति फिर से राष्ट्रपति बनेगा।
1. डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में नहीं हैं
अर्थव्यवस्था अमेरिका के वोटरों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। अमेरिका के लोगों का कहना है कि उन्हें हर रोज़ महंगाई का सामना करना पड़ रहा है।
1970 के दशक के बाद महंगाई इस स्तर पर पहुंच गई है कि ट्रंप को यह कहने का मौक़ा देती है, ‘क्या आप चार साल पहले की तुलना में अब बेहतर स्थिति में हैं?’
साल 2024 में दुनियाभर में वोटरों ने कई सत्ताधारी दल को सत्ता से बाहर किया है।
मतदाताओं ने ऐसा कोरोना काल के बाद रहने के लिए ख़र्च बढऩे जैसे कारणों से किया है। ऐसा लग रहा है कि अमेरिकी मतदाता भी बदलाव चाहते हैं।
सिफऱ् 26 प्रतिशत अमेरिकी ही देश जिस तरीके से आगे बढ़ रहा है, उससे संतुष्ट हैं।
हैरिस ने अपने आपको बदलाव के एक चेहरे के तौर पर पेश किया है लेकिन उन्हें उपराष्ट्रपति होने के कारण ऐसा करने में मुश्किल हो रही है।
2. डोनाल्ड ट्रंप पर कोई असर नहीं हुआ
तीन साल पहले यानी छह जनवरी 2021 को वॉशिंगटन के कैपिटल हिल में दंगा होना और आपराधिक मामलों में कटघरे में होने के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन इन सभी सालों में 40 प्रतिशत या इससे अधिक बना हुआ है।
डेमोक्रेट्स कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने के लिए सही नहीं हैं। वहीं अधिकतर रिपब्लिकन ट्रंप की इस बात से सहमत हैं कि वो राजनीतिक बदले की भावना का शिकार हुए हैं।
ट्रंप को बस उन मतदाताओं के एक छोटे से हिस्से के वोट हासिल करने हैं जो कि अभी तक तय नहीं कर पाए हैं कि वो किसके साथ हैं।
3. डोनाल्ड ट्रंप की अवैध प्रवासियों पर सख्ती
अर्थव्यवस्था की स्थिति से परे चुनाव में जीत अक्सर भावनात्मक मुद्दे भी तय करते हैं।
जहाँ एक तरफ डेमोक्रेट्स को उम्मीद है कि ये भावनात्मक मुद्दा उसके लिए गर्भपात होगा तो वहीं ट्रंप ने इमिग्रेशन के मामले पर दांव लगाया है।
जो बाइडन के शासन में सीमा क्षेत्रों पर मुठभेड़ रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद सर्वेक्षणों में सामने आया है कि इमिग्रेशन के मुद्दे पर लोग अधिक विश्वास ट्रंप पर करते हैं।
4. डोनाल्ड ट्रंप की अपील
डोनाल्ड ट्रंप ने उन वोटरों से अपील की है जो कि भूला दिए गए हैं या अपने आप को पीछे छूटा हुआ महसूस कर रहे हैं।
ट्रंप ‘स्विंग स्टेट्स’ के ग्रामीण और सबअर्बन हिस्से में मत हासिल करते हैं तो ये कॉलेज से पढ़े हुए लोगों के वोट नहीं मिलने के नुकसान की संभावना की वो भरपाई कर सकते हैं।
अमेरिका में ‘स्विंग स्टेट्स’ वे राज्य हैं, जहाँ मतदाताओं की प्राथमिकता स्पष्ट नहीं होती और ये चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
5. डोनाल्ड ट्रंप का मज़बूत पक्ष क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप कब क्या कर देंगे किसी को नहीं पता। ट्रंप इसे अपना मज़बूत पक्ष मानते हैं। वो कहते हैं कि मेरे राष्ट्रपति रहते हुए दुनिया में कोई बड़ा युद्ध शुरू नहीं हुआ।
कई अमेरिकी अलग-अलग कारणों से ग़ुस्से में हैं। इसका कारण यूक्रेन और इसराइल को अरबों की मदद भेजना है। कई अमेरिकी सोचते हैं कि देश बाइडन की सरकार में कमज़ोर हुआ है।
अधिकतर मतदाता ख़ासकर पुरुष वोटर कमला हैरिस की तुलना में ट्रंप को मज़बूत नेता मानते हैं।
1. कमला हैरिस डोनाल्ड ट्रंप नहीं हैं
डोनाल्ड ट्रंप के पास कई तरह की बढ़त होने के बाद भी उन्हें ध्रुवीकरण करने वाले शख्स के तौर पर जाना जाता है।
साल 2020 में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर ट्रंप को रिकॉर्ड संख्या में वोट मिले थे लेकिन वो हार गए। ऐसा इसलिए क्योंकि 70 लाख से अधिक अमेरिकी बाइडन के साथ गए।
इस बार हैरिस ने अपने लिए वोट मांगते हुए ट्रंप को फासीवादी बताया और कहा कि वो लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के जुलाई में किए सर्वे में सामने आया था कि पांच में से चार अमेरिकी लोगों को लगता है कि स्थिति काबू से बाहर है।
वहीं हैरिस को उम्मीद है कि मतदाता उन्हें देश को स्थिर रखने वाले उम्मीदवार के तौर पर देखेंगे।
2. कमला हैरिस जो बाइडन भी नहीं हैं
जो बाइडन के चुनावी रेस से बाहर होने पर माना जाने लगा कि डेमोक्रेट्स की हार निश्चित है लेकिन ट्रंप को हराने की चाहत ने डेमोक्रेट्स के लोगों को हैरिस के इर्द-गिर्द ला दिया है।
सर्वे में लगातार सामने आ रहा है कि मतदाता इस बात को लेकर चिंतित थे कि क्या बाइडन राष्ट्रपति बनने के लिए स्वस्थ हैं।
लेकिन अब पासा पलट गया है और ट्रंप राष्ट्रपति बनने की दौड़ में सबसे ज्यादा उम्र के शख्स बन गए हैं।
3. महिला अधिकारों की वकालत करती हैं कमला हैरिस
सुप्रीम कोर्ट के रो बनाम वेड फ़ैसले और गर्भपात को लेकर संवैधानिक अधिकार के निर्णय को पलटने के बाद ये अमेरिका में पहला राष्ट्रपति चुनाव है।
गर्भपात के मुद्दे को लेकर चिंतित मतदाता हैरिस का समर्थन करते हैं। साल 2022 में हुए मध्यावधि चुनाव से पता लगता है कि ये मुद्दा चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
हैरिस के पहली महिला राष्ट्रपति बनने की संभावना के कारण भी महिला वोटरों के बीच उनको बढ़त मिल सकती है।
4. हैरिस किसकी पसंद
कॉलेज से पढ़े हुए लोग और वृद्ध लोगों के वोट डालने की अधिक संभावना है। ऐसा होता है तो हैरिस को बढ़त मिल सकती है।
वहीं ट्रंप को युवा पुरुष और बिना कॉलेज की डिग्री वाले लोगों से लाभ होता है जो कि बड़ी संख्या में वोट नहीं डालते।
न्यूयॉर्क टाइम्स /सिएना पोल के मुताबिक़ उदाहरण के तौर पर देखें तो साल 2020 में ट्रंप को उन लोगों के बीच में बढ़त मिली जो कि वोट करने के योग्य हैं लेकिन किया नहीं।
ऐसे में सवाल है कि क्या इस बार ये लोग वोट डालने के लिए आएंगे या नहीं।
5. कमला हैरिस अधिक खर्च कर रहीं
ये कोई छिपी हुई बात नहीं है कि अमेरिकी चुनाव महंगा होता है। 2024 का चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव हो सकता है।
फाइनेंशियल टाइम्स के हाल के विश्लेषण के अनुसार, हैरिस चुनाव में खर्च करने में शीर्ष पर हैं। हैरिस के चुनावी प्रचार में ट्रंप के चुनावी प्रचार से दोगुना ख़र्च हुआ है।
ये करीबी चुनावी मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्विंग स्टेट्स के वोटर चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। स्विंग स्टेट्स में राजनीतिक विज्ञापन की भरमार है।
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूजरूम की ओर से प्रकाशित) (bbc.com/hindi)
- आनंद दत्त
झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए मतदान आगामी 13 और 20 नवंबर को होने जा रहे हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक दोनों फेज की स्क्रूटनी के बाद कुल 1211 उम्मीदवार मैदान में हैं।
झारखंड की मुख्य राजनीतिक पार्टियां झारखंड मुक्ति मोर्चा, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, आजसू, आरजेडी, वाम दल के अलावा भी बड़ी संख्या में लोग हैं, जो विधायक बनने की चाहत रखते हैं।
मसलन, मुकुल नायक रंगाई-पुताई का काम करते हैं। पुरुषोत्तम पांडेय पूजा पाठ कराते हैं। रविंद्र सिंह पान बेचते हैं। बद्री यादव मैकेनिक हैं। सावित्री देवी मजदूर हैं।
जहाँ मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए करोड़ रुपए से ज़्यादा खर्च करते हैं, वहीं ये उम्मीदवार महंगे चुनाव में क्या कर पाएंगे?
ऐसे ही कुछ लोगों से मिलिए और उनसे समझिए कि आखिर ये चुनाव क्यों लडऩा चाहते हैं?
मुकुल नायक, कांके विधानसभा क्षेत्र
सातवीं पास 47 साल के मुकुल नायक, रंगाई-पुताई का काम करते हैं। उन्हें लोकहित अधिकार पार्टी ने रांची से सटे कांके विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया है। वो सुकुरहुटू गांव के रहने वाले हैं।
बीते 24 अक्टूबर को जब वो नामांकन करने रांची जिलाधिकारी के कार्यालय जा रहे थे तो उनके घर में चावल नहीं था और खाना नहीं बना था क्योंकि उन्हें अभी तक अक्टूबर माह का राशन नहीं मिला है।
मुकुल बताते हैं, ‘नामांकन के लिए जा रहे थे तो गांव वालों ने चंदा दिया। उसमें कुछ पैसा बच गया तो वापस घर आते वक्त चावल खऱीद लिए थे।’
पैसों के अभाव में दोनों बेटे ज्वाला नायक ने दसवीं के बाद और रामवतार नायक ने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी है। दोनों रंगाई-पुताई का काम करते हैं। वहीं बेटी ज्योती ने लॉकडाउन के वक्त पढ़ाई छोड़ी थी। अब दोबारा से इंटर में दाखिला लिया है। पत्नी सुग्गी देवी भी पति के साथ मजदूरी करती हैं।
ऐसी परिस्थिति में चुनाव क्यों लडऩा चाहते हैं?
मुकुल कहते हैं, ‘’मैंने गाँव के ही अपने पड़ोस की लडक़ी से साल 2002 में प्रेम विवाह किया था। समाज के लोगों ने गांव से निकाल दिया तो रांची शहर में आकर रहने लगे। यहीं मजदूरी करने लगे।’
‘ठीक 12 साल बाद, जब 2014 में गांव वापस आया तो गांव की हालत बहुत खऱाब थी। मैंने पंचायत चुनाव लडऩे का सोचा और वार्ड सदस्य के तौर पर चुना गया। तब से अपने और अपने जैसों के हक़ और अधिकार के लिए लड़ता रहा हूँ।’
वो कहते हैं, ‘चुनाव प्रचार के लिए छह दिन प्रचार गाड़ी चलाएंगे, जिसका खर्चा 24,000 रुपया है। खुद बाइक से गांव-गांव जाकर प्रचार करेंगे। अधिकतम 30,000 खर्च करेंगे। वो भी तब, जब इतना पैसा चंदा में आ जाएगा।’
आखिर में वो कहते हैं, ‘समाज के लिए दर्द बहुत है। तब भी हिम्मत टूटी नहीं है। अगर किसी तरह से जीत गए तो गरीबों को लूटने वाले को छोड़ेंगे नहीं।’’
मनोज करुआ, जुगसलाई विधानसभा क्षेत्र
जमशेदपुर से सटे जुगसलाई विधानसभा क्षेत्र से 27 साल के मनोज करुआ निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।
वो चेकमेट सिक्योरिटी सर्विस में काम काम करते हैं। फिलहाल टाटा स्टील में बतौर सिक्योरिटी गार्ड पार्किंग एरिया में तैनात हैं। यहां उन्हें प्रतिदिन 430 रुपए दिहाड़ी मिलती है।
मनोज दलित हैं। पॉलिटिकल साइंस से ग्रैजुएट होने के बाद फिलहाल लॉ की पढ़ाई भी कर रहे हैं।
मनोज कहते हैं, ‘मेरे पास 30 हजार रुपए चंदा के तौर पर आ गए हैं। अधिकतम 50,000 रुपया तक खर्च करेंगे। प्रचार के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेंगे। मुझे उम्मीद है कि 3000 से अधिक वोट मैं ले आऊंगा। फि़लहाल कंपनी में दस दिन की छुट्टी का आवेदन दे दिया है। नो वर्क, नो पे के आधार पर छुट्टी मिल जाएगी।’
मनोज चुनाव हारने के लिए क्यों चुनाव लड़ रहे हैं?
मनोज कहते हैं, ‘कहीं से तो शुरू करना होगा। मेरे इलाके में युवा नशे के शिकार हो रहे हैं। लोगों के पास काम नहीं हैं। स्थानीय विधायक मंगल कालिंदी के पास समस्या लेकर जाते हैं तो वो मिलते तक नहीं हैं। नौकरी और ढंग का रोजग़ार न होने की वजह से मेरे दो भाइयों की शादी नहीं हो पा रही है।’
पुरुषोत्तम पांडे, बरही विधानसभा क्षेत्र
पुरुषोत्तम कुमार पांडे 27 साल के हैं और पेशे से पुजारी हैं।
पांडे बरही विधानसभा सीट से निर्दलीय मैदान में हैं। उन्हें अखिल भारत हिन्दू महासभा ने उन्हें अपना समर्थन दिया है।
हजारीबाग जि़ले के पद्मा प्रखंड के नवाडीह गांव के रहनेवाले पुरुषोत्तम पांडेय बताते हैं, ‘मैंने चर्च से होने वाले धर्मांतरण को रुकवाया है।’
‘रामनवमी में सरकार ने डीजे बजाने पर प्रतिबंध लगा दिया था, इसके विरोध में हजारीबाग से रांची तक पैदल मार्च किया है। यही नहीं, हिन्दू राष्ट्र और जनसंख्या नियंत्रण के लिए हजारीबाग से नई दिल्ली तक पैदल मार्च भी किया है।’
पुरुषोत्तम को उम्मीद है कि वो 20,000 से अधिक वोट लाएंगे।
बदरी यादव, बरही विधानसभा क्षेत्र
बदरी यादव 46 साल के हैं। वो बरही विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। यादव पेशे से पोकलेन मकैनिक हैं।
वो कहते हैं, ‘मैं साल भर में 300 से 400 मशीन ठीक करता हूँ। ये जो मेरे ग्राहक हैं, वही मेरे मतदाता हैं। अगर मैं जीत कर आता हूँ तो सबसे पहला काम होगा लोगों का सहारा इंडिया में फंसा पैसा वापस दिलाना।’’
बदरी के मुताबिक़ उनके इलाक़े में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनका 'सहारा इंडिया' में पैसा फंसा हुआ है। ऐसे परिवारों के 150 से अधिक लोग उनके चुनावी कैंपेन में सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं।’
बदरी कहते हैं, ‘इससे पहले मेरी पत्नी भी जिला परिषद का चुनाव लड़ चुकी हैं। पिता मुखिया का चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि दोनों ही सफल नहीं हो पाए थे। इन दोनों का सपना पूरा करना है और चुनाव जीतना है।’’
रविंद्र सिंह, जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा क्षेत्र
जिस सीट से ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास की बहू पूर्णिमा दास चुनाव लड़ रही हैं, उसी जमशेदपुर पूर्वी से 52 साल के रविंद्र सिंह भी अपना भाग्य आजमा रहे हैं।
रविंद्र सिंह जमशेदपुर बस स्टैंड के पास पान की दुकान चलाते हैं। दो बेटे और दो बेटियां हैं। सबकी शादी हो चुकी है। रविंद्र का कहना है कि बेटों ने उन्हें छोड़ दिया है। फि़लहाल वह अपनी पत्नी और मां के साथ रहते हैं।
रविंद्र सिंह को लोग उनके इलाके में प्रभु जी के नाम से जानते हैं। वो कहते हैं, ‘मेरे पास पैसा तो बिल्कुल भी नहीं है। हमको अगर पाँच वोट भी मिल जाएगा तो हम अपने को सफल समझेंगे। अभी तो पैदल घूमकर प्रचार कर रहे हैं। आखिरी समय में साइकिल से प्रचार करेंगे।’’
वो कहते हैं, ‘कुछ लोग चंदा दे रहे हैं। इसी से काम निकल जाएगा। हम जीत-हार के बारे में नहीं सोच रहे हैं।’
सावित्री देवी, तोरपा विधानसभा क्षेत्र
35 साल की सावित्री देवी पेशे से किसान और खेतिहर मज़दूर हैं।
वो खूंटी जि़ला के तोरपा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रही हैं। उन्हें बहुजन समाज पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है।
वो इससे पहले खूंटी लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं। जहां उन्हें 12300 वोट मिले थे।
जिस वक्त उनसे बात हुई, वो बच्चों के कपड़े धो रही थीं।
उन्होंने कहा, ‘मैं अपने क्षेत्र में होनेवाली ग्राम सभाओं में लगातार जाती रही हूं। इसी वजह से लोगों के बीच मेरी पहचान और पकड़ है।’
वो कहती हैं, ‘अभी तो मैंने सही से चुनाव प्रचार भी शुरू नहीं किया है। लेकिन लोग आकर चंदा देने लगे हैं। कुल 10 हजार जमा हो चुके हैं। एक लाख तक आने की उम्मीद है। लोकसभा के समय भी और अब विधानसभा के समय भी मैं पति के साथ बाइक से ही चुनाव प्रचार करने जाती हूं।’
पति सुरेंद्र सिंह अपने दोनों बेटे कृष्ण सिंह और अर्जन सिंह के साथ चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। पति का दावा है कि उनकी पत्नी 45,000 वोट ले आएंगी और चुनाव हर हाल में जीतेंगी।
दिवाशंकर पासवान, हटिया विधानसभा क्षेत्र
37 साल के दिवाशंकर पासवान पेशे से एम्बुलेंस ड्राइवर हैं। उन्हें पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया ने रांची से सटे हटिया विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया है। वो पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं।
दिवाशंकर बताते हैं, ‘मैं अधिकतम 20 हज़ार रुपए चुनाव प्रचार में खर्च करने जा रहा हूँ। बावजूद इसके, मैं जीत सकता हूं। हटिया इलाक़े के कई गांव के लोगों का मैंने फ्री में इलाज करवाया है। एम्बुलेंस की सेवा दी है।’
इसके अलावा हटिया से बीजेपी के नवीन जायसवाल और कांग्रेस के अजयनाथ शाहदेव करोड़पति हैं। राज परिवार के वंशज हैं।
चुनावी मुद्दों के बारे में वो कहते हैं, ‘रांची में जितनी भी निजी कंपनिया काम कर रही हैं, वहां लोगों से ओवरटाइम कराया जाता है। लेकिन उसके बदले एसआई, पीएफ, इंश्योरेंस तक नहीं मिलते हैं। यहां तक कि उन्हें वीक ऑफ भी नहीं मिलता है। संविधान में मजदूरों को जो अधिकार मिला है, वो हम जैसों को मिलना चाहिए।’
दिवाशंकर को उम्मीद है कि वो अपने वोटरों के बीच इन मुद्दों को अगर सही से पहुंचा दिए, तो जीत जाएंगे। (bbc.com/hindi)
तेहरान की आज़ाद यूनिवर्सिटी की शोध शाखा में रविवार को एक छात्रा के कपड़े उतारने के वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर ज़बर्दस्त प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
इस छात्रा ने ऐसा क्यों किया- इसका कारण जो भी हो, लेकिन विपक्ष का कहना है कि उसने ऐसा 'ज़बर्दस्ती हिजाब पहनने के नियमों के विरोध' में किया है।
वहीं आज़ाद यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने छात्रा को हिरासत में लेकर मानसिक स्वास्थ्य अस्पताल भेज दिया है।
शनिवार यानी नवंबर को तेहरान की आज़ाद यूनिवर्सिटी के साइंस एंड रिसर्च के परिसर में अंडरवियर में एक लडक़ी के दिखने और फिर उसकी गिरफ़्तारी के वीडियो को कई लोगों ने सोशल मीडिया पर साझा किया था।
कई लोग ये भी मान रहे हैं कि ये प्रदर्शनकारी महिलाओं से निबटने के लिए ईरानी शासन जो सख़्त रवैया अपना रहा है, ये उसी से जुड़ा एक और मामला है।
बीबीसी फ़ारसी को ईरान के भीतर काम करने की अनुमति नहीं है और अब तक ईरान में काम करने वाले स्वतंत्र पत्रकार इस महिला तक नहीं पहुंच सके हैं।
समर्थन और चिंताएं: ‘विद्रोह की प्रतीक’
इस छात्रा के समर्थन में सोशल मीडिया पर रिसर्च साइंस गर्ल हैशटैग ट्रेंड कर रहा है। कई लोग इस छात्रा की पहचान ज़ाहिर करने और इसे रिहा करने की मांग कर रहे हैं।
इस छात्रा का समर्थन करने वाले लोगों का मानना है कि उसने कपड़े उतारकर और सिफऱ् अंडरवियर पहनकर चहलकदमी करके ‘ज़बरदस्ती हिजाब थोपे जाने का विरोध किया है।’
ईरानी छात्रा के इस क़दम को क्रांतिकारी तक बताया जा रहा है।
ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर छात्रा का समर्थन कर रहे लोग एक चश्मदीद के हवाले से बता रहे हैं कि इस छात्रा ने कपड़े उतारते वक़्त अन्य छात्रों से कहा था, ‘मैं तुम सबको बचाने आई हूँ।’
शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले नर्गिस मोहम्मदी, जो अभी इविन जेल में बंद हैं, के इंस्टाग्राम अकाउंट से लिखा गया, ‘महिलाओं को आदेश न मानने की क़ीमत चुकानी पड़ती है लेकिन वो ताक़त के आगे झुकती नहीं हैं।’ इस अकाउंट से लिखा गया है, ‘यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन कर रही छात्रा का शरीर विद्रोह का प्रतीक है। ये ग़ुस्से और विद्रोह की तीव्रता का भी प्रतीक है।’
वहीं, अभिनेत्री कातायून रियाही और पेंटिया बहराम ने भी अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर इस छात्रा का समर्थन किया है।
साल 2022 में ईरान में अनिवार्य हिजाब के ख़िलाफ़ व्यापक प्रदर्शन हुए थे। तब भी इन दोनों अभिनेत्रियों ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था।
अमेरिका के राजनीतिक टिप्पणीकार जैक्सन हिंकले ने कपड़े उतारने वाली लडक़ी का तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है, ''ये लडक़ी बहादुर नहीं बल्कि इसकी मानसिक सेहत ठीक नहीं है।’
हिंकले की इस पोस्ट को आड़े हाथों लेते हुए ईरान की मानवाधिकार कार्यकर्ता अज़ाम जानगरवी ने लिखा है, ‘मैंने जब हिजाब अनिवार्य किए जाने के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया था तो सुरक्षा बलों ने मुझे गिरफ़्तार कर लिया था और मेरे परिवार वालों पर दबाव डाला गया कि वे मुझे मानसिक रूप से बीमार बताएं। ईरानी सुरक्षा बल मुझे फॉरेसिंक डॉक्टर के पास भी ले गए थे। मेरा एक रिश्तेदार मुझसे जेल में मिलने आया था और उसने मुझसे पूरी बात बताई थी।’
‘मेरा वो रिश्तेदार बहुत दबाव में था। उसने रोते हुए कहा था, ''तुम इस तरह जेल नहीं जा सकती हो।'' मैंने उसे ग़ुस्से से देखा और कहा, ‘तुम कह रहे हो कि मैं पागल हूँ? मैं साइको हूँ? तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो?’
‘इसके बाद हम दोनों रोने लगे। मैंने कहा कि मुझे इस तरह से जेल से बाहर नहीं आना है और तुम भी इस दबाव में मत आओ। मेरे परिवार वालों ने ऐसा नहीं किया लेकिन बहुत सारे परिवार दबाव में आकर अपने बच्चों को साइको बता देते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने से वे अपने बच्चों को जेल से बचा लेंगे। ईरान इसी तरह मानसिक रूप से बीमार बताकर महिलाओं को डिसक्रेडिट करता है।’
अजाम जानगरवी ने कहा, ''जैक्सन हिंकले आप गलत सूचना मत फैलाइए। चुप रहिए और उस महिला के बार में कुछ भी मत बोलिए जिसकी जान ईरान में खतरे में है।’
चीन के तियानमेन स्क्वायर के ‘टैंक मैन’ से तुलना
ईरान रिफॉर्म फ्रंट के प्रमुख अजर मंसूरी ने लिखा, ‘हमारी एक बेटी ने हैरान कर दिया है। मुझे इस बात में कोई शक नहीं है कि पुलिस के ज़रिए सख्ती और नकारात्मकता के सभी प्रयास नाकाम हो गए हैं।’
साल 2023 में हिजाब ना पहनने की वजह से हिरासत में ली गईं और फिर दंडित की गईं रोया हशमती ने हैशटैग ‘डॉटर ऑफ़ साइंस एंड रिसर्च’ के साथ लिखा है, ‘हमारी प्यारी बहन, रसातल के इस अंधेरे दौर में गर्व और विद्रोह की ये मशाल जलती रहे, जिसका मुंह तुमने खोल दिया है।’
विद्रोह के गायक और पूर्व कैदी महदी यारराही ने हिजाब के खिलाफ लिखे गए अपने विद्रोही गीत ‘जीवन का गीत' को ट्वीट करते हुए इसी हैशटैग के साथ लिखा है, ‘महिलाओं की आवाज में दम है।’
जर्मनी में रह रहे विद्रोही लेखक फराज सारकोही ने कहा, ‘रिसर्च और साइंस की इस लडक़ी ने जो किया है वो भीषण दमन के खिलाफ एक क्रांतिकारी कदम है। इस दमन से बचने के लिए क्रांति के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।’
यूक्रेन के महिलावादी समूह फेमेन की नेता इना शेवशेंको ने भी इस ईरानी छात्रा का समर्थन किया है।
एक्स पर पोस्ट करते हुए शेवशेंको ने इस छात्रा के नग्न प्रदर्शन की तुलना चीन के थियानमन चौक पर हुए नरसंहार के दौरान एक टैंक के सामने अकेले खड़े रहे व्यक्ति से की है।
साल 1989 में राजनीतिक स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाए जाने की मांग के साथ चीन में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे। इसी दौरान चीन के एक शीर्ष चीनी नेता हू याओबैंग की मौत के बाद उनकी अंत्येष्टि में लाखों लोग शामिल हुए थे।
इसके कुछ हफ्तों बाद चीन की राजधानी बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर में चीनी लोग जुटना शुरू हुए।
इस प्रदर्शन को रोकने के लिए चीनी सेना और सुरक्षाबलों को बुलाया गया था और इस दौरान ‘टैंक मैन’ की एक तस्वीर दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी थी, जो चीनी टैंक के सामने डटा हुआ था।
तेहरान की ताज़ा घटना पर फोरो फर्रूखजाद की एक कविता का हवाला देते हुए तुर्की के लेखक एलिफ शफाक ने लिखा, ‘ईरानी महिलाओं की खबूसरूत, प्रतिरोधी, विद्रोही आत्माज् दुनिया दिल टूटने और टूट जाने की जगह है, ख़ासकर महिलाओं के लिए।’
मनोवैज्ञानिक शाकिब नसरल्लाह ने छात्रा को अस्पताल ले जाए जाने के बारे में लिखा, ‘इस छात्रा का मानसिक स्वास्थ्य कैसा भी हो, लेकिन इसे मानसिक रोगी बताने के किसी भी कारण को किसी भी तरह न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।’
‘जब एक व्यक्ति पर हमला किया जाता है, तब उस घटना की जांच हमले की पृष्ठभूमि में ही की जानी चाहिए और ऐसा हुआ है, इसलिए अगर इस छात्रा के मानसिक रूप से बीमार होने का इतिहास है भी, तो वो यहां अप्रसांगिक है।’
ख़बर ऑनलाइन को भेजे एक नोट में यूनवर्सिटी प्रोफ़ेसर हामिद सूरी ने लिखा है, ‘जो लोग वहां मौजूद थे, वो मूकदर्शक क्यों बनें रहे।’
निंदा और घृणा: ‘यूनिवर्सिटी की हत्या का प्रयास’
वहीं ईरान के रिवोल्यूश्नरी गार्ड और ईरान में इस्लामी शासन का समर्थन करने वाले मीडिया समूहों के कवरेज से पता चलता है कि अधिकतर रिपोर्टों में इस घटना को ‘नग्नता और कपड़े उतारने’ से जोडक़र देखा गया है।
ऐसे मीडिया समूहों में इसे अनैतिक कृत्य बताया गया है या फिर इसे ‘अचानक मानसिक स्वास्थ्य बिगडऩे’ के कारण हुई घटना बताया गया है।
इस्लामिक आज़ाद यूनिवर्सिटी से जुड़े एक अख़बार फरहीख़्तेगान ने उस रिपोर्ट को खारिज किया है, जिसमें दावा किया गया था कि सुरक्षाकर्मियों और महिला छात्रा के बीच झड़प हुई थी।
अख़बार ने लिखा है कि छात्रा यूनिवर्सिटी के सुरक्षा गार्डों ने छात्रा को पुलिस को सौंप दिया था, जहां से उसे मानसिक स्वास्थ्य अस्पताल भेज दिया गया है।
‘यूनिवर्सिटी की हत्या’ शीर्षक से प्रकाशित एक लेख में ईरान के स्वयंसेवक अर्धसैनिक बल बासिज से जुड़ी ‘दानेशजू’ न्यूज एजेंसी ने इस घटना की तुलना आतंकवादी कार्रवाई से की है।
इस्लामिक रिपब्लिक का विरोध करने वाले कुछ समूहों और देश में राजशाही की वापसी का समर्थन करने वाले कुछ लोगों ने भी छात्रा के इस कृत्य का विरोध किया है और इसे ‘ईरानी महिलाओं की मर्यादा से कहीं दूर’ बताया है।
वहीं कुछ लोग इस घटना को यूनिवर्सिटी को बदनाम करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं।
छात्रा के ‘पूर्व पति’ ने क्या कहा
रूढि़वादी नजरिया रखने वाली एक न्यूज़ वेबसाइट सीरत न्यूज इस कृत्य को ‘महिला, जि़ंदगी और आजादी प्रदर्शनों के बाद का अगला चरण बताया है और ईरान में अंदालूयिसा के प्रोजेक्ट का चौथा चरण कहा है।’
ईरान में इस्लामी शासन के सुरक्षा संस्थानों से जुड़े लोग ये मानते हैं कि प्रोजेक्ट अंदालूसिया ईरान के इस्लामी चरित्र को समाप्त करने की साजिश है।
वहीं आजाद यूनिवर्सिटी के एक इस्लामी छात्र संगठन (स्टूडेंट बासिज) ने बयान में कहा है, ‘यूनिवर्सिटी के कैंपस में ये बर्ताव एक छात्र की मर्यादा और नियमों के खिलाफ है। यूनिवर्सिटी ऐसे शर्मनाक कृत्यों की जगह नहीं है।’
ईरान के मीडिया में एक पुरुष का वीडियो भी प्रसारित हो रहा है। इस धुंधले चेहरे वाले वीडियो में ये पुरुष नफरत भरी भाषा में लोगों से इस महिला के वीडियो को प्रसारित और प्रकाशित ना करने की अपील कर रहा है।
इस छात्रा का ये पूर्व पति कह रहा है, ‘उसके बच्चों के भविष्य की खातिर, कृपया इस वीडियो को प्रसारित ना करें, उसके सम्मान से ना खेलें।’
2022 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान गाने से प्रतिबंधित किए गए एक स्तुतिकार हामिद्रेजा अलीमी ने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा, ‘इस देश की लड़कियों और महिलाओं की तस्वीरों और वीडियो का प्रकाशन (किसी भी कारण से) कई परिवारों को नष्ट कर देगा। (bbc.com/hindi)
चिंताओं से मुक्ति, आजीविका, घर के कार्यों और परिवार को मिला ज्यादा समय
-कमलेश साहू
घर के आंगन में नल से गिर रही पानी की धार ने महिलाओं का जीवन ही बदल दिया है। जल जीवन मिशन महज हर घर तक पेयजल पहुंचाने की योजना नहीं है। यह दूरस्थ अंचलों और गांवों में महिलाओं की दिनचर्या और जीवन में बड़ा बदलाव ला रहा है। गांवों में परंपरागत रूप से घर में पेयजल और अन्य जरूरतों के लिए पानी के इंतजाम का जिम्मा महिलाओं पर ही है। घर तक पानी की पहुंच न होने के कारण उन्हें हैंडपंपो, सार्वजनिक नलों, कुंओं या अन्य स्रोतों से रोज पूरे परिवार के लिए जल संकलन करना पड़ता है। रोजाना का यह श्रमसाध्य और समयसाध्य काम बारिश तथा भीषण गर्मी के दिनों में दुष्कर हो जाता है। कई इलाकों में गर्मियों में जलस्रोतों के सूख जाने के कारण दूर-दूर से पानी लाने की मजबूरी रहती है। परिवार के लिए पानी की व्यवस्था हर दिन का संघर्ष बन जाता है। महिलाओं के दिन के कई घंटे इसी काम में निकल जाते हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के हर घर तक नल से जल पहुंचाने के सपने को पूरा करने का जल जीवन मिशन पेयजल के साथ ही महिलाओं को कई समस्याओं से निजात दिला रहा है। घर तक स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचने से वे कई चिंताओं से मुक्त हो गई हैं। अब रोज-रोज पानी के लिए बहुत सारा श्रम और समय नहीं लगाना पड़ता। इससे उन्हें घर के दूसरे कामों, बच्चों की परवरिश, खेती-बाड़ी एवं आजीविका के अन्य कार्यों के लिए अधिक समय मिल रहा है और वे इन कार्यों पर अपना ज्यादा ध्यान व समय दे पा रही हैं। बारहों महीने घर पर ही जलापूर्ति से लगातार बारिश तथा गर्मी के दिनों में पेयजल का संकट जल जीवन मिशन ने दूर कर दिया है। गर्मियों में जलस्तर के नीचे चले जाने से तथा बरसात में लगातार बारिश से जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। गुणवत्ताहीन पेयजल से पेट तथा निस्तारी के लिए खराब जल के उपयोग से त्वचा संबंधी रोगों का खतरा रहता है। जल जीवन मिशन ने सेहत के इन खतरों को भी दूर कर दिया है।

जल जीवन मिशन के माध्यम से हर घर में रोज प्रति व्यक्ति 55 लीटर जल की आपूर्ति की जा रही है। घर तक जल की सुलभ और पर्याप्त पहुंच से महिलाओं के ‘किचन गार्डन’ (बाड़ी) के लिए भी पानी मिल रहा है। इसके लिए उन्हें अब अतिरिक्त समय और श्रम नहीं लगाना पड़ रहा। इस्तेमाल किए हुए जल का सदुपयोग करते हुए इससे वे अपनी बाड़ी में लगाए सब्जी-भाजी की सिंचाई कर रही हैं। उनका यह काम परिवार के सुपोषण का द्वार भी खोल रहा है।

छत्तीसगढ़ में हर घर में नल से जल पहुंचाने के जल जीवन मिशन का 79 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो गया है। राज्य के 39 लाख 63 हजार 700 घरों में पाइपलाइन से पेयजल पहुंच रहा है। मिशन की शुरूआत के बाद से अब तक करीब 36 लाख 44 हजार नए घरों में नल कनेक्शन दिए गए हैं। प्रदेश में 4142 ऐसे गांव हैं जहां के शत-प्रतिशत घरों में नल से पानी पहुंच रहा है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत 19 जिलों में 77 प्रतिशत से अधिक काम पूरे कर लिए गए हैं। हर घर तक नल से जल पहुंचाने के लिए धमतरी जिले में मिशन का 98 प्रतिशत, रायपुर में 94 प्रतिशत, राजनांदगांव में 89 प्रतिशत, जांजगीर-चांपा में 88 प्रतिशत, दुर्ग और मुंगेली में 87 प्रतिशत, बालोद में 86 प्रतिशत तथा गरियाबंद और सक्ती में 85 प्रतिशत काम पूर्ण कर लिया गया है।

मिशन के तहत बेमेतरा में 84 प्रतिशत, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई और बस्तर में 83 प्रतिशत, कबीरधाम और महासमुंद में 82 प्रतिशत, रायगढ़ में 81 प्रतिशत, कोंडागांव में 79 प्रतिशत, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में 78 प्रतिशत तथा दंतेवाड़ा और बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में 77 प्रतिशत से अधिक काम पूर्ण हो चुके हैं। खारे पानी, भू-जल में भारी तत्वों की मौजूदगी या जल स्तर के ज्यादा नीचे चले जाने की समस्या से जूझ रहे गांवों में स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति के लिए 71 मल्टी-विलेज योजनाओं का काम प्रगति पर है। इनके माध्यम से 3234 गांवों के दस लाख से अधिक घरों में पेयजल के लिए सतही (नदी) जल पहुंचाया जाएगा। जल जीवन मिशन के कार्यों के लिए राज्य शासन द्वारा चालू वित्तीय वर्ष के बजट में राज्यांश के रूप में 4500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,माक्र्सवादी थे, लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे। फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है। एक बेहतरीन माक्र्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते, धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं, धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरुपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं। संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म, संत-महंत, पंडे, पुजारी, तांत्रिक, ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है, इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है। इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।
यह सच है हम पैदा होते हैं धर्म की छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं। धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया। हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं, झूठ में जीवन जीते हैं, झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है। झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।
धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है। धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है। धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोडऩा। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुडऩा चाहिए। लेकिन होता उल्टा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।
धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और माक्र्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और माक्र्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और माक्र्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना, गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाइयत और माक्र्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है। इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।
फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ंफिदेल एंड रिलीजनं,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है। इसमें फिदेल से उनकी 23 घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखा जोखा है। यह किताब मूलत: क्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और माक्र्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतर्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है। इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया। धर्म और माक्र्सवाद के अंत संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है। इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए। ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे। ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर माक्र्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।
-कृष्ण कांत
रात को तीन बजने को हैं। अब पटाखों की आवाज थम गई है। कुछ देर पहले तक कान पर कहर बरपा है। अब चारों तरफ सिर्फ धुआं है। घर से बाहर आते ही पटाखे जलने की गंध नाक में भर रही है। ्रक्तढ्ढ नापने से पहले अंदाजा लग रहा है कि कल क्या रिपोर्ट आने वाली है।
परिवार का ही एक बच्चा दिवाली से पहले बाहर ले जाया गया है क्योंकि उसके नाजुक फेफड़े यह जहर नहीं झेल सकते। कुछ साल पहले उसे सांस की तकलीफ हुई। डॉक्टर ने कहा कि दिल्ली की हवा का स्तर ये नहीं झेल सकता। इसके हिसाब से ्रक्तढ्ढ खतरनाक है। बाहर ले जाओ। पिछले कुछ सालों से वह हर साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच बाहर जाता है। माता पिता को अपने काम के साथ समझौता करना पड़ता है।
ऐसे हजारों बच्चे होंगे जिनके लिए दिल्ली हृष्टक्र की हवा जहर हो चुकी है। तमाम सांस के मरीज, तमाम बीमार, तमाम कमजोर लोग, इसे झेलते हैं।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ पटाखों से ही प्रदूषण हो रहा है। करोड़ों वाहन, हजारों हजार निर्माण कार्य, हजारों फैक्ट्रियां रोजमर्रा के प्रदूषक हैं। इस सीजन में पराली और पटाखे इसे अति खतरनाक बना देते हैं।
भारत में 2019 में वायु प्रदूषण से 24 लाख मौतें हुई थीं। यानी रोजाना 6500 मौतें। 2021 में भारत में वायु प्रदूषण से 21 लाख मौतें हुईं। इनमें 169000 पांच साल से कम उम्र के बच्चे थे। अकेले दिल्ली में प्रतिवर्ष 12000 से ज्यादा मौतें वायु प्रदूषण से होती हैं।
दिवाली बहुत सुन्दर त्यौहार है। बचपन में मुझे भी पटाखों का शौक लगता था। बच्चे खास आकर्षित होते हैं। लेकिन क्या पटाखों के बगैर दिवाली कम सुंदर होगी? जैसे ही कोई कहता है कि पटाखे नुकसान पहुंचाते हैं, उसकी बात को हिन्दू विरोध के रूप में देखा जाता है।
फर्ज कीजिए कि आप भी पटाखों पर किसी भी सलाह को हिन्दू विरोधी कह देते हैं। किसी दिन आपके बच्चे की सांस अटकने लगे और डॉक्टर कहे कि इसे यहां से बाहर ले जाओ तो आप बच्चे की जान बचाएंगे या ‘पटाखा छुड़ाकर हिन्दू बचाने वाली सनक’ का प्रदर्शन करेंगे?
क्या हम सामूहिक रूप से ऐसा सनक गए हैं कि अपने ही बच्चों के बारे में सोचने लायक नहीं बचे?
यकीन मानिए, इस समय मैं अपने दरवाजे के बाहर की हवा में घुला जहर महसूस कर रहा हूं और हमारे आपके बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों के बारे में सोच रहा हूं।
अगर सामूहिक रूप से हमें जहर पसंद है, अगर बहुमत इस जहरीली हवा का ही समर्थक है, तो इसी हवा में दो चार सांसें और एक मौत अपनी भी है। मेरा किसी से कोई विरोध नहीं, बस चाहता हूं कि आप भी सोचना शुरू करें।
ईश्वर आपको अंधेरे से प्रकाश को ओर, और मौत से जीवन की ओर ले जाएं। दिवाली फिर से मुबारक!
25 वें वर्ष में राज्य आंदोलन की यात्रा
-राहुल कुमार सिंह
लोग सिर्फ छत्तीसगढ़ का सपना ही नहीं देखते रहे, उस पर गंभीर विचार, सक्रिय पहल, गतिविधियां भी संचालित करते रहे। ऐसे लोगों में से कुछेक ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, माधवराव सप्रे, पं. सुंदरलाल शर्मा, पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय, ठाकुर प्यारेलाल सिंह हैं। और भी जननायक है जिनकी चर्चा और सूची सहज उपलब्ध हो जाती है। किंतु कुछ ऐसे भी नाम हैं जो अल्पज्ञात बल्कि इस संदर्भ में लगभग अनजाने रह गए हैं। इन्हीं में से एक है डॉ. इंद्रजीत सिंह। मुस्लिम इतिहासकारों ने जिस क्षेत्र का आमतौर पर गोंडवाना नाम दे रखा था यही गोंडवाना आज के छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि है। गोंडवाना की सांस्कृतिक सामाजिक पहचान को रेखांकित करने के उद्देश्य से डॉ. इंद्रजीत सिंह ने लगभग 90 साल पहले पूरे गोंडवाना का व्यापक भ्रमण-सर्वेक्षण कर अंचल के भौगोलिक परिवेश और आदिम संस्कृति की विशिष्ट महानता को समझने के लिए गहन शोध किया और मध्य-भारत में सामाजिक मानवशास्त्र के क्षेत्र में किसी स्थानीय द्वारा किया गया यह पहला शोध सन् 1944 में 'द गोंडवाना एंड द गोंड्स' शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ जिसकी पृष्ठभूमि पर नागपुर विधानसभा में ठाकुर रामकृष्णसिंह व अन्य विधायकों ने गोंडवाना राज्य के गठन की गुहार की थी।
21 नवंबर 1955 को ठा. रामकृष्ण सिंह ने विधानसभा में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए कहा था-हमारा छत्तीसगढ़ जो देश का बहुत पिछड़ा हुआ भाग है, इस बड़े प्रदेश (सीपी-बरार) में कभी नहीं पनप सकता। बृजलाल वर्मा, लाल श्याम शाह और वी. वाई. तामस्कर ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया। लाल श्याम शाह ने कहा-जब कमीशन यहां आया था तब आदिवासी विभाग के मंत्री व उपमंत्री ने गोंडवाना (छत्तीसगढ़) राज्य बनाने मेमोरेंडम दिया था, लेकिन उस पर क्यों ध्यान नहीं दिया गया? यह रहस्य की बात है। तामस्कर ने कहा कि गोंडवाना का मेमोरेंडम भी म. प्र. के मेमोरेंडम के साथ ही प्रस्तुत हुआ था। मगर सदन में प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला। यह प्रस्ताव राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान रखा गया था। चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल ने कहा-सिवाय प्रस्ताव महादेय और एकाध माननीय सदस्यों को छोड़ इस संशोधन की चर्चा किसी दूसरे ने भी नहीं की। इसका अर्थ यही है कि इसको समर्थन देने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसलिए में समझता हूं कि इस पर कुछ ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है।
अंतत: 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश का गठन हो गया। छत्तीसगढ़ को भी उसमें मिला दिया गया। इन क्षेत्रों में न भाषाई समानता थी और न ही सांस्कृतिक साम्य था। म. प्र. के गठन के संदर्भ में राजेंद्र माथुर की टिप्पणी गौर करने योग्य है-'म.प्र. के पास एक मंत्रिमंडल है, एक सचिवालय है, एक प्रशासकीय ढांचा है और राज्य के लिए जरूरी सारा तामझाम है। लेकिन उसके पास एक राज्य की आत्मा नहीं है।'
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के इतिहास और पृष्ठभूमि की तलाश में जितनी सामग्री मेरे देखने में आई उनमें लगभग सभी संस्मरण, श्रेय और दावों के अधिक करीब हैं। स्रोतों-दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास की अपनी कमियां हो सकती हैं, लेकिन जड़ और जमीन के लिए यह आवश्यक है। इस दृष्टि से अग्रदूत समाचार पत्र के 30 नवम्बर 1955 अंक में अंतिम पृष्ठ-8 का मसौदा, जिसमें गोंडवाना प्रान्त की मांग क्यों? शीर्षक के साथ परिचय है कि एस.आर.सी. की रिपोर्ट पर हमारी विधान सभा ने पिछले सप्ताह विचार-विमर्श किया। कुछ सदस्य एक गोंडवाना प्रान्त की मांग कर रहे हैं। ठाकुर रामकृष्ण सिंह एम.एल.ए. ने इस मांग के समर्थन में विधान सभा में जो विचार व्यक्त किए हैं, वे पठनीय है। उक्त का अंश इस प्रकार है-
अध्यक्ष महोदय, इस सदन में आज चार-पांच रोज से जो भाषावार प्रान्त के हिमायती हैं उन्होंने भाषण दिए। उससे यह स्पष्ट हो गया कि एक ही भाषा के बोलने वाले एक ही भाषा के बड़े प्रान्त में नहीं रहना चाहते। आयोग ने या हाई कमान्ड ने जो इस बात की कोशिश की कि एक भाषा के लोग एक ही प्रान्त में रहें तो इसका भी विरोध इसी सदन में आज 5 दिनों से हम देख रहे हैं। मराठी भाषा बोलने वाले लोग ही संयुक्त महाराष्ट्र में रहना नहीं चाहते। वे अपना अलग प्रान्त बनाना चाहते हैं। उनके भाषण में एक दूसरे के प्रति कटु भाव थे। इससे मुझे भास होता है कि जब एक भाषा के बोलने वाले आपस में एक दूसरे के प्रति इतनी कटु भावना रख सकते हैं तो वे दूसरी भाषा बोलने वाले के प्रति कैसी भावना रखेंगे। इन सब कारणों के अध्यक्ष महोदय, मैं एक भाषा के एक प्रान्त बनाने की योजना का विरोध करता हूं।
दूसरी बात जो श्री जोहन ने हमारे मुख्यमंत्री जी के प्रस्ताव में संशोधन रखा है उसका मैं समर्थन करता हूं। इस संबंध में अभी पहले हमारे एक उपमंत्री जी ने बहुत सुन्दर ढंग से ऐतिहासिक भूमिका दी है और वह इतनी यथेष्ठ है कि उसको मैं दोहराना नहीं चाहता। हम लोग जो गोंडवाना के समर्थक हैं वे यह चाहते हैं कि हमारा एक ऐसा कम्पोजिट प्रदेश बने जिनमें वे मराठी भाषी जो आज 95 वर्ष से हमारे साथ रहते आये हैं वे भी साथ रहें और अभी तक जिस प्रकार प्रेमपूर्वक रहते आये हैं उसी प्रकार रहें।
अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्तावित मध्यप्रदेश का इसलिये विरोध करता हूं कि वह इतना अन-बोल्डी है कि उसमें एडमिनिस्ट्रटिव कनविनिअन्स बिलकुल नहीं रहेगा। अध्यक्ष महोदय, मध्यभारत, भोपाल और विन्ध्य-प्रदेश का महाकोशल प्रदेश से कभी भी शासकीय संबंध नहीं रहा है। पर्वत, जंगल तथा अन्य कठिनाइयों के कारण आपस में आवागमन के लिए जो रेल और सड़क बनाने की सुविधा होनी चाहिए या इनको एक स्टेट के एडमिनिस्ट्रेशन में लाने के लिए जो सुविधा होनी चाहिये वह सुविधा बिलकुल नहीं है। आपने, अध्यक्ष महोदय, इस बात पर भी गौर किया होगा कि हमारे बस्तर से मध्यभारत की कितनी दूरी है। 800 से एक हजार मील की दूरी होती है। ऐसे प्रदेश में बस्तर जैसे पिछड़े प्रदेश में रहने वाला व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है यह सोचने की बात है।
दूसरी बात यह है कि हमारा छत्तीसगढ़, जो कि देश को बहुत ही पिछड़ा हुआ भाग है, इस बड़े प्रदेश में कभी पनप नहीं सकता। इसकी जो तरक्की होनी चाहिये इसकी तरफ से जो ध्यान देना चाहिये वह कभी भी प्रस्तावित मध्यप्रदेश के शासन में नहीं हो सकता। अध्यक्ष महोदय, आपने देखा होगा कि राजधानी के प्रश्न पर भोपाल, सागर, इटारसी और सबसे मुख्य जबलपुर की चर्चा होती रही पर किसी ने भी यह गौर नहीं किया कि हमारे बस्तर से या छत्तीसगढ़ से ये स्थान कितनी दूरी पर हैं। मैंने इस संबंध में इतने भाषण सुने पर किसी ने भी छत्तीसगढ़ का जिक्र नहीं किया। यह नहीं सोचा गया कि इन स्थानों से छत्तीसगढ़ कितनी दूर हो जावेगा।
हालांकि अध्यक्ष महोदय, मैंने अभी प्रस्तावित मध्यप्रदेश का विरोध किया है मगर जो होना है वह तो होकर रहेगा इसलिये इस सिलसिले में मैं यहां एक बात रिकार्ड करा देना चाहता हूं कि चाहे राजधानी भोपाल हो या सागर हो या जबलपुर हो पर उसमें हमारे छत्तीसगढ़ के हित का ध्यान रखा जाना चाहिये और वह यह है कि इसमें रायपुर शहर को उप-राजधानी बनाया जावे। रायपुर शहर छत्तीसगढ़ का हृदय है और छत्तीसगढ़ के सभी स्थानों से बराबर दूरी पर है। आज के हमारे मध्यप्रदेश की राजधानी नागपुर थी फिर गवर्नमेंट बराबर जबलपुर को उप-राजधानी मानती चली आ रही है इसलिये हम चाहते हैं कि सिर्फ सिर और चेहरे को ही न देखा जावे। इन्दौर, भोपाल और जबलपुर तो बड़े बड़े शहर हैं वे आकर्षण के केन्द्र हो सकते हैं। पर केवल चेहरे को ही न देखा जावे। हम दूर में जो गरीब लोग इस छत्तीसगढ़ में रहेंगे उनके ऊपर भी यथोचित ध्यान दिया जाना चाहिये इसलिए मेरा निवेदन है कि नवीन मध्यप्रदेश में रायपुर को उप-राजधानी बनाया जावे। यहां जो गरीब लोग रहे हैं उनमें पोलिटिकल जाग्रति नहीं है इसका प्रमाण है कि 82 सदस्यों में से किसी ने भी राजधानी के प्रश्न पर यह नहीं कहा कि रायपुर को उप-राजधानी बनाया जावे। इससे पता चलता है कि ये लोग कितने बैकवर्ड हैं। इसलिये मैं चाहता हूं कि प्रस्तावित मध्यप्रदेश का यदि निर्माण होता है तो रायपुर को उप-राजधानी बनाने के अलावा हाईकोर्ट बेंच, रेवन्यू बोर्ड बेंच और दीगर फेसिलिटीज जो होती हैं वे दी जावें। अध्यक्ष महोदय, मैं इन शब्दों के साथ गोंडवाना प्रान्त की मांग का समर्थन करता हूं।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुर रामकृष्ण सिंह पहले विधायक थे जिन्होंने विधानसभा में छत्तीसगढ़ राज्य की मांग उठाई थी। इससे पहले उन्होंने रायपुर के गिरधर भवन में 30 अक्टूबर 1955 को एक बैठक बुलाई थी, जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य की मांग सदन में उठाने के विषय पर विचार विमर्श किया गया था। बैठक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांतिकुमार भारतीय, दशरथ लाल चौबे और कमलनारायण शर्मा ने जोरदार शब्दों में छत्तीसगढ़ राज्य की आवश्यकता प्रतिपादित की थी।
(पूर्व संयुक्त संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व छत्तीसगढ़)
-केशव कृपाल पांडेय
कोई भी धर्म हो उसके अनुयाई उस धर्म के ठीक-ठीक पालन से और अनुरूप आचरण से जाने जाते हैं। लेकिन हिन्दूधर्म धर्माचरण की मर्यादा से निश्चिन्त तथा निष्क्रिय केवल पंडाल, शोभायात्रा, उत्सव, मेले और दिव्य दरबार में सहभागिता पर निर्भर हो गया है। पहले तो हमारा धर्म 'हिन्दू' धर्म है नहीं, पर जो है, मैं उसी की बात कर रहा हूं।
वर्णव्यवस्था, चारों आश्रम, संध्या, तर्पण, पूजन, भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक, रोटी-बेटी के रिश्ते आदि अब कहां को बचे हैं? इनकी पूर्णतया वापसी संभव है भी नहीं। लेकिन सत्य, दया, धर्म, त्याग, तप आदि आध्यात्मिक मूल्यों की हिफाजत करना तो संभव है।
इनका बचे रहना उचित है या अनुचित, इससे परे प्रश्न यह है कि इस प्रकार हमारे स्वयं के धर्म से क्रमशः च्युत होने में क्या विधर्मी और मुसलमान कारण हैं? अगर नहीं तो फिर हमारे धर्म को इनसे से खतरा क्यों बताया जाता है? धर्मसम्राट पूज्य करपात्रीजी महाराज कहा करते थे कि अपने धर्म में दृढ़ निष्ठा रखने वाला मुसलमान उस हिन्दू से अच्छा है जो अपना धर्माचरण छोड़कर केवल हिन्दू होने की बात करता है।
वर्तमान समय में हिन्दू अपने धर्म का जितना विरोध कर रहे हैं, मुसलमान उसका एक अंश भी करता दिखाई नहीं देता। हमने कभी नहीं सुना कि हमारे देवताओं, प्रतीकों, ब्राह्मणों और महापुरुषों को मुसलमान ने अपमानित किया है।
वर्तमान में धर्माचरण और आध्यात्मिक मूल्यों से सर्वथा विहीन जो हिन्दू समाज दृश्यमान है, वह फल के छिलके की तरह स्वरस-विहीन है। उसे देखकर केवल फल की याद आ सकती है कि छिलका भी कभी फल था।
आज का हिन्दू एक समुदाय या बहु संख्यक जनसमूह का वाचक हो गया है, धर्माश्रयी नहीं। जैसे मराठी, बंगाली, पहाड़ी और पंजाबी आदि शब्दों का व्यवहार होता है। यह विशेष हिन्दू अपने तथाकथित उत्कर्ष के अमृतकाल में किसी धार्मिक अनुशासन का मोहताज न होकर एक गैर पंजीकृत राजनीतिक संगठन का प्रारूप बन चुका है।
हमारी गौ माता जिनके लिए भगवान के विविध अवतार हुआ करते हैं, बूचड़खानों में तड़प रही हैं और हम हिरण के पीछे पागल हो रहे हैं। मतवाला हिन्दू सड़क पर छटांक भर मांस पिंड के पीछे बवाल काट कर गौ माता से उऋण होना चाहता है और मस्जिदों पर ध्वजारोहण को परम धर्म समझ रहा है। हमारे खास मन्दिर आत्मशांति और आत्मोद्धार की पवित्र भावना से दूर पर्यटन, पैसा और जनमत के विस्तार की प्रयोगशाला बन रहे हैं। अब विचार कीजिए कि हिन्दू या हिन्दुत्व को खतरा हिन्दू से है या किसी पराये से?
-श्याम मीरा सिंह
दिल्ली में मेरे किराए के घर के पास अमीरों की रिहाइश है। उनके बच्चे पिछले दो हफ़्ते से पार्क में इक_ा होते हैं और घंटों-घंटों तक पटाखे फोड़ते हैं। उनके ग्रुप बने हुए हैं। आपस में कन्पटीशन होते हैं। मेरे कई पत्रकार मित्र जो मेरे घर आए उन्होंने ख़ुद आँखों से ये सब देखा है। मेरे कई दोस्तों ने फ़ोन पर भी पटाखें की आवाज़ें नोटिस की हैं और टोका है कि ये किसकी अवाज आ रही है बार बार। जब मैं कहता हूँ कि पटाखों की तो वे कहते हैं अभी तो दीवाली भी नहीं आई। इसी हफ़्ते मेरे तीन दोस्त घर आए, जिन्हें मैंने छत की बालकनी में बिठाया। पटाखों की आवाज़ से वे इतने परेशान हुए कि खुले में बैठ ही नहीं पाए, उन्हें कमरे के अंदर जाना पड़ा। ये दीवाली से एक हफ़्ते पहले की बात है, इसका हमारे पवित्र त्यौहार से कोई संबंध भी नहीं है।
रिच किड्स पर पैसे की कमी नहीं होती, इन्हें पॉकेट मनी भी हमारे बच्चों की स्कूल फ़ीस से ज़्यादा मिलती है। जहां आम हिन्दी त्यौहार मनाने के लिए एक दो पटाखे फोड़ लेता है वहीं अमीरों के ये बच्चे अपने मनोरंजन के लिए दो हफ़्ते पहले से ही घंटों तक पटाखे फोड़ते हैं। बच्चों में आपस में ग्रुप हैं और घंटों तक कनपटीशन चलते हैं। पूरा आसमान पटाखे के ज़हरीले धुएँ से भरके, आराम से घर जाकर अपने बड़े बड़े घरों में सोते हैं जहां इनके घरों में एयर प्योरिफ़ायर होते हैं। लेकिन धुआँ घंटों आसमान में रहता है। इधर उधर जाता है। उन लोगों तक पहुँचता है जो इसके लिए जि़म्मेदार भी नहीं। इस धुएँ को दिल्ली में आम हिंदू झेलते हैं। जबकि गरीब हिंदू और उनके बच्चों का इस ज़हरीले धुएँ में लगभग जीरो योगदान है। अधिक से अधिक वे दीवाली वाले दिन एकाध पटाखें जला लें तो जला लें। नहीं तो गरीब हिंदुओं के बच्चे आपको पटाखे फोड़ते नहीं मिलेंगे। (बाकी पेज 5 पर)
अमीरों के बच्चे ही नहीं बल्कि अमीर लोग ख़ुद भी दीवाली वाले दिन सबसे अधिक पटाखे फोड़ते हैं। अपने मनोरंजन के लिए बीस-तीस हज़ार के पटाखे फोड़ देना इनके लिए कान पर जू रेंगने जितना भी नहीं है। आपने कभी नहीं देखा होगा कि किसी गाँव में रंगारंग आतिशबाजी घंटों तक हो रही हो। ये शहरों में ही होती हैं, वो भी अमीर लोगों के द्वारा।
हमारे घरों को खिड़कियाँ भी ऐसी होती हैं कि बाहर की आवाज़ें और धुआँ घरों में घुस जाएँ, जबकि इनके मकानों में लगे ग्लास से बाहर की आवाज़ तक इनके कमरों में नहीं घुस सकती। शहर और शहर का पर्यावरण हमारी साझा जि़म्मेदारी हैं। लेकिन हमारे यहाँ सिटिजऩ सेंस जीरो है, बच्चों की रेस्पोंसिबल पेरेंटिंग जीरो है। इस कारण पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाला कोई और होता है और झेलने वाले कोई और।
-ध्रुव गुप्त
दीवाली में देवी लक्ष्मी की हर तरफ चर्चा है लेकिन उनके वाहन उल्लुओं की बात कोई नहीं करता। यह शायद इसलिए कि उन्हें हमने मूर्खता का पर्याय मान रखा है। सच इसके विपरीत ही है। पक्षियों की यह प्रजाति दुनिया के कुछ सबसे अद्भुत और बुद्धिमान जीवों में एक है। रातों में बेहतर देखने वाला एकमात्र जीव जिसकी दृष्टि इतनी पैनी होती है कि वह वस्तु को 3-डी एंगल यानी उसकी लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई तीनों में देख सकता है। वह अपने सिर को दोनों दिशाओं में 270 डिग्री तक घुमा सकने में सक्षम है। उल्लू हम इंसानों की श्रवण-सीमा से दस गुनी धीमी आवाज सुन सकता है। पृथ्वी के वातावरण में मौजूद कई-कई तरह के हानिकारक कीड़ों का शिकार करने के कारण उसे प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है। दुनिया के कई देशों में उल्लुओं को ज्ञान का प्रतीक कहा गया है। यूनान की पौराणिक कथाओं के अनुसार बुद्धि की देवी एथेन उल्लू का रूप धरकर पृथ्वी पर आती हैं और लोगों को बुद्धि का वरदान देती है। चीनी फेंगशुई में उल्लू सौभाग्य और सुरक्षा का प्रतीक है। जापानियों की नजर में उल्लू मुसीबत में उनकी रक्षा करता है। हमारा ज्योतिषशास्त्र मानता है कि उल्लू की मुद्राओं, बोली और उड़ान भरने की स्थिति से भूत, भविष्य और वर्तमान की घटनाओं का पता लगाया जा सकता है।
तात्पर्य यह कि उल्लुओं का सम्मान करिए। धन की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती दोनों प्रसन्न होंगी। कोई आपको उल्लू कहे तो अपमानित नहीं,बल्कि सम्मानित महसूस करिए। उल्लुओं के बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद मेरी हार्दिक इच्छा रहती है कि लोग मुझे उल्लू कहकर बुलाएं। और किसी ने तो अबतक नहीं कहा लेकिन मेरी घरवाली दिन में जितनी बार मुझे उल्लू कहती है उतनी बार में आत्मगौरव की भावना से भर जाता हूं।
बीते दो दिनों में प्यूर्टो रिको अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में बहस का केंद्र बन गया है।
कैरेबियाई सागर में क्यूबा के नज़दीक इस छोटे से टापू में इस बार कोई प्राकृतिक आपदा नहीं आई है और ना ही उसकी हिचकोले खाती अर्थव्यवस्था अमेरिकियों का ध्यान खींच रही है।
प्यूर्टो रिको में दिलचस्पी का सबब है एक चुटकुला।
बीते रविवार को टोनी हिंचक्लिफ़ नाम के एक अमेरिकी कॉमेडियन ने न्यूयॉर्क में हुई ट्रंप की रैली में एक ऐसा जोक सुना दिया, जो अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों पर असर डाल सकता है।
टोनी हिंचक्लिफ़ ने रविवार को न्यूयॉर्क में हुई रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की रैली के दौरान प्यूर्टो रिको को ‘समुद्र में तैरता कूड़े का एक टापू’ बताया था।
जबसे उनका ये जोक इंटरनेट पर वायरल हुआ, तबसे सोशल मीडिया पर नाराजग़ी देखने को मिल रही है।
डेमोक्रेट ही नहीं बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के राजनेता भी इस चुटकुले से पल्ला झाड़ रहे हैं और कॉमडेयिन की आलोचना कर रहे हैं।
जब विवाद बढ़ा तो हिंचक्लिफ़ ने अपना बचाव करते हुए एक्स पर लिखा, ‘इनको जऱा भी सेंस ऑफ़ ह्यूमर नहीं है। मैं प्यूर्टो रिको से प्यार करता हूँ, मैंने सबका मज़ाक उड़ाया, आप पूरा भाषण सुनें।’
प्यूर्टो रिको से आने वाले जेनिफऱ लोपेज़ और रिकी मार्टिन जैसे सुपरस्टार भी इन लोगों में शामिल हैं।
ट्रंप और हैरिस के बीच मुकाबला कांटे का है। ताज़ा सर्वेक्षणों से संकेत मिल रहे हैं कि एक प्रतिशत वोट इधर से उधर होने पर खेल बन या बिगड़ सकता है।
प्यूर्टो रिको क्यों है खास
प्यूर्टो रिको, अमेरिका का एक स्वशासित राज्य है। ये साल 1898 से अमेरिका का हिस्सा रहा है।
इस कैरेबियाई द्वीप पर जन्मा हर व्यक्ति अमेरिकी नागरिक होता है और उसके पास अमेरिकी पासपोर्ट होता है।
हालाँकि वहां के लोग तब तक अमेरिकी चुनावों में वोट नहीं डाल सकते, जब तक वे 50 अमेरिकी राज्यों में से किसी एक में मतदान करने के लिए पंजीकृत न हों।
प्यूर्टो रिको की संस्कृति पर स्पैनिश और अफ्रीकी प्रभावों का मिश्रण है। इस द्वीप पर अधिकतर लोग स्पैनिश बोलते हैं।
हर साल इस द्वीप पर लाखों टूरिस्ट आते हैं लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ते कजऱ्े, गरीबी और बेरोजगारी के कारण बड़ी संख्या में लोग अमेरिका जाते रहते हैं।
टोनी हिंचक्लिफ़ कौन हैं
टोनी हिंचक्लिफ टेक्सास के एक स्टैंड-अप कॉमेडियन हैं, जो अपने पॉडकास्ट ‘किल टोनी’ के लिए मशहूर हैं।
उनके यूट्यूब पर पॉडकास्ट के कऱीब 11 लाख सब्सक्राइबर हैं।
उन्होंने कॉमेडी जगत में अपनी शुरुआत जो रोगन के साथ काम करते हुए की और कॉमेडी सेंट्रल रोस्ट पर मशहूर हस्तियों के लिए चुटकुले लिखे।
वे पहली बार अपनी टिप्पणियाँ और आक्रामक स्वभाव के कारण सुर्खय़िों में नहीं आए हैं।
साल 2021 में, उन्होंने एक कॉमेडी सेट के दौरान अमेरिकी-चीनी कॉमेडियन पेंग डेंग का जिक्र करते हुए नस्लीय टिप्पणी की थी और बाद में माफी मांगने से इनकार कर दिया था।
अमेरिकी मैगज़ीन वैरायटी ने जब उस विवाद के बारे में पूछा था तो हिंचक्लिफ ने कहा था, ‘मैं जानता था कि मैंने जो किया वह गलत नहीं था।’
बाइडन के चुनाव से हटने के बाद कमाल हैरिस मैदान में आई थीं तो मुकाबला कांटे का हो गया था। नीचे दिए गए ग्राफ़ में देखिए सर्वे में कैसे हैरिस और ट्रंप के बीच नज़दीकी मुकाबला देखने को मिल रहा है।
ट्रंप का डैमेज कंट्रोल
आलोचनाओं के बाद ट्रंप ने ख़ुद को हिंचक्लिफ़ के बयान से किनारा कर लिया है।
ट्रंप की वरिष्ठ सलाहकार डेनिएल अल्वारेज़ ने कहा, ‘ये एक जोक था और ये ट्रंप के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करता।’
गौरतलब है कि ट्रंप और हैरिस दोनों ही लैटिन अमेरिकी लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते रहे हैं। ये मतदाता 5 नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
पेनसिल्वेनिया जैसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य में प्यूर्टो रिको से आए लोग बड़ी संख्या में रहते हैं।
बीबीसी संवाददाता एंथनी जर्चर कहते हैं कि संडे की ट्रंप की रैली उनकी ताक़त दिखाने के लिए थी लेकिन अब उन्हें डेमेज कंट्रोल करना पड़ रहा है।
कुछ जानकार कह रहे हैं कि हिंचक्लिफ़ का जोक ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस जाने के सपने को धूमिल कर सकता है।
कितने असरदार हैं प्यूर्टो रिको के मतदाता
बीते एक दशक में प्यूर्टो रिको से हज़ारों लोग अमेरिका पहुँचे हैं। अपने यहाँ भयानक समुद्री तूफ़ानों के बाद आए आर्थिक संकट से भागे लोग कई राज्यों में बसे हैं।
प्यूर्टो रिको से जो भी अमेरिका पहुँचा है, उसे चुनाव में मतदान देने का अधिकार है, बशर्ते वो किसी अमेरिका राज्य में बतौर वोटर पंजीकृत हो।
एक अनुमान के अनुसार ऐसे 58 लाख मतदाता हैं। इससे भी अहम ये है कि इनमें कई नॉर्थ कैरोलिना, जॉर्जिया, फ्लोरिडा और पेनसिल्वेनिया जैसे अहम राज्यों में केंद्रित हैं।
फ्लोरिडा में 11 लाख ऐसे मतदाता हैं। ये ज़रूर ट्रंप का गढ़ है लेकिन प्यूरटो रिको के लोगों की नाराजगी यहाँ महंगी पड़ सकती है।
फ्लोरिडा के पूर्व गवर्नर रिक स्कॉट ने चुटकुले के बारे में कहा, ‘ये बिल्कुल फनी नहीं था और सच तो कतई नहीं। प्यूर्टो रिको के लोग ज़बरदस्त हैं और वे बढिय़ा अमेरिकन भी हैं।’
रिपब्लिकन पार्टी की मारिया एलविरा सालाज़ार ने एक्स पर ‘नस्लभेदी’ चुटकुले को भद्दा बताते हुए कहा कि ये उनकी पार्टी के मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करता।
न्यूयॉर्क में प्यूर्टो रिको से आने वाले कऱीब 10 लाख लोग रहते हैं। इन लोगों को भी हिंचक्लिफ़ का जोक बिल्कुल फऩी नहीं लगा होगा।
दांव पर व्हाइट हाउस की गद्दी
लेकिन सबसे अहम हैं पेनसिल्वेनिया में रहने वाले 4,50,000 प्यूर्टो रिको के मतदाता। ये लोग रिपब्लिकन पार्टी के सपनों को नुक़सान पहुँचा सकते हैं।
सर्वे के मुताबिक़ डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस में से कौन जीतेगा इसका फ़ैसला शायद पेनसिल्वेनिया करने वाला है।
इसकी वजह है।
पिछले चुनावों में यहाँ जो बाइडन को जीत मिली थी। वे महज़ 82,000 मतों से जीते थे। साल 2016 में यहाँ ट्रंप जीते थे पर सिफऱ् 44,000 वोटों से।
टोनी हिंचक्लिफ़ के चुटकुले से पहले कमला हैरिस पेनसिल्वेनिया के एक प्यूर्टो रिकोन रेस्तरां में थी।
वे द्वीप की अर्थव्यवस्था और सात साल पहले आए तूफ़ान मारिया के बाद पुनर्निमाण की बारे में बात कर रही थीं।
इसके बाद उन्होंने एक वीडियो भी रिलीज़ किया जिसमें यही संदेश दोहराया और कहा कि तूफ़ान मारिया के वक़्त ट्रंप ने प्यूर्टो रिको की पर्याप्त मदद नहीं की थी। इस तूफ़ान के कारण वहां 4,000 लोग मरे थे।
फायदा उठाने की फिराक में डेमोक्रेट्स
ट्रंप की न्यूयॉर्क रैली में जो कुछ हुआ डेमोक्रेटिक पार्टी उस भरपूर फ़ायदा उठाने की फिराक में है।
कमला हैरिस ने सोशल मीडिया पर प्यूर्टो रिको के बारे में अपने वीडिया हिंचक्लिफ के चुटकुले के साथ शेयर किया है ताकि लोगों को दोनों पार्टियों के विचारों का पता चल सके।
इसके अलावा डेमोक्रेटिक पार्टी के उप राष्ट्रपति उम्मीदवार टिम वाल्ज़ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विच पर कॉमेडियन की कड़ी आलोचना की है।
नॉटिंघम यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर टॉड लैंडमेन ने द कनवर्सेसन में छपे एक लेख में कहा है कि ‘इस बार के चुनाव काफी छोटे मार्जिन से जीते या हारे जाएंगे। यही वजह है कि प्यूर्टो रिको के लोगों का रुख किसी भी उम्मीदवार का खेल बिगाड़ सकता है।’
लैंडमेन कहते हैं कि यही वजह है कि दोनों ही पक्ष अब उनके वोट लेने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं।
उन्होंने लिखा, ‘अगर हिंचक्लिफ़ की टिप्पणियों से लोग क्रोधित हुए तो इसका चुनाव के परिणामों पर अहम असर पड़ेगा।’
यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग के समाजशास्त्री फर्ऩेंडो टोरमोस-अपोंटे ने टाइम मैगज़़ीन को बताया, ‘चुनाव बहुत नज़दीक हैं और इतनी जल्दी उस जोक को नहीं भुलाया जाएगा।’
उनका मानना है कि अन्य अल्पसंख्यक समूह भी प्यूर्टो रिको के लोगों का समर्थन कर सकते हैं और अगर ऐसा हुआ तो पांच नवंबर को डेमोक्रेट्स का पलड़ा भारी पड़ सकता है। (bbc.com/hindi)
-शिल्पा शर्मा
ये जो लोग राग अलाप रहे हैं कि पटाखे फोड़ेंगे, पटाखे फोडऩा तभी बंद करेंगे जब अलां ये बंद करे और फलां वो बंद करे। ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे!
और इन्हें सचमुच हिन्दू बनाने की ताकत दे, क्योंकि इन्हें कतई पता नहीं है कि आतिशबाजी की आमद नवीं शताब्दी में चीन से हुई। वही चीन, जिसकी झालरों का बहिष्कार आप अपना राष्ट्र धर्म निभाते हुए कर रहे हैं।
फिर सन् 1400 के आसपास (जब भारत पर मुगलों का राज था) पटाखे बजाना या आतिशबाजी का खेल गली नुक्कड़ों में किया जाने लगा तो इससे एक बात तो तय हो गई कि जो परंपरा सन 1400 के आसपास शुरू हुई और मुगल काल में शुरू हुई वो हिंदुओं की परंपरा तो कतई नहीं थी।
बहरहाल, मेरी छोटी समझ कहती है कि जब पटाखे गली-नुक्कड़ों पर फोडऩा शुरू किया गया होगा, तब इससे होने वाले वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की जानकारी नहीं रही होगी और न ही भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश रहा होगा।
अब जहां तक सवाल इस तर्क का है कि दुनियाभर में पटाखे फोड़े जाते हैं तो प्रदूषण नहीं होता और हम हिंदू दिवाली पर पटाखे फोड़ते हैं तो प्रदूषण होता है। तो ध्यान दें कि दुनियाभर जब में पटाखे जब फोड़े जाते हैं तो किसी एक निर्धारित स्थान पर जाकर फोड़े जाते हैं, हर गली नुक्कड़ में नहीं!
अब आपके परिवार में किसी को या आपको न हो तो कोई बात नहीं, पर लोगों को सांस से जुड़ी समस्याएं, अस्थमा या फिर धुएं से एलर्जी होती है, गला चोक होने लगता है, सांस नहीं आती, उनका क्या?
हमारी जनसंख्या सबसे अधिक है और हर गली में पटाखे फूटने से कितना प्रदूषण होगा? बच्चों, बूढों और बीमार लोगों के बारे में कुछ सोचने की मानवता रखिएगा या उसका भी पटाखा बना के फूंक दें सब?
करवाइए assign एक जगह हर शहर में, जाइए वहां और फोडि़ए पटाखे, इतना डिसिप्लिन पैदा कर/करवा पाएंगे सब में?
वैसे कुछ अच्छे कामों की पहल ख़ुद भी तो की जा सकती है, कुछ जानलेवा परंपराओं को हम स्वयं भी तो ख़त्म करने का साहस दिखा सकते हैं कि नहीं? हमारी परवरिश और शिक्षा यदि हमें मानवता नहीं सिखाती तो व्यर्थ ही हुई समझिए।
-कैटी केय
अमेरिका में पाँच नवंबर को राष्ट्रपति चुनावों के लिए वोटिंग होनी है। इन चुनावों में मौजूदा उपराष्ट्रपति कमला हैरिस डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हैं, जबकि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार हैं।
बीबीसी ने जानने की कोशिश की है कि अमेरिका के दो प्रमुख दलों के उम्मीदवारों में एक का महिला होना और एक का पुरुष होना कितना बड़ा चुनावी मुद्दा है।
चुनावी सर्वेक्षण करने वालों के मुताबिक़ अगले महीने होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप को पुरुषों के बीच बहुत ज़्यादा बढ़त हासिल है, जबकि महिलाओं ने बताया है कि वे कमला हैरिस को ट्रंप के मुकाबले बड़े पैमाने पर पसंद करती हैं।
अमेरिका में यह राजनीतिक ‘जेंडर’ अंतर एक दशक के सामाजिक उथल-पुथल को दिखाता है और अमेरिकी चुनाव के नतीजों को तय करने में मदद कर सकता है।
कमला हैरिस अमेरिका में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने वाली पहली काली महिला हैं।
वो इस रेस के लिए जगह बनाने वाली वाली दूसरी महिला हैं। हालांकि कमला हैरिस अपनी पहचान के बारे में बात न करने की पूरी कोशिश करती हैं।
पिछले महीने सीएनएन को दिए इंटरव्यू में हैरिस ने कहा था, ‘मैं इसलिए चुनाव लड़ रही हूं क्योंकि मैं मानती हूँ कि इस समय सभी अमेरिकियों के लिए राष्ट्रपति के तौर पर काम करने के लिए मैं सबसे उपयुक्त हूं, चाहे उनकी जाति या लिंग कुछ भी हो।’
अमरिका में लैंगिक भेद कितना बड़ा मुद्दा
इस मुद्दे को ख़त्म करने की उनकी सभी कोशिशों के बावजूद, ‘जेंडर’ यानी लैंगिक आधार इस बार के राष्ट्रपति चुनाव अभियान का निर्णायक मुद्दा बनता जा रहा है।
‘मैडम प्रेसिडेंट’ का संबोधन यानी एक महिला का राष्ट्रपति बनना अमेरिका के लिए एक नई बात होगी और यह मानना सही है कि जहां कई मतदाताओं को यह पसंद आएगा, वहीं कुछ को यह नयापन थोड़ा परेशान करने वाला लगेगा।
हैरिस का चुनाव प्रचार अभियान इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन एक अधिकारी ने हाल ही में मेरे सामने स्वीकार किया कि उनका मानना है कि यहाँ एक ‘छिपा हुआ लिंगभेद’ है, जो कुछ लोगों को राष्ट्रपति पद के लिए किसी महिला को वोट देने से रोकेगा।
यह साल 2024 है और बहुत कम लोग इस तरह से बेवकूफ बनना चाहेंगे, जो पोलस्टर (चुनावी सर्वेक्षण करने वालों) को सीधे-सीधे बता दें कि उन्हें नहीं लगता कि कोई महिला अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय के लिए उपयुक्त है।
हालांकि अमेरिका में बहुत से लोग सोशल मीडिया पर महिला विरोधी मीम्स शेयर करने के लिए तैयार हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी के एक रणनीतिकार का कहना है कि यह एक कोड है, जब मतदाता पोलस्टर्स को बताते हैं कि ‘हैरिस तैयार’ नहीं हैं या वोटरों के पास सही विकल्प या उन्हें जो चाहिए वो नहीं है, तो उनका वास्तव में मतलब है कि समस्या यह है कि हैरिस एक महिला हैं।
अमेरिका में ‘ताकतवर महिला’ को कहाँ तक स्वीकर करते हैं लोग
ट्रंप के चुनाव प्रचार अभियान का कहना है कि जेंडर का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
उन्होंने कहा है, ‘कमला कमजोर, बेईमान और खतरे की हद तक उदारवादी हैं और यही वजह है कि अमेरिकी लोग 5 नवंबर को उन्हें अस्वीकार कर देंगे।’
हालाँकि उनके चुनाव प्रचार अभियान के एक वरिष्ठ सलाहकार ब्रायन लैंज़ा ने मुझे संदेश भेजकर कहा है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि ट्रंप चुनाव जीतेंगे क्योंकि ‘पुरुषों’ का बड़ा अंतर हमें बढ़त दे रहा है।
पिछली बार जब कोई महिला राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रही थी तो उनका लिंग के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से एक मुद्दा था।
आठ साल पहले हिलेरी क्लिंटन ने खुद को अमेरिका के किसी प्रमुख पार्टी की पहली महिला उम्मीदवार बताया था। उनके प्रचार अभियान का नारा ‘मैं उनके साथ हूँ’ था। जो इसमें बढ़-चढक़र उनकी भूमिका की एक ख़ास याद है।
पेंसिल्वेनिया की कांग्रेस सदस्य (सांसद) मैडेलीन डीन को याद है कि उन्होंने मतदाताओं के साथ क्लिंटन की उम्मीदवारी पर चर्चा की थी।
मैंने डीन के साथ एक दोपहर बिताई, जब वह अपने जिले में प्रचार कर रही थीं और उन्होंने मुझे बताया कि साल 2016 में लोग उनसे कहते थे, ‘उनमें कुछ ख़ास बात है।’
डीन के मुताबिक़ उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि ‘यह 'उनके' बारे में था। ये वो बात थी कि हिलेरी एक महिला थीं।’
हालांकि डीन का मानना है कि आज यह भावना कमज़ोर हुई है। लेकिन वो स्वीकार करती हैं कि आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो ‘एक शक्तिशाली महिला के अस्तित्व पर सवाल खड़े करते हैं और उनके लिए यह बहुत दूर की बात है।’
हालाँकि साल 2016 के बाद से महिलाओं के लिए बहुत कुछ बदल गया है। साल 2017 में ‘मी ट’ आंदोलन ने काम करने वाली जगह पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में जागरूकता बढ़ाई है।
अमेरिका में महिलाएं कितनी आगे
‘मी टू’ ने पेशेवर के तौर पर महिलाओं के बारे में हमारी बातचीत के तरीके को बदल दिया है और इसने हैरिस जैसे उम्मीदवार के लिए नामांकन हासिल करना आसान बना दिया है।
लेकिन विविधता, समानता और समावेश के मुद्दों पर उठाए गए बड़े कदमों को कुछ लोगों ने एक कदम पीछे की ओर भी माना है।
खासतौर पर उन युवा पुरुषों के लिए जिन्हें लगा कि उन्हें पीछे छोड़ दिया गया है।
ये बदलाव रूढि़वादी अमेरिकियों के लिए बहुत दूर के भी थे जो पारंपरिक तौर पर महिला या पुरुष की अलग-अलग भूमिकाओं को पसंद करते हैं।
रविवार को जारी सीबीएस न्यूज के सर्वेक्षण के नतीजों से पता चलता है कि इस दौड़ में लैंगिक अंतर पैदा हो गया है, जो सामाजिक भूमिकाओं के बारे में अमेरिका में व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
बीबीसी के अमेरिकी समाचार सहयोगी सीबीएस के मुताबिक़ जिन पुरुषों के यह कहने की संभावना ज़्यादा है कि अमेरिका में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की कोशिश बहुत ज़्यादा बढ़ गई है; उनके ट्रंप समर्थक होने की संभावना ज़्यादा है।
जबकि महिलाओं का यह कहना ज़्यादा सही है कि ये प्रयास पर्याप्त नहीं हैं और वे हैरिस का समर्थन करती हैं।
सीबीएस की रिपोर्ट के मुताबिक़ पुरुषों के बीच हैरिस को एक मजबूत नेता मानने की संभावना, महिलाओं की तुलना में कम है और ज़्यादातर पुरुषों का कहना है कि वो ट्रंप को एक मजबूत नेता मानते हैं।
इसलिए कुछ मतदाताओं के लिए यह चुनाव लैंगिक मानदंडों और हाल के बरसों की सामाजिक उथल-पुथल पर जनमत संग्रह बन गया है।
युवा पुरुषों के सामने बदलता समाज
यह बात ख़ास तौर पर उन मतदाताओं के लिए सही दिखती है, जिन तक कमला हैरिस को पहुँचने में मुश्किल हो रही है।
ऐसे युवा जो इस तरह की दुनिया में रहते हैं जो युवा पुरुषों के लिए तेजी से बदल रही है।
हार्वर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स में डायरेक्टर ऑफ पोलिंग जॉन डेला वोल्पे कहते हैं, ‘युवा पुरुषों को अक्सर ऐसा लगता है कि अगर वो सवाल पूछते हैं तो उन्हें महिला विरोधी, समलैंगिकों का विरोधी या नस्लवादी करार दिया जाता है।’
उनका कहना है, ‘खुद के न समझे जाने से निराश होकर, कई लोग डोनाल्ड ट्रंप या एलन मस्क की भाईचारे वाली संस्कृति में फंस जाते हैं। वो देखते हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी किसे प्राथमिकता देती है। जैसे; महिलाएँ, गर्भपात के अधिकार, एलजीटीबीक्यू संस्कृति और फिर अपने बारे में सवाल पूछते हैं कि वो इसमें कहाँ हैं।’
डेला वोल्पे युवा मतदाताओं के सर्वेक्षण में विशेषज्ञ हैं। उनका कहना है कि जिन युवा पुरुषों का वो जिक्र कर रहे हैं, वो किसी कट्टरपंथी दक्षिणपंथी, इनसेल गुट का हिस्सा नहीं हैं।
वो आपके या आपके पड़ोसी के बेटे हैं। वास्तव में वो कहते हैं कि कई लोग महिलाओं के लिए समानता का समर्थन करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी लगता है कि उनकी अपनी चिंताओं को अनदेखा कर दिया जाता है।
डेला वोल्पे ने आंकड़ों की एक सूची पेश की है, जिसमें दिखाया गया है कि आजकल युवा पुरुष अपनी महिला समकक्षों की तुलना में किस तरह खराब हालात में हैं।
इसके मुताबिक उनके रिश्तों में पडऩे की संभावना कम है, उनके कॉलेज में दाखिला लेने की संभावना पहले की तुलना में कम है और उनकी आत्महत्या की दर महिला समकक्षों की तुलना में ज़्यादा है।
इस बीच युवा अमेरिकी महिलाएँ तेजी से आगे बढ़ रही हैं। उन्हें पुरुषों की तुलना में बेहतर शिक्षा हासिल है। वो सर्विस सेक्टर में काम करती हैं, जो तेजी से बढ़ रहा है और वे पुरुषों की तुलना में ज़्यादा पैसे कमा रही हैं।
‘गैलअप पोलिंग ग्रुप’ के मुताबिक डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद से युवा महिलाएँ भी युवा पुरुषों की तुलना में काफी ज़्यादा उदार हो गई हैं।
यह सब अमेरिका में लैंगिक भेदभाव को और भी बढ़ा रहा है। ‘अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक पिछले सात साल में ऐसे युवा पुरुषों की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है जो कहते हैं कि अमेरिका लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में बहुत आगे निकल गया है।
ट्रंप का पुरुष वोटरों को साधने पर जोर
लोगों के असंतोष को सहज रूप से समझने की क्षमता की वजह से ट्रंप ने पुरुषों की इस निराशा का फायदा उठाया है और अपने प्रचार अभियान के अंतिम दौर में उन्होंने ‘मर्दानगी’ पर दोगुना जोर दिया है।
उन्होंने अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक चेतावनी को फिर से पोस्ट किया जिसमें दावा किया गया कि ‘मर्दानगी पर हमला हो रहा है।’
हाल ही में उन्होंने एक प्रसिद्ध गोल्फर के जननांग के बारे में मजाक किया था।
ट्रम्प ने लॉकर रूम की चर्चा को लॉकर रूम से बाहर निकाल दिया है और उनके दर्शकों को यह बहुत पसंद आया।
अपनी रैलियों में और प्रसारण के दौरान असंतुष्ट पुरुषों के प्रति डेमोक्रेट्स की प्रतिक्रिया कठोर प्रेम की खुराक जैसी दिखती है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फटकार भी लगाई कि कुछ पुरुष ‘महिला को राष्ट्रपति बनाने के विचार को पसंद नहीं कर रहे हैं और आप इसके लिए अन्य विकल्प और अन्य वजह लेकर आ रहे हैं।’
एक नए टीवी विज्ञापन में अभिनेता एड ओ‘नील थोड़े तीखे लेकिन अधिक सीधे थे। उनका कहना था, ‘एक पुरुष बनें और एक महिला को वोट दें।’
इस चुनाव प्रचार अभियान के अंतिम दिनों में जेंडर हर जगह है-अन्य किसी जगह नहीं।
डोनाल्ड ट्रम्प इस दौड़ में मर्दानगी को सबसे आगे और केंद्र में रखना चाहते हैं। कमला हैरिस शायद ही स्वीकार करती हैं कि वह एक महिला हैं जो राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रही हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के सर्वेक्षण में ट्रम्प पुरुष मतदाताओं के साथ 14 फीसदी आगे हैं, जबकि महिलाओं के बीच हैरिस 12 फीसदी वोट से आगे हैं।
अमेरिका में पुरुष और महिलाएं, लडक़े और लड़कियाँ शायद इस चुनाव के नतीजों को तय तक सकते हैं। (bbc.com/hindi)
-चंदन कुमार जजवाड़े
मौसम बदलने के साथ ही उत्तर भारत में वायु प्रदूषण का असर बढऩे लगा है। इस प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर राजधानी दिल्ली और इसके आसपास रहने वाले करीब 3 करोड़ लोगों पर पड़ता है।
सर्दियों की दस्तक के साथ ही दिल्ली और इसके आसपास के लोग करीब तीन महीने तक एक तरह के गैस चैंबर में जहरीली हवा के बीच सांस लेने को मजबूर होते हैं।
इसका असर बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों पर सबसे ज्यादा होता है। हालाँकि इन दिनों दिल्ली में प्रदूषण का असर इतना ज़्यादा होता है कि यह स्वस्थ इंसान को भी गंभीर बीमारियाँ दे सकता है।
दिल्ली के प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट कई बार नाराजग़ी जता चुका है। केंद्र सरकार से लेकर दिल्ली और आसपास की राज्य सरकारें अलग-अलग दावे करती रही हैं, लेकिन इससे प्रदूषण के स्तर में कोई बड़ी राहत नजऱ नहीं आती है।
क्या हैं दिल्ली में प्रदूषण के हालात
दिल्ली में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर काम करने वाले सीएक्यूएम यानी ‘द कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट’ ने बीबीसी को बताया है कि दिल्ली में पूरे साल प्रदूषण होता है, लेकिन यह सर्दियों में ज्यादा नजर आता है।
सर्दियों में कम तापमान, हवा नहीं चलने और बारिश नहीं होने से प्रदूषण करने वाले कण ़मीन की सतह के करीब काफी कम इलाके में जमा हो जाते हैं।
पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत की राजधानी दिल्ली दुनियाभर में सभी देशों की राजधानी में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर है।
इस रिपोर्ट में पीएम 2.5 के आधार पर बताया गया है कि दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रदूषित 15 शहरों में 12 शहर भारत के हैं।
विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 30 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं जहां पीएम 2.5 की सालाना सघनता सबसे ज़्यादा है।
मेडिकल जर्नल बीएमजे की स्टडी में पाया गया है कि प्रदूषण की वजह से भारत में हर साल 20 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत होती है।
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ठ कहते हैं, ‘दिल्ली में प्रदूषण पूरे साल रहता है लेकिन यह सर्दियों में सतह के काफी करीब आ जाता है, जिसकी वजह से यह ज़्यादा दिखता है और ज्यादा नुकसान भी पहुँचाता है।’
उनका कहना है कि प्रदूषण की कई वजहें हैं जिनमें निजी वाहनों की बड़ी तादाद, दिल्ली में निर्माण कार्य की बड़ी भूमिका है, इसमें पराली (खेतों में फसलों के अवशेष) जलाना भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
देश की राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में दिवाली के पहले ही एक्यूआई ‘बहुत खराब’ स्तर पर पहुँच गई है और इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी शुरू हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए बने कानूनों को लेकर केंद्र सरकार, पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों पर तीखी टिप्पणी की है और कहा है कि ये किसी काम के नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना सभी नागरिकों का मौलिक अधिकार है और नागरिकों के अधिकार की रक्षा करना केंद्र और राज्य सरकारों का कर्तव्य है।
कोर्ट ने कहा कि पराली जलाने पर जुर्माने से संबंधित प्रावधानों को लागू नहीं किया गया है।
हालाँकि दिल्ली की इस हालत और प्रदूषण के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार तीखी टिप्पणी कर चुका है।
साल 2019 में दिल्ली सरकार के ऑड-इवन स्कीम पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़े किए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान वायु प्रदूषण को ‘जीने के मूलभूत अधिकार का गंभीर उल्लंघन’ बताते हुए कहा था कि राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय अपनी ‘ड्यूटी निभाने में नाकाम’ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ‘हमारी नाक के नीचे हर साल ऐसा हो रहा है। इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे, आप लोगों को मरते हुए नहीं छोड़ सकते।’ दिल्ली में उस साल हेल्थ इमरजेंसी भी लागू करनी पड़ी थी।
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में दिवाली में पटाखों पर पाबंदी लगा दी थी।
कृषि विशेषज्ञ और वकील विजय सरदाना इस मुद्दे पर लंबे समय से नजऱ रख रहे हैं। उनका मानना है कि पराली जलाना भारत में एक राजनीतिक समस्या है, इसलिए सरकारें इसके खिलाफ कदम नहीं उठा सकती हैं।
विजय सरदाना कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट को पराली जलाने की सैटेलाइट तस्वीरें मंगाकर पराली जलाने वालों के खिलाफ एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने प्रदूषण को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीने के अधिकार के खिलाफ माना है, तो ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ एक्शन जरूरी है।’
उनका मानना है पराली जलाने से प्रदूषण की समस्या में अचानक बढ़ोतरी होती है और ऐसा करना अपराध है तो इस तरह के अपराध करने वालों को कोई सरकारी लाभ नहीं मिलना चाहिए।
क्या कर रही है दिल्ली सरकार
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के मुताबिक साल 2016 से अक्तूबर से फरवरी के बीच करीब 150 दिनों में दिल्ली में हवा की गुणवत्ता की स्थिति चिंताजनक रही है।
इस दौरान जहाँ साल 2016 में 143 दिनों तक एक्यूआई खऱाब से लेकर खतरनाक (सिवियर) की श्रेणी में रहा, वहीं पिछली सर्दियों 150 में 124 दिन हवा की गुणवत्ता इसी श्रेणी में पाई गई।
डीपीसीसी यानी दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी की वेबसाइट के मुताबिक़ दिल्ली में सर्दियों के दौरान पीएम-2.5 को बढ़ाने में बायोमास को जलाने का सबसे बड़ा योगदान रहा जो 25 फीसदी के बराबर है। इसमें पराली जलाना भी शामिल है।
सीएक्यूएम के मुताबिक सरकार ने दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के लिए जो कदम उठाए हैं उसका असर हुआ है और प्रदूषण का औसत स्तर 2016 के मुकाबले कम हुआ है। हालाँकि अक्तूबर महीने के आसपास दिवाली और पराली की वजह से कुछ दिनों के लिए यह जरूर बढ़ जाता है।
डीपीसीसी के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में प्रदूषण के पीछे दूसरे नंबर पर वाहनों का योगदान होता है और यह करीब 25 फीसदी है।
दिल्ली के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक ने अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से प्रदूषण की समस्या पर बात की है। उनका कहना है कि बीते कुछ साल में खेती में मशीनों के इस्तेमाल की वजह से यह समस्या बढ़ी है।
वो कहते हैं, ‘मशीनों से खेती की लागत कम होती है और मजदूरों की जरूरत भी कम हो जाती है। इससे खेती में पशुओं की जरूरत खत्म हो गई और अब उन्हें खिलाने के लिए पराली की जरूरत नहीं पड़ती है।’
उनका कहना है कि बीजों की नई नस्ल, ज़्यादा गर्मी में सिंचाई के लिए पानी की ज़्यादा जरूरत से बचने के लिए भी एक फसल के बाद दूसरी फसल के लिए खेतों को जल्दी तैयार करना पड़ता है, इसलिए पराली को जला दिया जाता है।
विजय सरदाना भी इस बात से सहमत दिखते हैं। उनका कहना है कि ज़्यादा मज़दूरी देने से बचने के लिए पराली को जला दिया जाता है और यह समस्या कऱीब 10 साल पहले ज़्यादा बड़े स्तर पर शुरू हुई है।
विजय सरदाना कहते हैं, ‘जब से पंजाब सरकार ने जून के महीने में अंडर ग्राउंड वॉटर से सिंचाई पर पाबंदी लगाई है, तब से किसान धान की कटाई के बाद अक्तूबर महीने के आसपास धान की कटाई के बाद पराली को जला देते हैं ताकि अगली फसल के लिए खेत जल्दी तैयार हो जाए।’
उनका मानना है कि यह प्रदूषण के पीछे एक बड़ी वजह है चाहे इसे कोई स्वीकार करे या न करे।
दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए 200 मोबाइल एंटी स्मॉग गन भी लगाए गए हैं जो पानी का छिडक़ाव कर धूल को नियंत्रित करता है। इनमें से करीब 100 एएसजी ऊंची इमारतों पर लगाए गए हैं। इसके अलावा सडक़ों पर 100 से ज्यादा एएसजी लगाए गए हैं।
दिल्ली सरकार इस प्रदूषण को रोकने के लिए ग्रेडेड एक्शन प्लान भी लागू करती है। इसके तहत प्रदूषण के स्तर के हिसाब से निर्माण के काम पर रोक, होटलों और अन्य खान-पान की दुकानों पर कोयला जलाने पर पाबंदी लगाई जाती है।
इसले अलावा इसमें आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र डीजल जेनरेटर के इस्तेमाल पर रोक जैसे कदम शामिल हैं।
दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में आने वाली डीज़ल बसों की वजह से दिल्ली में प्रदूषण पर असर पड़ता है।
उनका कहना है, ‘दिल्ली में अब सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में डीजल बसें अभी भी आनंद विहार और कौशांबी डिपो पर चल रही हैं।’
सरकारों के बीच खींचतान और राजनीति
खबरों के मुताबिक इस साल फिर से दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मुख्यमंत्री आतिशी को चि_ी लिखी है।
जबकि बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को जि़म्मेदार ठहराया है, जो बीते 10 साल में ज़्यादातर समय के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री थे।
लाइव लॉ के मुताबिक साल 2021 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनाम दाखिल किया था उसके मुताबिक सर्दियों में दिल्ली में पीएम-2.5 की मात्रा बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका उद्योगों की है जो कि 30त्न है। जबकि इसमें दिल्ली की सडक़ों पर चल रहे वाहनों का योगदान करीब 28 फीसदी है।
दिल्ली सरकार पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटना को एक बड़ी वजह बताती रही है, जबकि केंद्र सरकार इसके पीछे दूसरी वजहों को ज्यादा जिम्मेदार मानती है।
इसके अलावा डीपीसीसी की वेबसाइट पर दी गई जानाकारी के मुताबिक़ भारत में 10 जनवरी 2019 को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की शुरुआत की गई। हालाँकि दिल्ली सरकार का आरोप है कि दिल्ली को साल 2019-20 और साल 2020-21 के दौरान एनसीएपी के तहत कोई फंड नहीं मिला।
दिल्ली सरकार का कहना है कि उसे साल 2021-22 में करीब 11 करोड़ और साल 2022-23 में इसके तहत करीब 23 करोड़ रुपये का फंड मिला।
क्या है समाधान?
पीएम यानी पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण की एक किस्म है। इसके कण बेहद सूक्ष्म होते हैं जो हवा में बहते हैं। पीएम 2.5 या पीएम 10 हवा में कण के साइज को बताता है।
हवा में मौजूद यही कण हवा के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर ख़ून में घुल जाते है। इससे शरीर में कई तरह की बीमारी जैसे अस्थमा और साँसों की दिक्कत हो सकती है।
संजय वशिष्ठ कहते हैं, ‘प्रदूषण की वजहों और इसके असर की सारी जानकारी हर सरकार को है, उनके पास हमसे ज़्यादा जानकार लोग बैठे हैं। लेकिन प्रदूषण को कम करने के लिए अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को ठीक किया जाता है तो इसका असर कार और बाकी वाहनों के बिजनेस पर पड़ेगा।’
संजय वशिष्ठ इस मामले में ट्रांसपोर्ट सेक्टर के हितों और उसमें आई गिरावट का रोजगार पर असर तो मानते ही हैं, साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर करने के लिए बड़े निवेश की ज़रूरत को भी सरकारों के लिए एक बड़ी समस्या मानते हैं।
इसके अलावा निर्माण कार्य के खिलाफ सख्त कदम उठाने से इस सेक्टर पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि वो मानते हैं कि निर्माण कार्य में धूल कम निकले इसके लिए नई तकनीक की जरूरत भी है।
सीएक्यूएम भी इस बात को मानती है कि दिल्ली के प्रदूषण को कम करने के दूरगामी उपायों में ज्यादा से ज्य़ादा इलेक्ट्रिक वाहन, निर्माण के कार्य में उडऩे वाली धूल को रोकना और जीवनशैली को बदलना शामिल है।
सीएक्यूएम के मुताबिक अक्सर लोग रोज़मर्रा की जिंदगी से प्रदूषण में योगदान को भूल जाते हैं जिसमें वाहनों के इस्तेमाल से लेकर कई कार्यों में लकड़ी को जलाना शामिल है, जैसे सर्दियों के दौरान ठंड से बचने के लिए अलाव जलाना। (bbc.com/hindi)
-अंशुल सिंह
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक तस्वीर पूरे ब्रिक्स समिट के दौरान चर्चा में रही।
तस्वीर में पुतिन बीच में हैं और उनके अगल-बगल पीएम मोदी और शी जिनपिंग हैं। इस दौरान पुतिन कैमरे की तरफ़ मुस्कुराते हुए ‘थम्स अप’ का इशारा कर रहे हैं।
पांच साल बाद ब्रिक्स समिट में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात हुई। दोनों नेता आखिरी बार साल 2019 में मिले थे तब शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आए थे।
ब्रिक्स जैसे मंच पर दो सबसे बड़े आबादी वाले देशों के नेताओं की मुलाकात हुई और रूस ने इसे दुनिया भर में अपनी रणनीतिक सफलता के रूप में दिखाने की कोशिश की।
कजान में ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा था जब एक तरफ तो यूक्रेन में युद्ध हो रहा है और दूसरी तरफ व्यापार के क्षेत्र में रूस पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती देने में लगा हुआ है।
स्तंभकार सुधींद्र कुलकर्णी ने रूस के कजान में हुई इस ब्रिक्स समिट को इतिहास की सबसे सफल ब्रिक्स समिट बताया है और पुतिन को इसका हीरो।
लेकिन कज़ान में 20 से अधिक नेताओं की मेजबानी करने वाले पुतिन क्या सच में ऐसे साबित हुए हैं?
ब्रिक्स की स्थापना 2006 में ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन ने की थी। साल 2011 में इस गुट में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ था।
यह संगठन दुनिया की 44 फीसदी जनसंख्या और एक तिहाई से अधिक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
पश्चिम को चुनौती देने में कितने सफल पुतिन?
अमेरिका समेत बाकी पश्चिमी देशों ने रूस के खिलाफ कड़े से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं और इन देशों के साथ रूस के संबंध भी नाजुक दौर में हैं।
बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि पिछले साल इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट यानी आईसीसी ने यूक्रेन में कथित युद्धापराधों के मामले में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर दिया था।
लेकिन इस गिरफ्तारी वारंट के बावजूद पुतिन इसी साल सितंबर में इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के सदस्य देश मंगोलिया पहुंचे थे। वारंट जारी होने के बाद किसी भी सदस्य देश की उनकी यह पहली यात्रा थी।
अगर गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है तो आईसीसी सदस्यों से संदिग्धों को हिरासत में लेने की उम्मीद की जाती है लेकिन इसके लिए तय नियम नहीं हैं।
ब्रिक्स में जो घोषणापत्र जारी किया गया है उसमें भी अप्रत्यक्ष तौर पर पश्चिम द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का जि़क्र है।
घोषणापत्र के मुताबिक़, ‘हम विश्व अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति पर अवैध प्रतिबंधों सहित गैर-कानूनी एकतरफा उपायों के बांटने वाले प्रभाव के बारे में गहराई से चिंतित हैं। ये संयुक्त राष्ट्र चार्टर, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली, सतत विकास और पर्यावरण समझौतों को कमजोर करते हैं। वे आर्थिक विकास, ऊर्जा, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर भी नकारात्मक प्रभाव डालते हैं जिससे गरीबी और पर्यावरणीय चुनौतियाँ बढ़ती हैं।’
अजय पटनायक जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफेसर और रूस मामलों के जानकार हैं।
अजय पटनायक कहते हैं, ‘पश्चिम ने जो प्रतिबंध लगाए थे उन्हें कई देश पहले से ही नहीं मानते थे। हां, ब्रिक्स एक आधिकारिक मंच हैं जहां पर सभी देश इस मुद्दे पर रूस के साथ खड़े दिखे। मुझे लगता है कि पहले भी अलग-अलग तरीकों से कई देश रूस का समर्थन कर रहे थे।’
ब्रिक्स में पुतिन ने डॉलर के बजाय स्थानीय करेंसी में लेन-देन पर ज़ोर दिया है और इसका जिक्र ब्रिक्स के घोषणापत्र में भी किया गया है।
घोषणापत्र में लिखा गया, ‘हम लोकल करेंसी में वित्तीय लेनदेन के निरंतर विस्तार में न्यू डेवेलपमेंट बैंक (पूर्व में ब्रिक्स बैंक) की इस पहल का समर्थन करते हैं। हम ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों को यह काम सौंपते हैं कि लोकल करेंसी में भुगतान संबंधी मामलों को महत्व दें और अगले साल वापस हमें रिपोर्ट करें।’
2014 में ब्रिक्स ने न्यू डेवलपमेंट बैंक को शुरू किया था जिसे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का एक विकल्प बताया जाता रहा है।
डॉलर को लेकर पुतिन ने कहा, ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर अभी भी एक महत्वपूर्ण टूल है और इसको राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से मुद्रा में विश्वास कम हो जाता है। हम डॉलर को अस्वीकार नहीं कर रहे हैं या उससे लड़ नहीं रहे हैं, लेकिन अगर वे हमें डॉलर के साथ काम नहीं करने देंगे तो हम अन्य विकल्प तलाशेंगे और हम बिल्कुल यही कर रहे हैं।’
उन्होंने कहा कि रूस और चीन के बीच लगभग 95 फीसदी व्यापार अब रूबल और युआन में होता है।
लेकिन क्या इस रणनीति से पश्चिमी देशों का मुकाबला किया जा सकता है?
स्वस्ति राव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ हैं और मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज से जुड़ी हैं।
स्वस्ति कहती हैं, ‘दुनिया में बड़े देशों का एक समूह है जो रूस के पश्चिम के नहीं बल्कि अपने नजरिए से देखता है। जब वो इस नजरिए से देखता है तो उसे समझ में आता है कि एक ऐसी जगह भी है जहां न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसी जगह है। कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट जैसी व्यवस्था है जिसके तहत विकासशील देशों को वित्तीय मदद देता है। ज़ाहिर हैं ऐसी चीजें अपील करती हैं लोगों को। अगर आप इस लिहाज से देखेंगे तो पाएंगे कि रूस अकेला नहीं है।’
हालांकि लेन-देन और लोकल करेंसी से जुड़ी योजनाओं के बारे में विस्तार से कोई जानकारी नहीं दी गई है।
स्वस्ति कहती हैं, ‘लोकल करेंसी में व्यापार की जो बात है वो स्वागत योग्य है क्योंकि ये आपके आर्थिक संबंधों को सुरक्षित और स्थाई बनाती हैं। लेकिन भारत कभी ब्रिक्स करेंसी जैसी चीज़ का समर्थन नहीं करेगा क्योंकि असल में ये चीन के प्रभुत्व वाली करेंसी होगी।’
पश्चिमी देशों ने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि रूस अलग-थलग पड़ गया है और रूस ने ब्रिक्स के बहाने यह बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि पश्चिम को छोडक़र कई देश उनके साथ हैं।
तुर्की को ब्रिक्स में लाना
कजान में हिस्सा लेने के लिए तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन भी पहुंचे थे। अर्दोआन अपने पश्चिम के पारंपिक सहयोगियों से आगे बढक़र ब्रिक्स देशों से नज़दीकी बनाने में जुटे हैं।
पिछले कुछ समय से वो लगातार ब्रिक्स रूस, चीन और भारत वाले ब्लॉक ब्रिक्स में शामिल होने के लिए दिलचस्पी दिखा चुके हैं। ब्रिक्स ने तुर्की को पार्टनर देश का दर्जा दिया है।
इस साल अगस्त के महीने अर्दोआन के कहा था कि तुर्की सिर्फ पश्चिम के भरोसे नहीं रह सकता है।
उनका कहना था, ‘तुर्की सिर्फ पश्चिमी देशों के सहारे अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकता है। तुर्की तभी एक मज़बूत, समृद्ध और प्रभावशाली देश बन सकता है जब वो पश्चिम और पूर्व के साथ अपने संबंधों को एक साथ आगे बढ़ाए।’
पुतिन ने इस साल तुर्की को ब्रिक्स सम्मेलन के लिए न्योता भेजा और न्योते को स्वीकार करने से पहले सितंबर में अर्दोआन ने आधिकारिक रूप से ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आवेदन किया था।
तुर्की नेटो का सदस्य देश है। नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन। पुतिन नेटो का विरोध करते आए हैं और यही नेटो रूस-यूक्रेन युद्ध की प्रमुख वजहों में से एक है।तुर्की पहला ऐसा नेटो देश है, जो ब्रिक्स में शामिल होना चाहता है। तुर्की के इस कदम के पश्चिम के साथ टकराव के रूप में देखा जा रहा है।
अजय पटनायक इस बारे में कहते हैं, ‘नेटो के सदस्यों पर काफी दबाव है कि रूस के साथ कोई डील न करें और न ही नज़दीकी बढ़ाएं। ऐसे में नेटो सदस्य तुर्की को ब्रिक्स के मंच तक लाना पुतिन के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। हालांकि इससे पहले भी तुर्की और रूस के संबंध बेहतर हो रहे थे। अभी तुर्की को यूरोप के अंदर उस तरह की स्वीकार्यता भी नहीं मिल रही है। तुर्की नाराज है क्योंकि यूरोपीय संघ के मेंबर कई साल से उसकी सदस्यता को टाल रहे हैं और उसने देखा कि भूराजनीति की दृष्टि से भी रूस के नजदीक रहना उसके लिए फायदेमंद है।’
जनवरी 2024 में मिस्र, ईरान, इथियोपिया और यूएई को ब्रिक्स का सदस्य बनाया गया। हालांकि सऊदी अरब को भी शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन अभी हो नहीं पाया है।
सऊदी को भी अगर ब्रिक्स देशों में शामिल कर लिया जाए तो यह संगठन दुनिया भर में कच्चे तेल का कुल 44 फीसदी उत्पादन करता है।
तुर्की को लेकर स्वस्ति राव कहती हैं, ‘तुर्की ब्रिक्स के करीब आ रहा है लेकिन अर्दोआन कभी भी नेटो को नहीं छोड़ेंगे। लेकिन तुर्की के पास यूरोपीय संघ की सदस्यता नहीं है इसलिए वो ब्रिक्स में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। तुर्की के अलावा कई और मध्य पूर्व के देश हैं जो ब्रिक्स के साथ जुडऩा चाहते हैं क्योंकि ब्रिक्स बार-बार कहता है कि तेल व्यापार में हम एक अलग की व्यवस्था शुरू कर रहे हैं। ब्रिक्स की ये बातें इन देशों के हित में हैं।’
मोदी-शी की मुलाकात पुतिन की कामयाबी?
आधे दशक बाद पीएम मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कोई द्विपक्षीय बातचीत हुई। भारत की इस मुलाकात की घोषणा ब्रिक्स समिट से ठीक पहले की थी और पट्रोलिंग को लेकर जारी विवाद पर समझौते की बात कही थी। इसके अगले ही दिन चीन ने भी मुलाकात की पुष्टि की थी।
इस मुलाकात को पुतिन की कामयाबी बताया जा रहा है और इसे पुतिन के लिए एक बड़े मौके के रूप में देखा गया। कहा गया कि पुतिन पश्चिम को दिखाना चाहते हैं कि जो पश्चिमी देश पांच सालों में नहीं कर पाए वो उन्होंने कर दिखाया।
बातचीत में दोनों ही नेताओं ने ‘सीमा पर शांति’ बनाए रखने की प्राथमिकता को रेखांकित किया और ‘आपसी विश्वास, ‘आपसी सम्मान’ और ‘आपसी संवेदनशीलता’ को रिश्तों की बुनियाद बताया।’
शी जिनपिंग ने और अधिक ‘आपसी संवाद और सहयोग’ पर जोर देते हुए कहा, ‘दोनों देशों के लोग और अंतरराष्ट्रीय जगत हमारी मुलाकात को बहुत ग़ौर से देख रहा है।’
क्या मोदी और शी जिनपिंग के बीच हुई इस मुलाकात को पुतिन की कामयाबी माना जाना चाहिए?
स्वस्ति राव के मुताबिक मोदी और शी की मुलाकात के कई पहलू हैं।
वह कहती हैं कि स्वाभाविक तौर पर पुतिन इस मुलाकात का क्रेडिट लेंगे क्योंकि वह ग्लोबल साउथ को पश्चिमी देशों के बरअक्श रखना चाहते हैं। लेकिन भारत की शी जिनपिंग से मुलाकात और ब्रिक्स में रहने की अपनी वजहें हैं क्योंकि भारत अपने विकल्प खुले रखना चाहता है।
अजय पटनायक कहते हैं कि मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि रूस बतौर माध्यम और ब्रिक्स वो जगह हैं जहां से भारत-चीन के संबंध सुधर सकते हैं।
पटनायक कहते हैं, ‘रूस जैसी शक्ति की जरूरत थी जो दोनों को एक साथ फोरम पर लाए और बातचीत के जरिए हल निकालने को कहे। इसमें रूस की भूमिका है और वो पृष्ठभूमि में रहा है। खुलकर तो कोई नहीं कहेगा कि रूस की भूमिका है लेकिन निश्चित रूप से इसमें रूस की भूमिका है।’
यूक्रेन के मुद्दे पर क्या कहा गया?
जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ब्रिक्स के निमंत्रण को स्वीकार किया था तब यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने उनकी कड़ी आलोचना करते हुए इसे उनका ‘गलत चुनाव’ बताया था। हालांकि गुटेरेस की तरफ से इस पर अब तक कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
ब्रिक्स के 43 पन्नों वाले घोषणापत्र में सिफऱ् एक बार ‘यूक्रेन’ शब्द लिखा गया है।
घोषणापत्र में 134 प्वाइंट हैं और इसके 36वें प्वाइंट में लिखा है, ‘हम यूक्रेन और उसके आस-पास की स्थिति को लेकर अलग-अलग देशों के रुख़ को याद करते हैं जिसे यूएनएसी और यूएनजीए सहित उपयुक्त मंचों पर बताया गया है। हम इस बात पर जोर देते हैं कि सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों पर लगातार कार्य करना चाहिए। हम बातचीत और कूटनीति के जरिए इस संघर्ष के शांति समाधान के लिए मध्यस्थता और अच्छे प्रयासों की सराहना करते हैं।’
स्वस्ति राव ब्रिक्स की इस घोषणा को रूस के लिए एक बड़ा सैटबेक मानती हैं। वो कहती हैं, ‘पूरा पश्चिम यूएन चार्टर के तहत रूस-यूक्रेन युद्ध को अवैध बताता है और ऐसे में अगर घोषणापत्र में यूएन चार्टर की बात की जा रही है तो आप इसे क्या कहेंगे? अगर ब्रिक्स भी यूएन चार्टर को मानने की बात कह रहा है तो यह रूस के लिए सोचने वाली बात है कि फिर युद्ध किया ही क्यों?। पश्चिमी देश तो इस बात से ख़ुश होंगे कि भारत ने उनकी बातचीत वाली भाषा का इस्तेमाल करवाया है।’
बुधवार को कीएव में यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि रूस ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में यूक्रेन पर अपने आक्रमण के लिए समर्थन हासिल करने में विफल रहा है।
यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा अपने बयान में कहा -
*यह घोषणापत्र दिखाता है कि ब्रिक्स का एक संगठन के तौर पर यूक्रेन के खिलाफ रूस के आक्रामक अभियान पर कोई एक रुख़ नहीं है।
*हमारा मानना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि इन देशों में से अधिकतर यूएन चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन करते हैं, जिसका जिक्र घोषणापत्र में भी किया गया है।
*ब्रिक्स सम्मेलन, जिसके जरिये रूस की योजना दुनिया को बांटने की थी, उस सम्मेलन से फिर दिखाया है कि दुनिया का अधिकतर हिस्सा यूक्रेन के उस इरादे के साथ खड़ा है, जिसके तहत वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों और यूएन चार्टर के तहत न्याय और स्थायी शांति चाहता है।
* इसमें अंतरराष्ट्रीय मान्यता पात्र सीमाओं के अधीन अपनी क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने का सिद्धांत भी शामिल है।
दिलचस्प यह है कि एक ओर ब्रिक्स चल रहा था तो ठीक उसी समय अमेरिका ने यूक्रेन को वित्तीय मदद देने का एलान किया। (bbc.com/hindi)
-उमंग पोद्दार
अगर आप ये लेख पढ़ रहे हैं, तो बहुत संभव है कि आप विकिपीडिया से वाकिफ होंगे। मामूली से लेकर गंभीर विषयों के बारे में जानने के लिए कई लोगों का पहला ठिकाना विकिपीडिया होता है। पर हाल के कुछ दिनों से विकिपीडिया दिल्ली हाई कोर्ट में दायर एक केस के कारण सुर्खियों में है। समाचार एजेंसी एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल यानी एएनआई ने विकिपीडिया के खिलाफ मानहानि का एक केस दायर किया है।
एएनआई के विकिपीडिया पेज पर ये लिखा है कि ये समाचार एजेंसी गलत सूचना रिपोर्ट करती है। लेकिन एएनआई ने इसका खंडन किया है। इस बीच एक सवाल जो कई बार उठ रहा है कि आखिर विकिपीडिया काम कैसे करता है? इनके लिए कौन लोग लेख लिखते हैं? इसे चलाता कौन है?
विकिपीडिया क्या है?
विकिपीडिया 2001 से दुनिया भर में एक मुफ़्त ओपन सोर्स के तौर पर जाना जाता है, जिसे आप ऑनलाइन विश्वकोश कह सकते हैं।
इसे गैर लाभकारी संस्था विकिमीडिया फाउंडेशन चलाती है। एएनआई ने विकिमीडिया फाउंडेशन के खिलाफ केस दर्ज कराया है।
ये दुनिया की सबसे प्रसिद्ध वेबसाइट्स में से एक है। इस पर मौजूदा समय में छह करोड़ से ज़्यादा लेख हैं और हर महीने इसे करीब 10 खऱब से ज़्यादा पेज व्यू मिलते हैं।
सवाल है कि क्या कोई भी विकिपीडिया में लिख सकता है?
इसका जवाब है हां। विकिपीडिया में कोई नई एंट्री डालने या पहले से मौजूद एंट्री में कुछ जोडऩे या बदलने की इजाज़त सबको है। इसलिए यह ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिसका नियंत्रण किसी एक या कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं है।
मौजूदा समय में कऱीब तीन लाख वॉलंटियर हैं जो विकिपीडिया के लिए लेख लिखते हैं और उस पर मौजूद कंटेंट की प्रामाणिकता को परखते हैं। कोई भी ऐसा कर सकता है और वेबसाइट पर काम के मुताबिक़ उन्हें अलग-अलग भूमिकाएँ दी जाती है।
विकिमीडिया फाउंडेशन का कहना है कि ये लोग अपनी मर्जी से काम करते हैं और इसके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं होता है।
ये वॉलंटियर अपनी पहचान गोपनीय रख सकते हैं। विकिमीडिया फाउंडेशन का ये कहना कि किस पेज पर क्या लिखा जा रहा, इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता है। हालांकि उनका ये भी कहना है कि इसका ये मतलब नहीं कि कोई इस पर कुछ भी लिख सकता है।
वेबसाइट पर क्या छप सकता है, इसको लेकर कई पॉलिसी और गाइडलाइन हैं।
जैसे, विकिपीडिया पर कोई नई जानकारी नहीं लिखी जा सकती, जो आजतक कहीं छपी नहीं है। सिर्फ वही लिखा जा सकता है जिसमें कोई छपा हुआ भरोसेमंद स्रोत दिया जा सके।
जो कंटेंट छपता है, उसकी निगरानी और तथ्यों की जाँच संपादक, एडमिनिस्ट्रेटर और कंप्यूटर बॉट से किया जाता है। सीनियर एडिटर किसी लेख या उसके कुछ हिस्से को संपादन कर हटा भी सकते हैं।
लेख या संपादन पर विवाद होने पर वॉलंटियर अपना पक्ष रखते हैं, चर्चा करते हैं और आपसी सहमति के बाद उसे प्रकाशित किया जाता है।
ये वाद-विवाद भी विकिपीडिया के पेज पर सबके देखने के लिए उपलब्ध होता है। अगर किसी लेख पर कुछ विवाद है तो उसके समाधान के लिए भी अलग-अलग प्रक्रियाएं है।
तो क्या इस पर ग़लत
जानकारी भी हो सकती है?
लिखने-पढऩे की दुनिया में लोग आपस में कहते हैं कि आप विकिपीडिया से जानकारी लें पर इसे विश्वसनीय स्रोत के तौर पर नहीं देख सकते हैं।
विकिपीडिया ख़ुद यह कहता है कि इसे प्राथमिक स्रोत के आधार पर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। विकिपीडिया पर मौजूद लेख में ग़लतियाँ मिल सकती हैं।
हर विकिपीडिया के लेख के नीचे कई संबंधित स्रोत की लिस्ट होती है और उनके आधार पर ही लेख लिखे होते हैं, यानी उस सूची से आप जानकारियों की पुष्टि कर सकते है।
अगर किसी लेख पर बहुत ज़्यादा बदलाव हो रहे हों या फिर उन बदलावों को लेकर विवाद हो रहा है तो संपादन पर कुछ अंतरिम समय तक रोक भी लगाई जाती ।
विकिपीडिया की विश्वसनीयता पर कई विशेषज्ञ अलग-अलग सवाल उठाते आए हैं। मीडिया एक्सपर्ट एमी ब्रकमैन अमेरिकी जॉर्जिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हैं।
वह कहती हैं कि हो सकता है कि कोई कम चर्चित विकिपीडिया लेख बिल्कुल विश्वसनीय ना हो, लेकिन एक चर्चित टॉपिक पर विकिपीडिया लेख ‘सबसे विश्वसनीय जानकारी’ का रूप हो सकता है।
वो कहती हैं कि किसी जर्नल में प्रकाशित लेख को कुछ ही विशेषज्ञ देखते हैं और उसके बाद उसमें कोई बदलाव नहीं होता है।
उन्होंने बताया, ‘लेकिन एक लोकप्रिय विकिपीडिया लेख की समीक्षा हजारों लोगों द्वारा की जा सकती है।’
विकिपीडिया पर पक्षपात के भी आरोप लगाए गए हैं। विकिपीडिया की एक आलोचना ये रही है कि इस पर ज़्यादा पुरुष लेख लिखते हैं और इसके कारण वेबसाइट पर पुरुषों पर बहुत अधिक लेख हैं।
एक कंजर्वेटिव थिंक टैंक ‘मैनहट्टन इंस्टीट्यूट’ ने अपनी रिसर्च में पाया है कि अमेरिका में दक्षिणपंथी सार्वजनिक हस्तियों को विकिपीडिया पर अधिक नकारात्मक तौर पर दिखाने की प्रवृति रही है। हालांकि उन्होंने यह माना है कि विकिपीडिया एक अहम सार्वजनिक संसाधन है।
इसे चलाने के लिए पैसे कहां से आते हैं?
अगर आपने विकिपीडिया पर कुछ पढ़ा है तो ये देखा होगा उनकी वेबसाइट की शुरुआत में ही चंदा देने की अपील होती है। विकिपीडिया का ख़र्च चंदे से ही चलता है। 2022-23 में विकिमीडिया फाउंडेशन को 18 करोड़ डॉलर से ज़्यादा चंदा मिला था, ये भारतीय रुपये के हिसाब से कऱीब 1,513 करोड़ रुपये था।
विकिपीडिया विज्ञापन नहीं छापता और उनका कहना है कि वो यूजर डेटा के इस्तेमाल से पैसे भी नहीं कमाते। इस तरह की कमाई कई वेबसाइट्स करती हैं। वैसे विकिपीडिया कई देशों में विवाद में घिरा रहा है। कम से कम 13 देशों में विकिपीडिया पर अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं।
चीन, म्यांमार और उत्तर कोरिया ने विकिपीडिया पर पूरा प्रतिबंध लगाया हुआ है। वहीं, रूस और ईरान ने विकिपीडिया के कुछ लेखों पर प्रतिबंध लगाया है।
पाकिस्तान ने 2023 में विकिपीडिया पर तीन दिनों की रोक लगा दी थी, ये कहते हुए कि विकिपीडिया पर कुछ लेखों से देश के मुसलमानों को ठेस पहुँची है।
एएनआई के केस में दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज ने विकिपीडिया को कहा था कि उन्हें भारत में क़ानून का पालन करना होगा, वरना वह भारत में विकिपीडिया पर पाबंदी लगाने का आदेश देंगे।
भारत में भी विकिपीडिया विवाद में रहा है। ्रहृढ्ढ द्वारा दर्ज मानहानि केस के बारे में भी एक विकिपीडिया पेज था।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट की 2 जजों की पीठ का मानना था कि ये कोर्ट की प्रक्रिया में दखल डाल रहा था, और उन्होंने इसे हटाने का आदेश दिया।
21 अक्टूबर को ये पेज विकिपीडिया ने हटा दिया। कुछ जानकारों का मानना है कि ये पहली बार हुआ कि अंग्रेजी विकिपीडिया पर कोई कोर्ट के आदेश के बाद एक पूरा पेज हटाया गया है। (bbc.com/hindi)
-दिनेश श्रीनेत
लेखक होना अलग है, लिक्खाड़ होना अलग। हर कोई इसलिए लेखक नहीं हो जाता कि उसने कुछ किताबें लिख दी हैं। हम किसी को इसलिए नहीं पढ़ते कि उसने बहुत सारा लिख दिया है। खराब लेखक ही संख्या का आतंक पैदा करते हैं। मसलन हमारी अब तक 20 किताबें आ चुकी हैं। अवार्ड का आतंक दिखाते हैं, हमें फलां-फलां-फलां स्मृति सम्मान मिल चुका है। वे मंचों पर माइक पकडक़र बैठ जाते हैं। वे किताबें पकडक़र तस्वीर खिंचवाते हैं। ऐसी मुद्रा अपनाते हैं, ऐसी पोशाक पहनते हैं कि उन्हें देखते लगे कि वे रचनाकार हैं। विचारधारा की लाठी कंधे पर लेकर विजय मुद्रा में तनकर चलते हैं।
यानी बेहतर रचना लिखने के अतिरिक्त हर वह प्रयास करते हैं, जिससे उनको रचनाकार मान लिया जाए।
जबकि हम किसी को इसलिए नहीं पढ़ते कि वह बहुत सारे विषयों पर कलम चला सकता है। किस्सागोई तो एक हुनर है। लेखनी सिर्फ एक माध्यम है, अपने विचारों को दूसरों तक ले जाने का। उन तक ले जाने का जिन्हें हम जानते भी नहीं। अपनी भौतिक सीमाओं के परे, अपने शहर से परे, अपने देश से परे ले जाने का एक जरिया है लेखन।
लिखना इसलिए जरूरी है क्योंकि अभी कही गई बात नष्ट हो जाएगी।
लिखी बात समय की सीमाओं को तोड़ते-फोड़ते समय की रेल के साथ भागेगी। खुद के एकांत में जो लिखा-रचा गया है, वह अचानक किसी और के एकांत का हिस्सा बन जाएगा। खुद के सपने किसी और की आँखों में उसके सपनों की शक्ल में उतर आएंगे। लिखना इसीलिए जरूरी है क्योंकि हमारे पास कहने के लिए कोई बात है। और उतना ही सच यह भी है कि हमारे पास एक जीवन में कहने के लिए बहुत सारी बातें नहीं हैं।
अच्छे लेखन में विस्तार नहीं गहराई होती है। जैसे पत्ते पर टिकी पानी की एक बूंद में इंद्रधनुष समा जाता है। हम किसी का लिखा इसीलिए पढ़ते हैं कि उसके पास कहने के लिए कोई अलग बात होती है। यह अलग बात ही उसे 'लेखक' बनाती है। नहीं तो लिखते तो बहुत से लोग हैं। एक खबरनवीस रोज हजारों शब्द लिखता है, लेकिन वो तात्कालिक होता है और भुला दिया जाता है।
जो बात भूलने के विरुद्ध खड़ी हो, वही लेखनी है।
एक लेखक की अपनी विकास यात्रा होती है। उसके पास दुनिया भर के विषय नहीं होते हैं। वह बिना पेंदी के लोटे की तरह इधर से उधर लुढक़ता नहीं रहता है। यदि वह स्वयं को ख़ारिज भी करता है तो उसकी भी तार्किक कडिय़ां होती हैं। एक अच्छा लेखक अंतत: चुक भी जाता है। बेहतर लेखक-मनुष्य ज्यादा होता है, लेखक कम। जबकि खराब लेखक-ज्यादा लेखक होता है, मनुष्य कम। ज्यादा गंभीरता ओढ़े हुए लोगों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध होती है।
अपने ही महिमामंडन और अहंकार के बोझ से दबे हुए लोगों के पास दूसरों को कुछ देने के लिए नहीं होता। उनके भीतर कोई बेचैनी या तलाश नहीं होती। लेखक अपने अकेलेपन में खुद पर हँस सकता है और आपके साथ भी। उसके पास अपने सत्य पर यकीन करने और उसके पीछे-पीछे चलने के सिवा कोई चारा नहीं होता। वह कोई एक राह पकडक़र इसी उम्मीद में चलता जाता है कि उसे अपनी मंजि़ल एक दिन मिल ही जाएगी।
उसका यह भोला मगर अटूट विश्वास ही दरअसल उसे एक पाठक के लिए खास बनाता है। उनसे जोड़ता है। यदि उसे अपनी मंजिल मिल ही जाए तो वह लेखक कहां रह जाएगा, दार्शनिक, समाजसुधारक राजनेता बन जाएगा। हर लेखक अपने कुछ स्वप्नों का पीछा करने में सारी जि़ंदगी गुजार देता है। हम हर बार जब किताब उठाते हैं तो हम भी धुंध में लेखक की परछाईं के पीछे-पीछे भागते हैं। उसकी धडक़न हमारी धडक़न बन जाती है। उसकी उम्मीद हमारी उम्मीद।
इसलिए लेखक होना अलग है, बहुत अलग। (फेसबुक)
-सीटू तिवारी
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बिहार में 18-22 अक्तूबर के बीच ‘हिंदू स्वाभिमान यात्रा’ की।
इस यात्रा से जहां बीजेपी की प्रदेश इकाई ने किनारा कर लिया, वहीं राज्य में बीजेपी के साथ सत्ता में शामिल पार्टी जेडीयू भी इससे असहज दिखी।
गिरिराज सिंह ने ये यात्रा राज्य के भागलपुर, किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया में की। इन जि़लों को सीमांचल का इलाका कहा जाता है।
केंद्रीय मंत्री ने अपनी इस यात्रा के दौरान 19 अक्तूबर को कटिहार में ‘लव, थूक और लैंड जिहाद’ की बात कहने के साथ ही सीमांचल में ‘रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठ’ का मुद्दा उठाया।
बिहार में पिछले कुछ समय से कई राजनीतिक यात्राएं चर्चा में रही हैं। चाहे वो नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की संवाद यात्रा हो, या हाल ही में अपनी पार्टी लॉन्च करने वाले प्रशांत किशोर की पदयात्रा हो।
फिलहाल वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी की निषाद संकल्प यात्रा, भाकपा माले की न्याय यात्रा चल ही रही है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा गिरिराज सिंह की हिंदू स्वाभिमान यात्रा और इस दौरान आए बयानों की है।
गिरिराज सिंह की इस यात्रा पर राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी से लेकर सत्ताधारी पार्टी और बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने भी सवाल उठाए हैं।
जेडीयू ने जहां इस यात्रा को ‘गैऱ जरूरी’ बताया, वहीं तेजस्वी यादव ने यात्रा ने पहले चेतावनी दी थी, ‘अगर इस यात्रा से नफरत फैली तो आरजेडी चुप नही बैठेगी।’
आलम ये रहा कि इस सियासी उबाल में बीजेपी ने भी गिरिराज सिंह की इस यात्रा से किनारा कर लिया। आखिर ये यात्रा महत्वपूर्ण क्यों बन गई थी, इस सवाल का जवाब यात्रा के रूट चार्ट में है।
यात्रा वाले इलाके की डेमोग्राफी
दरअसल गिरिराज सिंह की यात्रा जिन जिलों से गुजरी, वो मुस्लिम आबादी के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
किशनगंज में 68 फीसदी, कटिहार में 45, अररिया में 43, पूर्णिया में 38 और भागलपुर में 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है।
बिहार की सियासत पर नजऱ रखने वाले गिरिराज सिंह की इस यात्रा को राज्य में एक नए ट्रेंड के तौर पर देखते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष कहते है, ‘राज्य में हिंदू, मुसलमान या धर्म के नाम पर किसी पॉलिटिकल पार्टी या केन्द्रीय मंत्री के यात्रा निकालने का हाल के दशकों में कोई इतिहास नहीं मिलता।’
सीमांचल के चार जि़लों में 24 विधानसभा क्षेत्र हैं। अगर इसमें भागलपुर के 7 विधानसभा क्षेत्रों को भी जोड़ दें तो गिरिराज सिंह ने अपनी यात्रा के जरिए 31 विधानसभा क्षेत्रों को प्रभावित करने की कोशिश की है।
मुस्लिम आबादी के लिहाज से महत्वपूर्ण सीमांचल के अलावा भागलपुर भी गिरिराज सिंह की इस यात्रा का हिस्सा है। भागलपुर में साल 1989 में सांप्रदायिक दंगा हुआ था।
बीजेपी ने कर लिया था यात्रा से किनारा
बिहार बीजेपी ने पहले ही इस यात्रा से खुद को किनारे कर लिया था।
प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर कहा, ‘ना नफरत के नाम पर, ना सियासत के नाम पर, एनडीए चुनाव लड़ेगी मोहब्बत के नाम पर।’
दिलीप जायसवाल ने कहा कि पार्टी के बैनर के तहत ये यात्रा नहीं हो रही है, इसलिए वो इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।
लेकिन क्या ये संभव है कि कोई केन्द्रीय मंत्री बिना केन्द्रीय नेतृत्व की सहमति से यात्रा निकाले?
दैनिक अख़बार राजस्थान पत्रिका में बिहार के ब्यूरो चीफ रहे प्रियरंजन भारती कहते हैं, ‘पार्टी बेशक आधिकारिक तौर पर घोषणा नहीं कर रही लेकिन ये एजेंडा तो बीजेपी और आरएसएस का ही है।’
उन्होंने कहा, ‘यात्रा का टार्गेट हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करना है, लेकिन ये बहुत मुश्किल है क्योंकि हिंदू समाज जातियों में बंटा है और उसका वोटिंग पैटर्न भी इससे प्रभावित होता है।’
वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष भी गिरिराज सिंह की हिंदू स्वाभिमान यात्रा को बीजेपी का ‘प्लान बी’ बताते हैं।
वो कहते हैं, ‘बिना केन्द्रीय नेतृत्व की मंजूरी के ऐसी यात्राएं नहीं की जा सकती। ये बीजेपी का प्लान बी है, जिस पर पार्टी काम कर रही है।’
हालांकि। वरिष्ठ पत्रकार फ़ैज़ान अहमद इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते हैं। वो कहते हैं, ‘मुझको नहीं लगता कि वो पार्टी के लिए यात्रा निकाल रहे हैं। सीमांचल में पार्टी अच्छी स्थिति में है। गिरिराज जो कर रहे है, वो अपने लिए कर रहे हैं।’
‘हिंदूवादी छवि को मजबूत करने की कवायद’
पत्रकार फैजान अहमद के मुताबिक, गिरिराज सिंह का यात्रा के पीछे ‘व्यक्तिगत मकसद’ है।
फ़ैज़ान अहमद कहते हैं, ‘बिहार में बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं है, ऐसे में गिरिराज सिंह खुद को लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। आप देखिए कि सुशील मोदी के बाद पार्टी ने जो डिप्टी सीएम दिए भी, उनकी कोई पॉलिटिकल स्टैंडिंग नहीं है।’
वो कहते हैं, ‘गिरिराज सिंह की अपनी छवि हिंदू फायर ब्रांड नेता की रही है। लेकिन पार्टी में हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं के उभार के बाद गिरिराज को अपनी उस छवि को बनाए रखने का संघर्ष पार्टी के भीतर ही करना पड़ रहा है। यानी उनके अपने लिहाज़ से भी ये यात्रा महत्वपूर्ण है।’
पत्रकार प्रियरंजन भारती भी कहते हैं, ‘हाल के दिनों में गिरिराज सिंह बाकी के फायरब्रांड नेताओं के मुकाबले खुद को बैकफुट पर महसूस कर रहे है। इस यात्रा के ज़रिए वो खुद को आक्रामक तरीके से प्रोजेक्ट करना चाहते हैं।’
इस बीच गिरिराज सिंह कई मौकों पर अपने साथ त्रिशूल लिए दिखे हैं।
अररिया में गिरिराज सिंह ने कहा भी, ‘त्रिशूल की पूजा महादेव (शिव) के तौर पर करें और ज़रूरत पडऩे पर इसका इस्तेमाल भी करें।’
गैर जरूरी यात्रा-जेडीयू
गिरिराज सिंह के हिंदू स्वाभिमान यात्रा की घोषणा के बाद से ही जेडीयू इसके प्रति असहज है।
ये जेडीयू के नेतृत्व में चल रही सरकार के एजेंडें ‘सबका साथ– सबका विकास’ के नारे में फिट बैठती नहीं दिखती।
जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन बीबीसी से कहते हैं, ‘हमारी पार्टी के मुताबिक ये ग़ैर ज़रूरी यात्रा है और बीजेपी भी इसे निजी और व्यक्तिगत यात्रा बता चुकी है।’
उन्होंने कहा, ‘वैसी स्थिति में आप कोई भी कार्यक्रम करते हैं तो ये आपका निजी कार्यक्रम है। बिहार में हिंदू हो या मुसलमान, नीतीश कुमार की अगुआई में सभी सुरक्षित हैं।’
हालांकि, इस यात्रा के दौरान कई विवादित बयान सामने आए हैं।
इस यात्रा के दौरान अररिया के बीजेपी सांसद प्रदीप सिंह ने कहा, ‘अररिया में रहना है तो हिंदू बनना पड़ेगा।’
इस पर जेडीयू एमएलसी नीरज कुमार सांसद प्रदीप सिंह के बयान को तो आड़े हाथों लेते हैं, लेकिन बिहार बीजेपी का बचाव करते हैं।
वो कहते है, ‘हिंदुस्तान के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत संसद है। जहां सांसद जाति, धर्म से ऊपर उठकर काम करने की शपथ लेते हैं। अच्छा होता कि प्रदीप सिंह कहते कि लोगों को डॉ। आंबेडकर के दिए संविधान को मानना होगा।’
उन्होंने कहा, ‘इसी तरह के बयानों के कारण ही बीजेपी प्रदेश ईकाई ने इस यात्रा से खुद को अलग कर लिया है।’
क्या चुनावी राजनीति पर होगा असर?
इस यात्रा में कई जगह गिरिराज सिंह इलाके के मुस्लिम विधायकों पर निशाना साधते दिखे।
जैसे उन्होंने पूर्णिया में अपनी सभा को संबोधित करते हुए कहा,‘ बायसी और अमौर में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए। अब कसबा की बारी है।’
पूर्णिया में 7 विधानसभा सीट हैं, जिनमें से तीन सीट यानी बायसी, अमौर और कसबा के विधायक मुस्लिम हैं। अमौर में अख्तरूल ईमान, बायसी से सैयद रूकनुद्दीन और कसबा से आफक़े आलम।
एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष और अमौर से विधायक अख्तरूल ईमान, गिरिराज सिंह के हिंदुओं के अल्पसंख्यक हो जाने के दावे को ‘उन्मादी जुमला’ बताते हैं।
वो कहते हैं, ‘कोचाधामन और अमौर दो ऐसी सीट हैं, जहां 74 फीसदी मुसलमान और 24 फ़ीसदी हिंदू आबादी है। एक दो बार ही ऐसा मौका आया कि जब यहां से हिंदू विधायक रहे।’
उन्होंने कहा, ‘गिरिराज सिंह उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि एक संवैधानिक पद पर बैठे आदमी धर्म विशेष और जाति की राजनीति कैसे कर सकता है। भागलपुर सिल्क सिटी है, उसके लिए कपड़ा मंत्री रहते उन्होंने क्या किया?’
प्रियरंजन भारती कहते है, ‘चुनावों पर क्या असर पड़ेगा, इसके लिए तो इंतज़ार करना होगा। लेकिन जेडीयू बीजेपी के रिश्तों में इससे तल्खी आएगी, ऐसा लगता नहीं है।’
बिहार में विधानसभा चुनाव साल 2025 में होने है।
देखना दिलचस्प होगा कि पक्ष और विपक्ष में बहुमत हासिल करने को लेकर और सत्ता पक्ष यानी जेडीयू और बीजेपी के भीतर भी खुद के ‘पॉलिटिकल स्पेस’ बढ़ाने को लेकर कौन कौन से राजनीतिक करतब भविष्य के गर्भ में है। ((bbc.com/hindi)
- द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
किसी व्यक्ति के विषय में उसकी गैरहाजिरी में आलोचना करना हम सबको बहुत पसंद है। इसका आनंद अवर्णनीय है। घंटों बीत जाएं, बातों से बातें खुलती जाएँगी और हम सब मिलकर ऐसे रसमय संसार की रचना कर लेते हैं जिसकी कल्पना रसों के उद्घाटक आचार्य भरत मुनि ने भी नहीं की थी। इसे निंदा रस कहते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार अपना व्यवहार निश्चित करता है। यह जरूरी नहीं कि उसका तरीका सबको पसंद आए। फिर, उस पर टीका-टिप्पणी शुरू होती है। उचित-अनुचित पर तर्क दिए जाते हैं और बहस आरम्भ हो जाती है। वार्तालाप का एक ऐसा निरर्थक सिलसिला शुरू हो जाता है जिससे किसी को कुछ भी हासिल नहीं होता।
यदि किसी के सामने उसकी आलोचना करने का साहस न हो, या रिश्तों के बिगडऩे की बाधा न हो तो अपने मन का गुबार निकालने का यह एक मात्र तरीका है। वैसे, निंदा करने से दो फायदे होते हैं, प्रथम, इस प्रकार कुछ कह-सुन लेने से मन हल्का हो जाता है और द्वितीय, यह अत्यंत रोचक ‘टाइम पास’ खेल है इसलिए जिनके पास फुर्सत है, वे इसके निपुण खिलाड़ी होते हैं और जो व्यस्त हैं, वे कम शब्दों में कुछ कहकर या धीरे से मुस्कुरा कर इसका सुख प्राप्त कर लेते हैं।
हम सब निंदा करने में बहुत आगे रहते हैं लेकिन हम खुद इसे सहन नहीं कर पाते। किसी ‘भेदिये’ से अपने विषय में हो रही निंदा की जानकारी मिलते ही हमारे चेहरे की रंगत बदलने लगती है, कान गर्म होने लगते हैं और हमारे दिमाग में दूषित बातें जन्म लेने लगती हैं। कई बार हम अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने लगते हैं। हमारी यह सोच न्यायोचित नहीं है।
कड़वाहट की तजऱ् पर आमने-सामने की आलोचना किसी का भी ह्रदय भेदती है और उसे जिद्दी बनाती है। यदि किसी समूह में किसी व्यक्ति की निंदा हो रही हो तो उसे रोकें और लोगों को प्रेरित करें कि भूलों की चर्चा केवल भूल करने वाले के सामने की जाएं। किसी के पीठ-पीछे उसकी आलोचना करने से होने वाली हानियाँ अत्यंत घातक होती हैं। किसी की गलतियां आमने-सामने भी बताई जा सकती हैं। सबसे पहले उसके अच्छे कार्यों की प्रशंसा करें, फिर धीरे से ‘शुगर कोटेड’ कैप्सूल की तरह उसकी भूलों की ओर इशारा करें। ध्यान रहे, किसी को भी दोषी ठहराने का हक आपको नहीं है। इस प्रकार उसकी गलतियों को सुधार का अवसर देकर हम उसके कार्यों तथा व्यवहार को सही दिशा दे सकते हैं। इससे हमारे सम्बन्ध और अधिक मधुर एवं प्रगाढ़ होते हैं।
निंदा रस में रस लेने वालों के लिए यह सुझाव है कि निंदा में रस लेना मानव व्यवहार के अनुरूप नहीं है। काना-फूसी और चरित्रहरण का काम घटिया लोग करते हैं इसलिए इससे बचें और आलोचना करने के लिए सकारात्मक तरीका अपनाएं।
-अंशुल सिंह
हरियाणा में बीजेपी की सरकार ने अनुसूचित जाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण वाले फैसले को लागू करने का निर्णय लिया है। ऐसा करने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य बन गया है।
17 अक्टूबर को नायब सिंह सैनी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और शपथ ग्रहण के अगले दिन 18 अक्टूबर को सीएम सैनी ने कैबिनेट की बैठक में यह फ़ैसला लिया।
कैबिनेट के इस फैसले के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्रेस कॉन्फ्ऱेंस की और कहा कि हमारी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान किया है।
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने हरियाणा सरकार के इस फैसले को दलितों को आपस में लड़ाने का षडय़ंत्र करार देते हुए इसे दलित विरोधी बताया है।
फैसले से किन जातियों को लाभ मिलेगा?
इसी साल अगस्त के महीने में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद चुनाव से पहले अनुसूचित जाति में उप-वर्गीकरण की बात उठी थी।
तब नायब सिंह सैनी के कहा था कि राज्य मंत्रिमंडल ने हरियाणा अनुसूचित आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है।
उन्होंने कहा था, ‘राज्य में अनुसूचित जातियों के लिए सरकारी नौकियों में 20 फीसदी कोटा आरक्षित किया जाएगा। आयोग की सिफारिश के हिसाब से इस कोटे का आधा (50 फीसदी) और कुल कोटे में 10 फ़ीसदी वंचित अनुसूचित जातियों को दिया जाएगा।’
हरियाणा में आधिकारिक रूप से कुल 36 जातियां ‘वंचित अनुसूचित जातियों’ की लिस्ट में शामिल हैं।
ये जातियां हैं: अद धर्मी, वाल्मीकि, बंगाली, बरार, बटवाल, बोरिया, बाजीगर, बंजारा, चनल, दागी, दरेन, देहा, धानक, धोगरी, डुमना, गगरा, गंधीला, जुलाहा, खटीक, कोरी, मरीजा, मजहबी, मेघ, नट, ओड, पासी, पेरना, फरेरा, संहाई, संहाल, सांसी, संसोई, सपेला, सरेरा, सिक्लीगर और सिरकीबंद।
हरियाणा में वंचित अनुसूचित जातियों की स्थिति
राज्य में वंचित अनुसूचित जातियों के लिए अनुसूचित जातियों के आरक्षण के भीतर आरक्षण देना लंबे समय से एक मुद्दा रहा है।
बीजेपी ने 2014 और 2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्र में भी इन जातियों को आरक्षण देने का वादा किया था।
2011 की जनगणना के मुताबक़ि, राज्य की कुल आबादी 2.5 करोड़ से ऊपर है और इसमें करीब 27.5 लाख की हिस्सेदारी वंचित अनुसूचित जातियों की है।
राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, ग्रुप-ए, ग्रुप-बी और क्रुप-सी में इन जातियों से आने वाले लोगों की हिस्सेदारी क्रमश: 4.5 फीसदी, 4.14 फीसदी और 6.27 फीसदी है।
वहीं राज्य में दूसरी अनुसूचित जातियों की जनसंख्या भी 27.5 लाख के आसपास है लेकिन इनकी हिस्सेदारी ग्रुप-ए, ग्रुप बी और ग्रुप सी में क्रमश: 11 फीसदी, 11.31 फीसदी और 11.8 फीसदी है।
2011 की जनगणना के डेटा से पता चलता है कि वंचित अनुसूचित जातियों में सिफऱ् 3.53 फ़ीसदी आबादी ग्रेजुएट, 3.75 फ़ीसदी आबादी बारहवीं, 6.63 फीसदी आबादी हाईस्कूल और 46.75 फीसदी लोग निरक्षर हैं।
घोर आरक्षण विरोधी फैसला-मायावती
बीएसपी प्रमुख मायावती ने इस फैसले को ‘फूट डालो-राज करो’ से जोडक़र बताया है।
मायावती ने एक्स पर लिखा, ‘हरियाणा सरकार को ऐसा करने से रोकने के लिए भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के आगे नहीं आने से भी यह साबित है कि कांग्रेस की तरह बीजेपी भी आरक्षण को पहले निष्क्रिय व निष्प्रभावी बनाने और अन्तत: इसे समाप्त करने के षडय़ंत्र में लगी है, जो घोर अनुचित है। बीएसपी इसकी घोर विरोधी है।’
उन्होंने आगे लिखा, ‘वास्तव में जातिवादी पार्टियों द्वारा एससी-एसटी व ओबीसी समाज में ‘फूट डालो-राज करो’ व इनके आरक्षण विरोधी षड्यंत्र आदि के विरुद्ध संघर्ष का ही नाम बीएसपी है। इन वर्गों को संगठित व एकजुट करके उन्हें शासक वर्ग बनाने का हमारा संघर्ष लगातार जारी रहेगा।’
उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने व्यक्तिगत तौर से हरियाणा सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है।
केशव प्रसाद मौर्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट के 1 अगस्त 2024 के फैसले के तहत, मैं व्यक्तिगत तौर से हरियाणा सरकार द्वारा एससी/एसटी में उप-वर्गीकरण लागू करने का स्वागत करता हूँ। आरक्षण का लाभ उन वंचितों तक पहुँचना जरूरी है, जो 75 साल बाद भी हमारे ही समाज का एक बड़ा हिस्सा है और जो बहुत पीछे रह गया था। उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सभी दलों की है। इसका विरोध अस्वीकार्य है।’
उन्होंने लिखा, ‘हरियाणा सहित भाजपा सरकारें,सबका साथ, सबका विकास, के मार्ग पर मोदी जी के नेतृत्व में समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध हैं।’
‘ओबीसी के बाद बीजेपी का दलित कार्ड’
चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू करने की बात कही थी। ऐसे में एक चीज़ स्पष्ट थी कि बीजेपी इस मुद्दे के साथ चुनाव में उतरने जा रही है।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इस फ़ैसले का विश्लेषण सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू बताते हुए करते हैं।
हेमंत अत्री कहते हैं, ‘फैसले का सकारात्मक पहलू यह है कि जो वंचित अनुसूचित जातियां हैं उन्हें आरक्षण का लाभ मिलेगा। नकारात्मक पहलू यह है कि इससे दलितों के बीच ही गुट बन जाएंगे। भाजपा पहले भी कई राज्यों में ऐसा कर चुकी है जब उन्होंने प्रभावशाली जाति वर्ग के खिलाफ उन्हीं के वर्ग से दूसरी जातियों को खड़ा कर दिया हो। हरियाणा में जाट प्रभावशाली हैं तो मनोहर लाल खट्टर और नायब सैनी को सीएम बनाया।ये दोनों गैर जाट हैं।’
हेमंत अत्री इसे दलित कार्ड से भी जोडक़र देखते हैं। वो कहते हैं, ‘हरियाणा में तब सत्ता विरोधी लहर देखी जा रही थी और लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने पांच सीटें गंवाई थीं। इस चुनाव से पहले आचार संहिता के बावजूद इन्होंने यह फैसला लिया था। इसलिए यह एक औपचारिकता है क्योंकि पहले लागू नहीं हो पाया था। इसमें इन्होंने दलित कार्ड खेला है और पहले खट्टर को हटाकर नायब सैनी को सीएम बनाकर ओबीसी कार्ड खेला था।’
मायावती को बीजेपी का जवाब
बीजेपी के हरियाणा प्रदेश के प्रवक्ता प्रोफेसर विधु रावल इसे वंचित अनुसूचित जातियों के लिए एक ज़रूरी फैसला बताते हैं।
विधु रावल कहते हैं, ‘जो असली वंचित हैं उन तक सरकारी लाभ और सुविधाएं पहुंचे इसके लिए यह मील का पत्थर साबित होने वाला निर्णय है। आरक्षण की मूल आत्मा भी यही है कि जो भी समाज की मुख्य धारा से पिछड़ गए या सालों तक शोषित रहे हैं उनके लिए आरक्षण है।’
मायवती ने इस फैसले को विभाजनकारी बताया है और कांग्रेस भी इसे बांटने वाला बता रही है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और हरियाणा प्रभारी रहे एडवोकेट जितेन्द्र बघेल कहते हैं, ‘भाजपा का काम ही बांटने वाली राजनीति करना है और यह फ़ैसला भी दलितों के भीतर बांटने वाला और आपस में ही एक-दूसरे के खिलाफ करने जैसा है।’
इन आरोपों पर प्रो। विधु रावल कहते हैं, ‘मायावती जी अगर दलितों का वास्तव में हित चाहतीं तो कभी भी इस फ़ैसले का विरोध न करतीं। असल में कुछ लोगों तक ही आरक्षण का लाभ सीमित न रहे इसके लिए भी बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर जी ने भी प्रयास किए थे। जिन लोगों तक आज तक आरक्षण का लाभ नहीं पहुंचा है तो मुझे लगता है कि उन तक भी आरक्षण पहुंचे। असल में यह एक साहसिक निर्णय है और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ही पालन करना है।’
क्या बीजेपी दूसरे राज्यों में भी अनुसूचित जाति में ऐसा वर्गीकरण कर सकती है?
इस सवाल के जवाब में रावल कहते हैं, ‘राज्य दर राज्य स्थितियां अलग होती हैं। जैसे कर्नाटक में दलितों में कुछ दलितों के प्रति छुआछूत है कुछ के प्रति नहीं। यह अलग-अलग राज्य की परिस्थितियों पर ज़्यादा निर्भर करता है।’
प्रोफेसर विधु रावल कहते हैं कि राज्य सरकारें इसका अवलोकन करेंगी और असल प्रयास बाबासाहेब आंबेडकर के संविधान को आत्मा सहित लागू करने का है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या था?
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल एक अगस्त को अपने फ़ैसले में कहा था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण या सब-क्लासिफिकेशन किया जा सकता है।
अभी अनुसूचित जाति को 15 फ़ीसदी आरक्षण मिलता है और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फ़ीसदी। इनकी सूची राष्ट्रपति बनाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के छह जजों ने कहा था कि इस लिस्ट में राज्य सरकार सिर्फ उप-वर्गीकरण कर सकती है, और कुछ सीटों को एक अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए अंकित कर सकती है।
कोर्ट का ये मानना था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक समान नहीं हैं। अदालत का कहना था कि कुछ जातियां बाकी से ज़्यादा पिछड़ी हुई हैं।
इस फैसले के समर्थकों में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन, आंध्र प्रदेश के एन चंद्रबाबू नायडू, बिहार के नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी के कई नेता शामिल हैं।
वहीं, बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने फैसले का विरोध किया था। ((bbc.com/hindi)
-शेरिलान मोलान
शापुरजी सकलतवाला का नाम शायद इतिहास की किताबों से निकलकर लोगों के सामने नहीं आए। लेकिन अतीत की किसी भी अच्छी कहानी की तरह एक कपास व्यापारी के बेटे, सकलतवाला की कहानी काफी दिलचस्प है।
सकलतवाला भारत के सबसे अमीर परिवार, टाटा के सदस्य थे। लेकिन वो कभी भी कारोबार को चलाने के लिए सामने नहीं आए।
शापुरजी की कहानी के हर मोड़ पर ऐसा लगता है कि उनका जीवन निरंतर संघर्ष, चुनौती और जिद से भरा हुआ था। न तो उनका सरनेम उनके अपने अमीर चचेरे भाइयों जैसा था और न ही उनका नसीब उनके जैसा था।
अपने भाईयों के विपरीत वो कभी टाटा समूह को चलाने के लिए आगे नहीं आए। टाटा समूह आज दुनिया के सबसे बड़े करोबारी विरासतों में से एक है और जगुआर, लैंड रोवर और टेटली टी जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश कंपनियों का मालिक है।
कारोबार संभालने की बजाय शापुरजी एक मुखर और प्रभावशाली राजनेता बने। उन्होंने भारत पर शासन करने वाली उपनिवेशवादी ताकत के केंद्र, यानी ब्रिटिश संसद में स्वतंत्रता के लिए पैरवी की और यहां तक कि महात्मा गांधी के साथ भी टकराव मोल लिया।
लेकिन सवाल यह है कि सकलतवाला एक व्यवसायी परिवार में पैदा हुए थे, इसके बावजूद उन्होंने अपने परिजनों से इतर अपने लिए अलग रास्ता क्यों और कैसे चुना?
सवाल यह भी है कि उन्होंने ब्रिटेन के पहले एशियाई सांसदों में से एक बनने के लिए रास्ता कैसे बनाया? इसका जवाब उतना ही जटिल है जितना कि सकलतवाला का अपने परिवार के साथ रिश्ता।
मामा जमशेदजी के साये में गुजरा बचपन
सकलतवाला, कपास व्यापारी दोराबजी और जेरबाई के बेटे थे। उनकी मां जेरबाई, टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी नुसरवानजी टाटा की सबसे छोटी बेटी थीं।
जब सकलतवाला चौदह साल के हुए तो उनका परिवार मुंबई के एस्प्लेनेड हाउस (टाटा परिवार का घर) में शिफ्ट हो गया और जेरबाई के भाई और उनके परिवार के साथ ही रहने लगा। जेरबाई के भाई का नाम भी जमशेदजी था।
सकलतवाला के माता-पिता उनके बचपन में ही अलग हो गए थे, जिसके बाद उनके मामा जमशेदजी उनके लिए पिता समान बन गए।
सकलतवाला की बेटी सेहरी ने अपने पिता की जीवनी ‘द फिफ़्थ कमांडमेंट’ में लिखा है, ‘जमशेदजी हमेशा शापुरजी के लिए बहुत प्रिय रहे और वो बहुत कम उम्र से शापुरजी के अंदर क्षमता और संभावनाएं देखा करते थे। उन्होंने शापुरजी पर बहुत ध्यान दिया। उन्हें उनके बचपन और जवानी के दौरान उनकी क्षमताओं पर बहुत विश्वास था।’
लेकिन सकलतवाला के लिए जमशेदजी के प्यार और लगाव के कारण, जमशेदजी के बड़े बेटे दोराब को सकलतवाला से नाराजगी हो गई।
सेहरी लिखती हैं, ‘बचपन और युवावस्था के दौरान दोनों एक-दूसरे के प्रति मनमुटाव के साथ रहे। दोनों के बीच ये दरार कभी नहीं मिट सकी।’
इसकी वजह से दोराब को पारिवारिक व्यवसाय में सकलतवाला की भूमिका कम कर दी और अंत में सकलतवाला को अलग रास्ता अपनाना पड़ा।
वेट्रेस से शादी और गरीबों के प्रति संवेदनशीलता
1890 के दशक के अंत में बम्बई (आज के वक्त की मुंबई) में ब्यूबोनिक प्लेग से हुई तबाही से सकलतवाला बहुत प्रभावित थे। उन्होंने देखा कि महामारी की वजह से गऱीब और मज़दूर वर्ग काफी प्रभावित हुए, जबकि समाज के उच्च वर्ग के लोग, जिनमें उनका परिवार भी शामिल है, इससे अधिक प्रभावित नहीं हुआ।
सकलतवाला उन दिनों कॉलेज स्टूडेंट हुआ करते थे। उन्होंने एक रूसी वैज्ञानिक वाल्देमर हाफकिन के साथ मिलकर काम किया। हाफकिन को अपनी क्रांतिकारी और रूसी शासन प्रणाली विरोधी राजनीति के कारण अपना देश छोडक़र भागना पड़ा था।
हाफ़किन ने प्लेग से निपटने के लिए एक वैक्सीन बनाई और सकलतवाला ने घर-घर जाकर वैक्सीन लेने के लिए लोगों को मनाया।
सेहरी अपनी किताब में लिखती हैं, ‘दोनों के नज़रिए में बहुत समानता थी और इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक आदर्शवादी बुज़ुर्ग वैज्ञानिक और युवा और दयालु छात्र के बीच इस घनिष्ठ संबंध ने शापुरजी के विश्वास को बनाने में और उन्हें मूर्त रूप देने में मदद की होगी।’
इसके अलावा सैली मार्श नाम की एक महिला के साथ शापूरजी के रिश्ते ने भी उनपर काफी प्रभाव छोड़ा। सैली एक वेट्रेस थीं, जिनसे शापूरजी ने साल 1907 में शादी की थी।
सैली मार्श अपने माता-पिता की 12 संतानों में से चौथी थीं। उन्होंने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था।
मार्श के परिवार के लिए गुजारा करना मुश्किल था, जिसकी वजह से परिवार में सभी को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।
लेकिन धनी परिवार से आने वाले सकलतवाला, मार्श की ओर आकर्षित हुए। दोनों के प्रेम-संबंध के दौरान मार्श के जीवन के ज़रिए सकलतवाला को ब्रिटेन के मज़दूर वर्ग की कठिनाइयों के बारे में पता चला।
‘कट्टर’ कम्युनिस्ट के तौर पर बनी पहचान
सेहरी लिखती हैं कि मार्श के पिता भी जेसुइट पादरियों और ननों के निस्वार्थ जीवन से प्रभावित थे। इन्हीं लोगों की मदद से उन्होंने स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई की थी।
इस कारण 1905 में अपनी ब्रिटेन यात्रा के बाद सकलतवाला ने ख़ुद को राजनीति से जोड़ लिया। राजनीति में जाने का उनका उद्देश्य था कि वे गऱीब और हाशिए पर रहने वाले वंचित वर्ग के लोगों की मदद कर सकें।
उन्होंने 1909 में लेबर पार्टी ज्वाइन की और 12 साल बाद कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली। वो भारत और ब्रिटेन में मज़दूर वर्ग के अधिकारों को लेकर गहरी चिंता करते थे।
सकलतवाला का मानना था कि किसी साम्राज्यवादी शासन के बजाय केवल समाजवाद ही गऱीबी को मिटा सकता है और लोगों को शासन में अपनी बात कहने का अधिकार दे सकता है।
सकलतवाला के भाषणों की खूब सराहना होती थी। ब्रिटेन में वो जल्द ही एक लोकप्रिय चेहरा बन गए। साल 1922 में उन्हें पहली बार संसद के लिए चुना गया और बतौर सांसद उन्होंने कऱीब सात साल तक काम किया।
इस दौरान उन्होंने भारत की आज़ादी के लिए जमकर वकालत की। उनके विचार इतने दृढ़ थे कि कंज़र्वेटिव पार्टी के एक ब्रिटिश-भारतीय सांसद ने उन्हें एक ख़तरनाक ‘कट्टरपंथी कम्युनिस्ट’ माना था।
महात्मा गांधी से वैचारिक लड़ाई
सांसद के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान सकलतवाला ने कई बार भारत की भी यात्रा की। भारत में दिए अपने भाषणों में उन्होंने मज़दूर वर्ग और युवा राष्ट्रवादियों से ख़ुद को मुखर करने और स्वतंत्रता आंदोलन को अपना समर्थन देने की अपील की।
इस दौरान सकलतवाला ने जिन क्षेत्रों का दौरा किया, वहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को संगठित करने और बनाने में भी मदद की।
अपने साझा दुश्मन यानी ब्रिटिश शासन को हराने के लिए साम्यवाद पर सकलतवाला के विचारों का टकराव अक्सर महात्मा गांधी के अहिंसा के प्रति दृष्टिकोण से होता था।
सकलतवाला ने महात्मा गांधी को लिखे अपने एक पत्र में कहा था, ‘प्रिय कॉमरेड गांधी, हम दोनों ही इतने अनिश्चित हैं कि अपनी बात को स्वतंत्र रूप से और सही ढंग से रखने के लिए एक-दूसरे के साथ रूख़ा व्यवहार करने की अनुमति देते हैं।’
इसके साथ ही उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रति अपनी बेचैनी और लोगों को उन्हें ‘महात्मा’ (एक पूजनीय व्यक्ति या साधु) कहने की अनुमति देने के बारे में भी खुलकर बात की।’
इसी वजह से इन दोनों के बीच कभी समझौता नहीं हो सका। फिर भी वे एक-दूसरे के साथ सौहार्द्रपूर्ण बने रहे और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के अपने साझा लक्ष्य के लिए एकजुट रहे।
भारत में सकलतवाला के जोशीले भाषणों से ब्रिटिश अधिकारी परेशान हो गए और साल 1927 में उनपर भारत की यात्रा करने को लेकर प्रतिबंध लगा दिया गया।
1929 में उन्होंने ब्रिटिश संसद में अपनी सीट खो दी, लेकिन उन्होंने भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई जारी रखी।
1936 में उनके निधन तक सकलतवाला ब्रिटिश राजनीति और भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बने रहे।
उनके अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियों को लंदन के एक कब्रिस्तान में उनके माता-पिता और जमशेदजी टाटा के बगल में दफऩा दिया गया, जिससे वो एक बार फिर टाटा परिवार और उनकी विरासत के साथ जुड़ गए। (bbc.com/hindi)
-मिर्जा एबी बेग
‘ये दो ऐसे लोग हैं जिन्हें सारी दुनिया सलाम करती है लेकिन उन्होंने अपनी सारी जि़ंदगी कॉपी के अलावा कुछ नहीं किया। सलीम-जावेद कॉपी राइटर हैं, वह असली लेखक नहीं।’
ये शब्द लेखक अमित आर्यन के हैं, जिन्होंने बॉलीवुड के दो मशहूर स्क्रिप्ट राइटर सलीम ख़ान और जावेद अख्तर के बारे में हाल ही में ये बातें कही हैं।
सलीम खान और जावेद अख्तर ने भारतीय सिनेमा को ‘ज़ंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘त्रिशूल’, ‘डॉन’, ‘क्रांति’, ‘शक्ति’ और ‘मिस्टर इंडिया’ समेत दर्जनों सुपरहिट फिल्में दी हैं।
यह आरोप लगाने वाले अमित आर्यन ने ‘एफ़आईआर’, ‘एबीसीडी’, ‘यह उन दिनों की बात है’, ‘लापतागंज’ और ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ जैसी फि़ल्में लिखीं हैं।
अमित आर्यन ने दावा किया कि सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘शोले’ राज खोसला की फिल्म ‘मेरा गांव, मेरा देश’ की नकल है।
इससे पहले भी फि़ल्म ‘शोले’ पर आरोप लग चुके हैं कि यह सर्जीव लियोन की फिल्म ‘वंस अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट’ की नकल है।
बॉलीवुड से संबंध रखने वाले कई लोग 1975 में रिलीज़ होने वाली ब्लॉकबस्टर फि़ल्म ‘शोले’ में जय यानी अमिताभ बच्चन और मौसी (लीला मिश्रा) के बीच होने वाली बातचीत को नामी उर्दू फिक्शन राइटर इब्ने सफी के नॉवेल ‘खौफनाक इमारत’ से लिया गया डायलॉग बताते हैं।
इस फि़ल्म के गीत ‘महबूबा महबूबा’ को किसी ने अरबी गाने की नकल कहा है तो किसी ने इसे अंग्रेज़ी फि़ल्म ‘से यू लव मी’ की नकल बताया है।
आरोपों पर क्या बोले जावेद अख्तर?
बीबीसी ने हाल के आरोपों पर जावेद अख़्तर से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका जवाब नहीं मिल पाया।
हालांकि, उन्होंने कुछ समय पहले नसरीन मुन्नी के साथ बातचीत पर आधारित किताब ‘टॉकिंग लाइफ़’ में इस तरह के आरोपों को बेबुनियाद बताया था।
लेकिन, उन्होंने सर्जीव लियोन से प्रभावित होने की बात मानी थी। एक मीडिया हाउस से बात करते हुए जावेद अख़्तर यह भी कह चुके हैं कि वह इब्ने सफी के उपन्यासों को शौक से पढ़ा करते थे।
उन्होंने कहा था कि कुछ वर्गों की ओर से उनकी फिल्म ‘जंजीर’ को फि़ल्म ‘डर्टी हैरी’ की नक़ल कहा गया, जो ‘बकवास’ है।
उनका कहना था कि ‘ज़ंजीर’ सलीम ख़ान की सोच थी जिस पर ‘हम दोनों ने एक साथ काम किया।’
उनके अनुसार ‘डर्टी हैरी’ पर एक फि़ल्म ‘ख़ून ख़ून’ जरूर बनी, लेकिन वह किसी और का काम था।
उन्होंने इस तरह के सभी आरोपों को ‘रबिश’ कहकर रद्द कर दिया और कहा कि उनकी लिखी कोई भी फिल्म किसी दूसरे फिल्म की नकल या कॉपी नहीं है।
बहरहाल, भारतीय सिनेमा विशेष तौर पर बॉलीवुड या हिंदी सिनेमा में नक़ल के आरोप नए नहीं है। बहुत सी मशहूर फिल्मों की स्क्रिप्ट से लेकर सीन, डायलॉग, संगीत और गीत सभी पर ऐसे आरोप लगे हैं।
जानकार क्या सोचते हैं?
जब बीबीसी ने पुणे स्थित डीवाई पाटिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ़ मीडिया एंड जर्नलिज़्म के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर अरविंद दास से सवाल किया कि बॉलीवुड में नक़ल किस हद तक जगह बना चुकी है तो उनका जवाब था, ‘बकौल गालिब, आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’
उन्होंने कहा कि भारतीय फि़ल्म इंडस्ट्री में नकल बेशर्मी की हद तक घर कर चुकी है और हद तो यह है कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। वो बोले, ‘ऐसी बातों को ‘इंस्पायर्ड’ कहकर कबूल कर लिया जाता है।’
प्रोफेसर दास ने कहा अगर आप पश्चिम में देखें तो नकल की वजह से लोगों का ओहदा और उनकी नौकरियां चली गई हैं और उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा है।
वह कहते हैं, ‘आप फरीद जक़रिया की मिसाल ले सकते हैं, जिन्हें न्यूज़ वीक के एडिटोरियल बोर्ड से हटना पड़ा था।’
प्रोफेसर दास ने दावा किया की फि़ल्म ‘शोले’ में जो सिक्का उछालने का मशहूर सीन है, वह भी ‘गार्डन ऑफ इविल’ की कॉपी थी।
उनके अनुसार यह बड़ी समस्या है, लेकिन अब इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। (बाकी पेज 8 पर)
उनके अनुसार शाहरुख खान की ‘बाज़ीगर’ या ‘अग्नि साक्षी’ जैसी फिल्मों पर भी ‘स्लीपिंग विद दि एनिमी’ की नक़ल होने के आरोप लगे हैं। इसी तरह ‘बरेली की बर्फी’ फिल्म भी ‘फ्रेंच किस’ पर आधारित है।
उन्होंने कहा, ‘अब तो इंटरनेट का जमाना है। आप सर्च करें तो आपको नक़ल पर बनी फिल्म और उसकी असल दोनों के लिंक मिल जाएंगे और आप ख़ुद ही फ़ैसला कर सकते हैं कि भारतीय सिनेमा में ‘चोरी’ किस हद तक जगह बना चुकी है।’
दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़’ (सीएसडीएस) में इंडियन लैंग्वेजेज प्रोग्राम में एसोसिएट प्रोफेसर रविकांत का कहना है, ‘नकल मानव स्वभाव में है और यह किसी भी चीज़ की तरक्की और उसे बढ़ावा देने के लिए जरूरी है।’
उन्होंने कहा, ‘पॉपुलर कल्चर को बढ़ावा देने के लिए नकल जरूरी है।’
उन्होंने सवाल किया कि जो लोग सलीम-जावेद पर नक़ल या चोरी का इल्ज़ाम लगाते हैं, क्या वह उन जैसी कोई चीज़ पेश कर सकते हैं या वह चीज़ लिख सकते हैं?
लेकिन, जब किसी का सृजनात्मक काम कोई दूसरा अपने नाम कर ले तो उसे चोरी कहते हैं और यह भी एक जमाने से दुनिया भर में चल रही है।
नक़ल किसे कहेंगे?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की डिक्शनरी ने ‘प्लेगेरिज़्म’ या नकल की परिभाषा लिखते हुए बताया है कि किसी दूसरे के काम या विचार को अपने काम या विचार के तौर पर पेश करना नकल है।
फिर चाहे ऐसा मूल लेखक की रजामंदी के साथ या इसके बिना किया गया हो।
वैसे नकल करना अपने आप में कोई जुर्म नहीं है, लेकिन जालसाज़ी की तरह कॉपीराइट और नैतिक अधिकारों के उल्लंघन की वजह से इस तरह की धोखाधड़ी के लिए अदालत में सज़ा दी जा सकती है।
यह अकादमियों और उद्योगों में एक गंभीर नैतिक अपराध माना जाता है।
दिल्ली की अंबेडकर यूनिवर्सिटी में क़ानून के प्रोफ़ेसर और कॉपीराइट्स के माहिर प्रोफ़ेसर लॉरेंस लियांग कहते हैं, ‘सिनेमा का अपना एक लंबा इतिहास है, जिसमें काम व्यक्तिगत तौर पर भी होता है और सामूहिक तौर पर भी।’
वे कहते हैं, ‘यानी किसी फिल्म की प्रोडक्शन में किसी ने क्या काम किया और क्या इनपुट दिया, इसे बहुत स्पष्टता के साथ आप अलग-अलग नहीं कर सकते। इसलिए यह क्षेत्र बहुत ही विशिष्ट भी है और बहुत ही अजीब भी है।’
उन्होंने कहा, ‘इसलिए कॉपीराइट के क़ानून का इसमें बहुत दखल नहीं होता है और फिल्म में ऑरिजनलिटी की बहुत जरूरत भी नहीं है।’
प्रोफ़ेसर लियांग ने कहा, ‘भारत में शायद ही कोई फि़ल्म हो जो बाउंड स्क्रिप्ट के साथ बनती है। हालांकि शायद पहली बार आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ एक बाउंड स्क्रिप्ट के साथ बनी फिल्म थी।’
उन्होंने कहा, ‘वर्ना आमतौर पर एक विचार होता है जिस पर काम किया जाता है और शूटिंग के दौरान बहुत से प्रयोग किए जाते हैं। ऐसे में जो चीज सामने आती है, वह एक नई चीज़ ही होती है।’
प्रोफेसर लियांग ने कहा, ‘कुछ ऐसी फि़ल्में बनी हैं जिसके कई संस्करण सामने आए हैं और सब की सब अपने आप में अलग हैसियत रखती हैं।’
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, ‘अकीरा कुरोसावा की 1954 की फिल्म ‘सेवन समुराई’ से प्रभावित होकर भारत में फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ बनी जिसे ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखा है।’
उन्होंने बताया, ‘इसी पर हॉलीवुड ने ‘दी मैग्नीफिशेंट सेवन’ बनाई है, जबकि हॉलीवुड फिल्म ‘बीटल बियोंड स्टार्स’ ने कहा है कि उन्होंने अपनी साइंस फिक्शन फिल्म की प्रेरणा ‘सेवन सामुराई’ से ली है।’
प्रोफ़ेसर लॉरेंस लियांग के अनुसार, ‘कॉपीराइट का मामला उस समय सामने आया था, जब फि़ल्मों की सीडी और डीवीडी बनाई जाती थी और उन्हें ग़ैर क़ानूनी तौर पर बेचा जाता था।’
उन्होंने कहा, ‘आज इसमें भी छूट है कि किसी फि़ल्म को अगर आप थिएटर में नहीं देख सकते तो आप उसे पैसे देकर ऑनलाइन देख सकते हैं यानी बहुत से आउटलेट्स मौजूद हैं।’
उन्होंने एक प्रसिद्ध बात की नकल करते हुए कहा, ‘फिल्मों के मामले में यह बहुत अहम नहीं है कि आप कोई विचार कहां से उठाते हैं बल्कि अहम यह है कि आप उसे कहां पहुंचाते हैं।’
एक कहानी पर बनी तीन अलग फि़ल्में
प्रोफेसर लियांग ने कहा कि साल1936 में आई फिल्म ‘इट हैपेंड वन नाइट’ को ही आप ले लें तो आपको मालूम होता है कि राज कपूर ने इस पर एक फिल्म ‘चोरी चोरी’ बनाई और फिर महेश भट्ट ने इस पर ‘दिल है कि मानता नहीं’ बनाई और आप देखें तो पाएंगे कि तीनों फिल्में अपने आप में अलग-अलग हैं।
सीएसडीएस के प्रोफ़ेसर रविकांत का भी कहना है कि भारत में कहानी कहने का अपना अंदाज रहा है और इसे आप ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ में देख सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘आपको ‘रामायण’ के भी इतने ही संस्करण मिलेंगे जितने ‘महाभारत’ के मिलेंगे और आप उन्हें चोरी या नकल नहीं कह सकते।’
प्रोफेसर लियांग का कहना है कि अनुराग कश्यप और सलीम-जावेद जैसे ‘ए’ लिस्टर स्क्रिप्ट राइटर को छोड़ दें तो स्क्रिप्ट राइटर का शोषण होता है।
उन्हें उनके काम का मेहनताना नहीं मिलता है और इस पॉलिटिकल इकॉनमी में जो शोषण है, वह कॉपीराइट का उल्लंघन है।
उन्होंने कहा कि फि़ल्मों की कहानी से ज़्यादा फिल्मों के गीत और संगीत में नकल बहुत ही आम है और संगीतकार बप्पी लाहिड़ी और अनु मलिक इस मामले में बहुत हद तक ‘बदनाम’ हैं।
उन्होंने कहा, ‘यह बहुत आम है। रीमिक्स में तो और भी ज़्यादा आम है।’
प्रोफेसर लियांग ने बताया, ‘फिल्म ‘मधुमती’ का गीत ‘दिल तड़प तड़प कर कह रहा’ पोलैंड के लोकगीत से लिया गया है और यह कल्चरल ट्रांसलेशन है।’
उन्होंने कहा, ‘अब इंटरनेट की वजह से सारी दुनिया के गीत आपके सामने हैं तो आपको अंदाजा होता है कि सलिल चौधरी से लेकर आरडी बर्मन तक बहुत सारे संगीतकारों पर गीत की धुन नकल करने के आरोप देखे जा सकते हैं।’
नकल पर लिखा गया लेख
पत्रकार मोनोजीत लाहिड़ी ने बॉलीवुड में नकल के विषय पर एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक है ‘चोरी मेरा काम’ जिसमें ‘चोरी चोरी’ से लेकर फिल्म ‘फरेब’ तक का जिक्र किया गया है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह ‘ऐन अनलॉफुल एंट्री’ की नकल है।
अगर फिल्मों की साइट ‘आईएमडीबी’ पर जाएं तो आपको दर्जनों हिंदी फिल्मों का जिक्र मिलेगा जो हॉलीवुड की फिल्म की रीमेक हैं या फिर उन पर आधारित हैं।
प्रोफेसर रविकांत कहते हैं कि दरअसल नकल उसी चीज़ की होती है जो कामयाब होती है या फिर उस पर नकल का आरोप लगाया जाता है जो कामयाब होती है।
उन्होंने एक फिल्म की चर्चा की जिसमें फिराक गोरखपुरी के शेर का इस्तेमाल किया गया था तो फिराक गोरखपुरी ने किसी से कहा था कि उन्हें इसका पैसा मिलना चाहिए।
इस पर फिल्म मैगजीन ‘शमा’ में लोगों ने उन्हें कहा कि इससे यह तो साबित होता है कि आपका शेर लोकप्रिय है, लेकिन आपके शेर की वजह से फिल्म हिट हुई है, यह पता नहीं चलता। इसलिए पैसे मांगना कुछ ज़्यादा तो नहीं हो गया।
रविकांत के अनुसार न जाने कितने ही गायक मोहम्मद रफी की नकल करके अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं।
इसी तरह, प्रोफेसर लियांग ने कुमार शानू की एक बात बताई कि जब किसी ने उनसे पूछा कि वह किशोर कुमार के ही गीत क्यों गाते हैं तो उन्होंने संगीत को अपना धर्म और किशोर कुमार को अपना भगवान कहा था। ((bbc.com/hindi)
-राघवेन्द्र राव
अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने 17 अक्तूबर को भारतीय नागरिक विकास यादव के खिलाफ भाड़े पर हत्या और मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज करने की घोषणा की।
ये मामला साल 2023 में न्यूयॉर्क शहर में अमेरिकी नागरिक और सिख अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू के क़त्ल की नाकाम साजिश से जुड़ा है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ‘पन्नू की हत्या की साजिश’ में विकास यादव की अहम भूमिका थी। जहां अमेरिकी न्याय मंत्रालय ने यादव को भारत सरकार का कर्मचारी बताया है, वहीं भारत ये कह चुका है कि विकास यादव अब भारत सरकार के कर्मचारी नहीं हैं।
इस मामले में एक और भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता पहले से ही अमेरिकी हिरासत में हैं।
अमेरिका ने क्या कहा?
अमेरिका ने विकास यादव और निखिल गुप्ता पर भाड़े पर हत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया है जिसके लिए वहां के कानून के मुताबिक अधिकतम 10 साल की जेल की सजा का प्रावधान है। साथ ही दोनों अभियुक्तों पर भाड़े पर हत्या करने की साजि़श रचने का भी आरोप लगाया गया है जिसके लिए भी अधिकतम 10 वर्ष की जेल की सजा का प्रावधान है।
दोनों पर मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश रचने का आरोप भी लगाया गया है जिसके लिए अधिकतम 20 वर्ष की जेल की सजा का प्रावधान है।
आरोपों की घोषणा करते हुए अमेरिकी अटॉर्नी जनरल मेरिक बी गारलैंड ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो अमेरिकी नागरिकों को नुकसान पहुँचाने और चुप कराने की कोशिश करेगा, फिर चाहे वो किसी भी पद पर हो या सत्ता से कितनी भी निकटता रखता हो, उसे न्याय मंत्रालय जवाबदेह ठहराने की पूरी कोशिश करेगा।
अमेरिकी अटॉर्नी डेमियन विलियम्स ने कहा, ‘पिछले साल इस कार्यालय ने निखिल गुप्ता पर अमेरिकी धरती पर भारतीय मूल के एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया था।’
उन्होंने कहा, ‘लेकिन, जैसा कि आरोप लगाया गया है, गुप्ता ने अकेले काम नहीं किया। आज हम एक भारतीय सरकारी कर्मचारी विकास यादव के खिलाफ आरोपों की घोषणा करते हैं, जिन्होंने भारत से साजिश रची और गुप्ता को पीडि़त की हत्या के लिए एक हत्यारे को नियुक्त करने का निर्देश दिया।’
विलियम्स ने यह भी कहा कि अमेरिकी नागरिकों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने वाले सभी लोगों के लिए ये मामला चेतवानी की तरह है।
विकास यादव के बारे में क्या-क्या पता है?
अमेरिका ने जो आरोप दर्ज किए हैं उनके मुताबिक़, विकास यादव उफऱ् अमानत भारत सरकार के कैबिनेट सचिवालय में कार्यरत थे जो भारतीय प्रधानमंत्री कार्यालय का एक हिस्सा है।
अमेरिका के मुताबिक़, यादव भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के लिए काम करते थे जो कैबिनेट सचिवालय का हिस्सा है।
अमेरिकी न्याय मंत्रालय ने कहा है कि विकास यादव ने अपने पद को ‘वरिष्ठ फील्ड ऑफिसर’ के रूप में बताया है जहां उनकी जिम्मेदारियाँ ‘सुरक्षा प्रबंधन’ और ‘खुफिया प्रबंधन’ हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, विकास यादव ने अपने नियोक्ता का पता नई दिल्ली में सीजीओ कॉम्प्लेक्स के रूप में सूचीबद्ध किया है, जहाँ रॉ का मुख्यालय है। साथ ही अमेरिकी न्याय मंत्रालय का कहना है कि यादव ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में भी काम किया है जो भारत का सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल है।
यादव ने वहां अपना पद ‘सहायक कमांडेंट’ के रूप में बताया है जिसके पास 135 लोगों की कंपनी की कमान थी।
अमेरिका ने कहा है कि यादव के बारे में मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने काउंटर इंटेलिजेंस, बैटल-क्रॉफ्ट (युद्ध कला), हथियार और पैराट्रूपर प्रशिक्षण हासिल किया है।
कौन हैं निखिल गुप्ता?
अमेरिका का कहना है कि 53 वर्षीय निखिल गुप्ता उर्फ निक एक भारतीय नागरिक हैं और विकास यादव के सहयोगी रहे हैं।
अमेरिकी न्याय मंत्रालय के मुताबिक़, निखिल गुप्ता ने विकास यादव और अन्य लोगों के साथ बातचीत में इस बात का जि़क्र किया है कि वो मादक पदार्थों और हथियारों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही तस्करी में शामिल हैं।
पिछले साल अमेरिकी न्याय मंत्रालय ने निखिल गुप्ता के खिलाफ गुरपतवंत सिंह पन्नू मामले में भाड़े पर हत्या की कोशिश का आरोप लगाया था।
30 जून, 2023 को निखिल गुप्ता को चेक गणराज्य के अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया और इसके बाद अमेरिका और चेक गणराज्य के बीच द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि के तहत अमेरिका को सौंप दिया था।
विकास यादव और निखिल गुप्ता के बीच क्या ‘कनेक्शन’?
अमेरिकी न्याय मंत्रालय का कहना है कि मई 2023 में विकास यादव ने अमेरिका में गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रचने के लिए निखिल गुप्ता को भर्ती किया।
अमेरिका का कहना है, ‘विकास यादव के निर्देश पर निखिल गुप्ता ने पन्नू की हत्या करने के लिए एक हिटमैन को भर्ती करने करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति से संपर्क किया, जिसके बारे में गुप्ता को लगता था कि वह एक आपराधिक सहयोगी है, लेकिन असलियत में वो अमेरिका के ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) के साथ काम करने वाला एक ख़ुफिय़ा एजेंट था।’
‘इस खुफिया एजेंट ने गुप्ता को एक कथित हिटमैन से मिलवाया, जो असलियत में डीईए का अंडरकवर अधिकारी था। निखिल गुप्ता ने जो डील की, उसके मुताबिक़ विकास यादव ने पन्नू की हत्या के लिए हिटमैन को एक लाख अमेरिकी डॉलर का भुगतान करने पर हामी भरी।’
आरोपों के मुताबिक, ‘9 जून 2023 को विकास यादव और निखिल गुप्ता ने एक सहयोगी से हत्या के लिए अग्रिम भुगतान के रूप में हिटमैन को पंद्रह हज़ार अमेरिकी डॉलर नकद देने की व्यवस्था की और ये पैसा यादव के सहयोगी ने फिर मैनहट्टन में हिटमैन को दिया।’
‘कैसे रची गई साजिश’?
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जून 2023 में हत्या की साजिश को आगे बढ़ाने के लिए विकास यादव ने निखिल गुप्ता को पन्नू के बारे में व्यक्तिगत जानकारी दी।
इसमें न्यूयॉर्क शहर में पन्नू के घर का पता, उससे जुड़े फोन नंबर और उसके दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों के बारे में विवरण शामिल था। निखिल गुप्ता ने ये जानकारियां हिटमैन को दे दीं।
अमेरिकी न्याय मंत्रालय के मुताबिक़, ‘विकास यादव ने निखिल गुप्ता को हत्या की साजि़श कैसे बढ़ रही है, उस पर नियमित अपडेट देने को कहा। निखिल गुप्ता ने ये अपडेट और पन्नू की निगरानी के दौरान ली गई तस्वीरों को विकास यादव को भेज दिया।’
अमेरिका का दावा है कि निखिल गुप्ता ने हिटमैन को जल्द से जल्द हत्या को अंजाम देने के लिए कहा, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि ये हत्या भारत के प्रधानमंत्री की अमेरिका की आधिकारिक राजकीय यात्रा के आसपास न की जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा 20 जून, 2023 के आसपास शुरू होने वाली थी।
‘अब ये प्राथमिकता है’
18 जून, 2023 को भारतीय प्रधानमंत्री की अमेरिका की राजकीय यात्रा से लगभग दो दिन पहले नकाबपोश बंदूकधारियों ने कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में एक सिख मंदिर के बाहर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या कर दी।
निज्जर को गुरपतवंत सिंह पन्नू का सहयोगी बताया जाता है और पन्नू की तरह ही सिख अलगाववादी आंदोलन का नेता और भारत सरकार का मुखर आलोचक थे।
अमेरिकी अदालत में दर्ज किए गए आरोपों में कहा गया है कि 19 जून 2023 को निज्जर की हत्या के अगले दिन निखिल गुप्ता ने हिटमैन से कहा कि निज्जर भी ‘लक्ष्य था’ और ‘हमारे पास बहुत सारे लक्ष्य हैं’।
आरोपों के मुताबिक़, निखिल गुप्ता ने कहा कि निज्जर की हत्या के मद्देनजर पन्नू को मारने के लिए ‘अब इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं है’।
अमेरिकी न्याय मंत्रालय का कहना है कि 20 जून, 2023 को विकास यादव ने निखिल गुप्ता को पन्नू के बारे में एक समाचार लेख भेजा और एक संदेश दिया- ‘अब यह प्राथमिकता है।’
क्या भारत विकास यादव को
अमेरिका को सौंप देगा?
इस पूरे घटनाक्रम के चलते बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत को विकास यादव को अमेरिका को सौंपना पड़ेगा?
भारत और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संधि साल 1997 में हुई थी। इस संधि के तहत ऐसा हो सकता है कि अमेरिका भारत से विकास यादव का प्रत्यर्पण करना चाहेगा।
प्रोफेसर हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं। हमने उनसे पूछा कि क्या भारत और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संधि के तहत भारत को विकास यादव को अमेरिका को सौंपना पड़ सकता है?
उन्होंने कहा, ‘मेरी अपनी समझ यह है कि दोनों देशों को अदालतों से परे कुछ समझौता करना होगा क्योंकि इससे मुश्किलों के हल होने की बजाय और ज़्यादा मुश्किलें पैदा होंगी।’
उन्होंने कहा, ‘निश्चित रूप से कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि वो किसी पूर्व ख़ुफिय़ा अधिकारी का प्रत्यर्पण होने दें। मुझे लगता है कि भारत और अमेरिका को यह पता लगाने के लिए कोई और तरीका निकालना होगा कि इस मसले को कैसे सुलझाया जाए।’
प्रोफ़ेसर पंत के मुताबिक़ ‘आखिरकार ये सभी राजनीतिक निर्णय हैं’।
वे कहते हैं, ‘एक बार जब स्पॉटलाइट चली जाती है तो आप कई चीज़ें कर सकते हैं लेकिन जब तक स्पॉटलाइट है तब तक यह मुश्किल भी है।’
वो कहते हैं, ‘इस मामले में अमेरिकी प्रणाली की क़ानूनी बारीकिय़ाँ भी शामिल हैं और इन सीमाओं के बीच रहते हुए किस बात पर सहमति हो सकती है यह अनिवार्य रूप से एक राजनीतिक सवाल होगा।’
दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि होने के बावजूद अमेरिका ने अतीत में 26/11 मुंबई हमले के दोषी डेविड कोलमैन हेडली को भारत को प्रत्यर्पित करने से इनकार कर दिया था।
क्या विकास यादव के मामले में भारत भी ऐसा कर सकता है?
प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं, ‘खुफिया अधिकारियों से जुड़े ज़्यादातर मामलों में आपके पास सिस्टम के भीतर तंत्र उपलब्ध हैं और मुझे लगता है कि संरचना आपको ऐसा करने की अनुमति देती है।’
उन्होंने कहा, ‘आप जटिलताएं पैदा कर सकते हैं, आप देरी कर सकते हैं और ध्यान भटका सकते हैं, संदर्भ बदल सकते हैं और आप कानूनी व्याख्या को इस तरह से आगे बढ़ा सकते हैं कि उसे अमेरिका में प्रत्यर्पित होने से रोका जा सके।’
लेकिन साथ ही प्रोफेसर पंत ये भी कहते हैं कि चूंकि इस मामले में भारत ने बहुत जल्दी कहा कि वो जांच में मदद और सहयोग कर रहा है इसलिए इस मामले में दोनों देशों के बीच कोई खटास नहीं है।
प्रोफेसर पंत कहते हैं, ‘अमेरिकियों ने इसे स्वीकार किया है और कहा है कि वे संतुष्ट हैं। कनाडा के साथ चल रहे मामले के विपरीत, यहां स्थिति काफ़ी अलग है।’
इस मामले पर भारत सरकार का क्या कहना है?
भारत ने कहा है कि वो इस मामले की जांच में अमेरिका का सहयोग कर रहा है और अमेरिका ने कहा है कि वो अब तक मिले सहयोग से संतुष्ट है।
गुरुवार को भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने विकास यादव का नाम लिए बिना कहा था कि अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट के अभियोग में जिस व्यक्ति का नाम है, वह अब भारत सरकार का कर्मचारी नहीं है।
एक सवाल के जवाब में जायसवाल ने कहा, ‘मैंने अभी पुष्टि की है कि हाँ, यह विशेष सज्जन, वह भारत सरकार के ढांचे का हिस्सा नहीं हैं। वह कोई कर्मचारी नहीं हैं। इसके अलावा मेरे पास आपके साथ साझा करने के लिए कुछ भी नहीं है।’
जायसवाल ने ये भी बताया कि इस मामले से जुड़ी एक उच्च स्तरीय जांच समिति के सदस्य अमेरिका गए हैं।
उन्होंने कहा कि इस जांच समिति का गठन नवंबर 2023 में उन इनपुट्स की जांच करने के लिए किया गया था जो अमेरिका ने भारत के साथ साझा किए थे।
जायसवाल ने कहा, ‘हमने इन इनपुट्स को बहुत गंभीरता से लिया है और हम इस मामले पर अमेरिकी पक्ष के साथ जुड़े हुए हैं। उच्च स्तरीय समिति के दो सदस्य, वे वहां गए हैं और उन्होंने अमेरिकी पक्ष के साथ बैठकें की हैं।’ इसी साल सितंबर में गुरपतवंत सिंह पन्नू ने अमेरिका की एक अदालत में भारत सरकार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और रॉ चीफ सामंत गोयल और अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दायर किया था।
इस मुकदमे में पन्नू ने भारत सरकार पर उनकी हत्या की कथित कोशिश का आरोप लगाया था और क्षतिपूर्ति की मांग की थी। अमेरिकी अदालत ने मामले में नामजद लोगों को समन किया था।
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इसे ‘पूरी तरह से अनुचित मामला’ बताया था और कहा था कि पन्नू के बारे में ये बात साफ है कि वो एक गैर-कानूनी संगठन से जुड़े हैं। (bbc.com/hindi)
- डॉ. आर.के. पालीवाल
पिछले दशक में केंद्र सरकार ने कई ऐसे नियम कानून बनाए हैं जिनसे लोगों को डिजिटल दुनिया में प्रवेश करना जरूरी हो गया। नकद लेन देन को जांच एजेंसियों द्वारा शक की नजर से देखना, डिजिटल इकोनॉमी प्रयुक्त करने पर टोल नाकों पर लाभ और ऑन लाइन आवेदन और ऑन लाइन शिकायत निवारण आदि भी ऐसी कई वजहें हैं जिससे लोगों को मज़बूरी में मोबाइल के सहारे डिजिटल लेन देन करना पड़ता है।
दूसरी तरफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के तेजी से प्रचार प्रसार के कारण ऐसे बेरोजगार पढ़े लिखे युवाओं की एक बड़ी फौज तैयार हो गई है जिसने उचित नौकरी के अभाव या घर बैठे ठगी की आसान कमाई को अपने पेशे के रूप में अपना लिया है। अखबारों और सोशल मीडिया की खबरों में आए दिन देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे समाचार मिलते हैं जिनसे विशेष रूप से बुजुर्गों और पेंशन आदि की सीमित आय वालों की ऑनलाइन ठगी के दुखद समाचार मिलते हैं। इस ठगी के नित नए विविध रूप सामने आ रहे हैं जिनमें कहीं फर्जी फेसबुक अकाउंट बनाकर मैसेंजर के माध्यम से लोगों से तरह तरह से ठगी की जा रही है। इसी तरह व्हाट्सएप पर किसी का फोटो लगाकर उनके मित्रों और परिजनों को व्हाट्स ऐप कॉल पर झूठी सूचना देकर पैसे वसूले जा रहे हैं।
इन सबमें सबसे ख़तरनाक वीडियो काल के माध्यम से महिलाओं से दोस्ती के नाम पर ब्लैकमेलिंग कर और ई डी, सी बी आई और इनकम टैक्स आदि जांच एजेंसियों का डर दिखाकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट तक कर तगड़ी रकम वसूली है। हाल ही में पंजाब के औद्योगिक समूह वर्धमान इंडस्ट्री के वरिष्ठ मैनेजिंग डायरेक्टर ओसवाल को सुप्रीम कोर्ट की फर्जी बैंच का डर दिखाकर छह करोड़ की पेनल्टी किसी अज्ञात अकाउंट में जमा कराने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। यही नहीं फेसबुक पर मुकेश अंबानी के फोटो और नाम से भी कुछ फर्जी अकाउंट बने हैं जिनसे मुझे भी मित्रता का अनुरोध आया है। जब मुकेश अंबानी और ओसवाल के नाम से ठगी का कारोबार हो सकता है ऐसे में आम आदमी के साथ कुछ भी संभव है।
फेसबुक और व्हाट्स एप आदि के सर्वर देश के बाहर हैं। इन कंपनियों की नीतियां ऐसी हैं कि फर्जी अकाउंट की रिपोर्ट करने पर भी रेडीमेड उत्तर आता है कि हमें इस अकाउंट में कुछ गलत नहीं लगता। केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ही इस मामले को फेसबुक और व्हाट्स एप आदि के साथ सख्ती से उठा सकते हैं क्योंकि पुलिस के लिए भी इन अंतरराष्ट्रीय गिरोहों को नियंत्रित करना तब तक संभव नहीं है जब तक फेसबुक और व्हाट्स एप चलाने वाली मल्टी नेशनल कंपनियां अपनी तरफ से आगे बढ़ कर डिजिटल ठगी को अंजाम देने वाले गिरोहों को पकड़वाने की पहल नहीं करेंगी। अभी उनका रवैया इन्हें संरक्षण देने का है।
डिजिटल ठगी के जो विविध रूप इन दिनों चल रहे हैं उनमें कुछ लोग छोटी छोटी रकम की ठगी करते हैं, जैसे वे आपको कहते हैं कि यदि आपने अमुक अकाउंट में तीन हजार रुपए का बिल तुरंत नहीं भरा तो आपकी बिजली रात दस बजे कट जाएगी । ऐसे ठग दिन में सौ डेढ़ सौ लोगों को निशाना बनाते हैं। ठगी की रकम कम होने से ठगे जाने वाले लोग पुलिस के झमेले में भी नहीं पड़ते।
दूसरे डिजिटल ठग वे हैं जो महिलाओं की कामुक अदाओं की वीडियो काल में थोड़ी चंचल तबियत के लोगों को फंसाकर ब्लैकमेल करते हैं।इज्जत नीलाम होने के डर से ठगे गए लोग कोर्ट कचहरी नहीं जाते। तीसरे सबसे शातिर ठग अमीरों को जांच एजेंसी द्वारा गिरफ्तार करने का डर दिखाकर लाखों करोड़ों की वसूली करने वाले हैं ,जिनका शिकार वर्धमान समूह के मालिक हुए हैं। सबसे ज्यादा बरबाद वे होते हैं जिनका बैंक अकाउंट हैक कर जीवन भर की जमा पूंजी लुट जाती है। कहने के लिए साइबर फ्रॉड सेल बनी हैं लेकिन वहां ऑन लाइन शिकायत करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है जो बुजुर्गों के बस की नहीं है। यदि साइबर पुलिस किसी व्हाट्स ऐप नंबर पर सादा शिकायत करने की सुविधा दे तभी लुटे पिटे लोग अपनी शिकायत आसानी से दर्ज करा सकते हैं अन्यथा लोग चुपचाप लुटते रहेंगे।


