विचार/लेख
3 मार्च विश्व वन्यजीव दिवस
-प्राण चड्ढा
बड़ी खुशी की बात है कि धरती के श्रृंगार वन्यजीवों को बचाना आज एक महत्वपूर्ण अभियान का रूप ले रहा है लेकिन हम उनके रहवास को पर्यटन से जोडक़र उनके मौलिक स्वभाव को तब्दील करते जा रहे हैं। बाजारवाद जंगल में पहुंच कर अपना रंग दिखा रहा है। इस पर विचार करना जरूरी होगा कि हम अपने नेशनल पार्क और सेंचुरी के जीवों के स्वाभाव में जो तब्दीली ला रहे हैं वह क्या गुल खिलायेगा?
टाइगर जंगल का राजा है। आज जब कान्हा और बांधवगढ़ नेशनलपार्क में यह जिप्सी के सामने कैटवाक करते चलता है तब फोटो लेने वाले बेखौफ हो कर पर्यटक शॉट लेने जुट जाते हैं। वह तो जिप्सी में सवार गाइड और ड्राइवर की मेहबानी है कि सम्मानजनक दूरी बनाए टाइगर के आगे या फिर पीछे गाड़ी चलाता है।
बच्चे वाली टाइग्रेस की फोटो लेते समय शावक को यह सबक मिल जाता है कि चाहे तू जंगल का राजा बनेगा पर जिप्सी वाले तेरे से बड़े और मजबूत हैं तभी तुम्हारी मां इनको कुछ नहीं बोल रही। जिप्सी जंगल में तय गति सीमा पर चलती है लेकिन मोड़ पर यदि बच्चे वाली टाइग्रेस हो तो चार में दो या तीन बच्चे मां के साथ रह जाते हैं और शेष सडक़ पार कर जाते हैं। उधर जिप्सी बीच में फोटोग्राफी के लिए रुक जाती है। मां भी बच्चे का इंतज़ार करती दूसरी तरफ खड़ी रहती है। यह वह वक्त होता है जब पीछे रह गया शावक मां से अलग होकर भटक जाता है।
जंगल में अब हाथी पर चढक़र दिखाया जाने वाला टाइगर शो बन्द हो गया है। एक दशक पूर्व ये हाथी टाइगर को घेरे रहते थे और हाथी से सैलानियों को ले जाकर टाइगर दिखाया जाता था। इसके बावजूद अब भी कुछ जंगल में ऐसा है कि टाइगर झाडिय़ों के पीछे हो तो हाथी की सेवा मिल जाती है। यह भी बंद होनी चाहिए। जब सैलानी जंगल में हों तो हाथी और महावत के जंगल जाने पर रोक लगाई जा सकती है।
एक मार्च को छतीसगढ़ के वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने प्रेस क्लब बिलासपुर में कहा कि अचानक मार टाइगर रिजर्व को कान्हा नेशनल पार्क के समान विकसित किया जाएगा। मुझे यह मजाक सुनने की आदत हो गई है। अचानकमार में गर्मी में वन्यजीव पानी को तरसते हैं, जबकि कान्हा में होलोन और बंजर नदी सदानीरा हैं। वहां बड़े-बड़े मैदान में आर्द्र भूमि है, जो बारहसिंघा की पहली पसंद है। शायद वन मंत्री को यह भी नहीं बताया गया होगा कि अचानकमार में दस दिनों से कोई डेढ़ दर्जन हाथी मटरगश्ती कर हैं और उनकी खौफ व सुरक्षा के मद्देनजर सैलानियों की जिप्सी सफारी बंद है।
हाथियों की जंगल में उपस्थिति जंगल और वन्यजीवों के लिए लाभदायक है। उनको अचानकमार में स्थायी रहवास बना लेना चाहिए। छतीसगढ़ के बारनवापारा सेंचुरी में कुछ साल पहले जंगली हाथी पहुंचे। इसके पहले सींग वाले जीव जब सफारी जिप्सी को देखते तो सरपट भाग निकलते थे, लेकिन हाथियों के आने का लाभ मिला। हाथियों ने बैरियर उखाड़ फेकें। सूचना के बोर्ड को झुका दिया। बस यह उनके आधिपत्य का संकेत था, जिसे जंगल में घुसकर शिकार करने वाले, लकड़ी काटने वाले की फिर हिम्मत नहीं हुई। महाकाय शाकाहारी हाथी की पनाह में धीरे-धीरे चीतल, सांभर बेखौफ दिखने लगे और उनकी संख्या भी बढ़ गई। यहां टाइगर नहीं लेकिन तेंदुए की शानदार उपस्थिति दर्ज होती है।
हाथी ऐसा जीव है जो आज तक अपने अस्तित्व और मानव द्वारा कब्जे में की गई जमीन के लिए लड़ रहा है। अचानकमार टाइगर रिजर्व में कुछ टाइगर हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि वे यहां पैदा हुए हैं या फिर कान्हा से अचानकमार को जोडऩे वाले जंगल कॉरिडोर से इधर किन्हीं कारणों से पहुंचे हैं। हाथी यदि इस जंगल को अपना लेते हैं तब पार्क एरिया में बसे 19 गांववालों को सतर्क रहना होगा पर सींग और खुर वाले वन्यजीवों की बढ़ोत्तरी ठीक उसी तरह होगी जैसे बारनवापारा सेंचुरी में हुई है।
-बिल एटकिन
जब पहली बार मैंने गांव की भैंसों को लगभग खड़े पहाड़ पर चढ़ते देखा तो मैं दंग रह गया था। उन्हें ऊपर चढ़ाने के लिये पुचकारना और कई बार धकियाना पड़ता था ताकि वह रास्ते की बाधाओं को फांदें लेकिन जैसे-तैसे वह पिन्नाथ की चोटी तक पहुंच ही जाती थीं। इस जगह को बूढ़ा पिन्नाथ कहते हैं जहां एक प्राचीन मंदिर, भगवान शिव के धर्नुर्धारी रूप को समर्पित है।
पिन्नाथ के सम्मुख पहाड़ी पर नीचे की ओर चौड़ी कोसी जलधारा के साथ जाने पर आपको एक आकर्षक मंदिर मिलता है जिसे मध्यकाल में कुमाऊं के राजाओं ने बनाया था। नीचे बने पिन्नाथ मंदिर पर नदी से सीढिय़ां जाती हैं। मैं पूरा अंदाज़ा तो नहीं लगा सकता लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूं कि इस मंदिर को स्थापित करने में बहुत अधिक श्रम लगा होगा। यहां न तो पानी है और न ही यहां से बर्फ की कोई चोटी दिखती है। घने जंगल में बने इस मंदिर पर पहुंच कर लगता है कि वहां से आगे कोई रास्ता नहीं है लेकिन यहां से पुराने मंदिर पर पहुंचना हो तो आप एक खड़ी चढ़ाई पार कर जा सकते हैं। अगर तंत्र-मंत्र न करना हो तो इस सुदूर वीरान जगह मंदिर बनाने का कोई कारण मुझे समझ नहीं आता। मैं यहां रात को ठहरा और मैंने इस मंदिर से लिपटी भक्ति और समर्पण की बयार महसूस की फिर भी इसे यहां क्यों स्थापित किया गया। यह सवाल मरे लिये अनसुलझा ही रहा।
अपनी हिमायल यात्रा के दौरान मैंने शिव के धनुर्धर रूप को बहुत विराट और शक्तिशाली पाया है। वह कामदेव की तरह आसक्ति के तीर बरसाते हैं और एक बार वह किसी पर्वतारोही को लग गये तो वह हमेशा यहीं का होकर रहेगा। कभी-कभी तो लगता है कि ये पर्वत भी सम्मोहित करने के लिये ऐसे तीर बरसा रहे हों। बर्फ का धवल त्रिभुजाकार शिवलिंग गंगा का मुकुट-स्रोत है लेकिन मैंने उसे हमेशा एक हिम-ज्योति की तरह देखा है। जहां भी आपको शिव मिलेंगे वहां विरोधाभासी प्रतीकों का संगम भी होगा।
फक्कड़ मनमौजी स्वभाव और अपार ऊर्जा के स्रोत भगवान शंकर की छवि बर्फ से ढकी चोटियों से मेल खाती है जबकि संयमी और गंभीर भगवान विष्णु इसके बिल्कुल विपरीत हैं जिनका दैवीय अवतार सहज-सपाट मैदानों जैसा है। हिमालयी इलाकों में रहने वाले अधिकांश लोग शैव हैं और शायद इसके पीछे एक कारण वैष्णव उपासना पद्धति से जुड़ी तमाम कठिनाइयां हैं। पहाड़ों में मज़ाक में कहा जाता है कि विष्णु के अनुयायी नहाने से और शिव के खाने से मर जाते हैं। इस विनोद का चतुर संबंध दोनों के समाजशास्त्र और तौर तरीकों से भी जुड़ा है। अगर आप पहाड़ों पर स्नान कर्म अधिक करें तो मर सकते हैं। कठोर शिवभक्त मंदिर में मिलने वाले प्रसाद से गुजारा करते हैं लेकिन कभी-कभी वह खाने लायक नहीं होता और आपको मार भी सकता है।
अनुवाद - हृदयेश जोशी
महाशिवरात्रि जन्मदिन विशेष
-स्वामी सहजानन्द सरस्वती
महाशिवरात्रि स्वामी सहजानन्द सरस्वती की 134वीं जन्मतिथि है। वर्ष 1889 में इसी दिन गाजीपुर जिले के दुल्लहपुर रेलवे स्टेशन के पास एक छोटे से गाँव देवा में जन्मे नौरंगलाल के स्वामी सहजानन्द बनने की कथा आस्था पर विवेक, श्रद्धा पर विश्लेषण की जीत और खुद के अध्ययन तथा अनुभव से जीवन के प्रति दृष्टिकोण के विकास की जीती जागती कथा है।
संस्कृत और धर्मग्रंथों के प्रकाण्ड ज्ञानी एक धर्मालु स्वामी के सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित एक योद्धा और नायक बनने की दिलचस्प कहानी है। इसे पूरा पढ़ा जाना चाहिए; इसके लिए स्वयं सहजानन्द सरस्वती की लिखी किताब मेरा जीवन संघर्ष में मूल्यवान सामग्री है। इसे अवधेश प्रधानजी के संपादन में ग्रन्थ शिल्पी ने प्रकाशित किया है।
स्वामी सहजानन्द सरस्वती किसान आंदोलन को देशव्यापी नजरिया देने वाले, किसानों को आजादी की लड़ाई में शामिल करते हुए उन्हें सच्ची मुक्ति की लड़ाई के लिए तैयार करने वाले व्यक्ति थे। इन्हीं की पहल और अध्यक्षता में 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुयी और वह आगे बढ़ी-आज भी मौजूदा किसान आंदोलन की सबसे मजबूत और भरोसेमंद आधार बनी हुयी है।
यहां स्वामीजी के पूरे विराट व्यक्तित्व और कृतित्व और योगदान को समेटना तो दूर उसे छुआ तक नहीं जा सकता। सिर्फ कुछ विलक्षण पहलू हैं जिनके बारे में इंगित किया जा सकता है।
1914 में स्वामीजी ने 'शास्त्रों के तंग दायरे से बाहर आकर सार्वजनिक जीवन के प्रवाह में प्रवेश किया।Ó और एक ऐसी हलचल खड़ी कर दी जिसे इससे पहले इतने व्यापक पैमाने पर इस देश ने कभी नहीं देखा था। सोये हुए और अक्सर हताश तथा रोये हुए दिखने वाले किसानों को उन्होंने संघर्ष की अगली कतार में लाकर खड़ा कर दिया। वर्ष 1929 के आते आते सामंतों के खिलाफ यह लड़ाई इतनी बढ़ गयी कि पहले उसने बिहार प्रांतीय किसान सभा और उसके बाद 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का सांगठनिक रूप धारण कर लिया। दोनों ही के शिल्पी स्वामी सहजानन्द सरस्वती थे।
ध्यान देने की बात यह है कि यह सब काम वे उस दौर में कर रहे थे जब ग्रामों पर क्रूर सामंती निजाम का वर्चस्व था और उसकी हिमायत में सिर्फ अंग्रेज भर नहीं थे बल्कि उस जमाने के सबसे बड़े नेता गांधी भी थे। इन तीनों से एक साथ लड़कर आंदोलन खड़ा करना, इन तीनों के विरोध के बावजूद रास्ता तलाशना बड़ा काम था- जो उन्होंने सफलता के साथ किया। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के एजेंडे में किसानो और उनकी मांगों को शामिल करवाया।
मगर वे यहीं तक नहीं रुके। अखिल भारतीय किसान सभा के स्थापना सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में ही उन्होंने साफ कर दिया कि 'किसान पूर्ण स्वतंत्रता के हामी हैं और किसान सभा की लड़ाई किसानों-मजदूरों और शोषितों को पूरी आर्थिक राजनीतिक ताकत दिलाने की लड़ाई है।' यह सिर्फ सत्ता हस्तांतरण तक सीमित मामला नहीं है।
दूसरी बात जिसे उन्होंने ठीक ठीक समझा और जोर देकर कहा वह थी उनकी वर्ग दृष्टि; उन्होंने कहा कि वर्गों में बँटे समाज में वर्गसंघर्ष ही परिवर्तन का जरिया है। वर्ग सहयोग या वर्ग समन्वय की समझदारी से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। एक वेदान्ती दण्डी स्वामी का इस समझदारी तक पहुंचना एक महत्वपूर्ण घटना विकास था- जो उन्होंने समाज को समझने के वैज्ञानिक नजरिये से हासिल किया था।
उन्होंने कहा था कि 'किसानों की तात्कालिक राजनीतिक, आर्थिक मांगों के लिए संघर्ष करते हुए राजनीतिक सत्ता हासिल करने की लड़ाई लड़ी जाएगी। इस लड़ाई के केंद्र में हर तरह की जमींदारी व्यवस्था के खात्मे, लगान की समाप्ति, टैक्स प्रणाली में बदलाव कर उसका ग्रेडेशन, जमीन जोतने वाले को, भूमिहीनों को जमीन तथा कर्ज मुक्ति की मांगे रहेंगी।'
स्वामी जी की तीसरी महत्वपूर्ण धारणा राजनीति में धर्म की घुसपैठ से उनकी सख्त असहमति थी। वे मानते थे कि 'धर्म एक नितांत निजी मामला है। इसे सामाजिक और राजनीतिक विषयों से दूर रखना ही चाहिये। जो ऐसा नहीं करते, धर्म को राजनीति की सीढ़ी बनाते हैं वे न धार्मिक हैं न सामाजिक।' इन दिनों जारी किसान आंदोलन के लिए यह एक बड़ा सूत्र है। धर्म और सामाजिक चेतना के संबंध में स्वामी जी ने लिखा है कि;
'प्रायेण देवमुनय: स्वविमुक्ति कामा-
मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठां-
नैतान विहाय कृपणान विमुमुक्षु एको
नात्यत त्वदस्य शरणं भ्रमतोनुपश्ये!!'
(मुनि लोग स्वामी बनकर अपनी ही मुक्ति के लिए एकांतवास करते हैं। लेकिन मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता। सभी दुखियों को छोड़ मुझे सिर्फ अपनी मुक्ति नहीं चाहिए। मैं तो इन्ही के साथ रहूँगा, जीऊँगा और मरूँगा।)
यह स्वामी सहजानन्द सरस्वती थे जिनकी अध्यक्षता में अक्टूबर 1937 में कलकत्ता में हुयी अखिल भारतीय किसान सभा की सीकेसी बैठक ने लाल झण्डे को अपना झण्डा बनाया। इस बैठक में बोलते हुए स्वामी जी ने कहा था कि 'मुक्ति की लड़ाई अकेले किसानों की नहीं है। इसकी धुरी किसानों, खेत मजदूरों, गरीब किसानों और मजदूरों की एकता है। इसलिए उनके औजार ही इस झण्डे के प्रतीक निशान होने चाहिए।' इसके लिए उन्हें न केवल दूसरों बल्कि समाजवादियों से भी जूझना पड़ा था।
संगठन-व्यापक किसान संगठन के बारे में स्वामीजी की समझ द्वंद्वात्मक थी। वे एक तरफ एकजुट और व्यापक किसान संगठन के हामी थे वहीँ इसी के साथ वे किसान सभा को राजनीतिक पार्टी या उसके संलग्नक में बदलने के पक्ष में नहीं थे। वे स्वयं राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय रहते हुए और किसानो सहित आम मेहनतकशों को राजनीतिक भूमिका निबाहने के लिए प्रेरित करते हुए भी, मानते थे कि व्यापक और सर्वसमावेशी किसान एकजुटता वाले संघर्षों में शामिल होकर, अपने तजुर्बों से ही किसान सही राजनीतिक निष्कर्ष और मुकाम तक पहुंचेगा।
इसी के साथ वे मानते थे कि किसान सभा को असली पीडि़त किसानो का संगठन बनना चाहिए। वर्ष 1944 में अखिल भारतीय किसान सभा के सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा था कि 'मध्यम और बड़े किसान आज किसान सभा का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं जबकि हम उसका उपयोग सबसे गरीब और छोटे तबकों में वर्ग चेतना जगाने के लिए करना चाहते हैं। हमारे विचार में किसान वही हैं जो या तो भूमिहीन हैं या जिनके पास बहुत कम जमीन है। ऐसे ही सर्वहारा लोगों संगठन किसान सभा है और आखिर में वैसे ही लोग असली किसान सभा बनायेंगे। 'जमींदारों के खिलाफ स्वामी जी का मशहूर नारा था।' 'कैसे लोगे मालगुजारी, ल_ हमारा जिंदाबाद !!'
ऐसे स्वामी सहजानन्द सरस्वती भारत के किसान आंदोलन के पुरखे हैं- और जिनके ऐसे पुरखे होते हैं वे लड़ाईयों को जीतने तक जारी रखने का माद्दा रखते हैं।
-आयुष चतुर्वेदी
आस्तिकता और नास्तिकता के बीच जूझती मानवता में जब भी ईश्वर के बारे में सोचता हूँ तो पहला चेहरा शिव का दिखता है बचपन से ही। बाई डिफॉल्ट।
तमाम बहसें की जा सकती हैं कि शिव काल्पनिक हैं या वास्तविक। यह बहसें ज़रूरी भी हैं। लेकिन शिव लोक के देवता हैं। लोगों के देवता। आप उस गरीब किसान-मजदूर को नास्तिकता का कौन-सा चैप्टर पढ़ाएंगे जो रोजाही के बीस रुपये कमाकर भी बाबा को धन्यवाद देता है।
शिव उसके बाबा हैं। भोले बाबा। शंकर।
पिंडी पर टिकुली सटा के उसे शंकर बना देने वाले बच्चे से जबरन उसका शंकर कहाँ से छीन पाएंगे हम? चलिए थोड़ी-सी आस्तिकता बची रहने देते हैं उसके अंदर। और शिव सोने-चांदी वाले देवता नहीं हैं। हीरे-जवाहरात उनके लिए नाक के बाल बराबर हैं। शिव को देवों ने पूजा, दानवों ने भी। आज भी शिव को जमींदार भी पूजते हैं, मजदूर भी। लेकिन शिव मजदूरों के ही साथ हैं। अगर हैं तो!
जानवरों, पेड़-पौधों, बर्फ-पहाड़ के साथ जीने वाले शिव मजलूमों की नुमाइंदगी करते हैं। तमाम सवाल किए जा सकते हैं, तर्क दिए जा सकते हैं कि शिव थे ही नहीं। मैं भी कह रहा हूँ नहीं थे। लेकिन शिव के होने के लिए क्या शिव का होना जरूरी है?
क्या बर्फ, जानवर, साँप, नदी, चाँद, पहाड़ का होना शिव का होना नहीं है? आज के शिव यही हैं। तमाम पर्यावरणविदों से बड़े पर्यावरणविद। अपने-आप में एक क्रांतिकारी और एक विद्रोही-शंकर!
प्रकृति से प्रेम करना, दुनिया से प्रेम करना, लोगों से प्रेम करना, दबाए गए और उपेक्षित हुए लोगों से खासा स्नेह-सहानुभूति और सॉलिडैरिटी रखना भी शिव से सीखा जा सकता है। शिव कुछ नहीं तो एक प्रतीक हैं, एक ऐसे प्रतीक कि जिसके मूल्यों के बिना मनुष्य शव समान है।
और उन मूल्यों के साथ शिव समान।
शिव के नाम पर गांजा पीकर, सुट्टा मारकर, भांग पीसकर पीने से आप खुद के साथ-साथ शिव का भी गला घोंट रहे हैं। शिव के नाम पर दूध की नदियाँ ज़मीन पर बहाकर आप शिव को डुबा रहे हैं। शिव का होना यह होना नहीं है।
एक बच्चे की पूजा की अलमारी में छोटी-सी पत्थर की पिंडी ही शिव है। पत्थरों में शिव हैं, और उस पत्थर को पीसकर अपने कारखानों और इमारतों की बुनियाद बनाने वाले लोग ढोंगी हैं। वे शिव को पीस रहे हैं। इस सभ्यता ने शिव जैसों को पीसा ही तो है।
एक पेड़ को सोफा बनने से अगर आप बचा लेते हैं तो आप शिव को बचा लेते हैं। चिपको आंदोलन में पेड़ से चिपकना था। वो चिपकना बचा रहे, तभी शिव बचे रहेंगे।
और शिव करें, कि शिव को कभी राजनीति में न लाया जाए। और राम जैसा हश्र किसी देवता का न हो!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
यूक्रेन का संकट उलझता ही जा रहा है। बेलारूस में चली रूस और यूक्रेन की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। इतना ही नहीं, पूतिन ने परमाणु-धमकी भी दे डाली। इससे भी बड़ी बात यह हुई कि यूक्रेन के राष्ट्रपति झेलेंस्की ने यूरोपीय संघ की सदस्यता के लिए औपचारिक अर्जी भी भेज दी। झगड़े की असली जड़ तो यही है। झेलेंस्की की अर्जी का अर्थ यही है कि रूसी हमले से डरकर भागने या हथियार डालने की बजाय यूक्रेन के नेताओं ने गजब की बुलंदी दिखाई है।
रूस भी चकित है कि यूक्रेन की फौज तो फौज, जनता भी रूस के खिलाफ मैदान में आ डटी है। पूतिन के होश इस बात से फाख्ता हो रहे होंगे कि नाटो की निष्क्रियता के बावजूद यूक्रेन अभी तक रूसी हमले का मुकाबला कैसे कर पा रहा है। शायद इसीलिए उन्होंने परमाणु-युद्ध का ब्रह्मास्त्र उछालने की कोशिश की है।
संयुक्तराष्ट्र संघ की महासभा ने अपने इतिहास में यह 11 वीं आपात बैठक बुलाई थी लेकिन इसमें भी वही हुआ, जो सुरक्षा परिषद में हुआ था। दुनिया के गिने-चुने राष्ट्रों को छोड़कर सभी राष्ट्रों में रूस के हमले की निंदा हो रही है। खुद रूस में पूतिन के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस वक्त झेलेंस्की द्वारा यूरोपीय संघ की सदस्यता की गुहार लगाने से यह सारा मामला पहले से भी ज्यादा उलझ गया है।
अब अपनी नाक बचाने के लिए पूतिन बड़ा खतरा भी मोल लेना चाहेंगे। यदि झेलेंस्की कीव में टिक गए तो मास्को में पूतिन की गद्दी हिलने लगेगी। अभी यूक्रेन में शांति होगी या नहीं, इस बारे में कुछ भी कहना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में भारत के लगभग 20 हजार नागरिकों और छात्रों को वापस ले आना ही बेहतर रहेगा। इस संबंध में भारत के चार मंत्रियों को यूक्रेन के पड़ौसी देशों में तैनात करने का निर्णय नाटकीय होते हुए भी सर्वथा उचित है। हमारे लगभग डेढ़ हजार छात्र भारत आ चुके हैं और लगभग 8 हजार छात्र यूक्रेन के पड़ौसी देशों में चले गए हैं। हमारी हवाई कंपनियां भी डटकर सहयोग कर रही हैं।
यदि यह मामला लंबा खिंच गया तो भारत के आयात और निर्यात पर गहरा असर तो पड़ेगा ही, आम आदमी के उपयोग की चीजें भी मंहगी हो जाएंगी। भारत की अर्थ-व्यवस्था पर भी गहरा कुप्रभाव हो सकता है। इस संकट ने यह सवाल भी उठा दिया है कि भारत के लगभग एक लाख छात्र मेडिकल की पढ़ाई के लिए यूक्रेन, पूर्वी यूरोप और चीन आदि देशों में क्यों चले जाते हैं? क्योंकि वहां की मेडिकल पढ़ाई हमसे 10-20 गुना सस्ती है। क्या यह तथ्य भारत सरकार और हमारे विश्वविद्यालयों के लिए बड़ी चुनौती नहीं है? स्वयं मोदी ने 'मन की बातÓ में इस सवाल को उठाकर अच्छा किया लेकिन उसके लिए यह जरुरी है कि तत्काल उसका समाधान भी खोजा जाए। (नया इंडिया की अनुमति से)
- प्रकाश दुबे
चुनाव और होली के मौसम में गाली का बुरा नहीं मानते। इस सूची में अब संसद और विधानसभाएं शामिल होने की दावेदारी कर रही हैं। ताजी पेशकश राजस्थान विधानसभा में हुई। अशोक गहलोत सरकार के बजट का चीर हरण करते हुए सतीश पूनिया सौंदर्यशास्त्र की मिसाल देने लगे-काली औरत ब्यूटी पार्लर में जाकर चेहरा चमका सकती है। बजट का हाल वही है। यानी काली कलूटी का मेक अप कर दिया गया है। रंगभेद की नीति से गांधी जी लड़े थे। महात्मा गांधी की हत्या के 74 साल बाद महिलाएं भडक़ गईं। पूनिया का पद उनकी परेशानी बन गया। भाजपा की राजस्थान इकाई के अध्यक्ष होने के नाते अपनी पार्टी का ऐतराज ध्यान में आया। आपस में अनबन है। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का विरोध भारी पड़ता। सदन में विरोध के साथ साथ महिला आयोग की तलवार म्यान से निकल आई। पूनिया समझदार हैं। उन्होंने अपने काले कलूटे शब्द वापस लेने में ही खैर समझी।
टीचर्स स्पेशल
निराला, पंत, महादेवी, धर्मवीर भारती, फिराक गोरखपुरी समेत सैकड़ों कलम धनाढ्यों और शिक्षकों की भूमि में चुनाव प्रचार बस समाप्त होने वाला था। देश को सबसे अधिक नौकरशाह देने की शोहरत रखने वाला इलाहाबाद अब प्रयागराज है। विद्यार्थियों का जत्था प्रियंका गांधी के पास पहुंचा। उन्हें अपनी विपदा सुनाई। महामारी और कुंभ की डुबकी लगाने के कारण शिक्षा केन्द्र के विद्यार्थी गुरुजनों और संस्थान की शक्ल देखने से वंचित रह गए। कहने को केन्द्रीय विवि है और उसके सिवा दो और। विद्यार्थियों की समस्या है कि पढ़ाई तो आन लाइन हुई। अब परीक्षा आफ लाइन होगी यानी परीक्षा भवन में जाकर परचा देना होगा। विद्यार्थी इसके लिए तैयार नहीं हैं। प्रियंका को ज्ञापन देते समय वर्षा गायकवाड़ हाजिर थीं। वर्षा शिक्षा मंत्री हैं, परंतु महाराष्ट्र की। देश भर की शिक्षा की बागडोर संभालने वाले धर्मेन्द्र प्रधान विधानसभा चुनाव के प्रभारी हैं और युवा मामलों के मंत्री अनुराग ठाकुर सहप्रभारी।

आफिसर्स च्वाइस
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पढ़ाकू जहां जाते हैं, अपनी छाप छोड़ते हैं। विवि को बदनाम करने वाले उनकी इस गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखते। विजय कुमार का ही उदाहरण लो। भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी में आने के बाद छत्तीसगढ़ के नक्सली उपद्रव ग्रस्त में पहुंचे। कलूरी जैसे उस्ताद के साथ काम करने का अवसर मिला। कलूरी तो पत्रकारों की ठुकाई के कारण बदनाम हुए। विजय कुमार को हाले कश्मीर दुरुस्त करने श्रीनगर रेंज का पुलिस महानरीक्षक बनाया गया। फुर्तीले विजय ने आतंकवादियों और उनकी नजऱ में शरारती पत्रकारों को दुरुस्त करना शुरु किया। दो टूक बोलने वाले पुलिस महानरीक्षक दो टूक बोलने से नहीं हिचके। उपराज्यपाल के किसी कथन पर कहा-नेता अपने तरीके से बात करते हैं। हम अपने तरीके से काम करते हैं। विजय कुमार को पदोन्नत कर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बनाने के प्रस्ताव पर विभागीय समिति की मुहर लग चुकी है। तरक्की नहीं हुई। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के उत्तर प्रदेश में व्यस्त होने के कारण नहीं। फिलहाल पद रिक्त नहीं है।

रायल चेलैंज
मौसम है घूमने फिरने का। नासमझ चुनाव प्रचार करते घूमते हैं। समझदार समितियों और सरकारी दौरों के बहाने लक्षदीप, कश्मीर और अंडमान एक करते हैं। नहीं नहीं। सावरकर और काला पानी जेल के कारण पर्यटन केन्द्र बने पोर्ट ब्लेयर पहुंचना आसान नहीं है। एकमात्र रन वे को दुरुस्त करने के लिए सप्ताह में चार पांच दिन हवाई अड्डे पर जहाजों के उडऩे उतरने पर रोक रहेगी। सैलानी नहीं पहुंचेंगे तो एकमात्र व्यापार से जुड़े लोगों की कमाई बंद। वैसे भी महामारी ने बेहाल कर रखा है। सांसद कुलदीप राय शर्मा ने उपराज्यपाल की देहरी पर दस्तक दी। बात नहीं बनी। प्रधानमंत्री से गुहार लगाई। उनका सुझाव है कि रोजाना चार पांच घंटे विमानों की आवाजाही जारी रखी जाए। सोशल मीडिया पर ज्योतिरादित्य महाराज को कहते दिखाया जा रहा है-एयर इंडिया का महाराजा टाटा कर गया। यूक्रेन से प्रवासी भारतीयों को कैसे लाऊं? राजीव गांधी भवन के तो पंख नहीं हैं। सोशल मीडिया के शैतान बहकावे में मत आना। केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रवासियों की वापसी में व्यस्त हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सात-आठ वर्षों में न जाने कितनी बार अपने 'मन की बात' आकाशवाणी से प्रसारित की है। विपक्षी दलों ने यह कहकर कई बार उसकी मजाक भी उड़ाई है कि यह अपना प्रचार करने का एक नया पैंतरा मोदी ने मारा है। देश के ज्यादातर बुद्धिजीवी इस मन की बात पर कोई खास ध्यान भी नहीं देते लेकिन इस बार उन्होंने जो मन की बात कही है, वह वास्तव में मेरे मन की बात है। मातृभाषा दिवस पर ऐसी बात अब तक किसी प्रधानमंत्री ने की हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। मोदी ने मातृभाषा के प्रयोग पर जोर देने के लिए सारे भारतीयों का आह्वान किया है। लेकिन उनसे मैं पूछता हूं कि पिछले 7-8 साल में सरकारी कामकाज में मातृभाषाओं का कितना काम-काज बढ़ा है। अभी भी हमारे विश्वविद्यालयों में ऊँची पढ़ाई और शोध-कार्य की भाषा अंग्रेजी ही है। देश की संसद के कानून अभी भी अंग्रेजी में ही बनते हैं। हमारी अदालतों की बहस और फैसले अंग्रेजी में ही होते हैं। जब सारे महत्वपूर्ण कार्य अंग्रेजी में ही चलते रहेंगे तो मातृभाषाओं को कौन पूछेगा?
अंग्रेजी महारानी और सारी मातृभाषाएं उसकी नौकरानियां बनी रहेंगी। अपने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री श्री ज.प्र. नड्डा और डॉ. हर्षवर्द्धन ने मुझसे वायदा किया था कि मेडिकल की पढ़ाई वे हिंदी में शुरु करवाएंगे लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक कुछ नहीं किया। हॉं. मप्र की चौहान-सरकार इस मामले में चौहानी दिखा रही है। उसके स्वास्थ्य मंत्री विश्वास नारंग की पहल पर मेडिकल की पाठ्यपुस्तकें अब हिंदी में तैयार हो रही हैं। मैंने और सुदर्शनजी ने अटलबिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय भोपाल में इसी लक्ष्य के लिए बनवाया था लेकिन वह भी फिसड्डी साबित हो गया। जब आप राष्ट्रभाषा हिंदी में यह बुनियादी काम भी शुरु नहीं करवा सके तो अब आपके 'मन की बात' सिर्फ 'जुबान की बात' बनकर रह गई या नहीं? इस काम की आशा मैं डॉ. मनमोहनसिंह से तो कतई नहीं कर सकता था लेकिन यदि यह काम नरेंद्र मोदी जैसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक नहीं करवा सकता तो कौन करवा सकता है? मोदी को यह भी पता होना चाहिए कि चीनी भाषा (मेंडारिन) चीन में ही सर्वत्र न समझी जाती है और न ही बोली जाती है। चीन के सैकड़ों गांवों और शहरों में घूम-घूमकर मैंने यह अनुभव किया है। जबकि भारत ही नहीं, दुनिया के लगभग दर्जन भर देशों में हिंदी बोली और समझी जाती है। हमारे नेता जिस दिन नौकरशाहों के वर्चस्व से मुक्त होंगे, उसी दिन हिंदी को उसका उचित स्थान मिल जाएगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
मैंने कल लिखा था कि यूक्रेन में रूस अपनी कठपुतली सरकार जब तक नहीं बिठा लेगा, वह चैन से नहीं बैठेगा। यूक्रेन के नेता कितनी ही बहादुरी के बयान झाड़ते रहें, उनकी हालत खस्ता हो चुकी है। सैकड़ों लोग मर चुके हैं, कई भवन ध्वस्त हो गए हैं और राजधानी कीव पर भी रूसी कब्जा बढ़ता चला जा रहा है। सुरक्षा परिषद में रूसी वीटो ने संयुक्तराष्ट्र संघ को नाकारा बना दिया है। बड़ी-बड़ी डींग मारनेवाले नाटो राष्ट्रों और अमेरिका ने यूक्रेन की रक्षा के लिए अभी तक अपना एक भी सैनिक नहीं भेजा है।
रूसी नेता पूतिन को पता है कि नाटो राष्ट्रों के भरोसे खम ठोकनेवाले यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदोमीर झेलेंस्की का मनोबल गिर चुका है। उन्हें इस बात का अंदाज है कि यह युद्ध लंबा खिंच गया तो यूक्रेन 30-40 साल पीछे चला जाएगा और हजारों लोग मारे जाएंगे। स्वयं झेलेंस्की और उनके मंत्रियों का जिंदा रहना भी मुश्किल हो जाएगा। इसीलिए पूतिन का बातचीत का निमंत्रण तो झेलेंस्की ने स्वीकार कर लिया है लेकिन वे यह शांति-वार्ता बेलारुस में नहीं करना चाहते हैं।
उनका आरोप है कि रूसी हमले में बेलारुस की भूमिका सबसे ज्यादा घृणित रही है। उन्होंने ऐसे कई देशों के वैकल्पिक नाम सुझाएं हैं, जो सोवियत संघ के वारसा पेक्ट के सदस्य भी रहे हैं और पड़ौसी यूरोपीय देश भी हैं। मुझे लगता है कि पूतिन मान जाएंगे। यदि वे मान गए तो यूरोप को ही नहीं, सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को गड्ढ़े में गिरने से वे बचा लेंगे।
यदि यह युद्ध एक हफ्ते भी चलता रहा तो यूक्रेन और रूस तो आत्मघात का मार्ग अपने लिए खोल ही लेंगे, नाटो राष्ट्रों की भी बधिया बैठने लगेगी। यूरोप की संकटग्रस्त अर्थ-व्यवस्था से भारत जैसे राष्ट्रों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमेरिका के कई राष्ट्र भी रूस की तरह डंडे के जोर पर अपने पड़ौसियों से निपटने के लिए प्रेरित होंगे। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद राष्ट्रों के सैन्य-खर्च में जो कटौती हुई थी, वह अब दुगुने जोश के साथ बढ़ सकती है।
अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के वर्तमान समीकरणों को भी यूक्रेन का युद्ध नई दिशा में ठेल रहा है। अब रूस और चीन मिलकर विश्व राजनीति पर अपना वर्चस्व जमाने की पूरी कोशिश करेंगे। अब शायद भारत को नेहरु, नासिर और नक्रूमा की गुट-निरपेक्षता को फिर से जिंदा करने की जरुरत पड़ सकती है। यह केवल संयोग नहीं है कि अमेरिका के बाइडन, रूस के पूतिन और यूक्रेन के झेलेंस्की ने भी मोदी से बात करना जरुरी समझा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
यूक्रेन को पानी पर चढ़ाकर अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्र अब उसके साथ झूठी सहानुभूति प्रकट कर रहे हैं। सुरक्षा परिषद में अमेरिका ने रूस की निंदा का प्रस्ताव रखा लेकिन उसे क्या यह पता नहीं था कि उसका प्रस्ताव औंधे मुंह गिर पड़ेगा? अभी तो सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 11 ने ही उसका समर्थन किया था, यदि पूरी सुरक्षा परिषद याने सभी 14 सदस्य भी उसका समर्थन कर देते तो भी वह प्रस्ताव गिर जाता, क्योंकि रूस तो उसका निषेध (वीटो) करता ही!
वर्तमान अमेरिकी प्रस्ताव पर तीन राष्ट्रों—भारत, चीन और यू.ए.ई. ने परिवर्जन (एब्सटैन) किया याने वे तटस्थ रहे। इसका अर्थ क्या हुआ? यही कि ये तीनों राष्ट्र रूसी हमले का न समर्थन करते हैं और न ही विरोध करते हैं। चीन ने अमेरिकी प्रस्ताव का विरोध नहीं किया, यह थोड़ा आश्चर्यजनक है, क्योंकि इस समय चीन तो अमेरिका का सबसे कड़क विरोधी राष्ट्र है। रूस तो उम्मीद कर रहा होगा कि कम से कम चीन तो अमेरिकी निंदा-प्रस्ताव का विरोध जरुर करेगा।
जहां तक भारत का सवाल है, उसका रवैया उसके राष्ट्रहित के अनुकूल है। वह रूस-विरोधी प्रस्ताव का समर्थन कैसे करता? अमेरिका और नाटो राष्ट्रों के साथ बढ़ते हुए संबधों के बावजूद आज भी भारत को सबसे ज्यादा हथियार देने वाला राष्ट्र रूस ही है। रूस वह राष्ट्र है, जिसने शीतयुद्ध-काल में भारत का लगभग हर मुद्दे पर समर्थन किया है। गोवा और सिक्किम का भारत में विलय का सवाल हो, कश्मीर या बांग्लादेश का मुद्दा हो, परमाणु बम का मामला हो— रूस ने हमेशा खुलकर भारत का समर्थन किया है जबकि यूक्रेन ने संयुक्तराष्ट्र संघ में जब भी भारत से संबंधित कोई महत्वपूर्ण मामला आया, उसने भारत का विरोध किया है।
चाहे परमाणु-परीक्षण का मामला हो, कश्मीर का हो या सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का मामला हो, यूक्रेन ने भारत-विरोधी रवैया ही अपनाया है। भारत ने उससे जब भी यूरेनियम खरीदने की पहल की, वह उसे किसी न किसी बहाने टाल गया। ऐसी हालत में भारत यूक्रेन को रूस के मुकाबले ज्यादा महत्व कैसे दे सकता था? उसने खुले-आम रूस का साथ नहीं दिया, यह अपने आप में काफी रहा।
भारत ने मध्यस्थता का मौका खो दिया, यह उसकी मजबूरी थी, क्योंकि उसके पास कोई अनुभवी और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से प्रतिष्ठित नेता या राजनयिक ही नहीं है लेकिन वह चाहता तो अपने 20 हजार छात्रों को युद्ध के पहले ही वहां से निकाल लाता। यदि उसके पास व्यावसायिक जहाज उपलब्ध नहीं हैं और उनका किराया बहुत ज्यादा है तो हमारी वायुसेना के जहाज क्या दूध दे रहे हैं? सरकार उन्हें सैकड़ों उड़ान भरने के लिए क्यों नहीं कहती?
कीव स्थित हमारे दूतावास की निश्चिंतता सचमुच आश्चर्यजनक है। मुझे नहीं लगता कि रूस का यह हमला कुछ घंटों में खत्म हो जाएगा। यह तब तक चलेगा, जब तक कीव में रूसपरस्त सरकार की स्थापना नहीं हो जाती। यदि वैसा हो गया तो अमेरिका के गले में नई फांस फंस जाएगी। अरबों-खरबों डालरों की मदद की जो घोषणाएं नाटो राष्ट्र अभी कर रहे हैं, क्या तब भी वह यूक्रेन को मिलती रहेगी? रूस पर प्रतिबंधों की घोषणाएं जरुर हो रही हैं लेकिन नाटो राष्ट्रों के लिए भी ये घोषणाएं दमघोंटू ही सिद्ध होंगी। (नया इंडिया की अनुमति से)
-अंजलि मिश्रा
अपने शरीर से अलग होने पर उस कटे हुए हिस्से का दर्द सदा साथ रहता है।
पाकिस्तान के अलग हो जाने का दर्द हर भारतीय जानता है। पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब अपने देश से अलग हुवा वो हिस्सा किसी और के बहकावे में आकर हमारे लिए खतरा बन जाए। पाकिस्तान का यहाँ भी उदाहरण दिया जा सकता है।
यही हाल यूक्रेन का भी है। यूक्रेन को अमेरिका ने बहकाया विश्वास दिलाया उसकी रक्षा करेगा उसे नाटो में शामिल करेगा, बदले में यूक्रेन की जो सीमा रूस के सबसे नजदीक थी वहाँ तक अमेरिकी सेनाओं ने अपने सैनिकों की गतिविधि शुरू कर दी।
रूस का विघटन होने पर उससे अलग हुए देशों का रूस के बदले अमेरिका की तरफ झुकना रूस के लिए सुखदायी तो नहीं ही था।
लेकिन अमरीका ने रूस के विघटन को एक अवसर के रूप में लिया उसने इसे दो बड़े देशों के बीच संघर्ष का अंत ना मानते हुए शांत रहने के बदले अपने फायदे में इस अवसर को तबदील करने में ज्यादा रुचि ली।
आज लोग रूस जो कर रहा है उसे देख रहे लेकिन रूस के विघटन के बाद अमेरिका ने क्या क्या किया वो भूल गए।
आज यूक्रेन को युद्ध में ढकेल कर अमेरीका सिर्फ बयानबाजी में लगा है।
अलग होकर भी देश अलग नहीं होते कुछ जुड़ा रहता है। जैसे हम पाकिस्तान से जुड़े है।
पाकिस्तान के जरिए आतंकवाद का भारत में आना पाकिस्तान का चीन का साथ देना ये सब हम देख चुके हैं आज आम भारतीयों के मन में पाकिस्तान को लेकर नफरत की भावना है।
पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच जीतना नाक का सवाल बन जाता है। नेताओं ने इस भावना को कैश करवाया वो हर बात में पाकिस्तान के प्रति बयानबाजी करते ही रहते है।
हमारी इस नफरत का फायदा पाकिस्तान के सियासतदारों और भारत के दोनों ने काफी उठाया है। अलग होने के इतने वर्षों बाद भी हम मन से पाकिस्तान से अलग नहीं हो पाये, हो जाते तो उसके प्रति असंवेदनशील बन जाते लेकिन हम पाकिस्तान में क्या बुरा हुआ इसकी ज्यादा चिंता करते है इसके इतर यूक्रेन पर जब रूस ने हमला किया तो वहा के हजारों नागरिक नो वार की तखती टांगे सडक़ पर पुतिन के विरोध में खड़े दिखे। वो पुतिन को हीरो मानते है फिर भी उन्होंने युद्ध का विरोध किया, पुतिन का साथ नहीं दिया।
इस दुनिया ने युद्ध की विभीषिका देखी है कोई भी सभ्य देश युद्ध को आज जायज नहीं मानता हर कोई जानता है कि युद्ध में आम लोग ही परेशानी झेलते है।
हमारे देश में कई ऐसे समाचार चैनल है जो भारत और चीन के बीच विवाद होते ही मोदी चीन को धूल चटा दिए युद्ध को लेकर जरूरत से ज़्यादा उन्मादी दिखते है। फेसबुक में युद्ध विरोधी बयान पर लोग देशद्रोही बोल कर पाकिस्तानी चले जाओ कि बात करते दिखने लगते है।
रूसी लोग हमसे बेहतर मिसाल रख कर दिखा दिए कि नेताओं की सोच जनता की सोच नहीं होती।
युद्ध विरोधी बनिए।
-हेमंत कुमार झा
80 के दशक में रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में अमेरिका अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर था।
शीत युद्ध अपने अंतिम दौर में था और सोवियत बिखराव ने दुनिया को दो ध्रुवीय से एक ध्रुवीय में बदल दिया था।
अब अमेरिका दुनिया का दारोगा था और ब्रिटेन उसका सबसे विश्वासप्राप्त हवलदार। कभी कभार किसी मुद्दे पर ना नुकुर करते फ्रांस और जर्मनी भी उसकी हवलदारी ही करते रहे।
अपनी एकछत्र दबंगई का अमेरिका ने जम कर दुरुपयोग किया। नाटो कहने को कई देशों का सैन्य संगठन था लेकिन मर्जी मूलत: अमेरिका की ही चलती रही। जिधर अमेरिकी हांक पड़ी, नाटो की सेना ने उधर कूच किया।
अपनी एकछत्रता के साथ ही आर्थिक और सैन्य ताकत का दुरुपयोग करते हुए अमेरिका ने तमाम विश्व संस्थाओं को अपना बंधक बना लिया और भूमंडलीकरण के बहाने आर्थिक उदारवाद के अश्वमेध के घोड़े को दुनिया के तमाम देशों में विचरने भेज दिया।
‘ढांचागत समायोजन’...यही वे शब्द थे जो किसी भी वैश्विक वित्तीय संस्थान से कर्ज लेने वाले गरीब देशों के लिये शर्त्त के तौर पर कहे जाते थे।
यानी...हमारी कम्पनियों के लिए बाजार खोलो, हमारी आर्थिक शर्ते मानो, अपने मजदूरों के श्रम अधिकारों को छीनो, उन्हें आदमी मानना बंद करो, हमारी कंपनियां अपनी शर्तों पर उनसे काम लेंगी और फिर एक दिन निचोड़ कर बाहर फेंक देंगी।
दुनिया के तमाम तेल भंडारों और अन्य संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा कायम करने के लिये न जाने कितने निर्मम रक्तपात किए गए, विरोध करने वाले कितने राष्ट्र प्रमुखों को कुर्सी से बेदखल किया गया, उनकी निर्मम हत्या की गई।
भूमंडलीकरण अमेरिकीकरण का ही एक दूसरा रूप बन कर दुनिया के सामने आया।
नैतिक पतन ने अमेरिका को एक दिन इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि डोनाल्ड ट्रंप जैसा नेता वहां का राष्ट्रपति बना।
फिर...बाइडन साहब आए।
इस बीच गंगा, नील, अमेजन आदि नदियों में बहुत सारा पानी बह चुका।
कभी नाटो का द्वंद्व सोवियत झंडे तले ‘वारसा पैक्ट’ नामक सैन्य समझौते से जुड़े देशों के साथ था। सोवियत विघटन के साथ ही वारसा पैक्ट अस्तित्वहीन हो गया।
लेकिन...नाटो बना रहा, जबकि विश्व राजनीति की नैतिकता का तकाजा था कि इसे भी भंग हो जाना चाहिए था।
पर, दुनिया को अपनी मु_ी में करने और रखने के लिए नाटो को बनाए रखना जरूरी था।
खाड़ी युद्ध नाटो की बर्बरता और अनैतिकता का ऐतिहासिक दस्तावेज बना।
नाटो को न सिर्फ बनाए रखा गया बल्कि इसका विस्तार करते हुए नए-नए देशों को इससे जोड़ा भी जाता रहा।
जिस मुक्त आर्थिकी और बाजार की निर्ममता के सिद्धांतों पर अमेरिका चलता रहा, उसे बड़ी चुनौती 2008 की मंदी से मिली। वह सोचने पर मजबूर हुआ लेकिन सोचने से अधिक करने की जरूरत थी। वह किया नहीं जा सका। अमेरिका में बेरोजगारी का आलम और निम्न मध्यवर्ग का असंतोष बढ़ता ही गया।
बढ़ती बेरोजगारी और मांग-आपूर्ति का संकट मजबूत से मजबूत अर्थतंत्र को हिला देता है। अमेरिका भी हिलने लगा।
अब उसके राष्ट्रपति की वह धमक नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। बराक ओबामा अंतिम अमेरिकी राष्ट्रपति हुए जिनकी इज़्जत दुनिया करती थी। उनके उत्तराधिकारी ट्रम्प ने दुनिया के इस सर्वाधिक शक्तिशाली पद की गरिमा को जी भर कर पलीता लगाया। फिर, बाइडन के आते-आते अमेरिका अपनी बढ़ती हुई भीतरी कमजोरी को भांप दुनिया भर में फैले अपने जाल को समेटने की कोशिश में लगा।
अफगानिस्तान से अमेरिकी सैन्य वापसी ने तालिबान को मौका मुहैया कराया ही, अमेरिकी प्रतिष्ठा को भी बट्टा लगाया।
नाटो का विस्तार करते-करते वह यूक्रेन को इसमें शामिल करने की मंशा तक पहुंच गया। रूस विरोधी और उससे भी अधिक पुतिन विरोधी यूक्रेनी नेता जेलेन्स्की को अमेरिका पर भरोसा था कि वह संकट में साथ देगा। नाटो के बल का भ्रम उन्हें ऐसा हुआ कि उन्होंने पुतिन की चुनौती को हल्के में ले लिया।
इधर पुतिन, जो मूलत: तानाशाह हैं, को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने, रूस की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिये कुछ न कुछ खुराफात तो करते ही रहना है।
जिस पुतिन ने कभी बिल क्लिंटन को कहा था कि रूस को भी नाटो में शामिल कर लो, उन्हें यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की संभावना से ही भारी प्रतिक्रिया हुई। यह स्वाभाविक भी था। यूक्रेन की सत्ता रूस विरोधी राजनीति की ही उपज है। रूस कैसे स्वीकार करता कि उसे नाटो का संरक्षण मिले।
पुतिन ने रूस को आर्थिक स्तरों पर कम, सैन्य स्तरों पर बहुत अधिक मजबूत किया। आज रूस इतना शक्तिशाली है कि उसने यूक्रेन पर हमला कर दिया और तमाम यूरोपीय देश राजनाथ टाइप ‘कड़ी निंदा’ से आगे नहीं बढ़ पाए। रूस से सैन्य पंगा लेने के अपने खतरे हैं जिन्हें यूरोप के लोकतांत्रिक नेतागण समझते हैं। पुतिन का क्या है, वे तो तानाशाह हैं। जलते हुए रूस के ऊपर पियानो बजाती अपनी तस्वीर डालने में भी उन्हें संकोच नहीं होगा।
यूक्रेन संकट ने अमेरिका की रही सही प्रतिष्ठा में भी बट्टा लगा दिया। राष्ट्रपति बाइडन की यह घोषणा कि ‘अमेरिका रूस-यूक्रेन युद्ध में सीधा सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा’, यूक्रेन के लिए बड़ा धोखा है। अमेरिका और नाटो के बल पर ही तो वह पुतिन को आंखें दिखा रहा था। अब यूक्रेन के राष्ट्रपति विलाप कर रहे हैं कि उनके देश को अकेला छोड़ दिया गया।
यूक्रेनी नेता का यह विलाप इस बात का घोषणापत्र है कि अब अमेरिका दुनिया का दारोगा नहीं रहा। दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही।
रीगन से बाइडन तक की अमेरिकी यात्रा महज तीन-साढ़े तीन दशकों की ही रही। कभी तेज चमक बिखेरता अमेरिका अब मद्धिम पडऩे लगा है। बीते कई दिनों से बाइडन पुतिन को चेतावनी दे रहे थे। अब जब, संकट सर पर आ गया तो ‘कड़ी निंदा’ और साधारण से प्रभाव छोडऩे वाले आर्थिक प्रतिबंध आदि से आगे बढऩे का साहस वे नहीं दिखा सके।
अमेरिका के पराक्रम का यह पराभव है। यह सिर्फ सैन्य मामलों में ही नहीं, आर्थिक सिद्धांतों के मामले में भी दिखेगा। क्योंकि, वह स्वयं आर्थिक रूप से भी कमजोर हो रहा है। न वह बेरोजगारी से पार पा रहा है न बढ़ती हुई भीषण आर्थिक विषमता से।
अमेरिकी पराभव ने पूरी दुनिया को विचारों के एक चौराहे पर ला कर खड़ा कर दिया है। यहां से मानवता को नए रास्तों की तलाश करनी होगी।
- रमेश अनुपम
20 जून सन् 1966
के.एल.पांडेय जांच आयोग की सुनवाई में बस्तर पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना उपस्थित हुए।
राजेंद्रजीत खुराना ने जांच आयोग को बताया कि ‘अपरान्ह 1.30 बजे के आसपास नियंत्रण कक्ष में उन्हें कलेक्टर ने बताया कि भोपाल से मुख्य सचिव का मैसेज आया है कि प्रवीर चंद्र भंजदेव को डी.आई.आर के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया जाए।’ इस पर बस्तर कलेक्टर की प्रतिक्रिया थी कि प्रवीर चंद्र भंजदेव को गिरफ्तार करने का यह उपयुक्त समय नहीं है।
मध्यान्ह भोजन के पश्चात गोरेलाल झा एडवोकेट द्वारा पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना से कुछ सवाल पूछे गए।
जिसके जवाब में खुराना ने कहा कि ‘उन्हें यह विदित नहीं है कि महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव 25 मार्च को 4.30 या 5.00 बजे के बीच राजमहल के बाहर आए थे या नहीं।’
उन्होंने आयोग से यह भी कहा कि ‘उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि पुलिस वालों ने महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को धक्के देकर राजमहल के भीतर धकेल दिया था।’
पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने इस बात से इंकार किया कि ‘उस समय पुलिस द्वारा दो बार फायर भी किए गए थे।’
आगे उन्होंने इस बात से भी मना किया कि ‘उन्होंने एस.एस.पी को फोन पर यह कहा है कि प्रवीर चंद्र भंजदेव दुस्साहसी हैं तथा वे आत्मसमर्पण नहीं करेंगे।’
गोरेलाल झा द्वारा यह पूछने पर कि क्या पुलिस द्वारा राजमहल के अहाते में स्थित कंकालीन मंदिर पर कोई फायरिंग की गई है ?
पुलिस सुप्रीटेंडेंट ने इस बात से इंकार करते हुए जांच आयोग को बताया कि ‘पुलिस द्वारा कंकालीन मंदिर में कोई फायरिंग नहीं की गई है।’
गोरेलाल झा ने जस्टिस के.एल.पांडेय को बताया कि ‘कंकालीन मंदिर के खंभों पर 4 गोलियों के निशान अब भी मौजूद हैं। उन्होंने आयोग को बताया कि उन्होंने तथा आर.एस.वाजपेयी ने राजमहल के अहाते में स्थित कंकालीन मंदिर में जाकर मंदिर की दीवारों पर चार गोलियों के निशान स्वयं देखे हैं।’
जस्टिस के.एल.पांडेय ने वकील गोरेलाल झा को आश्वासन दिया कि वे स्वयं कंकालीन मंदिर जाकर उन गोलियों के निशान को देखना चाहेंगे।
गोरेलाल झा के एक सवाल के जवाब में पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने आयोग को बताया कि ‘उनकी जानकारी में यह तथ्य नहीं है कि 25 मार्च को पूरे राजमहल में अंधेरा था। विद्युत आपूर्ति और जल प्रदाय को पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन द्वारा बाधित कर दिया गया था।’
उन्होंने आयोग को यह भी बताया कि ‘उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि पुलिस के जवानों के लिए 50 टॉर्च लाइट इसलिए खरीदे गए थे ताकि वे राजमहल के भीतर घुस सकें।’
जस्टिस के. एल.पांडे द्वारा बार-बार यह पूछने पर कि बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की मृत्यु कब और कैसे हुई है ?
पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना द्वारा बार-बार यही दोहराया गया कि ‘प्रवीर चंद्र भंजदेव की मृत्यु कैसे और कब हुई उसकी कोई जानकारी उन्हें नहीं है।’
पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने जांच आयोग को यह अवश्य बताया कि ‘26 मार्च से लेकर 7 अप्रैल तक दोनों राजमहल पुलिस के अधिकार क्षेत्र में थे।’
28 जून 1966 को तत्कालीन बस्तर कलेक्टर एस.पी.सिंह जांच आयोग के समक्ष उपस्थित हुए।
एस.पी.सिंह ने 2 जून को मोहम्मद अकबर से कलेक्टर का चार्ज लिया था। इससे पहले वे बस्तर में ही एडिशनल कलेक्टर के पद पर आसीन थे। बस्तर गोलीकांड के समय वे बस्तर में ही पदस्थ थे।
कलेक्टर एस.पी.सिंह ने जांच आयोग को बताया कि ‘25 मार्च को अपरान्ह 11.15 बजे जब वे पुलिस स्टेशन में बैठे हुए थे, उसी समय पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना के पास ए.ओ.एम. मुक्तेश्वर सिंह का एक टेलिफोनिक मैसेज आया। जिसमें मुक्तेश्वर सिंह ने पुलिस सुप्रीटेंडेंट को बताया कि राजमहल में एकत्र आदिवासियों ने पुलिस पार्टी पर अटैक कर दिया है। मुक्तेश्वर सिंह ने अतिरिक्त पुलिस बल की मांग भी की थी।’

इसकी सूचना टेलीफोन के माध्यम से तत्कालीन कलेक्टर मोहम्मद अकबर को दी गई। कलेक्टर ने कहा कि हमें एक बार राजमहल जाकर वस्तुस्थिति का निरीक्षण करना चाहिए।
कलेक्टर मोहम्मद अकबर, पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना तथा अन्य उच्च अधिकारी राजमहल पहुंचे। उन्होंने देखा कि शहर की सभी दुकानें बंद है और स्थिति काफी तनावपूर्ण है।
एस.पी.सिंह ने जांच आयोग को बताया कि ‘कलेक्टर मोहम्मद अकबर और पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने देखा कि पच्चीस तीस आदिवासी तीर कमान लेकर राजमहल के गेट पर खड़े हुए हैं और पुलिसवालों पर तीर बरसा रहे हैं।’
तत्कालीन कलेक्टर एस.पी.सिंह ने जांच आयोग को बताया कि ‘कलेक्टर मोहम्मद अकबर ने उन्हें उस समय पेट्रोलिंग ड्यूटी का कार्यभार सौंपा था।
इसलिए वे जब राजमहल पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक भारी-भरकम पुलिसवाला खून से लथपथ लाठी लेकर राजमहल के गेट से बाहर ‘मार डाला मार डाला ‘चिल्लाता हुआ भाग रहा है।’
दोपहर 1.30 से लेकर 4.30 बजे तक उन्होंने देखा कि कुछ निहत्थे आदिवासी जो बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के थे, वे राजमहल छोडक़र वापस लौट रहे थे।
उन्होंने आयोग को बताया कि ‘पश्चिमी गेट पर तैनात पुलिस बल को उन्होंने निर्देश दिया कि जो आदिवासी राजमहल छोडक़र जा रहे हैं उन्हें जाने दिया जाए।’
जांच आयोग को आगे की जानकारी देते हुए कलेक्टर एस.पी.सिंह ने बताया कि ‘3 बजे के आस-पास उत्तरी गेट पर रविशंकर वाजपेयी और लाडली मोहन निगम को पुलिस वालों ने राजमहल के भीतर जाने से रोक रखा था। पुलिसवालों ने उन्हें यह भी जानकारी दी कि ये लोग आदिवासियों को उकसाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने पुलिस वालों को निर्देश दिया कि इन्हें तत्काल पुलिस स्टेशन ले जाया जाए।’
(बाकी अगले हफ्ते)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
यूक्रेन के मामले में अमेरिका और नाटो बुरी तरह से मात खा गए हैं। अमेरिका ने अपनी बेइज्जती यहां पहली बार नहीं कराई है। इसके पहले भी वह क्यूबा, वियतनाम और अफगानिस्तान में धूल चाट चुका है। रूसी नेता व्लादिमीर पूतिन ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली और सबसे संपन्न सैन्य गुट को चारों खाने चित करके रख दिया है। जो देश रूस से टूटकर नाटो में शामिल हो गए थे, अब उनके भी रोंगटे खड़े हो गए होंगे। उन्हें भी यह डर लग रहा होगा कि यूक्रेन के बाद अब कहीं उनकी बारी तो नहीं आ रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का यह बयान कितना बेशर्मीभरा है कि उनकी सेनाएं सिर्फ नाटो देशों की रक्षा करेगी। वे अपनी सेनाएं यूक्रेन नहीं भेजेंगे। पूतिन ने पहले यूक्रेन के तीन टुकड़े कर दिए और फिर उन्होंने वहां अपनी 'शांति सेनाÓ भिजवा दी। यदि नाटो राष्ट्र ईमानदार और दमदार होते तो वह तत्काल ही अपनी फौजें वहां भेजकर यूक्रेनी संप्रभुता की रक्षा करते लेकिन उनका बगलें झांकना सारी दुनिया को चकित कर गया। मुझे तो उसी वक्त लगा कि अमेरिका और नाटो अब तक जो धमकियां दे रहे थे, वे शुद्ध नपुंसकता के अलावा कुछ नहीं थीं।
अमेरिका के गुप्तचर विभाग ने पहले से दावा किया था कि रूस तो यूक्रेन पर हमले की तैयारी कर चुका है। इसलिए बाइडन और उनके रक्षा मंत्री यह नहीं कह सकते कि यूक्रेन पर अब रूसी हमला अचानक हुआ है। इसका अर्थ क्या हुआ? क्या यह नहीं कि अमेरिका और नाटो गीदड़भभकियां देते रहे। इसका दूरगामी अभिप्राय यह भी है कि रूस को अब नई विश्व शक्ति बन जाने का अवसर अमेरिका ने प्रदान कर दिया है। यूक्रेन तो समझ रहा था कि अमेरिका उसका संरक्षक है लेकिन अमेरिका ने ही यूक्रेन को मरवाया है।
यदि अमेरिका उसे पानी पर नहीं चढ़ाता तो उसके राष्ट्रपति वी. झेलेंस्की हर हालत में पूतिन के साथ कोई न कोई समझौता कर लेते और यह विनाशकारी नौबत आती ही नहीं। जर्मनी और फ्रांस के नेताओं ने मध्यस्थता की कोशिश जरुर की लेकिन वह कोशिश विफल ही होनी थी, क्योंकि ये दोनों राष्ट्र नाटो के प्रमुख स्तंभ हैं और नाटो यूक्रेन को अपना सदस्य बनाने पर आमादा है, जो कि इस झगड़े की असली जड़ है।
इस सारे विवाद में सबसे उत्तम मध्यस्थ की भूमिका भारत निभा सकता था लेकिन दोनों पक्षों से वह सिर्फ शांति की अपील करता रहा, जो शुद्ध लीपापोती या खानापूरी के अलावा कुछ नहीं है। मैं पिछले कई हफ्तों से कहता रहा हूं कि भारत कोई पहल जरुर करे लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे पास पक्ष या विपक्ष में कोई ऐसा नेता नहीं है, जो इतनी बड़ी पहल कर सके।
हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूतिन से बात की, यह अच्छा किया लेकिन यही काम वे बाइडन के साथ भी महिना भर पहले करते तो उसकी कुछ कीमत होती। अब तो भारत का राष्ट्रहित इसी में है कि हमारे 20 हजार छात्र और राजनयिक लोग यूक्रेन में सुरक्षित रहें और हम तैल के बढ़े हुए भावों को बर्दाश्त कर सकें। (नया इंडिया की अनुमति से)
-हेमन्त झा
80 के दशक में रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में अमेरिका अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर था।
शीत युद्ध अपने अंतिम दौर में था और सोवियत बिखराव ने दुनिया को दो ध्रुवीय से एक ध्रुवीय में बदल दिया था।
अब अमेरिका दुनिया का दारोगा था और ब्रिटेन उसका सबसे विश्वासप्राप्त हवलदार। कभी कभार किसी मुद्दे पर ना नुकुर करते फ्रांस और जर्मनी भी उसकी हवलदारी ही करते रहे।
अपनी एकछत्र दबंगई का अमेरिका ने जम कर दुरुपयोग किया। नाटो कहने को कई देशों का सैन्य संगठन था लेकिन मर्जी मूलतः अमेरिका की ही चलती रही। जिधर अमेरिकी हांक पड़ी, नाटो की सेना ने उधर कूच किया।
अपनी एकछत्रता के साथ ही आर्थिक और सैन्य ताकत का दुरुपयोग करते हुए अमेरिका ने तमाम विश्व संस्थाओं को अपना बंधक बना लिया और भूमंडलीकरण के बहाने आर्थिक उदारवाद के अश्वमेध के घोड़े को दुनिया के तमाम देशों में विचरने भेज दिया।
'ढांचागत समायोजन'...यही वे शब्द थे जो किसी भी वैश्विक वित्तीय संस्थान से कर्ज लेने वाले गरीब देशों के लिये शर्त्त के तौर पर कहे जाते थे।
यानी...हमारी कम्पनियों के लिये बाजार खोलो, हमारी आर्थिक शर्त्तें मानो, अपने मजदूरों के श्रम अधिकारों को छीनो, उन्हें आदमी मानना बंद करो, हमारी कंपनियां अपनी शर्त्तों पर उनसे काम लेंगी और फिर एक दिन निचोड़ कर बाहर फेंक देंगी।
दुनिया के तमाम तेल भंडारों और अन्य संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा कायम करने के लिये न जाने कितने निर्मम रक्तपात किये गए, विरोध करने वाले कितने राष्ट्र प्रमुखों को कुर्सी से बेदखल किया गया, उनकी निर्मम हत्या की गई।
भूमंडलीकरण अमेरिकीकरण का ही एक दूसरा रूप बन कर दुनिया के सामने आया।
नैतिक पतन ने अमेरिका को एक दिन इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि डोनाल्ड ट्रंप जैसा नेता वहां का राष्ट्रपति बना।
फिर...बाइडन साहब आए।
इस बीच गंगा, नील, अमेजन आदि नदियों में बहुत सारा पानी बह चुका।
कभी नाटो का द्वंद्व सोवियत झंडे तले 'वारसा पैक्ट' नामक सैन्य समझौते से जुड़े देशों के साथ था। सोवियत विघटन के साथ ही वारसा पैक्ट अस्तित्वहीन हो गया।
लेकिन...नाटो बना रहा, जबकि विश्व राजनीति की नैतिकता का तकाजा था कि इसे भी भंग हो जाना चाहिए था।
पर, दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने और रखने के लिये नाटो को बनाए रखना जरूरी था।
खाड़ी युद्ध नाटो की बर्बरता और अनैतिकता का ऐतिहासिक दस्तावेज बना।
नाटो को न सिर्फ बनाए रखा गया बल्कि इसका विस्तार करते हुए नए-नए देशों को इससे जोड़ा भी जाता रहा।
जिस मुक्त आर्थिकी और बाजार की निर्ममता के सिद्धांतों पर अमेरिका चलता रहा, उसे बड़ी चुनौती 2008 की मंदी से मिली। वह सोचने पर मजबूर हुआ लेकिन सोचने से अधिक करने की जरूरत थी। वह किया नहीं जा सका। अमेरिका में बेरोजगारी का आलम और निम्न मध्यवर्ग का असंतोष बढ़ता ही गया।
बढ़ती बेरोजगारी और मांग-आपूर्त्ति का संकट मजबूत से मजबूत अर्थतंत्र को हिला देता है। अमेरिका भी हिलने लगा।
अब उसके राष्ट्रपति की वह धमक नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। बराक ओबामा अंतिम अमेरिकी राष्ट्रपति हुए जिनकी इज़्ज़त दुनिया करती थी। उनके उत्तराधिकारी ट्रम्प ने दुनिया के इस सर्वाधिक शक्तिशाली पद की गरिमा को जी भर कर पलीता लगाया। फिर, बाइडन के आते-आते अमेरिका अपनी बढ़ती हुई भीतरी कमजोरी को भांप दुनिया भर में फैले अपने जाल को समेटने की कोशिश में लगा।
अफगानिस्तान से अमेरिकी सैन्य वापसी ने तालिबान को मौका मुहैया कराया ही, अमेरिकी प्रतिष्ठा को भी बट्टा लगाया।
नाटो का विस्तार करते-करते वह यूक्रेन को इसमें शामिल करने की मंशा तक पहुंच गया। रूस विरोधी और उससे भी अधिक पुतिन विरोधी यूक्रेनी नेता जेलेन्स्की को अमेरिका पर भरोसा था कि वह संकट में साथ देगा। नाटो के बल का भ्रम उन्हें ऐसा हुआ कि उन्होंने पुतिन की चुनौती को हल्के में ले लिया।
इधर पुतिन, जो मूलतः तानाशाह हैं, को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने, रूस की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिये कुछ न कुछ खुराफात तो करते ही रहना है।
जिस पुतिन ने कभी बिल क्लिंटन को कहा था कि रूस को भी नाटो में शामिल कर लो, उन्हें यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की संभावना से ही भारी प्रतिक्रिया हुई। यह स्वाभाविक भी था। यूक्रेन की सत्ता रूस विरोधी राजनीति की ही उपज है। रूस कैसे स्वीकार करता कि उसे नाटो का संरक्षण मिले।
पुतिन ने रूस को आर्थिक स्तरों पर कम, सैन्य स्तरों पर बहुत अधिक मजबूत किया। आज रूस इतना शक्तिशाली है कि उसने यूक्रेन पर हमला कर दिया और तमाम यूरोपीय देश राजनाथ टाइप 'कड़ी निंदा' से आगे नहीं बढ़ पाए। रूस से सैन्य पंगा लेने के अपने खतरे हैं जिन्हें यूरोप के लोकतांत्रिक नेतागण समझते हैं। पुतिन का क्या है, वे तो तानाशाह हैं। जलते हुए रूस के ऊपर पियानो बजाती अपनी तस्वीर डालने में भी उन्हें संकोच नहीं होगा।
यूक्रेन संकट ने अमेरिका की रही सही प्रतिष्ठा में भी बट्टा लगा दिया। राष्ट्रपति बाइडन की यह घोषणा कि "अमेरिका रूस-यूक्रेन युद्ध में सीधा सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा", यूक्रेन के लिए बड़ा धोखा है। अमेरिका और नाटो के बल पर ही तो वह पुतिन को आंखें दिखा रहा था। अब यूक्रेन के राष्ट्रपति विलाप कर रहे हैं कि उनके देश को अकेला छोड़ दिया गया।
यूक्रेनी नेता का यह विलाप इस बात का घोषणापत्र है कि अब अमेरिका दुनिया का दारोगा नहीं रहा। दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही।
रीगन से बाइडन तक की अमेरिकी यात्रा महज तीन-साढ़े तीन दशकों की ही रही। कभी तेज चमक बिखेरता अमेरिका अब मद्धिम पड़ने लगा है। बीते कई दिनों से बाइडन पुतिन को चेतावनी दे रहे थे। अब जब, संकट सर पर आ गया तो 'कड़ी निंदा' और साधारण से प्रभाव छोड़ने वाले आर्थिक प्रतिबंध आदि से आगे बढ़ने का साहस वे नहीं दिखा सके।
अमेरिका के पराक्रम का यह पराभव है। यह सिर्फ सैन्य मामलों में ही नहीं, आर्थिक सिद्धांतों के मामले में भी दिखेगा। क्योंकि, वह स्वयं आर्थिक रूप से भी कमजोर हो रहा है। न वह बेरोजगारी से पार पा रहा है न बढ़ती हुई भीषण आर्थिक विषमता से।
अमेरिकी पराभव ने पूरी दुनिया को विचारों के एक चौराहे पर ला कर खड़ा कर दिया है। यहां से मानवता को नए रास्तों की तलाश करनी होगी।
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि रूस के साथ रक्षा संबंधों को लेकर भारत के साथ उनके मतभेद अभी सुलझे नहीं हैं और उन पर बातचीत चल रही है.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट-
यूक्रेन में रूसी कार्रवाई पर भारत का नपातुला रुख अमेरिका को ज्यादा रास नहीं आ रहा है. गुरुवार को जब पत्रकारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से यह सवाल पूछा, तो उन्होंने बहुत कम शब्दों में इस ओर इशारा किया कि अमेरिका भारत के रुख से ज्यादा संतुष्ट नहीं है.
बाइडेन सरकार की चीन को लेकर कड़ी नीति के तहत भारत अमेरिका के लिए एक अहम साझीदार के तौर पर उभरा है, लेकिन रूस के साथ उसकी नजदीकियों और यूक्रेन में रूसी सैन्य कार्रवाई पर भारत की चुप्पी ने दोनों देशों के बीच एक असहज स्थिति पैदा कर दी है.
यूक्रेन पर भारत का रुख
यूक्रेन पर भारत ने अब तक खुलकर कुछ नहीं कहा है. हालांकि गुरुवार को भारतीय प्रधानमंत्री ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत में हिंसा रोकने का आग्रह किया था. किंतु, बीते मंगलवार को पेरिस में एक विचार गोष्ठी में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा कि यूक्रेन के मुद्दे पर जो कुछ हो रहा है, वह नाटो के विस्तार और सोवियत-युग के बाद रूस के पश्चिमी देशों के संबंधों से जुड़ा है. जबकि हिंद-प्रशांत यूरोपीय फोरम में शामिल अन्य विदेश मंत्रियों की तरह जापानी विदेश मंत्री योशीमासा हायाशी ने रूस की कड़ी निंदा की, भारतीय विदेश मंत्री ने अपना पूरा ध्यान चीन द्वारा पैदा किए गए कथित खतरों पर केंद्रित रखा.
इससे पहले सुरक्षा परिषद में भी भारत ने जिस तरह का बयान दिया था, उसे रूस का पक्षधर माना गया. यूक्रेन पर भारत ने कहा था कि सारे पक्षों की रक्षा संबंधी चिंताओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए. रूस ने भारत के इस रुख का स्वागत करते हुए कहा है कि यूक्रेन के हिस्सों को मिली मान्यता अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत वैध है.
भारत को लेकर संदेह
रूस के साथ भारत के संबंध काफी पुराने हैं लेकिन बीते कुछ सालों में अमेरिका और भारत की नजदीकियां बढ़ी हैं. फिर भी, रूस भारत के लिए सबसे बड़ा रक्षा साझीदार बना हुआ है.
भारत 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है, जहां शुक्रवार रूस की निंदा में एक प्रस्ताव पर मतदान हो सकता है. संभावना जताई जा रही है कि रूस इस प्रस्ताव पर वीटो करेगा जबकि अमेरिका इस वीटो का इस्तेमाल रूस को अलग-थलग करने के लिए कर सकता है. अमेरिका को उम्मीद है कि मौजूदा गणित में 13 सदस्य उसके पक्ष में वोट करेंगे जबकि चीन गैरहाजिर रहना चुनेगा. लेकिन भारत अमेरिका के पक्ष में मतदान करेगा या नहीं, यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. इस मुद्दे पर एक बार पहले भी इसी महीने मतदान हो चुका है जिसमें भारत ने गैरहाजिर रहना चुना था.
अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा कि जो भी देश रूस के यूक्रेन पर आक्रमण को सहन करता है, उस पर रूस के सहयोग का कलंक लगेगा. जब बाइडेन से पूछा गया कि क्या भारत अमेरिकी रणनीति से सहमत है, तो उन्होंने कहा, "हम आज भारत से सलाह-मश्विरा कर रहे हैं. हमने यह मामला अब तक पूरी तरह नहीं सुलझाया है."
एक बयान जारी कर अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बताया है कि विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने भारतीय विदेश मंत्री डॉ. सुब्रमण्यम जयशंकर से गुरुवार को बातचीत की और "रूस के आक्रमण की सामूहिक निंदा और फौरी तौर पर युद्ध विराम व सेनाओं की वापसी की जरूरत पर बल दिया."
एक ट्वीट में जयशंकर ने कहा कि उन्होंने यूक्रेन में हुई गतिविधियों पर ब्लिंकेन से बात की है. साथ ही उन्होंने कहा कि वह रूसी विदेश मंत्री सर्गई लावरोव से भी बात कर चुके हैं और जोर देकर कह चुके हैं कि "कूटनीति और बातचीत ही आगे बढ़ने का सबसे अच्छा रास्ता है."
भारत-रूस संबंध
भारत की रूस के साथ करीबियां कुछ समय से अमेरिका को परेशान करती रही हैं. बीते साल दिसंबर में पुतिन ने भारत का दौरा किया था जिसमें दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौतों पर दस्तखत हुए थे. तभी भारत ने पुष्टि की थी कि रूस ने जमीन से हवा में मार करने वालीं एस-400 मिसाइलों की सप्लाई शुरू कर दी है.
रूस लंबे समय से भारत को हथियारों की सप्लाई करता रहा है. एस-400 मिसाइलों की सप्लाई को भारतीय सेना को आधुनिक बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने दोनों पक्षों की बैठक के बाद कहा, "सप्लाई इस महीने शुरू हो गई है और जारी रहेगी.”
2018 में हुआ यह समझौता पांच अरब डॉलर से भी ज्यादा का है लेकिन इस पर अमेरिका की नाराजगी की तलवार अब भी लटक रही है. अमेरिका ने ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट' (CAATSA) नामक कानून के तहत इस समझौते को आपत्तिजनक माना है.
रूस से ये सिस्टम खरीदने के कारण भारत पर कड़े अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. काट्सा - काउंटरिंग अमेरिकाज अडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस ऐक्ट (CAATSA) में रूस को उत्तर कोरिया और ईरान के साथ उन देशों की सूची में रखा गया है जिन्हें अमेरिका ने अपना बैरी बताया है. इसकी वजह यूक्रेन में रूस की कार्रवाई, 2016 के अमेरिकी चुनावों में दखलअंदाजी और सीरिया की मदद जैसी रूसी गतिविधियां बताई गईं.
हालांकि अमेरिका में भी भारत के पक्ष में बड़ी लॉबी काम कर रही है, जिसके चलते कांग्रेस में भारत को इन प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखने की मांग होती रही है. लेकिन जानकारों का मानना है कि यूक्रेन पर भारत का रुख अमेरिका में उसके विरोध में सक्रिय लॉबी को मजबूत कर सकता है.
इस बारे में अमेरिका भी खुले तौर पर कोई टिप्पणी करने से बच रहा है. सवाल पूछे जाने पर विदेश मंत्रालय ने इतना ही कहा, "हम यूक्रेन पर रूसी आक्रमण खिलाफ एक सामूहिक प्रतिक्रिया के लिए भारत में अपने समकक्षों से विचार-विमर्श कर रहे हैं." (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान आज रूस पहुंच गए हैं। लगभग 22 साल पहले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बाद किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की यह पहली मास्को-यात्रा है। इमरान और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन की ऐसे संकट के समय इस भेंट पर लोगों को बहुत आश्चर्य हो रहा है, क्योंकि पाकिस्तान कई दशकों तक उस समय अमेरिका का दुमछल्ला बना हुआ था, जब अमेरिका और सोवियत संघ का शीतयुद्ध चल रहा था। सोवियत संघ के बिखराव के बाद जब अमेरिका और रूस के बीच का तनाव थोड़ा घटा था, तब पाकिस्तान ने रूस के साथ संबंध बनाने की कोशिश की थी। वरना अफगानिस्तान में चल रही बबरक कारमल की सरकार के विरुद्ध मुजाहिदीन की पीठ ठोककर पाकिस्तान तो अमेरिकी मोहरे की तरह काम कर रहा था। उन्हीं दिनों अमेरिका अपने संबंध चीन के साथ भी नए ढंग से परिभाषित कर रहा था। इसी का फायदा पाकिस्तान ने उठाया। द्बद्वह्म्ड्डठ्ठ द्मद्धड्डठ्ठ ह्म्ह्वह्यह्यद्बड्ड 1द्बह्यद्बह्ल
वह भारत के प्रतिद्वंदी चीन के साथ तो कई वर्षों से जुड़ा ही हुआ था। उसने कश्मीर की हजारों मील ज़मीन भी चीन को सौंप रखी थी। अब जबकि चीन और रूस के संबंध घनिष्ट हो गए तो उसका फायदा उठाने में पाकिस्तान पूरी मुस्तैदी दिखा रहा है। पिछले दिनों ओलम्पिक खेलों के उदघाटन के अवसर पर पूतिन के साथ-साथ इमरान भी पेइचिंग गए थे। अब इमरान उस समय मास्को पहुंच रहे हैं, जबकि पूतिन ने यूक्रेन के तीन टुकड़े कर दिए हैं। मास्को पहुंचनेवाले वे पहले मेहमान हैं। उन्होंने एक रूसी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि उनका यूक्रेन-विवाद से कुछ लेना-देना नहीं है। वे सिर्फ रूस-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे। मुझे ऐसा लगता है कि यूक्रेन के सवाल पर भारत की तरह तटस्थता का ही रूख अपनाएंगे या घुमा-फिराकर कई अर्थों वाले बयान देंगे।
वे रूस को नाराज़ करने की हिम्मत नहीं कर सकते। वे चाहते हैं कि रूस 2.5 बिलियन डॉलर लगाकर कराची से कसूर तक की गैस पाइपलाइन बनवा दे। मास्को की मन्शा है कि तुर्कमानिस्तान से भारत तक 1800 किमी की गैस पाइपलाइन बन जाए। रूस चाहता है कि वह पाकिस्तान को अपने हथियार भी बेचे। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के मामले में भी रूस और पाकिस्तान का रवैया एक-जैसा रहा है। रूस का तालिबान के प्रति भी नरम रवैया रहा है। ओबामा-काल में ओसामा बिन लादेन की हत्या से पाक-अमेरिकी दूरी बढ़ गई थी। रूस ने उन दिनों पाकिस्तान को कुछ हथियार और हेलिकॉप्टर भी बेचे थे और दोनों राष्ट्रों की फौजों ने संयुक्त अभ्यास भी किया था। अब देखना है कि इमरान-पूतिन भेंट पर भारत और अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या होती है? हम यहां यह न भूलें कि 1965 के युद्ध के बाद भारत-पाक ताशकंद समझौता रूस ने ही करवाया था। (नया इंडिया की अनुमति से)
-स्टीव रोजनबर्ग
ब्रिटिश फिल्मकार अल्फ्रेड हिचकॉक ने असमंजस, दुविधा या सस्पेंस के विषय पर एक बार कहा था- जितना संभव हो सके दर्शकों को परेशान करें।’
ऐसा लगता है कि व्लादिमीर पुतिन हिचकॉक की फिल्में खूब देख रहे हैं। महीनों तक पुतिन ने दुनिया को अनुमान लगाने दिया कि वह यूक्रेन पर हमला करेंगे या नहीं। शीत युद्ध के बाद यूरोप में जो सुरक्षा व्यवस्था बनी थी, उसे नष्ट करने की योजना बना रहे हैं या नहीं?
जब उन्होंने इसी हफ्ते पूर्वी यूक्रेन के दो अलगाववादी इलाकों को स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में मान्यता दी तो कई लोग हैरान रह गए। लेकिन पुतिन अब क्या करेंगे? अभी कुछ देर पहले ही पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन में सैनिक भेजने की घोषणा कर दी है। हमले की खबरें भी आ रही हैं।
‘पुतिन्स रशा’ किताब की लेखिका लिलिया श्वेतसोवा कहती हैं कि पुतिन के लिए सस्पेंस सबसे पसंदीदा उपकरण है।
श्वेतसोवा कहती हैं, ‘पुतिन आग लगाकर और बुझाकर, तनाव बनाए रखेंगे। अगर वह अपने मानसिक तर्क पर बने रहते हैं तो पूरी तरह से हमला नहीं करेंगे। लेकिन उनके पास संभावित कदम उठाने के लिए अलग-अलग कई चीजें हैं। जैसे साइबर हमला और दक्षिणी अमेरिकी अजगर की तरह यूक्रेन को आर्थिक रूप से दबोचते रहेंगे। रूसी सेना पूरे दोनेत्स्क और लुहांस्क को भी अपने नियंत्रण में ले सकती है। वह बिल्ली की तरह चूहे के साथ खेलते रहेंगे।’
रूस की सत्ता की दीवार के पीछे क्या चल रहा है, इसकी थाह लेना बेहद मुश्किल काम है। पुतिन के दिमाग को पढऩा या समझना अब भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है।
पुतिन की आगामी योजना
लेकिन पुतिन के बयानों और उनके भाषणों से उनकी सोच का कुछ अंदाजा लगता है। शीत युद्ध का जिस तरह से अंत हुआ, उससे पुतिन बहुत नाराज रहते हैं।
शीत युद्ध का अंत सोवियय संघ के बिखरने और उसके प्रभाव के अंत की कहानी है। नेटो का विस्तार पूरब तक हुआ और पुतिन की कड़वाहट बढ़ती गई। पुतिन उस व्यक्ति तरह लग रहे हैं, जो पूरी शक्ति के साथ एक मिशन पर लगा हो। पुतिन का मिशन है- यूक्रेन को रूस के साथ किसी भी तरह से लाना।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में सीनियर रिसर्च असोसिएट व्लादिमीर पस्तुखोव कहते हैं, ‘वह रूस के फेडरल सिक्यॉरिटी सर्विस के एक अधिकारी से ज्यादा अयातुल्लाह लग रहे हैं। वह इतिहास में अपनी खास जगह के लिए किसी धार्मिक आस्था की तरह लगे हुए हैं। वह कदम दर कदम काम करेंगे। पहले अलगाववादी इलाकों को मान्यता दी। अब वहां सेना भेजेंगे। फिर दोनों इलाकों में अपने हिसाब से रूस में शामिल होने के लिए जनमत संग्रह की घोषणा करेंगे। इसके बाद यहाँ स्थानीय सैन्य अभियान चलेगा और पुतिन 2014 से पहले का सीमा विस्तार करेंगे।’
व्लादिमीर पस्तुखोव कहते हैं, ‘अगर अपने नियम से पुतिन को खेल खेलने की आजादी मिली तो इसे वह जहाँ तक संभव होगा, लंबा ले जाएंगे। वह धीमी आँच पर मांस पकाएंगे।’ पश्चिम के नेताओं को लग रहा है कि नए प्रतिबंध गेम-चेंजर होंग लेकिन पुतिन बहुत ही सख्ती दिखा रहे हैं।
रूस की प्रतिष्ठा
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने बीबीसी से कहा, ‘हम इन प्रतिबंधों को अवैध मानते हैं। हम लंबे समय से इसे देख रहे हैं और पश्चिम हमारी प्रगति को रोकने के लिए इसी टूल का बार-बार इस्तेमाल करता है। हमें पता था कि प्रतिबंध लगेगा, चाहे कुछ भी हो। यह कोई मायने नहीं रखता है कि हमने कुछ किया है या नहीं। उनका प्रतिबंध अनिवार्य है।’
लेकिन क्या रूस पश्चिम में अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करता है, जो कि लगातार निचले स्तर पर जा रही है। आपके मुल्क को एक हमलावर के तौर पर देखा जा रहा है? इस सवाल के जवाब में मारिया कहती हैं, ‘हमारी इस प्रतिष्ठा की खोज आप कर रहे हैं। पश्चिम की प्रतिष्ठा के बारे में आप क्या सोचते हैं? जो कि ख़ून से रंगा हुआ है।’
कहा जा रहा है कि मारिया जख़ारोवा को भी यूरोपियन यूनियन की प्रतिबंध सूची शामिल किया गया है। हिचकॉक की थ्रिलर फिल्में एंटरटेन करती है लेकिन पुतिन की यूक्रेन थ्रिलर रूस के लोगों को नर्वस कर रही है।
रूस के लोग क्या सोच रहे हैं?
लेवाडा पब्लिक ऑपिनियन एजेंसी के डेनिस वोल्कोव कहते हैं, ‘ज़्यादातर लोग यह नहीं जानना चाहते हैं कि क्या हो रहा है। लोगों के लिए यह डराने वाला है। ये सुनना नहीं चाहते हैं। लोग युद्ध से डरे हुए हैं। हमने जो सर्वे किया है, उनमें से आधे लोगों ने कहा है कि युद्ध की आशंका है।’
रूस के कुछ लोगों ने सार्वजनिक रूप से सरकार की लाइन का विरोध किया है। कुछ शीर्ष के रूसी बुद्धिजीवियों ने एक पीटिशन पर हस्ताक्षर किया है और यूक्रेन में अनैतिक, गैर-जिम्मेदार के साथ आपराधिक युद्ध से बचने की सलाह दी है। इनका दावा है कि रूसी आपराधिक दु:साहसवाद के बंधक बन गए हैं।
पीटिशन में अपना नाम दर्ज कराने वाले प्रोफेसर एंद्रेई जबोव ने कहा कि रूस में लोग अपनी सरकार या संसद को रोकने में सक्षम नहीं हैं। जबोव ने कहा, ‘लेकिन मैंने अपनी राय रखने के लिए यह हस्ताक्षर किया है। मैंने रूस के शासक वर्ग वाले आभिजात्यों से खुद को दूर कर लिया है। यह वर्ग अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ रहा है।’ लेकिन पुतिन के रूस में समर्थक भी हैं।
सोवियत आर्मी के एक पूर्व कमांडर एलेक्सी ने कहा, ‘केवल यूक्रेन नहीं है जो रूस में लौटेगा। पोलैंड, बुल्गारिया और हंगरी भी हैं। ये सभी देश हमारे हुआ करते थे।’ एलेक्सी को 1990 के दशक की आर्थिक उथल-पुथल याद है लेकिन अब उन्हें लगता है कि रूस अपने घुटनों पर खड़ा हो गया है।
एलेक्सी कहते हैं, ‘यह एक जैविक प्रक्रिया है। जब एक बच्चा बीमार पड़ता है तो बीमारी से लडऩे की और क्षमता विकसित कर लेता है। 1990 के दशक में रूस इसी बीमारी से ग्रस्त हुआ था। लेकिन बीमारी ने हमें और मज़बूत बना दिया है। हमें नेटो को दूर जाने के लिए मनाने की जरूरत नहीं है। वह ख़ुद ही सब छोड़ देगा।’ (bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
भारत को धर्म-निरपेक्ष नहीं, धर्म-सापेक्ष राष्ट्र बनाएं, यह बात मैं कई दशकों से कहता रहा हूं लेकिन इसी बात को बलपूर्वक कह कर जैन मुनि विद्यासागरजी महाराज ने इस धारणा में चार चांद लगा दिए हैं। विद्यासागरजी दिगंबर जैन मुनि हैं। उनकी मातृभाषा कन्नड़ है, लेकिन हिंदी और संस्कृत में उन्होंने विलक्षण दर्शन ग्रंथों की रचना की है। उनके प्रति सभी जैन-संप्रदाय तो भक्तिभाव रखते ही हैं, लाखों हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि भी उन्हें पूजनीय मानते हैं।
भारत को धर्म-सापेक्ष बनाएं, यह बात उन्होंने म.प्र. के कुंडलपुर में आयोजित पंचकल्याणक समारोह में कही। वहां लाखों भक्तों के अलावा देश के जाने-माने नेता भी उपस्थित थे। भारत को धर्म-सापेक्ष बनाने का अर्थ उसे वेटिकन-जैसा राज्य बनाना नहीं है। उसे किसी रिलीजन या संप्रदाय या मत या पंथ का अनुयायी बना देना नहीं है बल्कि ऐसा राष्ट्र बनाना है, जिसका प्रत्येक नागरिक और सरकार भी धार्मिक है। भारत के संविधान में कहीं भी धर्म-निरपेक्ष शब्द नहीं आया है। उसकी प्रस्तावना में भारत को 'पंथ-निरपेक्षÓ कहा गया है। लेकिन हमारे देश के नेता धर्म-निरपेक्ष शब्द का ही प्राय: इस्तेमाल करते रहते हैं।
इसका असली कारण अंग्रेजी भाषा की गुलामी ही है, क्योंकि अंग्रेजी में धर्म को 'रिलीजन' ही कहते हैं। 'सेक्युलर' शब्द यूरोप में चलता है। आप सेक्यूलर हैं याने धर्म-निरपेक्ष हैं। मैं तो कहता हूं कि जो लोग सचमुच सेक्यूलर हैं याने किसी भी पंथ, संप्रदाय या भगवान को भी नहीं मानते, वे भी परम धार्मिक हो सकते हैं। धर्म का अर्थ है— धारण करने योग्य। मनुष्य का, पशु का, पक्षी का, राजा का, प्रजा का, मालिक का, नौकर का— सबका अपना धर्म होता है। सब अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें, यही धर्म है।
मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरूद्वारे और साइनेगाग में जाना धर्म नहीं है। वह पंथ-भक्ति है। धर्म क्या है? इसकी परिभाषा मनुस्मृति में कितनी अच्छी है। मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं— धीरज, क्षमा, मन-नियंत्रण, चोरी या लालच से बचना, शरीर-मन-बुद्धि को शुद्ध रखना, इंद्रिय-संयम, बुद्धिप्रधान रहना, सत्याचरण और क्रोध-नियंत्रण! क्या कोई मजहब, पंथ या संप्रदाय धर्म के इन दस लक्षणें को अनुचित बता सकता है? दुनिया के हर संप्रदाय या रिलीजन का भक्त इस धर्म का अनुसरण कर सकता है। इसे ही वेदों में मानव-धर्म कहा है।
ऋग्वेद कहता है— मनुर्भव भव! याने मनुष्य बनो। कोई भी मनुष्य किसी भी मजहब या पंथ का अनुयायी हो या किसी का भी न हो, वह भी इन दस लक्षणों को धारण कर सकता है। इनको धारना ही धर्म है। इनका जो उल्लंघन करे और अपने आप को वह किसी भी रिलीजन या संप्रदाय का परम भक्त कहे तो वह किसी भी हालत में धार्मिक व्यक्ति नहीं कहला सकता।
रिलीजनों और संप्रदायों ने दुनिया में जितनी खून की नदियां बहाई हैं, उतनी बादशाहों, राजाओं और राजनीति ने भी नहीं बहाई हैं। सच्ची नैतिकता ही धर्म है। जिसमें नैतिकता नहीं, वह विचार और कर्म अधर्म ही है। ऐसे अधर्म को हम छोड़े और भारत ही नहीं, दुनिया के सारे राष्ट्र धर्म-सापेक्ष बनें तो यह पृथ्वी ही स्वर्ग बन जाएगी।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
कर्नाटक के शिमोगा में बजरंग दल के हर्ष नामक एक कार्यकर्ता की हत्या हो गई! उसकी हत्या करने के लिए 10 लाख रु. का इनाम रखा गया था। इनाम रखने वाले और हत्यारों के नाम अभी तक प्रकट नहीं किए गए हैं लेकिन कर्नाटक के एक मंत्री ने कहा है कि ''हर्ष की हत्या मुस्लिम गुंडों ने की है। इस हत्या के लिए कांग्रेसी नेता डी.के. शिवकुामर ने उकसाया था।ÓÓ जवाब में शिवकुमार ने कहा है कि ''भाजपा धर्म के नाम पर दंगा करवा रही है। उस मंत्री के खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज होना चाहिए।ÓÓ याने यह मामला अब पार्टीबाजी का शिकार हो रहा है।
यह अपने आप में बड़ी शर्मनाक बात है। यहां असली सवाल यह है कि हर्ष की हत्या क्यों हुई है? हर्ष कर्नाटक के बजरंग दल का सक्रिय कार्यकर्ता था। उसके परिवारवालों का कहना है कि वह बजरंग दल छोड़ चुका था लेकिन उसने कर्नाटक में हिजाब को लेकर चल रही मुठभेड़ पर कोई ऐसी टिप्पणी कर दी थी, जिसे इस्लाम-विरोधी समझा गया। उसे दो बार धमकियां भी मिली थीं। इस तरह की यह हत्या पहली नहीं है। इस्लाम और ईसाइयत के पिछले दो हजार साल के इतिहास में ऐसी सैकड़ों-हजारों घटनाएं होती रही हैं। धर्म का मामला ही कुछ ऐसा संगीन है।
हजार-डेढ़ हजार साल के भारत के इतिहास पर गौर करें तो जो मजहब भारत में पैदा हुए हैं, उनमें भी ऐसे कम लेकिन कई अतिवादी हिंसक और शर्मनाक किस्से होते रहे हैं। आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद को ज़हर किसने पिलाया? किसी मुसलमान या ईसाई ने नहीं, एक हिंदू रसोइए ने! दयानंद तो दया की मूर्ति थे। उन्होंने उस हत्यारे जगन्नाथ को 500 रु. कल्दार दिए और कहा कि तू नेपाल भाग जा। वरना पुलिस तुझे पकड़कर फांसी पर लटका देगी। लेकिन क्या ऐसे दयालु लोग आज भारत में हैं। भारत में तो क्या, सारी दुनिया में नहीं हैं। पूरे इतिहास में भी नहीं हैं।
लेकिन आज भारत का हाल क्या है? आप किसी भी मजहबी परंपरा के विरुद्ध तर्क करें या किसी भी तथाकथित महापुरुष में कोई दोष देख लें तो उनके अनुयायी आपकी हत्या के लिए तैयार हो जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आप अपनी अक्ल पर ताला जड़ दें और आंख मींचकर किसी भी अनर्गल, तर्कहीन, मूर्खतापूर्ण और अश्लील बात को मानते चले जाएं। और जो न माने, उसे अपमान, प्रताडऩा और हत्या का भी सामना करना पड़े। मैं तो यह मानता हूं कि जो सचमुच महापुरुष है, उसे निंदा या आलोचना कभी भी परेशान नहीं कर सकती। इसके अलावा लगभग सभी धर्मों के धर्मग्रंथ इतने पुराने हो गए हैं कि उनमें लिखी हर बात को आज का कोई भी इंसान पूरी तरह लागू नहीं कर सकता।
यदि धर्मग्रंथों की कुछ बातों के विरुद्ध कोई बुद्धिजीवी तर्क करता है तो उस तर्क को आप अपने बुद्धिबल से काट क्यों नहीं डालते? अपनी कलम या जुबान चलाने की जगह यदि आप बंदूक या छुरा चलाते हैं तो आप यह सिद्ध करते हैं कि आपका दिमाग खाली है और सामने वाला आदमी सच बोल रहा है। उस आदमी के खिलाफ हिंसा करके आप यह संदेश दे रहे हैं कि आपका पक्ष बिल्कुल कमजोर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों को धर्मग्रंथों, ऋषियों, नबियों, पोपों, पादरियों और गुरुओं का अपमान करने की छूट हो लेकिन शिष्टतापूर्ण सत्य को जाने बिना तो मनुष्य जीवन पशुतुल्य बन जाता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
क्रेडिट स्विस स्विट्जरलैंड का दूसरा सबसे बड़ा बैंक है. इससे जुड़े लीक से पता चला कि इसके ग्राहकों में तानाशाह, अपराधी और भ्रष्ट राजनेता शामिल थे. उनके माध्यम से आ रहे अवैध फंड पर कार्रवाई करने में बैंक नाकाम रहा.
क्रेडिट स्विस दुनिया के सबसे बड़े प्राइवेट बैंकों में से एक है. आरोप है कि उसके ग्राहकों में तानाशाह, ड्रग डीलर, संदिग्ध युद्ध अपराधी और मानव तस्कर भी शामिल रहे हैं. यह जानकारी एक डाटा लीक के माध्यम से बाहर आई है. इस 'क्रेडिट स्विस लीक' में बैंक के ग्राहकों से जुड़े करीब 30 हजार खातों का ब्योरा सामने आया है. इससे पता चला है कि अपराधी भी इस बैंक में अपने खाते खोल पा रहे थे या यहां पहले से खुले अपने खातों को चला पा रहे थे, जबकि बैंक को उस ग्राहक के अपराधी होने की जानकारी होती थी.
कैसे लीक हुआ डाटा?
यह डाटा एक अज्ञात विसल ब्लोअर ने जर्मन अखबार 'ज्यूडडॉयचे त्साइटुंग' (एसजेड) को लीक किया. इसके बाद 'ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट' (ओसीसीआरपी) के तहत दुनिया के करीब 46 मीडिया संस्थानों ने साझा तौर पर इस लीक हुए डाटा का विश्लेषण किया. इन संस्थानों ने 20 फरवरी को इससे जुड़ी रिपोर्ट छापी. लीक करने वाले विसल ब्लोअर ने अपने बयान में कहा, "मेरा मानना है कि स्विस बैंकिंग के गोपनीयता से जुड़े कानून अनैतिक हैं. यह कानून वित्तीय निजता की सुरक्षा के नाम पर स्विस बैंकों की शर्मनाक भूमिका को ढकने का काम करता है."
लीक डाटा में जिन खातों का ब्योरा है, उनमें करीब दो तिहाई खाते ऐसे हैं जो साल 2000 के बाद खुलवाए गए. इनमें से कई अब भी चालू हैं. कई खाते दशकों पुराने भी हैं. इनमें फिलिपींस का एक मानव तस्कर, रिश्वतखोरी के लिए जेल भेजा गया हांगकांग स्टॉक एक्सचेंज का एक प्रमुख, लेबनान की रहने वाली अपनी पॉप स्टार गर्लफ्रेंड की हत्या का आदेश देने वाला मिस्र का एक अरबपति और वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी को लूटने वाले अधिकारी शामिल हैं.
लीक में जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह द्वितीय, इराक के पूर्व उपप्रधानमंत्री अयाद अल्लावी, अल्जीरिया के निरंकुश शासक अब्दल अजीज बुतफ्लिका और अर्मेनिया के पूर्व राष्ट्रपति आरमेन सारकिसिन के गोपनीय खातों का ब्योरा भी शामिल हैं. एसजेड ने कुछ महीनों पहले क्रेडिट स्विस के सीक्रेट खाते को लेकर सारकिसिन से उनका पक्ष पूछा था. इसके कुछ ही दिन बाद जनवरी 2022 में सारकिसिन ने पद से इस्तीफा दे दिया. लीक में वैटिकन से जुड़ा एक खाता भी शामिल है, जिससे 350 मिलियन यूरो की रकम खर्च करके लंदन की एक प्रॉपर्टी में निवेश किया गया. यह वही खरीद है, जिसे लेकर जुलाई 2021 में वैटिकन ने एक कार्डिनल 10 लोगों पर जबरन वसूली, धोखाधड़ी और पद के बेजा इस्तेमाल का मुकदमा चलाने का एलान किया था.
अपने ऊपर लगे आरोपों पर बैंक की प्रतिक्रिया
लीक से पता चलता है कि बैंक संदिग्ध ग्राहकों की अच्छी तरह जांच करने में नाकाम रहा. ना ही उसने संदिग्ध ग्राहकों और गैरकानूनी फंड जमा करने वालों का खाता खोलने से इनकार किया. लीक से जुड़ी रिपोर्ट्स छापने वाले पत्रकारों ने क्रेडिट स्विस के कई पूर्व कर्मचारियों से भी बात की. उनका कहना था कि बैंक में अमीर और बेहद अमीर ग्राहकों के लिए अलग नियम-कायदे थे. क्रेडिट स्विस ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है. उसका कहना है कि लीक में सामने आए 90 प्रतिशत खाते पहले ही बंद किए जा चुके हैं.
स्विट्जरलैंड दुनिया के सबसे क्रीम 'टैक्स हैवन' में गिना जाता है. यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र है, मगर इसका सिस्टम पारदर्शी नहीं है. पॉपुलर कल्चर में स्विस बैंक अपने ग्राहकों के प्रति बेहद वफादार माने जाते हैं. कहा जाता है कि आपका पैसा इससे ज्यादा सुरक्षित कहीं नहीं रहता. भारत जैसे देशों में भी स्विस बैंक राजनीतिक कहावतों के रूप में इस्तेमाल होते हैं. उन्हें ब्लैक मनी से जोड़कर पेश किया जाता है.
मगर पिछले करीब एक दशक से चीजों में थोड़ा बदलाव आया है. स्विट्जरलैंड ने मनी लॉन्ड्रिंग और गबन किए गए सरकारी फंड को छुपाकर रखने के ठिकाने के तौर पर अपनी छवि को बदलने की कोशिश की है. 2018 में टैक्स में चोरी से लड़ने के लिए गठित एक अंतरराष्ट्रीय एक्सजेंच सिस्टम के तहत स्विट्जरलैंड ने अपने बैंकों से अपने ग्राहकों की सूची कुछ विदेशी अथॉरिटीज के साथ साझा करने को कहा.
इसे स्विस बैंकिंग के लिए मील का पत्थर बताया गया. मगर खबरें बताती हैं कि चीजें अब भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं हैं. टैक्स चोरी और धोखाधड़ी से निपटने के लिए बने ग्लोबल एक्सेंज प्रोग्राम के तहत स्विस बैंक अपने ग्राहकों की सूची कुछ देशों के साथ साझा करते हैं. लेकिन कई विकासशील और गरीब देशों को इस एक्सचेंज प्रोग्राम से दूर रखा जाता है.
एसएम/ओएसजे (डीपीए, एपी)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
केरल में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सरकार है और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। इन दोनों राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की बीच सतत मुठभेड़ का माहौल बना रहता है। इन दोनों प्रदेशों से आए दिन ऐसी खबरें दिल्ली के अखबारों में मुखपृष्ठों पर छाए रहती हैं कि जो वहां किसी न किसी संवैधानिक संकट का संदेह पैदा करती रहती हैं। भारत की संघात्मक व्यवस्था पर भी ये मुठभेड़ें पुनर्विचार के लिए विवश करती हैं। यदि केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने अपने निजी स्टाफ में किसी व्यक्ति को नियुक्त कर लिया तो उन्हीं के वरिष्ठ अधिकारी को यह हिम्मत कहां से आ गई कि वह राज्यपाल को पत्र लिखकर उसका विरोध करे?
जाहिर है कि मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन के इशारे के बिना वह यह दुस्साहस नहीं कर सकता था। इस पर राज्यपाल की नाराजगी स्वाभाविक है। राज्यपाल आरिफ खान का तर्क है कि केरल में मंत्री लोग अपने 20-20 लोगों के व्यक्तिगत स्टाफ को नियुक्त करने में स्वतंत्र हैं। उन्हें किसी से पूछना नहीं पड़ता है तो राज्यपाल को अपना निजी सहायक नियुक्त करने की स्वतंत्रता क्यों नहीं होनी चाहिए? उन्होंने एक गंभीर दांव-पेंच को भी इस बहस के दौरान उजागर कर दिया है। दिल्ली के केंद्रीय मंत्री अपने निजी स्टाफ में लगभग दर्जन भर से ज्यादा लोगों को नियुक्त नहीं कर सकते लेकिन केरल में 20 लोग की नियुक्ति की सुविधा क्यों दी गई है?
इतना ही नहीं, ये 20 व्यक्ति प्राय: मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य होते हैं और इन्हें ढाई साल की नौकरी के बाद जीवन भर पेंशन मिलती रहती है। यह पार्टीबाजी का नया पैंतरा सरकारी कर्मचारियों के कुल खर्च में सेंध लगाता है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच इस बात को लेकर भी पिछले दिनों सख्त विवाद छिड़ गया था कि किसी विश्वविद्यालय में उप-कुलपति की नियुक्ति करने का अधिकार राज्यपाल को है या नहीं? मुख्यमंत्री तो प्रस्तावित नामों की सूची भर भेजते हैं। आरिफ खान कुछ अनुपयुक्त नामों से इतने तंग हो गए थे कि वे अपने इस अधिकार को ही तिलांजलि देने को तैयार थे।
क्रद्गड्डस्र ड्डद्यह्यश चन्नी क्या केजरीवाल को हरा देंगे?
अब केरल के कम्युनिस्ट नेताओं ने यह गुहार लगाना भी शुरु कर दिया है कि राज्यपाल का पद ही खत्म कर दिया जाए या विधानसभा को अधिकार हो कि उसे वह बर्खास्त कर सके। उसकी सहमति से ही राज्यपाल की नियुक्ति हो। यदि केरल के कम्युनिस्ट नेताओं को इस बात को मान लिया जाए तो भारत का संघात्मक ढांचा ही चरमराने लग सकता है। प्रदेशों के कई राज्यपाल और मुख्यमंत्री मेरे व्यक्तिगत मित्र है। वे ऐसे विवादों का जिक्र अक्सर करते हैं। ऐसे विवादग्रस्त प्रांतों, खासकर राज्यपाल जगदीप धनकड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तनाव की खबरें पढ़कर मुझे बहुत दुख होता है।
ममताजी कई बार अपने भाषणों और क्रिया-कलापों में मर्यादा लांघ जाती हैं। अन्य राज्यों से भी ऐसी शिकायतें आती रहती हैं। राज्यपाल का पद मुख्यमंत्री से ऊँचा होता है। इसलिए प्रत्येक मुख्यमंत्री के लिए यह जरुरी है कि वह किसी मुद्दे पर अपने राज्यपाल से असहमत हो तो भी वह शिष्टता का पूरा ध्यान रखे। इसी तरह से राज्यपालों को भी चाहिए कि निरंतर तनाव में रहने की बजाय अपने मुख्यमंत्री को सही और संवैधानिक मर्यादा बताकर उसे अपने हाल पर छोड़ दें। वह जो भी उटपटांग काम करेगा, उसका फल भुगते बिना नहीं रहेगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
2008 में अहमदाबाद में हुए आतंकी हमले के अपराधियों को विशेष अदालत ने जो सजा सुनाई है, वह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी सजा है। इसमें 38 अपराधियों को मृत्युदंड, 11 को उम्रकैद और 48 पर 2.85 लाख का जुर्माना लगाया गया है। इसके पहले 1991 में राजीव गांधी हत्याकांड में 26 लोगों को सजा-ए-मौत हुई थी। इस आतंकवादी हमले में 56 लोग मारे गए थे और 240 लोग घायल हुए थे। 70 मिनिट में 21 बम फटे थे। यदि सूरत में मिले 29 बम और फट जाते तो पता नहीं कितने लोग मरते। इस मुकदमे का फैसला आने में 14 साल लग गए, यह अपने आप में अच्छी बात नहीं है। इन अपराधियों को यदि साल-दो साल में ही फांसी पर लटका दिया जाता तो इस सजा का कहीं ज्यादा असर होता लेकिन सैकड़ों गवाहों से पूछताछ और पुलिस की खोजबीन अच्छी तरह से इसीलिए की गई कि न्याय में कमी न रह जाए। न्यायाधीशों ने गहराई में जाकर निष्पक्ष फैसला करने की कोशिश की है।
7 हजार पृष्ठ के इस फैसले में 77 आरोपियों में से 22 को बरी कर दिया गया है। यदि यह फैसला जल्दबाजी में होता तो ये 22 लोग भी लटका दिए जाते। इस फैसले को सांप्रदायिक नजरिए से देखना भी उचित नहीं है। इस आतंकी हमले की सारी पोल जिसने खोली है, वह भी एक मुसलमान ही है। उसका नाम अयाज़ सय्यद है। भारत के औसत मुसलमानों को भी इस आतंकवादी हादसे ने बुरी तरह आहत किया था। इस हमले की जिम्मेदारी 'इंडियन मुजाहिदीन' और 'स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया' नामक संगठनों ने ली थी। पुलिस की जांच-पड़ताल से पता चला है कि इसमें गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र, केरल और कर्नाटक के आतंकवादी भी शामिल थे। एक अर्थ में यह देश के सभी मुसलमानों को बदनाम करनेवाले संगठन थे। इनके सज़ायाफ्ता लोग में 21 से 40 साल के लोग भी हैं। ये लोग गोधरा कांड के बाद हुए दंगों का बदला लेने पर उतारु थे। इन्होंने अपने आतंकी विस्फोटों की झड़ी भारत के दूसरे शहरों में भी लगाई थी।
इन्हें शायद पता नहीं है कि इनके विस्फोटों में मरे लोगों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही थे। इन आतंकियों ने अपना निशाना तो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अन्य मंत्रियों को बना रखा था। जऱा सोचिए कि यदि ये लोग अपने इरादों को अंजाम दे पाते तो देश के करोड़ों निर्दोष मुसलमानों की दशा क्या होती? 2002 में गुजरात के दंगों में मारे गए मुसलमानों के प्रति देश के सभी हिंदुओं और मुसलमानों को काफी अफसोस था लेकिन आतंकवादी हरकतों ने उस अफसोस को भी नदारद कर दिया। इन आतंकवादियों को अब जो कड़ी सजा मिल रही है, उसके कारण बहुत-से घरों में अंधेरा हो जाएगा लेकिन लोगों को बड़े पैमाने पर सबक भी मिलेगा। सबक यह है कि कोई भी आतंकी कितनी ही चालाकी करे, वह न्याय के शिकंजे में फंसे बिना नहीं रहेगा। जिन परिवारों ने इस आतंकी हमले में अपने प्रियजनों को खोया है, उनके घावों पर यह मरहम भी कुछ काम नहीं करेगा। कुछ मुस्लिम संगठन अदालत के इस फैसले पर सांप्रदायिक रंग चढ़ा रहे हैं लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि भारत की अदालतें अपने फैसले जाति और मजहब के आधार पर नहीं करती हैं। आतंकवादी कोई हो, हिंदू या मुसलमान, उसे कठघरे में खड़े होना ही पड़ेगा और अपने किए का फल भुगतना ही पड़ेगा। इस फैसले ने यह सिद्ध किया है और इसका यही संदेश है कि आतंक का जवाब आतंक नहीं हो सकता। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच जो व्यापारिक समझौता अभी-अभी हुआ है, वह इतना महत्वपूर्ण है कि कुछ ही वर्षों में हमारे इन दोनों देशों का व्यापार न सिर्फ दुगुना हो जाएगा बल्कि मैं यह कह दूं तो आश्चर्य नहीं होगा कि भारत का व्यापार और परस्पर विनिवेश शायद दुनिया में सबसे ज्यादा यूएई के साथ भी हो सकता है। इस समय दोनों का आपसी व्यापार 50 बिलियन डॉलर के आस-पास है। इसे 100 बिलियन डॉलर होने में पांच साल भी नहीं लगेंगे, क्योंकि यूएई अपने आप में छोटा देश है लेकिन यह सारे अरब देशों और सारे अफ्रीकी महाद्वीप का मुहाना है।
इसके जरिए आप इन दोनों क्षेत्रों में आसानी से पहुंच सकते हैं। दूसरे शब्दों में अबू धाबी से व्यापार करने का अर्थ है, दर्जनों देशों से लगभग सीधे जुडऩा। भारत का ज्यादातर माल जो कराची और लाहौर के बाजारों में बिकता है, वह कहां से आता है? वह दुबई से ही निर्यात होता है। यूएई में भारत के लगभग 40 लाख लोग रहते हैं। एक करोड़ की जनसंख्या में 40 लाख भारतीय, 15 लाख पाकिस्तानी और शेष पड़ौसी राष्ट्रों के लाखों नागरिकों को दुबई-अबू धाबी में देखकर यह लगता ही नहीं है कि हम विदेश में हैं।
यूएई छोटा-मोटा भारत ही लगता है। ऐसा भारत जो संपन्न है, सुशिक्षित है और जिसमें सांप्रदायिक सदभाव है। यूएई एक मुस्लिम राष्ट्र होते हुए भी भारत की तरह अत्यंत उदार और सर्वसमावेशी राष्ट्र है। इसमें रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म पालन की पूर्ण स्वतंत्रता है। अबू धाबी के शेख नाह्यान मुबारक भारतीयों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। वे स्वयं मुझे कई बार मंदिरों में साथ लेकर गए हैं। वे अपनी मजलिसों के प्रीति-भोज कई बार हमारी खातिर शुद्ध शाकाहारी भी रखते हैं। हमारे व्यापार मंत्री पीयूष गोयल ने वहां जाकर जो एतिहासिक व्यापारिक समझौता किया है, वह भारत के व्यापार को तो बढ़ाएगा ही, वह लगभग डेढ़ लाख नए रोजगार भी पैदा करेगा।
भारत के 90 प्रतिशत निर्यात पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। कुछ ही वर्षों में यह कर-मुक्ति शत प्रतिशत हो जाएगी। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिंहा भी दुबई गए थे। उन्होंने विनियोग के लिए कश्मीर के दरवाजे खोल दिए हैं। जब यूएई के करोड़ों-अरबों रु. कश्मीर में लगने लगेंगे तो कश्मीर की हालत कहीं बेहतर हो जाएगी। यूएई और सउदी अरब, दोनों ने धारा 370 के मामले में पाकिस्तान की आवाज में आवाज नहीं मिलाई है। वे अब भारत के ज्यादा नजदीक आते जा रहे हैं।
भारत और यूएई एक-दूसरे के इतने नजदीक आते जा रहे हैं कि मैं तो सोचता हूं कि सात देशों के इस यूएई संघ को भी जन-दक्षेस के 16 देशों में जोड़ लिया जाना चाहिए। आजकल पिछले छह-सात साल से चले भारत-पाक विवाद के कारण दक्षेस (सार्क) ठप्प हो गया है। इसका विकल्प जन-दक्षेस ही है। जन-दक्षेस में दक्षेस के आठ राष्ट्रों के अलावा म्यांमार, ईरान, मोरिशस और मध्य एशिया के पांचों गणतंत्रों के साथ-साथ यदि यूएई को भी जोड़ लिया जाए तो यह यूरोपीय संघ से भी ज्यादा शक्तिशाली महासंघ बन सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
बस्तर गोलीकांड की न्यायिक जांच के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के.एल.पांडेय की एकल जांच समिति की घोषणा हो चुकी थी।
इसी बीच देश के सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आचार्य जे. बी. कृपलानी बस्तर आए। वे जगदलपुर में हुए नरसंहार से बेहद क्षुब्ध थे। बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव और निरीह आदिवासियों की हत्या से बहुत आहत थे।
जे.बी.कृपलानी ने 10 मई सन 1966 को जगदलपुर में एक विशाल आम सभा को भी संबोधित किया।
बस्तर के इतिहास में यह आमसभा स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने लायक है। इस विशाल आमसभा को आज भी याद किया जाता है।
आमसभा को संबोधित करते हुए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सांसद
(सन् 1951 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था)
आचार्य जे.बी.कृपलानी ने कहा था-
‘जगदलपुर हत्याकांड को लेकर कांग्रेसी चुप क्यों हैं? अंग्रेजों के जमाने में यह हुआ होता तो क्या वे चुप रहते? कमीशन की नियुक्ति से लेकर कमीशन के आगमन (6 अप्रैल 1966) तक लगभग पैंतीस दिनों तक जगदलपुर में धारा 144 लगाना तथा प्रशासन की बागडोर पुलिस के हाथों में होना। साक्ष्यों को पुलिस द्वारा नष्ट किया जाना और राजमहल के खून के दागों को मिटाना, यह आखिर क्या साबित करता है ?
इसी तरह महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के साथ केवल बारह आदिवासियों की मौत की कहानी भी अपने आप में संदेहजनक है।

प्रखर नेता जीवटराम भगवानदास कृपलानी ने बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए आगे अपने भाषण में कहा था :
यदि बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव कांग्रेसी शासन का तख्ता पलटने वाले थे तो केंद्र को इसकी खबर कैसे नहीं लगी? आदिवासी तीर और बांस की नुकीली कमचियों से तख्ता पलटने वाले थे यह बात ही अपने आप में मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद प्रतीत होती है।
यह सोचने लायक बात है कि इतनी शक्तिशाली सरकार आदिवासियों के तीर और कमान से इतनी भयभीत कैसे हो गई। यह भी अपने आप में संदेहास्पद है कि जब इतनी भारी मात्रा में यहां बलवा होने वाला था तो स्थानीय कांग्रेस पार्टी ने राज्य और केंद्र सरकार को समय रहते सूचित क्यों नहीं किया ?
आचार्य जे. बी कृपलानी ने तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा था-
‘26 मार्च की गोली कांड के विषय में पूरी जानकारी देने के लिए गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने देश से 48 घंटों का समय क्यों मांगा?’
जगदलपुर में 10 मई को आयोजित विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए जे.बी. कृपलानी ने गोली कांड में लिप्त अधिकारियों के अब तक अन्यत्र स्थांतरण न किए जाने पर भी क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा था-
‘बस्तर गोली कांड से संबंधित अधिकारी अभी भी बस्तर में क्यों पदस्थ हैं? जब कि उनका तुरंत ट्रांसफर हो जाना चाहिए था।
यही कारण है कि शासन की इस नीति के फलस्वरूप गुनाहगार अधिकारी अपने गुनाह छिपाने के लिए इस खुली छूट का फायदा उठा रहें हैं।’
आचार्य जे.बी.कृपलानी का यह भाषण बस्तर गोली कांड के विषय में अनेक सवालों को जन्म देता है।
इस वीभत्स गोली कांड को लेकर आचार्य जे.बी. कृपलानी राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों को कटघरे में खड़े करने की कोशिश करते हैं।

राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों की जवाबदेही पर वे प्रश्न चिन्ह भी खड़े करते हैं।
यहां एक अवांतर टिप्पणी करने के मोह से मैं स्वयं को नहीं रोक पा रहा हूं। यह अवांतर टिप्पणी भी जे.बी. कृपलानी और बस्तर गोली कांड से संबंधित है।
मई 1966 में जब जे.बी.कृपलानी बस्तर गोली कांड के सिलसिले में जगदलपुर जा रहे थे। यह उसी समय की एक रोमांचक घटना है जो आज भी मेरे जेहन में कैद है।
मैं 1966 में चौदह वर्ष का एक किशोर था। धमतरी में आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। यह घटना शायद 9 या 10 मई की है।
धमतरी के मकई चौक पर स्थित अमर टाकीज के पास सुबह से ही लोगों की भारी भीड़ लगी हुई थी।
किशोर सुलभ जिज्ञासा से मैं भी उस भीड़ के साथ खड़ा हो गया। जब मैंने यह जानने की कोशिश की कि यहां भीड़ क्यों लगी हुई है? मुझे बताया गया कि जे.बी.कृपलानी अभी कुछ ही देर में यहां से होकर गुजरने वाले हैं।
भीड़ को जे. बी. कृपलानी का उत्सुकतापूर्वक इंतजार था जो बस्तर गोली कांड के सिलसिले में जगदलपुर जा रहे थे। वे रायपुर से कार से निकल चुके थे। मैं भी किशोर सुलभ उत्सुकतावश इस भीड़ में शामिल हो गया था ।
थोड़ी ही देर बाद रायपुर से आ रही एक कार को भीड़ ने घेर लिया था। कार के रुकते ही जे.बी.कृपलानी उस कार से बाहर निकले । लोग उनकी जय-जयकार के नारे लगाने लगे। लोगों ने उनसे कुछ बोलने का निवेदन भी किया। पर वे किस तरह इस आकस्मिक भीड़ को संबोधित करें यह किसी के समझ में नहीं आ रहा था।
तभी किसी ने सुझाव दिया कि जे. बी. कृपलानी कार के ऊपर चढ़ कर भाषण दें, ताकि सभी लोग उन्हें देख और सुन सकें। यह तरकीब काम आ गई ।
आनन-फानन में उन्हें जैसे-तैसे कार के ऊपर चढ़ाया गया। जे.बी. कृपलानी ने कार पर खड़े होकर अपना भाषण दिया। जाहिर है वह भाषण बस्तर गोली कांड को लेकर था। इस भाषण के बाद ही धमतरी से उनकी विदाई हुई और वे जगदलपुर के लिए सकुशल रवाना हो पाए थे।
मैं इसका चश्मदीद गवाह बन सका था, यही क्या मेरे लिए कम है।
बाद में सन 1967 के लोकसभा चुनाव में रायपुर लोकसभा सीट से जे.बी.कृपलानी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव भी लड़ा, किंतु कांग्रेस के लखन लाल गुप्ता के हाथों उन्हें पराजित होना पड़ा था।
(बाकी अगले हफ्ते)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
सोश्यल मीडिया आज की जिंदगी में इतना महत्वपूर्ण बन गया है कि कई लोग 5 से 8 घंटे रोज तक अपना फोन या कंप्यूटर थामे रहते हैं। यदि हम मालूम करें कि वे क्या पढ़ते और देखते रहते हैं तो हमें आश्चर्य और दुख, दोनों होंगे। ऐसा नहीं है कि सभी लोग यही करते हैं। सोश्यल मीडिया की अपनी उपयोगिता है। गूगल तो आजकल विश्व महागुरु बन गया है। दुनिया की कौनसी जानकारी नहीं है, जो पलक झपकते ही उस पर नहीं मिल सकती। गूगल ने दुनिया के शब्द-कोशों, ज्ञान ग्रंथों और साक्षात गुरुओं का स्थान ग्रहण कर लिया है। उसके माध्यम से करोड़ों लोगों तक आप चुटकी बजाते ही पहुंच सकते हैं लेकिन इसी सोश्यल मीडिया ने भयंकर एंटी-सोश्यल भूमिका निभानी भी शुरु कर दिया है। इसके जरिए न केवल झूठी अफवाहें फैलाई जाती हैं बल्कि अपमानजनक, अश्लील, उत्तेजक और घृणित सामग्री भी फैलाई जाती है। इसके कारण दंगे फैलते हैं, भयंकर जन-आंदोलन उठ खड़े होते हैं और राष्ट्रों के बीच जहर भी फैल जाता है।
सोश्यल मीडिया के जरिए सबसे विनाशकारी काम बच्चों के विरुद्ध होता है। छोटे-छोटे बच्चे भी अपने मोबाइल फोन के जरिए दिन भर अश्लील चित्रों और दृश्यों को देखते रहते हैं। वे गंभीर अपराध करने के गुर भी इसी से सीखते हैं। वे कई किशोर इंटरनेट के आदेशों का पालन इस हद तक करते हैं कि वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। पिछले साल भर में ऐसी कई खबरें भारत के अखबारों और टीवी चैनलों पर देखने में आई हैं। बच्चों को संस्कारविहीन बनाने में सोश्यल मीडिया का विशेष योगदान है। वे अपनी पढ़ाई-लिखाई में समय लगाने के बजाय अश्लील चित्र-कथाओं में अपना समय बर्बाद करते हैं। बैठे-बैठे लगातार कई घंटों तक कंप्यूटर और मोबाइल देखते रहने से उनकी शारीरिक गतिविधियां भी घट जाती है। उसका दुष्परिणाम उनके स्वास्थ्य पर भी प्रकट होता है। वे निष्क्रियता और अकर्मण्यता के भी शिकार बन जाते हैं।
भारत में अभी यह जहरीली बीमारी बच्चों में थोड़ी सीमित है लेकिन अमेरिका और यूरोप के बच्चे बड़े पैमान पर इसके शिकार हो रहे हैं। इसने वहां महामारी का रुप धारण कर लिया है। अमेरिकी सांसद इससे इतने अधिक चिंतित हैं कि उन्होंने अब इस सोश्यल मीडिया पर नियंत्रण के लिए कठोर कानून बनाने का संकल्प कर लिया है। वे शीघ्र ही ऐसा कानून बनाना चाहते है कि जिससे पता चल सके कि 16 साल से कम के बच्चे कितनी देर तक सोश्यल मीडिया देखते हैं। उनके माता-पिता को यह जानने की सुविधा होगी कि उनके बच्चे इंटरनेट पर क्या-क्या देखते हैं और कितनी देर तक देखते हैं। वे इंटरनेट पर जानेवाली हर प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री पर प्रतिबंध लगाएंगे। इस तरह की कई अन्य मर्यादाएं लागू करना अमेरिका में ही नहीं, भारत और दक्षिण एशिया के देशों में उनसे भी ज्यादा जरुरी है। यदि भारत सरकार इस मामले में देरी करेगी तो भारतीय संस्कृति की जड़ें उखडऩे में ज्यादा देर नहीं लगेगी। मैं तो चाहता हूं कि भारत का अनुकरण दुनिया के सारे देश करें। (नया इंडिया की अनुमति से)


