विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस साल के बजट पर मेरा लेख पढक़र पाठकों ने पूछा कि आपने भारत की आयकर अव्यवस्था पर सख्त टिप्पणी क्यों नहीं की? इस सवाल के जवाब में मैं यही कह सकता हूँ कि मैं तो कई वर्षों से कह रहा हूँ कि भारत में आयकर की जगह जायकर लगाना चाहिए। याने लोगों की आमदनी नहीं, खर्च पर टैक्स लगाना चाहिए ताकि लोग बचत करें और उस बचत की राशि का उपयोग राष्ट्र-निर्माण के लिए भी हो सके। दुनिया के लगभग एक दर्जन देशों में उनके नागरिकों पर आयकर नहीं थोपा जाता है। लेकिन आयकर की जगह जायकर की व्यवस्था लागू करने में काफी पेचीदगियां है और उसे लागू करने के लिए सरकारी कर्मचारियों का ईमानदार होना भी बहुत जरुरी है।
यदि भारत सरकार में इसे लागू करने का फिलहाल दम नहीं है तो कम से कम वह आयकर व्यवस्था को सुधारने की कोशिश तो करे। इस बजट में कोई कोशिश दिखाई नहीं पड़ी लेकिन पिछली सरकारों ने भी क्या किया? उन्होंने आयकर की सीमा में थोड़ा-बहुत फेर-बदल करके अपना पिंड छुड़ाया। उसका नतीजा क्या हुआ? उसका सबसे ज्यादा खामियाजा नौकरीपेशा मध्यम वर्ग ने भुगता। देश के 140 करोड़ लोगों में से सिर्फ लगभग 6 करोड़ लोगों ने आयकर के फार्म भरे। उनमें से लगभग आधे लोगों ने टैक्स दिया।
याने मुश्किल से 2 प्रतिशत लोग टैक्स भरते हैं, जबकि दुनिया के जापान, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे समृद्ध देशों में लगभग 30 से 50 प्रतिशत लोग इनकम टैक्स भरते हैं। भारत के इन दो प्रतिशत लोगों में से डेढ़ प्रतिशत से भी ज्यादा लोग मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा लोग हैं। वे अपनी आमदनी छिपा नहीं सकते लेकिन जो करोड़पति, अरबपति और खरबपति लोग हैं, उन पर इतना ज्यादा टैक्स थोप दिया जाता है कि वे टैक्स बचाने के एक से एक नए तरीके खोज लेते हैं। उन्हें टैक्स-चोरी के लिए मजबूर किया जाता है। लेकिन देश के किसानों पर कोई टैक्स नहीं है।
छोटे किसानों को जाने दें लेकिन 5-10 एकड़ से ज्यादा के किसानों पर टैक्स क्यों नहीं है? खेती के नाम पर नेताओं, अफसरों और मोटे पूंजीपति अपनी अरबों रु. की काली कमाई को उजली करते रहते हैं। जिन गरीब लोगों से सरकार आयकर नहीं लेती है, वे भी जीवन भर अपना पेट काटकर तरह-तरह के टैक्स भरते रहते हैं। इसीलिए मेरा सुझाव यह है कि आयकर की मात्रा काफी घटानी चाहिए और देश के कम से कम 60-70 करोड़ लोगों को आयकरदाता बनाना चाहिए। इसमें बड़े और मध्यम किसानों को भी जोडऩा चाहिए।
इसके अलावा देश के लगभग 14-15 करोड़ ऐसे लोगों को जो 60 साल से ऊपर हैं, उन्हें सरकार को कम से कम 10 हजार रु. प्रति मास मानदेय देना चाहिए। यह सर्वथा व्यावहारिक प्रस्ताव है। बशर्ते कि आयकर की व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार हो। इस लोक-कल्याणकारी प्रस्ताव के बारे में विस्तार से आगे कभी लिखेंगे। इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए महाराष्ट्र में लातूर के प्रसिद्ध समाजसेवी अनिल बोकील ने जबर्दस्त अभियान शुरु किया है। मेरे परम प्रेमी मित्र थे वही बोकील हैं, जिनकी 2014 में मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट करवाई थी और जिनसे महाभारत के अभिमन्यु की तरह अधकचरा ज्ञान लेकर मोदी ने देश पर नोटबंदी थोप दी थी और अभिमन्यु की भांति चक्र—व्यूह में फंस गए।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
आखिरकार 25 मार्च सन 1966 का दिन बस्तर के लिए ही नहीं समूचे देश के लिए एक शर्मसार कर देने वाला दिन साबित हुआ।
25 मार्च आजादी के उन्नीस वर्षों बाद ही देशी हुक्मरानों के असली चेहरों को उजागर कर देने वाला एक काला दिन सिद्ध हुआ।
इस दिन सत्ता का चरित्र साफ-साफ दिखाई दे रहा था और आदिवासी हितों की पैरवी करने का दिखावा करने वाला सत्ता का मुखौटा भी उतर चुका था।
बस्तर के आदिवासियों के हितों की लड़ाई लडऩे वाले प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसे महाराजा की जरूरत कांग्रेस को नहीं थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे उदारमना प्रधानमंत्री की मृत्यु भी सन 1964 में हो चुकी थी।
महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र की आंखों में पहले से ही खटक रहे थे। बस्तर के कांग्रेसी नेताओं के लिए तो शुरू से ही महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव आंख की किरकिरी साबित हो रहे थे।
तो 25 मार्च सन 1966 की कहानी पहले ही लिखी जा चुकी थी, यहां तक कि पटकथा भी पहले से ही तैयार हो चुकी थी। केवल इसे अंजाम देना भर बाकी रह गया था।
25 मार्च की घटना के संबंध में यह भी सच है कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के अनुज विजय चंद्र भंजदेव को जब महल में उत्पन्न विषम परिस्थितियों की जानकारी मिली तो वे तुरंत राजमहल की ओर दौड़ पड़े थे , पर पुलिसवालों ने उन्हें राजमहल के भीतर प्रवेश करने नहीं दिया।
विजय चंद्र भंजदेव लगातार बुदबुदा रहे थे कि पुलिस उनके भाई को मार डालेगी। वे पुलिस वालों से बार-बार राजमहल के भीतर जाने और अपने भाई से मिलने के लिए अनुनय-विनय कर रहे थे, पर पुलिस वाले तो पुलिस वाले थे ।

ऊपर से आला अधिकारियों का आदेश था कि राजमहल में परिंदे भी पर न मार पाएं क्योंकि आज जो कुछ भी राजमहल में होने जा रहा था उसकी भनक इंसान तो क्या परिंदे तक को भी न होने पाए ।
इसलिए महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के अनुज विजय चंद्र भंजदेव को भी भीतर नहीं जाने दिया गया। उन्हें मुख्य द्वार से ही वापस लौटा दिया गया था।
25 मार्च की सायंकाल चार बजे तक महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव अपने राजमहल में जीवित थे।
25 मार्च को राजमहल के बाहर सशस्त्र पुलिस की अनेक टुकडिय़ां मौजूद थीं। बाहर लाउडस्पीकर पर घोषणा की जा रही थी कि आदिवासी राजमहल से बाहर निकल कर आत्मसमर्पण कर दें नहीं तो पुलिस को मजबूरन गोली चलानी पड़ेगी ।
महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव स्वयं राजमहल के भीतर पुलिस के डर से घुसे हुए आदिवासियों को अपने साथ बाहर निकालने लग गए थे ताकि कोई भी निर्दोष आदिवासी पुलिस की गोलियों का निशाना न बन सके।
वे सोच रहे थे कि पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देने से भोले भाले आदिवासियों की जान बच जाएगी।
महाराजा इस मुश्किल समय में भी वे आदिवासियों की चिंता करना नहीं भूले थे।
महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव किसी तरह आदिवासियों को समझा बुझा कर अपने साथ राजमहल के भीतर से बाहर लाए।
आदिवासी ज्यों ही राजमहल के भीतर से निकल कर बाहर आए पुलिस वालों ने उन्हें घेर लिया और लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। यही नहीं देखते ही देखते ताबड़तोड़ गोलियों की बरसात भी शुरू हो गई ।
महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव पुलिस की इस क्रूरता को देखकर दंग रह गए थे। वे यह सब अपनी आंखों से देखकर विचलित हो उठे थे।
आदिवासियों के लिए कुछ न कर पा सकने की असमर्थता उनके चेहरे पर साफ-साफ पर दिखाई देने लगी थी।

पुलिस जिस निर्ममता के साथ आदिवासियों को लाठियों से पीट रही थी वह उनके लिए कल्पनातीत था।
आजाद भारत में आजाद भारत की पुलिस अपने ही आदिवासी भाई बहनों पर लाठियां बरसा रही थीं ।
पुलिस की बंदूकें भी गूंजने लगी थी ।
महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसे ही राजमहल के भीतर वापस जाने के लिए मुड़े कि पुलिस वालों ने उन पर भी गोली दाग दी। जैसे उन्हें महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव का ही अब तक इंतजार रहा हो कि कब वे राजमहल के बाहर निकलें और उन्हें निशाना बनाकर गोली दागी जा सके ।
गोली महाराजा के पावों को निशाना बनाकर दागी गई थीं । गोली लगते ही महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव लहुलुहान होकर लडख़ड़ाते हुए अपने शयनकक्ष की ओर भागे।
वे जैसे-तैसे घायल अवस्था में कराहते हुए खून से लथपथ शयनकक्ष तक पहुंचे।
अपने शयनकक्ष के भीतर पहुंचकर वे बिस्तर पर निढाल हो गए।
इससे पहले वे कुछ और सोच-समझ पाते कि दनदनाते हुए पुलिस की टुकड़ी उनके शयनकक्ष के भीतर घुस गई और बिस्तर पर निढाल महाराजा को गोलियों से छलनी कर दिया।
पुलिस ने अपनी इस बहादुरी के बाद शयनकक्ष से महाराजा के क्षत-विक्षत शव को किसी तरह ड्रॉइंग रूम में लाकर रख दिया ।
इसके बाद शयनकक्ष से खून और गोलियों के दाग मिटा दिए गए ताकि पुलिस के वहशी होने के सारे सबूत मिट जाए। सत्यमेव जयते’ ऐसे ही थोड़े पुलिस का लोगो माना जाता है ।
महाराजा के पुलिस की गोली से मारे जाने की सूचना पूरी रात लोगों से छिपा कर रखी गई।
लेकिन तब भी जगदलपुर की फिजाओं में महाराजा के गोली से मारे जाने की खबर लगभग फैल चुकी थी।
जगदलपुर और बस्तर ही नहीं पूरा देश इस जघन्य कांड को लेकर शर्मशार हो रहा था।
पर अभी महाराजा के मारे जाने की विधिवत सरकारी घोषणा होनी बाकी थी।
26 मार्च को दोपहर में प्रशासन की ओर से विजय चंद्र भंजदेव और शहर के कुछ प्रमुख नागरिकों और पत्रकारों को सूचना दी गई कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव और तेरह आदिवासी पुलिस की गोलियों से मारे गए हैं।
दोपहर तीन बजे के आस-पास विजय चंद्र भंजदेव और कुछ गणमान्य नागरिकों को भीतर जाकर महाराजा के अंतिम दर्शन की अनुमति प्रदान की गई।
शाम को महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की अंतिम यात्रा में थोड़े से लोगों को ही शामिल होने की अनुमति दी गई।
अंतिम यात्रा की खबर पाकर पूरा जगदलपुर शहर अपने प्रिय महाराजा को अंतिम विदाई देने उमड़ पड़ा था। अश्रूपूरित नयनों के साथ रास्ते के दोनों ओर लोग खड़े हुए थे।
लोग रो रहे थे, चीख रहे थे, विलाप कर रहे थे। उनके प्रिय महाराजा को पुलिस ने जो गोलियों से भून दिया था।
वे रुंधे हुए गले से बस एक ही सवाल बार बार पूछ रहे थे कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसे देवता तुल्य महाराजा के साथ पुलिस और प्रशासन ने ऐसा बर्बरतापूर्ण व्यवहार क्यों किया ?
पुलिस और प्रशासन को ऐसे देव पुरुष पर गोलियां क्यों बरसानी पड़ी ?
क्या महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव देशद्रोही थे या बस्तर के भोले भाले आदिवासियों को लूट रहे थे ?
आखिरकार उनका गुनाह क्या था ?
पर इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इस गोली कांड के पचपन वर्ष बीत जाने के बाद भी क्या इसका जवाब आज भी किसी के पास है?
देर शाम सात बजे महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव का अंतिम संस्कार किया गया।
लगभग इसी समय बी.बी.सी के माध्यम से पूरे देश और दुनिया ने जाना कि बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव अपने राजमहल में पुलिस की गोलियों के शिकार हो गए हैं।
पर एक गंभीर सवाल तो अब भी बस्तर की खामोश फिजाओं में गूंज रहा था कि क्या महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के साथ केवल तेरह आदिवासी ही पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे ?
क्या 25 मार्च को पुलिस की गोलियों से मारे गए आदिवासियों की संख्यां सैकड़ों में नहीं थी ?
पर आदिवासियों को इंसान कौन मानता है ? अगर मानते तो क्या आज भी बस्तर के आदिवासी पुलिस और नक्सलियों की गोली के शिकार होने को मजबूर होते ?
(बाकी अगले हफ्ते)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चीन की राजधानी पेइचिंग में शुरु हो रहे ओलंपिक खेलों का भारत बहिष्कार करेगा। हमारे कूटनीतिज्ञ न उसके उदघाटन और न ही सम्मान-समारोह में शामिल होंगे, क्योंकि चीन ने भारत को अपमानित करने के लिए एक नया पैंतरा मारा है। उसने ओलंपिक के आरंभिक जुलूस में अपनी फौज के उस कमांडर को मशालची बनाया है, जो गलवान घाटी में भारत पर हुए हमले का कर्ता-धर्त्ता था। की फाबाओ नामक इस कमांडर ने गलवान-मुठभेड़ के बाद एक इंटरव्यू में काफी शेखी बघारी थी और भारत के 20 जवानों को मारने का श्रेय अपने सिर लिया था। चीनी फौज ने उसे उसकी वीरता के लिए पुरस्कृत भी किया था।
ऐसे व्यक्ति को ओलम्पिक गेम्स का हीरो बनाना क्या इस बात का सूचक नहीं है कि चीन चोरी और सीनाजोरी पर उतारु है? इतना ही नहीं, पिछले माह चीनी फौजियों ने सीमांत के एक गांव से एक भारतीय नौजवान को अगुआ करके उसकी जमकर पिटाई की और भारत के विरोध करने पर उसे लौटा दिया लेकिन उसे अधमरा करके! चीनियों ने ये सब उटपटांग काम तब किए जबकि भारत ने नवम्बर 2021 में भारत-रूस-चीन के त्रिगुट की बैठक में ओलंपिक खेलों के स्वागत की घोषणा कर दी थी।
इसके अलावा उसकी जमीन कब्जाए जाने और उसके सैनिकों की हत्या के बावजूद वह चीन से शांतिपूर्वक संवाद भी कर रहा है। इसका अर्थ क्या यह नहीं है कि चीन अपनी दादागीरी पर उतारु हो गया है? उसे शायद यह बुरा लग रहा है कि भारत और अमेरिका एक-दूसरे के इतने नजदीक क्यों आ रहे हैं। चीनी ओलंपिक के उदघाटन में भाग लेने के लिए रुस से पुतिन, पाकिस्तान से इमरान खान और पांचों मध्य एशियाई गणतंत्रों के राष्ट्रपति पेइचिंग पहुंच रहे हैं। लेकिन अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, डेनमार्क जैसे कई देशों ने इन खेलों का राजनयिक बहिष्कार पहले से इसलिए घोषित कर रखा है कि चीन में मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन होता है।
एक अमेरिकी सीनेटर ने तो दो-टूक शब्दों में कहा है कि चीन की यह हरकत शर्मनाक है कि उसने ओलंपिक के जूलूस में ऐसे मशालची को शामिल किया है, जिसने उइगर मुसलमानों का कत्ले-आम किया है और भारतीय जवानों को भी मारा है। भारत ने ओलंपिक खेलों का यह बहिष्कार पहली बार किया है और सरकार इन खेलों को अब अपने दूरदर्शन के चैनलों पर भी नहीं दिखाएगी। चीन की इस हरकत ने भारत-चीन फौजी संवाद में एक नई कड़ुवाहट को जन्म दे दिया है। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को महापंडित के अलावा क्या कहा जाए? संसद में उन्होंने चीन और पाकिस्तान को लेकर जो बयान दिया है, यदि आप उसे ध्यान से पढ़ें तो आप खुद से पूछ बैठेंगे कि भारत की महान पार्टी इस कांग्रेस का नेतृत्व किन हाथों में चला गया है? यदि देश के प्रमुख विपक्षी दल का नेता इतना तथ्यहीन और तर्कहीन बयान दे सकता है और बौद्धिक तौर पर वह इतना अपरिपक्व है तो हमारे लोकतंत्र का ईश्वर ही मालिक है। राहुल गांधी की पहली मुलाकात मुझसे 2005 में काबुल में हुई थी। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह मुझे काबुल अपने साथ ले गए थे। बादशाह जाहिरशाह की नातिन और शाहजादी मरियम की बेटी ने मेरे लिए राजमहल में शाकाहारी प्रीति-भोज का आयोजन किया था। वह राहुल को भी उसमें बुला लाई।
लगभग दो घंटे तक हम साथ रहे। राज परिवार के सदस्यों से मैं फारसी में और राहुल से हिंदी में बात करता रहा। राहुल की बातचीत और अत्यंत शिष्टतापूर्ण व्यवहार ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं सोचता रहा कि यह नौजवान भारत की राजनीति में सक्रिय हो गया तो यह काफी आगे तक जा सकता है। शुरु के कुछ वर्षों में ऐसा लगने भी लगा था लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों से मुझे ही नहीं, देश के कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को भी यह लगने लगा है कि कांग्रेस का भविष्य अनिश्चित-सा हो गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य पार्टियों के नेता राहुल के मुकाबले महान बौद्धिक हैं। उनके और राहुल के बौद्धिक स्तर में ज्यादा अंतर नहीं है। वे भी अपने तथ्यों और तर्कों में हास्यास्पद भूलें करते रहे हैं लेकिन ऐसी भूलें वे अचानक या जल्दबाजी में करते हैं, संसद में भाषण देते हुए नहीं। राहुल ने कह दिया कि मोदी सरकार का ‘‘सबसे बड़ा अपराध’’ यह है कि उसने चीन और पाकिस्तान को एक-दूसरे का हमजोली बना दिया है। यह तो तथ्य है कि दो-ढाई साल पहले तक मोदी और चीनी नेता शी चिन फिंग ने जितनी गलबहियां एक-दूसरे के साथ कीं, आज तक दोनों देशों के किन्हीं भी नेताओं के बीच नहीं हुई।
लेकिन यह तो मोदी का स्वभाव ही है। फिर भी चीन और पाकिस्तान यदि एक-दूसरे के नजदीक हुए हैं तो वे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहनसिंह के शासनकाल में ही हुए हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन जानेवाला पहला प्रधानमंत्री कौन था? क्या राहुल को पता है? उनके पूज्य पिता राजीव गांधी। जिन सलाहकारों के लिखे हुए भाषण बिना सोचे-समझे हमारे युवा-नेता लोग पढ़ मारते हैं, उन्हें अन्य बुजुर्ग नेताओं के आचरण से कुछ सीखना चाहिए। वे भी कोई परम बौद्धिक नहीं होते लेकिन वे हमेशा सतर्क और सावधान होते हैं। राजीव गांधी के असंगत तर्कों को काटने के लिए विदेश मंत्री जयशंकर के तर्कों को मैं यहां दोहराना नहीं चाहता हूं लेकिन राहुल गांधी का यह कथन भी अतिरंजित और हास्यास्पद ही है कि भारत में लोकतंत्र की बजाय राजतंत्र स्थापित हो रहा है। यहां एक राजा का राज चल रहा है। यह ठीक है कि सत्तारुढ़ भाजपा में अपेक्षित आंतरिक लोकतंत्र घट गया है लेकिन कांग्रेस में तो यह शून्य ही है। भारत की लगभग सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन चुकी हैं। इस खटकर्म की शुरुआत और पराकाष्ठा कांग्रेस ने ही आपात्काल लाकर की थी। बेहतर तो यह हो कि राहुल इस महान कांग्रेस पार्टी को माँ-बेटा पार्टी और भाई-बहन पार्टी होने से बचाएं। वरना न केवल भारत का लोकतंत्र अधोगति को प्राप्त होगा बल्कि राहुल गांधी को भारतीय राजनीति के महापंडित की उपाधि से भी सम्मानित कर दिया जाएगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
-कनक तिवारी
राहुल गांधी के संसद में हालिया दिए गए अप्रत्याशित लेकिन परिपक्व भाषण से समर्थकों और विरोधियों दोनों के सामने गैरअनुमानित हालत पैदा हुई। कई बातों के अलावा राहुल ने ‘राष्ट्र‘ शब्द को रेखांकित करते कहा कि भारत को सीमित, एकांगी या केवल भाषायी अर्थ में राष्ट्र कहा या समझा नहीं जा सकता। भारत राज्यों का संघ है। राज्यों की संवैधानिक इकाइयों के रूप में स्वायत्त अहमियत है। राज्य केन्द्र के तहत शासित इकाई नहीं है। उसे लोकतंत्र की जरूरी धड़कन समझना आवश्यक होगा। इसी विचार बिन्दु से राष्ट्र, राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयकरण जैसे शब्दों का कुटुम्ब या परिधि बनाने की कोशिश करता है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी अपने समय के भारत की हालत देखते राष्ट्र शब्द मुफीद नजऱ नहीं आया था। ऊपरी तौर पर राहुल का कथन जुमला नज़र आता है। इसलिए उसे नासमझ हमलों का शिकार भी होना नामुमकिन नहीं है। निष्पक्ष, तटस्थ, वस्तुपरक और विचारमूलक नज़र से राष्ट्र जैसी अवधारणा को टटोलने पर उसमें मौजूदा भारत के संविधान और शासन संस्थाओं को लेकर पश्चिमी समझ का ही वातायन खुल पाता है। नई लोकतांत्रिक पारिभाषा के अनुसार भारत को बहुत पुराने इतिहास की खिड़कियां खोलकर इस तरह नहीं ढूंढ़ा जा सकता मानो राष्ट्र शब्द भारत के अस्तित्व की समझ के लिए निर्विकल्प रहा हो।
पश्चिमी नस्ल की डेमोक्रेसी और शासन प्रबंधन सहित हर तरह की सामाजिकी और अंततः संविधान रचने पर केवल शब्द छटा के आधार पर राजनीतिक थ्योरियां न तो गढ़ी जा सकती हैं और न ही उनसे सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धांत स्थिर होते हैं। शब्दों, वाक्यों, उद्धरणों, कथनों और समझ की संभावनाएं विकसित करने के भी लिए लोकतांत्रिक गणराज्य में संवैधानिक जुमलों, फतवों वगैरह का हुक्मनामा नहीं है। उसे तरह तरह के रंगीन चश्मों से देखा, समझा जा सकता है। 300 सदस्यों के औसतन, तीन वर्ष के श्रम के बाद जो हासिल आया वही संविधान तय करता है कि आखिरकार राष्ट्र और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का सर्वमान्य साध्य या प्रमेय क्या बन सकता है?
‘राष्ट्र‘ शब्द को लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानन्द, गांधी, नेहरू सहित कई दक्षिणी और वामपंथी विचारकों ने भाषायी समझ की समवेत व्याख्याओं को अपनी अपनी समझ की मुट्ठी में भींचने की कोशिश की है। मौजूदा भारत के लिए किसी हवाई सर्वेक्षण या वायवी जुमलों में डूबे बिना बाबा साहेब अम्बेडकर ने राष्ट्र को एक ठहरी हुई उपपत्ति नहीं माना। उसे समय के आयाम में संभावित और भविष्यमूलक संदर्भों में भी साफ साफ रेखांकित किया। राहुल के शब्द अलग हैं। इसलिए जाहिर है उनकी समझ भी अलग होगी। संभव है उनकी बौद्धिक टीम ने अम्बेडकर के अधिकारिक और सर्वसम्मत पारित वक्तव्य में से राष्ट्र संबंधी थ्योरी को समकालीन बनाते राहुल को कुछ सूत्र दिए होंगे।
25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने आखिरी सम्बोधन में बाबा साहेब ने सर्वाधिक व्यापक वक्तव्य दिया। वह संविधान रचने की भूमिका, चुनौतियों, कठिनाइयों, संभावनाओं और आशंकाओं तक को लेकर वक्त की स्लेट पर एक ऐसी इबारत उकेरता है जो अमिट नहीं है, लेकिन उस समझ के आधारमूलक ढांचे को तोड़ा मरोड़ा नहीं जा सकता। तल्खी में अम्बेडकर ने कहा कुछ राजनीतिक प्रतिनिधियों ने संविधान के मुखड़े में ‘हम भारत के लोग‘ शब्दांश को रखे जाने की मुखालफत की थी। उसके एवज में ‘भारत एक राष्ट्र‘ शब्दांश को शामिल करने की पुरजोर पैरवी की। अम्बेडकर ने कहा मेरी राय है कि हम एक राष्ट्र हैं कहकर बड़े मायाजाल में खुद को फंसा रहे हैं। हजारों वर्षों से जातियों में बंटे फंसे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं?
जितनी जल्दी हम महसूस कर लें कि इस शब्द के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ में अब भी हम एक राष्ट्र नहीं हैं, उतना ही बेहतर होगा। तब ही महसूस कर सकेंगे कि राष्ट्र होने की क्या ज़रूरत है और उस अहसास को हासिल करने कौन से रास्ते और प्रविधियां अपनाई जाएं। बाबा साहेब ने कहा इस मकसद को हासिल करना अमेरिका जैसे राज्य के मुकाबले ज़्यादा कठिन है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में कोई जाति समस्या नहीं है। भारत में उसके बरक्स जातियां ही जातियां हैं। जातियां ही एंटी नेशनल हैं। पहला कारण यह कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव पैदा करती हैं। इसलिए भी एंटी नेशनल हैं क्योंकि एक जाति दूसरी जाति के खिलाफ जलन, द्वेष और नफरत पैदा करती है। हकीकत में हम यदि राष्ट्र बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले इन कठिनाइयों पर जीत हासिल करनी होगी। बंधुत्व या बंधुता तब ही एक सच हो सकता है। राष्ट्र अस्तित्व में हो, तब ही बंधुता सही मायनों में हासिल हो सकती है। बंधुता के बिना बराबरी फकत किसी दीवार पर पुते पेन्ट की परतों से ज़्यादा कुछ नहीं है।
इस संदर्भ में ‘राष्ट्र‘ नामक शब्द के परखचे उखाडे़े बिना उसे नकली और उद्दाम देशभक्ति के पचड़े में नहीं डालें, तो राहुल का बयान अम्बेडकर की संवैधानिक पाठशाला में चुनौतीपूर्ण फलसफे की तरह क्यों नहीं पढ़ा जा सकता?
कई चेतावनियां अम्बेडकर ने इन्हीं सन्दर्भों में बिखेरी थीं। उनकी ओर आज़ादी के बाद अनदेखी है, और लापरवाही बल्कि ढिठाई सरकारों में कायम रही है। अम्बेडकर ने कहा रिश्तों के इस तिलिस्म को समझने के लिए नज़रों में मकड़जाले नहीं होने चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषण और व्याख्या करते उन्होंने कहा यदि देश पर राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा को अहम बनाकर लादा जाएगा तो लोकतांत्रिक अस्तित्व ही पराजित होगा। एक अलग बात उन्होंने कही कि संविधान के साथ साथ हमें संविधानवाद में भरोसा करना होगा।
उन्होंने ठोस सवाल पूछा सामाजिक लोकतंत्र क्या है सिवाय इसके कि वह एक ऐसा जीवन तंत्र है जिसमें आज़ादी, समानता और बंधुत्व ही बुनियादी आधार हो सकते हैं? 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र घोषित होने वाले देश में भले ही हम समानता और एक व्यक्ति एक वोट की संवैधानिक बराबरी का दावा कर लें लेकिन देश का आर्थिक और सामाजिक ढांचा पहले ही चरमरा चुका है। उस विरोधाभास के रहते कैसे वंचित वर्गों को सामाजिक आर्थिक बराबरी पर नहीं लाने पर भी ठेंगा दिखाते रहेंगे। यदि लंबे अरसे तक यही चला तो ये वर्ग उस पूरे ढांचे को ही फूंक मारकर उड़ा देंगे।
अम्बेडकर ने अमेरिका का उदाहरण देते बताया एक गिरजाघर में अमेरिकन आज़ादी के बाद शुरुआती प्रार्थना में ईश्वर के लिए आह्वान जोड़ा जाने की तजवीज की गई, ‘हे ईश्वर हमारे राष्ट्र को आशीर्वाद दे।‘ इस पर इतनी आपत्तियां उठाई गईं कि ये शब्द छोड़कर यह लिखना पड़ा ‘हे ईश्वर इन संयुक्त राज्यों को आशीर्वाद दो।‘ इसी का समानांतर अन्वेषित करते अम्बेडकर ने दमदारी के साथ संविधान की उद्देशिका में उसका मकसद एक राष्ट्र बनाने के पहले राष्ट्र शब्द के समर्थकों की आपत्ति को समायोजित करते भी यह वाक्यांश मंजूर कराया, ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता; प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए।‘
इन ऐतिहासिक, संवैधानिक परिस्थितियों, तथ्यों को देखने के बाद राष्ट्र शब्द की एकांगी, पक्षपातपूर्ण, अवैज्ञानिक और संकुचित समझ बाधित होती है। जब तक सही संदर्भ में शब्द-व्युत्पत्ति के इतिहास को नहीं जज़्ब किया जाएगा, व्हाट्सएप विश्वविद्यालय से तरह तरह की डिग्री प्राप्त और फिर उनके राजनीतिक प्रशिक्षु हर शब्द को अपने वजूद के लिए पेटेंट कराते रहेंगे। भले ही देश, इतिहास, संविधान और भविष्य का कबाड़ा होता रहे।
प्रसिद्ध अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ के इस सनसनीखेज खुलासे पर प्रधानमंत्री, उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों और सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं ने चुप्पी साध रखी है कि अपने ही देश के नागरिकों की जासूसी के उद्देश्य से सैकड़ों करोड़ की लागत वाले उच्च-तकनीक के पेगासस सॉफ्टवेयर सरकार ने इजराइल की एक कम्पनी से खरीदे थे। अखबार की खबर के मुताबिक, दो अरब डॉलर मूल्य के आधुनिक हथियारों की खरीद के साथ ही नागरिकों के निजी मोबाइल फोन में उच्च तकनीकी के ज़रिए प्रवेश करके उनके क्रिया-कलापों की जासूसी करने में सक्षम सॉफ्टवेयर को भी हासिल करने का सौदा प्रधानमंत्री की जुलाई 2017 में हुई इजराइल यात्रा के दौरान किया गया था। किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की वह पहली इजराइल यात्रा थी।
उत्तर प्रदेश सहित पाँच राज्यों में होने जा रहे महत्वपूर्ण चुनावों के ऐन पहले अमेरिकी अखबार द्वारा किए गए उक्त खुलासे के पहले तक देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद, न्यायपालिका, विपक्षी पार्टियां और नागरिक पूरी तरह से आश्वस्त थे कि न तो सरकार ने पेगासस सॉफ्टवेयर की खरीदी की है और न ही उनके जरिए किसी तरह की जासूसी को अंजाम दिया गया। वह यकीन अब पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है। ताजा खुलासे ने देश में लोकतंत्र को बनाए रखने और नागरिकों की निजी जिंदगी में उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करने को लेकर सरकार की मंशाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह एक अलग मुद्दा है कि प्रधानमंत्री, सरकार और अंतरराष्ट्रीय जगत में देश की प्रतिष्ठा को लेकर अब किस तरह के सवाल पूछे जाएँगे और यह भी कि करोड़ों की संख्या में विदेशों में बसने वाले भारतीय मूल के नागरिकों के पास देने के लिए क्या जवाब होंगे!
वर्तमान सूचना-प्रौद्योगिकी (आई टी) मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जब पिछले साल संसद में भारत द्वारा पेगासस के इस्तेमाल किए जाने की खबरों को आधारहीन और सनसनीखेज बताते हुए खारिज कर दिया था तब उनके कहे पर शक की गुंजाइश के साथ यकीन कर लिया गया था। पूछा जा रहा है कि अब सरकार उसी संसद और उन्हीं विपक्षी सवालों का किस तरह से सामना करने वाली है? क्या उसके इतना भर जवाब दे देने से ही विपक्ष और देश की जनता विश्वास कर लेगी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरे मामले की जाँच करने के लिए गठित की गई समिति की रिपोर्ट मिलने तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले प्रतीक्षा की जानी चाहिए। तो क्या आजादी प्राप्ति के बाद के इस सबसे बड़े जासूसी कांड को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच भी टकराव की आशंकाओं के लिए देश को तैयारी रखना चाहिए?
ताजा घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में क्या सरकार से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि विदेशी ताकतों के लिए जासूसी करने को देशद्रोह का अपराध करार देने वाली व्यवस्था में अपने ही नागरिकों की जासूसी करने को अपराध की किस श्रेणी में रखा जा सकता है? ऐसे मामलों में नैतिकता का क्या तकाजा हो सकता है जिनमें विदेशी संसाधनों की मदद लेकर स्थापित लोकतंत्र की बुनियादों को कमजोर करने की नियोजित कोशिशें की जातीं हों?
पेगासस का मामला जब पहली मर्तबा उठा था रविशंकर प्रसाद केंद्र में सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री थे। उन्होंने जासूसी के आरोपों का खंडन करने के बजाय यह कहते हुए सरकार का बचाव किया था कि जब दुनिया के पैंतालीस देश पेगासस का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उसे लेकर हमारे यहाँ इतना बवाल क्यों मचा हुआ है! उनके इस तरह के जवाब के बाद टिप्पणी की गई थी कि किसी दिन कोई और मंत्री खड़े होकर यह नहीं पूछ ले कि अगर दुनिया के 167 देशों के बीच ‘पूर्ण प्रजातंत्र’ सिर्फ तेईस मुल्कों में ही जीवित है और सत्तावन में अधिनायकवादी व्यवस्थाएँ हैं तो भारत को ही लेकर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है ? ब्रिटेन के अग्रणी अखबार ‘द गार्डीयन’ ने तब लिखा था कि जो दस देश कथित तौर पर पेगासस के जरिए जासूसी के कृत्य में शामिल हैं वहाँ अधिनायकवादी हुकूमतें काबिज हैं।
‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ ने अपनी साल भर की खोजबीन के बाद मैक्सिको,सऊदी अरब सहित जिन तमाम देशों में हुकूमतों द्वारा पेगासस सॉफ्टवेयर के जरिए सत्ता-विरोधियों की जासूसी करने का खुलासा किया है उसके प्रकाश में कल्पना की जा सकती है कि भारतीय लोकतंत्र को लेकर किस तरह की मान्यताएँ दुनिया में स्थापित हो सकतीं हैं। पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर के जरिए न सिर्फ पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, न्यायपालिका और चुनाव आयोग से संबद्ध हस्तियों को ही निशाने पर लिए जाने के आरोप हैं, सरकार के ही कुछ मंत्री, उनके परिवारजन, घरेलू कर्मचारी और अफसरों का भी पीडि़तों की सूची में उल्लेख किया गया है।
अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद से उस सरकार द्वारा अपने ही उन नागरिकों की जासूसी करना जिसे कि उन्होंने पूरे विश्वास के साथ अपनी रक्षा की जिम्मेदारी सौंप रखी है एक खतरनाक किस्म का खौफ उत्पन्न करता है। खौफ यह कि जो नागरिक अभी सत्ता के शिखरों पर बैठे अपने नायकों की क्षण-क्षण बदलती मुद्राओं से सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र में ही भयभीत होते रहते हैं उन्हें अब सरकारों द्वारा गुप्त तकनीकी उपकरणों, सॉफ्टवेयर की मदद से अपने निजी जीवन की जासूसी का शिकार बनने के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। सवाल यह उठता है कि क्या जनता के दिए जाने धन से किसी भी सरकार द्वारा उसके ही खिलाफ जासूसी करने के हथियार खरीदे जा सकते हैं? ऐसी स्थितियाँ तभी बनती है जब या तो जनता अपने शासकों का विश्वास खो देती है या फिर शासकों का शक इस बात को लेकर बढऩे लगता है कि एक बड़ी संख्या में लोग व्यवस्था के खिलाफ ‘षडय़ंत्र’ कर रहे हैं और उसमें पार्टी-संगठन के असंतुष्ट भी चोरी-छुपे साथ दे रहे हैं।’न्यूयॉर्क टाईम्स’ इस रहस्य का कभी खुलासा नहीं कर पाएगा कि संसद में पेश किए जाकर मंजूर होने वाले बजटों में जनता की जासूसी के लिए उपकरणों, सॉफ्टवेयर की खरीद के प्रावधान किन मदों से किए जाते होंगे!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हम भारतीयों को यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि हमारे पड़ौसी देश मालदीव में आजकल एक जबर्दस्त अभियान चल रहा है, जिसका नाम है- ‘भारत भगाओ अभियान’! भारत-विरोधी अभियान कभी-कभी नेपाल और श्रीलंका में भी चलते रहे हैं लेकिन इस तरह के जहरीले अभियान की बात किसी पड़ौसी देश में पहली बार सुनने में आई है। इसका कारण क्या है, यह जानने के लिए हमें मालदीव की अंदरुनी राजनीति को जऱा खंगालना होगा। यह अभियान चला रहे हैं, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन, जो लगभग डेढ़ माह पहले ही जेल से छूटे हैं। उन्हें रिश्वतखोरी और सरकारी लूट-पाट के अपराध में सजा हुई थी। उन्होंने सत्तारुढ़ मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी के खिलाफ जन-अभियान छेड़ दिया है। यह अभियान इसलिए भारत-विरोधी बन गया है कि ‘माडेपा’ के दो नेताओं राष्ट्रपति मोहम्मद सालेह और पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को कट्टर भारत-समर्थक माना जाता है।
यामीन को अपना गुस्सा नशीद और सालेह पर उतारना है तो उन्हें भारत को ही मालदीव का दुश्मन घोषित करना जरुरी है। यामीन का यह भारत-विरोधी अभियान इतनी रफ्तार पकड़ता जा रहा है कि सत्तारुढ़ ‘माडेपा’ अब संसद से ऐसा कानून पास करवाना चाह रही है, जिसके तहत उन लोगों को छह माह की जेल और 20 हजार रु. जुर्माना भरना पड़ेगा, जो मालदीव पर यह आरोप लगाएंगे कि वह किसी विदेशी राष्ट्र के नियंत्रण में चला गया है। इसे वह राष्ट्रीय अपमान कहकर संबोधित कर रहे हैं। यह कानून आसानी से पास हो सकता है, क्योंकि संसद में सत्तारुढ़ दल के पास प्रचंड बहुमत है। यामीन की प्रोग्रेसिव पार्टी में कोई दम नहीं है कि वह सत्तारुढ़ पार्टी को संसद में नीचा दिखा सके लेकिन मालदीव की जनता में उसकी लोकप्रियता बढ़ती चली जा रही है। उसके कई कारण हैं। पहला कारण तो यही है कि सत्तारुढ़ ‘माडेपा’ में अंदरुनी खींचतान चरमोत्कर्ष पर है।
राष्ट्रपति सालेह और संसद-अध्यक्ष नशीद में चिक-चिक की खबरें रोज़ मालदीवी जनता को हैरत में डाल रही हैं। नशीद वास्तव में खुद जनाधार वाले नेता हैं। वे संविधान में परिवर्तन करके अपने लिए प्रधानमंत्री का पद पैदा करना चाहते हैं। सालेह और नशीद के मतभेद अन्य कई मुद्दों पर भी खुले-आम सबके सामने आ रहे हैं। इसका कुप्रभाव प्रशासन पर हो रहा है। सरकार पर से जनता का विश्वास घटता जा रहा है। दूसरा, मंहगाई और कोरोना बीमारी ने मालदीव की अर्थ-व्यवस्था को लगभग चौपट कर दिया है। तीसरा, यद्यपि भारत पूरी मदद कर रहा है लेकिन यामीन-राज में चीन ने जिस तरह से अपनी तिजोरियां खोलकर मालदीवी नेताओं की जेबें भर दी थीं और उन्हें अपनी जेब में डाल लिया था, वैसा नहीं होने के कारण वर्तमान नेतृत्व काफी सांसत में है। चौथा, सालेह-नशीद सरकार पर उसके विरोधी यह आरोप भी जड़ रहे हैं कि उसने भारत से सामरिक सहयोग करने के बहाने मालदीव की संप्रभुता को भारत के हाथ गिरवी रख दिया है। मालदीव में सक्रिय भारतीय नागरिकों को आजकल कई नई मुसीबतों का सामना करना पड़ा है। भारतीय राजदूतावास पर हमले की आशंकाएं भी बढ़ गई हैं। यह असंभव नहीं कि मालदीव में तख्ता-पलट की कोई फौजी कारवाई भी हो जाए। भारत के लिए यह गहन चिंता का विषय है। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस साल का जो बजट पेश किया गया है, उसे भाजपा के नेता अगले 25 साल और 100 साल तक के भारत को मजबूत बनाने वाला बजट बता रहे हैं और विपक्षी नेता इसे बिल्कुल बेकार और निराशाजनक घोषित कर रहे हैं। वैसे जब इस बजट को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण संसद में पेश कर रही थीं तो उनके भाषण को सुनने वाले लोगों को, खासतौर से सामान्य लोगों को लग रहा था कि इस बजट में उनके लिए कुछ नहीं है।
सरकार ने न तो रोजमर्रा के इस्तेमाल की कुछ न कुछ चीज़ों को सस्ता करने की घोषणा की है, न आयकर को घटाकर मध्यम वर्ग को कोई राहत दी है और न ही आम लोगों को कुछ मुफ्त सुविधाओं की घोषणा की है। जैसा कि पिछले बजटों के समय जबर्दस्त नौटंकियां होती थीं, वैसी इस बार बिल्कुल भी दिखाई नहीं पड़ीं। कुल मिलाकर यह बजट निर्गुण निराकार-सा लगता रहा लेकिन जब इसके सारे आंकड़े अलग से विस्तारपूर्वक सामने आए और टीवी चैनलों पर तरह-तरह की बहसें सुनीं तो लगा कि इस बजट में बुनियादी सुधार के कई ऐसे कदम उठाए गए हैं, जिन्हें सरकार के द्वारा जनता को सरल भाषा में अच्छी तरह समझाना होगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस बजट में कहीं भी ऐसी झलक नहीं है कि इसका पांच राज्यों के चुनाव से कुछ संबंध है।
हर व्यक्ति यह सोच रहा था कि इन पांचों राज्यों के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सरकार इस बजट का इस्तेमाल जरुर करेगी। सच पूछा जाए तो किसानों और मध्यम वर्ग के व्यापारियों और नौकरीपेशा लोग तो इस बजट से निराश ही हुए हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां जरुर खुश हुई होंगी कि उनके टैक्स में कटौती हुई है लेकिन सरकार ने जो सपने इस बजट में दिखाए हैं, यदि वह इन्हें ठोस रुप दे सकी तो लोक कल्याण काफी हद तक बढ़ेगा।
जैसे वह 60 लाख नए रोजगार देगी, 400 नई रेलें चलाएगी, सारे गंगातटीय प्रदेशों में जैविक खेती को बढ़ावा देगी, 80 लाख मकान गरीबों को देगी, 200 नए टीवी चैनलों द्वारा मातृभाषा के जरिए शिक्षा का प्रसार करेगी, लगभग 4 करोड़ घरों में नलों द्वारा शुद्ध जल पहुंचाएगी, पांच नदियों को जोड़ेगी, 25000 किमी की नई सडक़ें बनाएगी, लघु-उद्योगों के प्रोत्साहन में सवा दो लाख करोड़ रु. लगाएगी।
इस तरह की घोषणाएं सुनने में तो अच्छी लगती हैं लेकिन इन पर भरोसा तभी होगा जबकि लोगों को इनके ठोस फायदे मिलने लगेंगे। कोरोना महामारी ने करोड़ों लोगों को बेरोजगार किया है और करोड़ों की आमदनी आधी रह गई है, मंहगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है, बहुत-से लोग इलाज के अभाव में मारे गए हैं।
ऐसी हालत में अगर इस बजट में आम लोगों को तात्कालिक राहत के कुछ संदेश मिलते तो उसका श्रेय सरकार को भी जरुर मिलता। भारत के लिए 25 और 100 साल के विकास की बात कही गई है लेकिन इस बजट में यदि देश की शिक्षा और चिकित्सा याने मन और तन के सुधार के लिए कोई बुनियादी क्रांतिकारी की पहल इससे होती तो यह बजट सचमुच अन्य बजटों से बेहतर और एतिहासिक भी कहलाता। (नया इंडिया की अनुमति से)
छत्तीसगढ़ में पिछले वर्ष रिकॉर्ड 30.6 लाख परिवारों के 60.19 लाख श्रमिकों को मिला था काम
-कमलेश साहू
ग्रामीण अंचलों में प्रत्येक नागरिक को रोजगार की गारंटी देने वाला ‘मनरेगा’ 2 फरवरी को अपने क्रियान्वयन के 16 साल पूरे कर रहा है। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 2 फरवरी 2006 को आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले से ‘मनरेगा’ यानि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) को अमलीजामा पहनाने की शुरूआत की थी। पहले चरण में इसे देश के 200 सबसे पिछड़े जिलों में लागू किया गया था। वर्ष 2007-08 में दूसरे चरण में इसमें 130 और जिलों को शामिल किया गया। तीसरे चरण में 1 अप्रैल 2008 को इसे देश के बांकी ग्रामीण जिलों तक विस्तारित किया गया। ‘नरेगा’ के नाम से शुरू इस योजना की व्यापकता और प्रभाव के मद्देनजर इसे ग्राम स्वराज के परिदृश्य में देखते हुए 2 अक्टूबर 2009 को इसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम जोड़ा गया।
छत्तीसगढ़ में मनरेगा का शुभारंभ 2 फरवरी 2006 को राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव विकासखण्ड के अर्जुनी ग्राम पंचायत से हुआ। राज्य में भी इस योजना का विस्तार तीन चरणों में हुआ। प्रथम चरण में 2 फरवरी 2006 को तत्कालीन 16 में से 11 जिलों में इसे लागू किया गया। इनमें बस्तर, बिलासपुर, दंतेवाड़ा, धमतरी, जशपुर, कांकेर, कबीरधाम, कोरिया, रायगढ़, राजनांदगांव और सरगुजा जिले शामिल थे। द्वितीय चरण में 1 अप्रैल 2007 से चार और जिलों रायपुर, जांजगीर-चांपा, कोरबा और महासमुंद को योजना में शामिल किया गया। तृतीय चरण में 1 अप्रैल 2008 से दुर्ग जिले को भी इसमें शामिल किया गया। अभी प्रदेश के सभी 28 जिलों में मनरेगा प्रभावशील है।
छत्तीसगढ़ में पिछले 16 सालों में मनरेगा का सफर शानदार रहा है। वर्ष 2006-07 में 12 लाख 57 हजार परिवारों को रोजगार प्रदान करने से शुरू यह सफर पिछले वित्तीय वर्ष 2020-21 में 30 लाख 60 हजार से अधिक परिवारों तक पहुंच चुका है। प्रदेश में पिछले वर्ष रिकॉर्ड 30 लाख 60 हजार परिवारों के 60 लाख 19 हजार श्रमिकों को मनरेगा के माध्यम से काम मिला था। इसके एवज में श्रमिकों को अब तक का सर्वाधिक 3493 करोड़ 34 लाख रूपए का मजदूरी भुगतान किया गया था। चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 में भी अब तक दस महीनों में (अप्रैल-2021 से जनवरी-2022 तक) 26 लाख 28 हजार परिवारों के 49 लाख 28 हजार श्रमिकों को रोजगार दिया गया है। कोरोना काल में मनरेगा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संजीवनी प्रदान की। कोरोना संक्रमण को रोकने लागू देशव्यापी लॉक-डाउन के दौर में इसने ग्रामीणों को लगातार रोजगार मुहैया कराया और उनकी जेबों तक पैसे पहुंचाए। बीते दो वर्षों में मनरेगा श्रमिकों को 5721 करोड़ 50 लाख रूपए का मजदूरी भुगतान किया गया है। वर्ष 2020-21 में 3493 करोड़ 34 लाख रूपए और चालू वित्तीय वर्ष में 2228 करोड़ 16 लाख रूपए मजदूरों के हाथों में पहुंचाए गए हैं। इसने कोरोना काल में ग्रामीणों को बड़ी राहत दी है। इसकी वजह से विपरीत परिस्थितियों में भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था अप्रभावित रही।
मनरेगा के अंतर्गत प्रदेश में पिछले चार वर्षों में 57 करोड़ 53 लाख मानव दिवस से अधिक का रोजगार सृजन किया गया है। इस दौरान वर्ष 2018-19 में 13 करोड़ 86 लाख, 2019-20 में 13 करोड़ 62 लाख और 2020-21 में 18 करोड़ 41 लाख मानव दिवस रोजगार ग्रामीणों को उपलब्ध कराया गया। चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 में भी अब तक 11 करोड़ 65 लाख श्रमिकों को रोजगार प्रदान किया जा चुका है। योजना की शुरूआत से लेकर अब तक वर्ष 2020-21 में सर्वाधिक 18 करोड़ 41 लाख मानव दिवस रोजगार का सृजन हुआ है, जो प्रदेश के लिए नया रिकॉर्ड है। छत्तीसगढ़ में 2020-21 में राष्ट्रीय औसत 52 दिनों के मुकाबले प्रति परिवार औसत 60 दिनों का रोजगार दिया गया। वर्ष 2019-20 में प्रति परिवार औसत 56 दिनों का और 2018-19 में 57 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया। चालू वित्तीय वर्ष में जनवरी-2022 तक औसतन प्रति परिवार 44 दिनों का रोजगार दिया जा चुका है, जबकि वित्तीय वर्ष की समाप्ति में अभी दो महीने शेष हैं।
मनरेगा के तहत पिछले चार वर्षों में प्रदेश में कुल 16 लाख 86 हजार से अधिक परिवारों को 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराया गया है। इस दौरान 2018-19 में चार लाख 28 हजार 372, वर्ष 2019-20 में चार लाख 18 हजार 159 और 2020-21 में छह लाख 11 हजार 988 परिवारों को 100 दिनों का रोजगार प्रदान किया गया। चालू वित्तीय वर्ष में अब तक दो लाख 27 हजार 566 परिवारों को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया जा चुका है।
मनरेगा कानून ग्रामीण गरीबों की जिंदगी से सीधे तौर पर जुड़ा है जो व्यापक विकास को प्रोत्साहन देता है। यह कानून अपनी तरह का पहला कानून है जिसके तहत जरूरतमंदों को रोजगार की गारंटी दी जाती है। इसका मकसद ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों की आजीविका सुरक्षा को बढ़ाना है। मनरेगा के अंतर्गत प्रत्येक परिवार जिसके वयस्क सदस्य अकुशल श्रम का कार्य करना चाहते हैं, उनके द्वारा मांग किए जाने पर एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों का गारंटीयुक्त रोजगार देने का लक्ष्य है। इस योजना का दूसरा लक्ष्य यह है कि इसके माध्यम से टिकाऊ परिसम्पत्तियों का सृजन किया जाए और ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को मजबूत बनाया जाए। इस अधिनियम का मकसद सूखा, जंगलों के कटान, मृदा क्षरण जैसे कारणों से पैदा होने वाली निर्धनता की समस्या से भी निपटना है, ताकि रोजगार के अवसर लगातार पैदा होते रहें।
-जेके कर
आज 1 फरवरी 2022 को साल 2022-2023 के लिये पेश केन्द्रीय बज़ट में स्वास्थ्य मंत्रालय के लिये महज 80 करोड़ रुपयों की बढ़ोतरी की गई है. इससे स्पष्ट हो जाता है कि जन-स्वास्थ्य सरकारी एजेंडे में बहुत नीचे की ओर है. हां, कोरोनाकाल में पिछले साल 82920.65 करोड़ रुपये खर्च किये गये जो उसके पिछले साल के 71268.77 करोड़ रुपयों से 11651.88 करोड़ रुपये ज्यादा था. इस बार उम्मीद की जा रही थी कि स्वास्थ्य क्षेत्र के केन्द्रीय बजट को और बढ़ाया जायेगा लेकिन वैसा नहीं हुआ.
यदि इसके थोड़े विस्तार में जायेंगे तो पता चलता है कि Revised Estimates 2021-2022 की तुलना में Budget Estimates 2022-2023 में Central Sector Schemes/Projects में पिछले साल 14223.31 करोड़ रुपये खर्च किये गये थे जिसे बढ़ाकर 15163.22 करोड़ रुपये कर दिया गया है. वहीं Centrally Sponsored Schemes में पिछले साल 50591.14 करोड़ रुपये खर्च किये गये थे जिसे घटाकर 47634.07 करोड़ रुपये कर दिया गया है. इसी तरह से Establishment Expenditure of the Centre को 6000.47 करोड़ रुपयों से बढ़ाकर 6856.73 करोड़ रुपये का कर दिया गया है. Other Central Sector Expenditure में भी 12105.73 करोड़ रुपये को बढ़ाकर 13345.98 करोड़ रुपये का कर दिया गया है.
कुलमिलाकर आज पेश केन्द्रीय बज़ट में स्वास्थ्य मंत्रालय के लिये महज 80 करोड़ रुपयों की बढ़ोतरी की गई है.
अब Department of Health Research पर भी एक नज़र डाल लेते हैं. इसमें कोरोना जैसी महामारी के बावजूद केवल 120.65 करोड़ रुपयों की बढ़ोतरी की गई है.
हालांकि, कल पेश आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारों का स्वास्थ्य क्षेत्र पर बजटीय व्यय 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद का 2.1 प्रतिशत हो गया, जोकि 2019-20 में 1.3 प्रतिशत था.
यहां पर इस बात का उल्लेख करना गलत न होगा कि ‘कोविड-19 महामारी का प्रकोप और इसका प्रबंधन' पर संसदीय समिति की पहली रिपोर्ट है में कहा गया था कि 2 साल के भीतर जीडीपी के 2.5 % तक के खर्च के राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये निरंतर प्रयास करें. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में 2025 तक जीडीपी का 2.5% स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च का लक्ष्य रखा गया है.
अब सवाल किया जाना चाहिये कि केन्द्रीय बज़ट में मात्र 80 करोड़ रुपयों की बढ़ोतरी करके स्वास्थ्य के क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद का 2.1फीसदी से 2.5 फीसदी तक पहुंचा जा सकता है? वैसे भारत जैसे देश में लोक कल्याणकारी सरकारों (केन्द्र + राज्य) को 6 फीसदी तक अपने सकल घरेलू उत्पादन का खर्च करना चाहिये. तभी माना जायेगा कि जन-स्वास्थ्य के लिये कुछ किया जा रहा है वर्ना कोरोनाकाल में खर्च बढ़ाना तो मजबूरी है.
Department of Health and Family Welfare Department of Health Research
Actuals 2020-2021- 77569.33......................3124.59
Budget Estimates 2021-2022 - 71268.77......................2663.00
Revised Estimates 2021-2022- 82920.65......................3080.00
Budget Estimates 2022-2023- 83000.00......................3200.65
(SOURCE- Expenditure Profile 2022-2023)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
30 जनवरी का दिन महात्मा गांधी की पुण्य तिथि है लेकिन इस दिन दिल तोडऩे वाली दो घटनाएं हुईं। एक तो ग्वालियर में गोड़से-आप्टे दिवस मनाया गया और दूसरे गुजरात के किशन भारद्वाज के हत्यारों की खबर सामने आई। किशन की हत्या इसलिए कर दी गई थी कि उसने इस्लाम के बारे में कोई निंदाजनक राय सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी थी। आजादी के 75 वें साल में यदि भारत में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं तो इसका अर्थ क्या है?
ये घटनाएं संख्या के हिसाब से नगण्य हैं लेकिन फिर इनका होते रहना क्या इस बात का सूचक नहीं है कि सांप्रदायिकता, असहिष्णुता और अतिवाद के जहरीले बीज आज भी भारत में हरे हैं। उन्हें जरा-सा खाद-पानी मिला नहीं कि वे वटवृक्ष बनने को तैयार रहते हैं। यह तो सत्य है कि हिंदुत्व और इस्लाम के नाम पर ऐसा कुकर्म करने वालों को देश के ज्यादातर हिंदू और मुसलमान गलत मानते हैं और दबी जुबान से उनकी निंदा भी करते हैं लेकिन असली सवाल यह है कि जो लोग इस जहरीले अतिवाद को फैलाते हैं, उनकी ऐसी मनोवृत्ति क्यों बन जाती है?
इसका मूल कारण यह है कि वे किसी धर्म के मर्म को ठीक से समझे ही नहीं होते। उन्हें पोंगा-पंडित या मुल्ला-मौलवी जो भी घुट्टी पिलाते हैं, उसे वे आंख मींचकर निगल जाते हैं। वे यह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि सारे धर्मध्वजी अपने आप को प्राय: बादशाहों, शासकों, राजाओं और सरकारों के चमचे बना देने में जरा भी संकोच नहीं करते। उन्हीं के इशारों पर वे धर्मग्रंथों के मंत्रों, वर्सों और आयतों की मनचाही व्याख्या कर डालते हैं। ये शासकगण अपनी सत्ता-पिपासा को शांत करने के लिए धर्मों, मजहबों, संप्रदायों आदि को सीढिय़ों की तरह इस्तेमाल करते हैं।
मज़हबी लोग सोचते हैं कि हम अपना पंथ फैलाने के लिए इन शासकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन दोनों के बीच यह सांप-सीढ़ी का खेल पूरी दुनिया में चलता रहा है। इसी खेल को हमने भारत, यूरोप, एशिया और अफ्रीका में सदियों से चलता हुआ देखा है। धर्म या मजहब के नाम पर जितना खून बहा है, वह सत्ता के लिए बहे खून से कम नहीं है। जो सच्चा धार्मिक व्यक्ति है और जो परमात्मा को सबका पिता मानता है, वही उसके नाम पर किसी की हत्या कैसे कर सकता है?
ऐसे हत्यारों का वह स्मृति-दिवस कैसे मना सकता है? भारतीय परंपरा में तो ऐसा होना असंभव ही है, क्योंकि हमारी परंपरा तो कहती है कि परमात्मा एक ही है लेकिन विदत्जन उसे अनेक रुप में देखते हैं (एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति)। हत्याओं से कोई मतभेद हल नहीं होते। गांधी की हत्या से क्या पाकिस्तान खत्म हो गया और किशन भारद्वाज की हत्या से क्या इस्लाम की रक्षा हो गई? क्या इन प्रश्नों का जवाब इन हत्याओं के समर्थकों के पास है? (नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रकाश दुबे
अयोध्या परिसर में नाम बदलने का पुराना रिवाज है। कभी साकेत, कभी अयोध्या, कभी फैजाबाद। नवाब नाचते गाते भी थे और राम की आराधना भी करते थे। उसी अयोध्या में जाने कितने बार सिर फुटव्वल की नौबत आने लगी। डा राम मनोहर लोहिया का जन्म वर्तमान अयोध्या संभाग का अकबरपुर में हुआ था। सत्ता में आने के बाद मायावती ने अकबरपुर को जिले का दर्जा देते हुए आम्बेडकर नगर जिला नाम कर दिया। नाम का अपना प्रभाव होता है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस प्रभाव को सिर नवाकर स्वीकार किया। जिले के चारों विधानसभा क्षेत्रों के सपा उम्मीदवारों की एकमात्र योग्यता समान है। सभी बसपा के दलबदलू हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में राम अचल राजभर बसपा के चुनावचिह्न पर अकबरपुर से जीते थे। नजाकत नाम के साथ नहीं बदलती। सपा में शामिल होते ही राजभर ने संकल्प घोषित किया-अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के बाद वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री बनाएंगे।
वंशवाद विरोधी क्रांति
प्रतापसिंह राणे चुनाव मैदान से हट गए। बेटा, बहू और प्रतापराव के चुनाव लडऩे पर वंशवाद का आरोप लगता। भले सत्ताधारी पार्टी ने बहू को प्रतापराव के खिलाफ मैदान में उतारा हो। बरसों तक जिस पार्टी के मुख्यमंत्री रहे, उसे वंशवाद विरोध समझ में नहीं आया। गोवा में भगवा को सत्ता दिलाने वाले मनोहर पर्रिकर ने सचिवालय के मुख्यमंत्री कक्ष में गोलवलकरजी की तस्वीर लगा रखी थी। निर्भीक पिता के चुनाव क्षेत्र से बेटा उत्पल निर्दल चुनाव लडऩे के लिए विवश है। वंशवाद और परिवारवाद विरोधी पार्टी नीति में उत्पल की दाढ़ी फिट नहीं हुई। कांग्रेस से दलबदल करने वाले दागदार को पार्टी ने मनोहर पर्रिकर के विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवारी थमा दी। उनकी पत्नी को भी चुनाव मैदान में उतारा। उत्पल अपना बच्चा है। दलबदलुओं पर नीति नहीं लाद सकते। हेमवती नंदन बहुगुणा के भांजे जनरल खंडूरी की बेटी ऋतु कोटद्वार से चुनाव लड़ेगी। बहुगुणा की सांसद बेटी रीता लखनऊ में बेटे को लड़ाने के लिए सांसदी छोडऩे का त्याग करना चाहती हैं या धमकी दे रही हैं? पूरा कुनबा ही पार्टी में हो तब परिवारवाद का आक्षेप बेमानी है।
सूर्य नमस्कार
राजतिलक की संभावनाओं पर कोहरा है। पडरौना के पूर्व जमींदार परिवार के राजकुमार और कांग्रेस के अघोषित राज परिवार के घनिष्ठ रतनजीत प्रताप नारायण सिंह को योगी बाबा की छत्रछाया में राजयोग को आदित्य उगता नजऱ आ रहा है। समाजवादी अखिलेश ने मौर्य को टिकट देकर कुंवर रतनजीत की जीत की संभावना का सूर्यास्त कर दिया था। कुंवर के दलबदल के बाद कांग्रेस ने महासचिव अविनाश पांडे को झारखंड का प्रभारी बनाया। तय हुआ था कि जिस दिन रतनजीत को योगी बाबा उम्मीदवार घोषित करेंगे, उसी दिन रांची में मंत्री, विधायक, पदाधिकारी अविनाश के साथ नए जोश में संगठन को मजबूत करने की बात करेंगे। रतन को चक्रव्यूह में उतारने की योगी बाबा की कोशिश पर आला कमान का अंकुश लगा है। कांग्रेस की रणनीति धरी रह गई। योगी का आदित्य प्रखर हो, या धुंधला, आरपीएन के दूसरे आदित्य ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। पार्टी में शामिल कराया तो टिकटवा भी दिलवाएंगे। एनडीटीवी पत्रकार सोनिया (वर्मा) सिंह आरपीएन की पत्नी हैं। दावे से कह सकता हूं कि दलबदल में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
अहिंसक गणतंत्र
दिल्ली में गणतंत्र दिवस की तैयारियां जारी थीं। गृहमंत्री गन्नों के खेत में वोट की मिठास तलाशने पहुंचे थे। गोदावरी तट पर पार्टी सांसद अहिंसक गणतंत्र का सामना कर रहा था। पुराना कांग्रेसी है। महात्मा गांधी वाला बुखार पूरी तरह उतरा नहीं है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में वादा किया कि जीतने के बाद हल्दी और ज्वार बोर्ड बनवा कर हल्दी उत्पादक किसानों को सही दाम दिलवाएंगे। नहीं बना तो सांसदी से इस्तीफा देंगे। स्टाम्प पेपर पर वचननामा छपवाकर बंटवाया था। निजामाबाद जिले के किसानों ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री की बेटी को हरा दिया सांसद धरमपुरी अरविंद का 25 जनवरी को जनता ने रास्ता छेंक लिया। पुलिस के लाठी-डंडे के बावजूद नहीं हटे। उनकी शिकायत है कि न तो बोर्ड बने और न त्यागपत्र मिला। सडक़ पर वचननामा की होली जलाई। क्रिकेटर रह चुके अरविंद पिच छोडक़र भागे। गांधी और गणतंत्र को मानने वालों की खुराफात का मुकाबला नहीं है। लुभावने चुनावी वादे करने के बाद याददाश्त खोने वालों को इन दिनों किसान सबक सिखला रहे हैं। नसीहत-फर्जी वादा करने वाले सावधान रहें।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-चैतन्य नागर
भय की अपनी ही भाषा होती है। अपना एक खास स्वाद और रंग। भय में फंसे मन में अँधेरा छा जाता है और कुछ भी नहीं सूझता। यह पंगु बना देता है। अँधेरे कमरे का भय, अकेले होने का भय, बीमार पडऩे का भय, इम्तेहान में फेल हो जाने का भय——न जाने कितनी तरह के भय हैं। यदि आप फोबिया के बारे में जानना चाहें तो आपको सैकड़ों ऐसे भयों की फेहरिश्त मिलेगी कि आप ताज्जुब में पड़ जायेंगें कि ऐसे-ऐसे भय भी हुआ करते हैं। और ये सिर्फ नाम नहीं, इनसे लोग वास्तव में गुजरते हैं और इनकी भयावहता का पूरा अनुभव करते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सात साल की उम्र तक बच्चे का मस्तिष्क पूरा विकसित हो जाता है, उतना ही जितना कि किसी वयस्क का। पर सात साल की उम्र तक अपने विकसित होते मस्तिष्क में एक बच्चा अजीबो-गरीब भयों का अनुभव करता है। जऱा हम अपने बचपन तक जाने की कोशिश करें। तार पर टंगे कपड़ों के उडऩे का भय, आंधी में तेजी से हिलते पेड़ों का भय, किसी बालकनी के किनारे तक जाने का भय, छत से पंखे के टूट कर गिर जाने का भय, और न जाने कैसे कैसे भय! कुछ विचारक यह भी कहते हैं कि बुनियादी तौर पर इंसान में बस दो ही भाव होते हैं, भय और प्रेम। जब तक उसमे प्रेम का जन्म नहीं होता, वह भय की गिरफ्त में होता है! भय के साथ ही कई मनोदैहिक, भावनात्मक प्रतिक्रियाएं चलती हैं। इसकी श्रृंखलित प्रतिक्रियाएं भी होती हैं। क्रोध और हिंसा भी भय के चक्र का ही हिस्सा हैं। भयभीत इंसान को बहुत गुस्सा आ सकता है और वह इस गुस्से को हिंसात्मक तरीके से व्यक्त कर सकता है। भय के पीछे असुरक्षा का भाव भी प्रबल तरीके से काम करता है।
दरअसल हमें जिस तरह शिक्षित किया जाता है, चाहे घरों में या स्कूलों में, वहां हमें कभी भी यह नहीं सिखाया जाता कि भय से कैसे निपटें। और इसका परिणाम यही होता है कि चाहे हम कहीं भी चले जाएँ, किसी भी पेशे या नौकरी में जाएँ, एक तरफ बाहरी तरक्की करते चले जाते हैं, पर अपने पुराने और गहरे भावों को नहीं समझ पाते और ये भाव लगातार हमारे जीवन को जटिल बनाते चले जाते हैं। माँ-बाप और शिक्षकों के पास न ही धैर्य होता है, न ही समय और न ही इतनी प्रज्ञा कि वे इन मुद्दों पर खुद के साथ और बच्चों के साथ संवाद कर सकें। आम तौर पर हम भय को जीवन का हिस्सा मान लेते हैं और जब इसपर संवाद करते भी हैं तो अपने अपने भयों के उदाहरण देकर संतुष्ट हो जाते हैं। एक सीमा के बाद इस नासमझी की दीवार को हम भेद नहीं पाते।
बारहवीं कक्षा में पढने वाली एक छात्रा ने कहा- ‘मुझे अपनी उम्र के लोगों के साथ रहना अच्छा ही नहीं लगता क्योंकि मेरा अनुभव तो यही है कि मेरे दोस्त मुझे छोड़ देंगे और ऐसा मेरे साथ इतनी बार हो चुका है कि मैं अब अपनी उम्र या अपने से छोटे बच्चों के साथ ही नहीं रहती। बड़े लोगों के साथ रहने में मैं सुरक्षित महसूस करती हूँ, ऐसा लगता है जैसे वे मुझे कभी छोड़ कर नहीं जायेंगे।’
आठवीं में पढ़ रहे एक बच्चे का अपना ही अलग अनुभव था। उसने कहा कि मुझे ट्राइपोफोबिया है। इस शब्द से मैं परिचित नहीं था, तो उसने स्पष्ट किया कि उसे ऐसी चीज़ें भयभीत करती हैं जो खुरदुरी हों और जिनमे छोटे छोटे छिद्र हों। बच्चे बड़े कल्पनाशील होते हैं और इन्टरनेट या दूसरे माध्यमों की मदद से वे अपनी भावनाओं के लिए शब्द भी ढूंढ लेते हैं।
बच्चों के कई सवाल होते हैं। बच्चे मृत्यु के बारे में जिज्ञासु जरुर होते हैं पर उनकी जिज्ञासा को एक तरफ कर देते हैं, उन्हें डांट-डपट कर चुप करवा देते हैं। पर इससे जुड़े सवाल उसके मन में लगातार कुलबुलाते रहते हैं। हम बच्चों को चुप कराने के लिए भय का प्रयोग करते आये हैं। कोई बच्चा नहीं पढ़ रहा, नहीं खा रहा या नहीं सो पा रहा तो उसे तुरंत किसी काल्पनिक भूत प्रेत का भय दिखाते हैं। बस इसलिए क्योंकि यह आजमाया हुआ उपाय है, इसमें ज्यादा सोचने समझने की जरुरत नहीं और इसका परिणाम तुरंत मिलता है। पर इसका भयंकर दुष्परिणाम यह होता है कि इस तरह के भय बच्चे के मन में जड़ें जमा लेते हैं और इन्हें वह जाने अनजाने में जीवन भर इन्हें ढोता रहता है। वयस्कों के लिए जरूरी है कि पहले तो वे अपने भयों को समझें और फिर साथ ही साथ बच्चों को भी उनके भय की व्यर्थता दिखाएँ। पर हममें से कितने हैं जो अपने मन की भावनात्मक संरचना को समझना चाहते हैं? इसके प्रति जिज्ञासा को न ही बढ़ावा दिया जाता है और न ही उसे पोषित किया जाता है। बल्कि उसे दबाने कुचलने का काम हम बखूबी करते रहते हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पेगासस के जासूसी सॉफ्टवेयर को लेकर भारत सरकार फिर दलदल में फंस गई है। सारे विरोधी दलों ने उसे दलने के लिए कमर कस ली है। सरकार को नींद नहीं आ रही होगी कि संसद के इस सत्र में वह बजट पेश करेगी या इस इजराइल के जासूसी यंत्र की मार से खुद को बचाएगी। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने ज्यों ही यह खबर उछाली कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में अपनी इजराइल-यात्रा के दौरान जब इजराइल से दो अरब डालर के हथियारों का सौदा किया था तभी 500 करोड़ रु. का यह जासूसी यंत्र खरीदा था तो फिर क्या था?
भारत के सारे विरोधी दल चंग पर चढ़ गए। उन्होंने सरकार पर हमले शुरु कर दिए। उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस सारे मामले पर पहले से जांच बिठा रखी है। जब यह मामला संसद के पिछले सत्र में उठा था तो इतना हंगामा हुआ कि संसद ही ठप्प हो गई थी। सरकार की हालत इतनी पतली हो गई थी कि उसकी घिग्घी बंध गई थी। वह न तो संसद को और न ही अदालत को यह साफ-साफ बता सकी कि उसने इजराइल से यह जासूसी यंत्र खरीदा था या नहीं और इस यंत्र से उसने विरोधी नेताओं, पूंजीपतियों, पत्रकारों और महत्वपूर्ण नागरिकों की जासूसी की थी या नहीं।
बस वह यही कहती रही कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। वह सारे तथ्य सार्वजनिक नहीं कर सकती। अदालत इजाजत दे तो वह खुद जांच बिठा सकती है। अदालत ने सरकार के अभिमत को रद्द कर दिया और एक सेवा-निवृत्त न्यायाधीश के अध्यक्षता में अपनी जांच बिठा दी। अदालत, विरोधियों और कई प्रबुद्ध पत्रकारों का मानना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में कोई भी सरकार नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं कर सकती। यदि सरकार आतंकवादियों, तस्करों, ठगों, हिंसकों, अपराधियों, देशद्रोहियों के खिलाफ जासूसी करे तो वह सर्वथा उचित है लेकिन यदि ऐसा ही है तो उसे हकलाने, लडख़ड़ाने और घबराने की जरुरत क्या है?
सरकार की इस घबराहट को ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अब बड़े सिरदर्द में बदल दिया है। यदि राहुल गांधी का यह आरोप कि सरकार ने देशद्रोह किया है, बचकाना है तो भी संसद में विपक्ष के सारे हमले का शिकार प्रधानमंत्री की कुर्सी ही होगी। प्रधानमंत्री की जानकारी के बिना किसी मंत्री या अफसर की हिम्मत नहीं है कि वह देश के नागरिकों पर इस तरह की जासूसी कर सके।
स्वयं नरेंद्र मोदी को चाहिए कि वे चाहे उन सब व्यक्तियों के नाम उजागर न करें लेकिन वे संसद में बताएं कि किस तरह के लोगों के खिलाफ पेगासस-यंत्र का इस्तेमाल होता रहा है और यदि गलती से या जानबूझकर भी निर्दोष, विरोधियों, पत्रकारों और उद्योगपतियों के खिलाफ उसका इस्तेमाल हुआ है तो वे सार्वजनिक तौर पर उनसे माफी मांग लें और इस मामले को यहीं खत्म करें। (नया इंडिया की अनुमति से)
-चिन्मय मिश्र
बापू के निर्वाण दिवस पर कुछ कहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। वे क्या थे, क्या नहीं यह समझना और बूझना बेहद कठिन है। आज जब लिखने बैठो तो 30 जनवरी 1948 को गालियों की शिकार उनकी पार्थिव देह आँखों के सामने आती है और दूसरे ही क्षण उन युवाओं और बच्चों की पुलिस मार से उधड़ी पीठ, कमर व टांगें दिखाती हैं। उनके फूटे सरों से बहता खून नजर आता है। नजर आते हैं तमाम नौजवान जो बेतरह रो रहे क्योंकि पुलिस बेरहमी से उनकी पिटाई कर रही है। वे पुलिस वाले के हाथ जोड रहे हैं पैर पकड़ रहे हैं उसके बावजूद पिटते जा रहे हैं। सामने नजर आ रहे हैं, पुलिसकर्मी जो अपने बंदूक के कुन्दे से इन युवाओं के रहने वाले होस्टलों, लॉजों के दरवाजे तोड़ रहे हैं। उन्हें गालियां दे रहे हैं। धमका रहे हैं। इन बच्चों का कुसूर ? वे रेल्वे से अपने लिए नौकरी मांग रहे हैं। वे प्रतियोगी परीक्षा में हुए अन्याय के खिलाफ अपनी आवास उठा रहे हैं। इस दौरान थोड़ी बहुत हिंसा भी हुई, जो अक्षम्य है और नहीं होना चाहिए थी। परंतु उन युवाओं को सडक़ों पर क्यों उतरना पड़ा, यह हमारी आपकी चर्चा का हिस्सा नहीं है। क्यों ? शायद इसलिए कि हमने किसी और की तकलीफ को महसूस करना छोड़ दिया है। दूसरों के दुख दर्द में हिस्सेदारी करने से स्वयं को अलग कर लिया है। हे राम !
बापू ने मरते वक्त भी ‘‘हे राम! ’’ कहा था परंतु आज हम अपने यहां जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर जब ‘‘हे राम!’’ कहते हैं तो उसके कुछ और ही निहितार्थ हो जाते है। आज हे राम के साथ अनायास जुड़ जाता है, ‘‘ये सब क्या हो रहा है ?’’ एक साथ बोलों तो ‘‘हेराम, ये सब क्या हो रहा है?’’ क्या बापू जिन्हें एक राज्य के उच्च शिक्षामंत्री ‘‘फर्जी पिता’’ के विषेशण से नवाजते हैं, यह सब देख रहे होते तो क्या करते? क्या वे पुलिस, प्रशासन व शासनतंत्र को इतनी हिंसा के बाद बिना कटघरे में खड़ा किए छोड़ देते ? बापू राज्य की हिंसात्मक प्रवृत्ति को बहुत अच्छे से समझते थे और उसके जबरदस्त खिलाफ थे। वे सत्याग्रही पुलिस की बात करते थे, जो आजाद भारत में में न्याय के साथ खड़ी होग । वे कहते है, ‘‘राज्य केंद्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतीक है। व्यक्ति के आत्मा होती है, परंतु राज्य एक आत्मा रहित मशीन होता है, इसलिए उससे हिंसा कभी नहीं छुड़वाई जा सकती, उसका अस्तित्व ही हिंसा पर निर्भर है।’’ वे इसका समाधान कुछ इस तरह देते हैं, ‘‘मैंने जिस लोकतंत्र अहिंसा द्वारा स्थापित लोकतंत्र की कल्पना की है, उसमें सबके लिए समान स्वतंत्रता होगी। हर एक अपना स्वामी होगा।’’
आज हम इसका ठीक उलट देख रहे हैं। राज्य की कठोरता लगातार बढ़ती जा रही है। किसी भी तरह की आलोचना को राष्ट्रदोह की श्रेणी में डाला जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आजादी के 75वें वर्श में सरकार हर उस व्यक्ति को जेल से (कम से कम पेरोल पर) तो रिहा करेगी, जिन पर सीधे-सीधे हिंसा के आरोप नहीं हैं। अपने से असंतुष्ट या असहमत वर्ग से सरकार मानवीय आधार पर कार्यवाही करेगी और ऐसे तमाम लोगों को चर्चा के माध्यम से अपनी बात समझाने की कोशिश करेगी। परंतु ऐसी कोई स्थिति या माहौल आज हमको दिखाई नहीं पड़ रहा है। इसकी सीधी सी वजह यह है कि सत्ता के षिखर पर बैठा समुदाय स्वयं के प्रति आशान्वित नहीं है।
बापू अपनी मृत्यु के 14 वर्ष पूर्व हरिजन में लिखते हैं, ‘‘उभर से बूढ़ा होने पर भी मुझे नहीं लगता कि मेरा आन्तरिक विकास रुक गया है या काया विसर्जन के बाद रुक जाएगा।’’ वहीं दूसरी ओर नवंबर 1947 में वे कहते हैं, ‘‘जो इनसान है और समझदार है, वह इस वातावरण में साबुत रह नहीं सकता। यह मेरी दु:ख की कथा है या कहो सारे हिन्दुस्तान के दु:ख की कथा है, जो मैंने आपके सामने रखी।’’ इस प्रार्थना सभा में वे भारत में विद्यमान सांप्रदायिक वातावरण से उपजे दुख की बात कर रहे थे। आज कमोवेश वैसी ही स्थितियां निर्मित होती जा रहीं हैं। परंतु दूसरी ओर बापू की यह बात विश्वास जगाती है कि काया विसर्जन के बाद भी उनका आंतरिक विकास नहीं रुकेगा। उनसे बिछड़े सात दशक बीत गए हैं लेकिन आज भी समाधान के लिए उनकी ओर ही देखना पड़ता है, उनके काया विसर्जन के बावजूद। उनके विचार विचार नए-नए आयामों के साथ हमें हल सुझाते जाते है।
बापू पर लिखना बेहद कठिन कार्य है क्योंकि उन्हें लेकर सामने आए तमाम विवरणों में से तथ्य और ल्प को अलग कर पाना कठिन है। उनके बारे में सुनी सुनाई बातों और सच को भी आप अलग-अलग नहीं कर सकते। वे अपने जीवनकाल में ही एक पौराणिक मिथकीय चरित्र की तरह स्थापित हो चुके थे। वे एक प्रतीक में बदल गए थे। वे एक ऐसी छवि में परिवर्तित हो चुके थे कि लोग उनके जीवनकाल में ही उनके नाम की कसमें खाने लगे थे। 31 जनवरी 1948 को न्यूयार्क टाईम्स ने अपनी श्रंद्धाजली में लिखा था, ‘‘रौशनी बुझ गई है। बाकी इतिहास के निष्ठुर हाथों में है कि वह क्या लिखे। जमुदा नदी के किनारे उनकी कृशकाय काया राख में बदल जाएगी और सारी दुनिया में सन्नाटा छा जाएगा। हम नहीं जानते उस राख से कौन से फूल खिलेंगे। परंतु हम यह जानते हैं कि वह संत पुरुष जो अहिंसा को पूजता था, वह हिंसा से मारा गया है। जिन्होंने उन्हें मरते देखा है उनका विश्वास है कि उनकी आखिरी भाव भंगिमा, अजीवरी संकेत बता रहा था कि उन्होंने अपने आखिरी शत्रु को भी माफकर दिया है।’ बापू गोडसे को माफ करने के बाद ही दूसरे लोक गए होंगे और उनकी क्षमा की तिलमिलाहट अभी भी उनके हत्यारे के समर्थकों में झलक रही है। मनुष्य पर ग्लानि भाव कई बार इतना हावी हो जाता है, कि वह उसे पश्चाताप भी नहीं करने देता। बापू की मृत्यु के 74 वर्ष बाद भी वह विचारधारा स्वयं को ग्लानि से मुक्त नहीं कर पा रही है और इसीलिए अतिरिक्त आक्रामकता से उन पर प्रहार कर रही है, उनके पुतले पर गोलियां चला रही है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वे अपने अंदर तो इस सच को जानते ही हैं कि बापू के विचारों के आगे वे बेहद बौने हैं, क्योंकि उनके पास कोई विचार ही नहीं है, सिर्फ घृणा है और वे अपनी घृणा से पराजित हो चुके हैं, इसलिए किसी भी समभाव पर आने का साहस उनमें नहीं है। वे सिर्फप प्रतिक्रिया हैं, ऐसी प्रतिक्रिया जो सिर्फ विनाश ला सकती है।
बापू ने अपने जीवन के अंतिम दिन और जीवन में अंतिम बार भोजन करते-करते प्यारेलाल जी से कहा था, और यह उनके सबसे महत्वपूर्ण संदेशों में से भी है। वे बोले, ‘‘हम लोगों ने तो ‘करेंगे या मरेंगे’यह मंत्र लेकर ही नोआखली का वरण किया है। भले ही आज मैं यहाँ बैठा हूँ, पर काम तो नोआखली का ही चल रहा है। हमें जनता को भी इसके लिए तैयार करना चाहिए कि वह अपनी इज्जत और सम्मान बनाए रखने के लिए बहादुरी के साथ वहीं रहे। भले ही अंतत: वहाँ गिने - गिनाए लोग ही रह जाएँ, लेकिन दुर्बलता से ही सामथ्र्य पैदा करनी हो, वहां दूसरा उपाय ही क्या है ? आखिर युद्ध में भी साधारण सिपाहियों का सफाया होता ही है। फिर अहिंसक युद्ध में उससे भिन्न और हो ही क्या सकता है?’’ हम 30 जनवरी 2022 को यदि उपरोक्त सीख का विश्लेषण करें तो लगता है, जैसे कि बापू ने आज भी दोपहर में भोजन करते हुए कुछ कहा है। स्थितियां पुन: एकबार गलत या उल्टी दिशा को मुड़ रहीं हैं। परंतु घबड़ाने की शायद कोई बात नहीं है। उनके विचार, आज हमारे माध्यम से बात कर रहे हैं, यह उनके जीवित और जीवंत होने का सशक्त प्रमाण है।
भारत में कटुता केाई नहीं स्थिति नहीं है। परंतु यह एक विचित्र परिस्थिति है क्योंकि अब हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं। इतिहास में अनेक बार बेहद कटुता का वातावरण बना हैं बहुत से नरसंहार भी हुए हैं, लेकिन तब की शासन व्यवस्था और वर्तमान व्यवस्था में आनूल चूल अंतर है। वर्तमान समस्या इसलिए अधिक खतरनाक है क्योंकि हम संविधान के अन्तर्गत निवास करते हुए संविधान की अवहेलना कर रहे हैं। अल्पसंख्यकों, दलितों और युवाओं के साथ जो हो रहा है, वह पूर्णत: अस्वीकार्य हैं। हमें विचार करना होगा कि 7 लाख नौकरियों के लिए 1.25 करोड़ युवा क्यों आवेदन कर रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश को अभी 20 करोड़ रोजगार की आवष्यकता है। इस सबसे हम अपना ध्यान हटाकर जहां लगा रहे हैं, वह बर्बादी ही देगा।
टाज बापू को श्रंद्धाजलि देने से ज्यादा जरूरी हैं उन्हें व्यापक स्तर पर याद करना उनके विचारों को दोहराना और उनके चरित्र से जितना बन पड़े आत्मसात करना। जो उनका विरोध कर रहे है, उन्हें उनकी नादानी के लिए मुस्कराकर माफ कर देगा। वे लगताार यह सिद्ध करने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने बापू की हत्या किसी विशिष्ट प्रयोजन से की थी। वह प्रयोजन क्या था, यह हम सबके सामने आ ही गया है। अपने जीवनकाल में न बापू ने तल्खी से उन सब बातों का जवाब दिया, न आज हमें इसकी आवश्यकता है। उनकी हर दलील के सामने बापू के अनगिनत उद्धहरण स्वयं सामने आ जाएंगे। निर्मल वर्मा लिखते है, कि शतरंज में जब आप एक चाल चलते है तो सामने वाले खिलाड़ी के सामने अंतहीन चालें या संभावनाएं खुल जाती हैं। बापू के खिलाफ जितनी भी बात होंगी, उतनी ही तादाद में उनके विचार भी प्रकाश में आएंगे। इसकी छोटी सी झलक हम आप आजकल समाचार चैनलों में होने वाली चर्चाओं में देख भी रहे हैं। अब एंकरों को जवाब देना कठिन होता जा रहा है। भारत तनाव की परिस्थिति से जल्द बाहर आ जाएगा।
बापू के निधन के बाद विनोबा ने कहा था, ‘‘जनरल मैंकआर्चर एक उत्तम फौजी सेनानी हैं, जिन्होंने पिछला विश्व युद्ध जीता। गांधी की मृत्यु के बाद वे बोले, आज नहीं तो कुछ वर्षों बाद गांधीजी जो मार्ग दिखा गए, उसे स्वीकार करने के सिवा और कोई चारा नहीं। गांधीजी के बारे में अनेक व्यक्ति बोले, पर मैक आर्चर जो कि सैनय विशेषज्ञ हैं की बात मेरे मन में घर कर गई। वे कहते हैं, ‘‘भाइयों, छुटकारे का मार्ग गांधी तो बताया।’’
क्या हम मुक्त होना चाहते हैं ?
बापू को नमन
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय को विधानसभा के एक अध्यक्ष के आदेश को निरस्त करना पड़ा है। यह घटना दुखद है लेकिन यदि ऐसा नहीं होता तो भारत की विधानपालिकाओं पर यह आरोप चस्पा हो जाता कि वे निरंकुश होती जा रही हैं। ब्रिटेन में माना जाता है कि संसद संप्रभु होती है। उसके ऊपर कोई नहीं होता लेकिन महाराष्ट्र विधानसभा ने एक नया सवाल उछाला। वह यह कि क्या विधानसभा या लोकसभा का अध्यक्ष भी संप्रभु होता है? वह जो कह दे, क्या वही कानून बन जाता है?
5 जुलाई 2021 को महाराष्ट्र की विधानसभा के अध्यक्ष भास्कर जाधव के साथ कुछ विधायकों ने काफी कहा-सुनी कर दी। उन्हें भला-बुरा भी कह डाला। उनका क्रोधित होना स्वाभाविक था। उन्होंने इन विधायकों को पूरे एक साल के लिए मुअत्तिल कर दिया। ये 12 विधायक भाजपा के थे। भाजपा महाराष्ट्र में विपक्षी दल है। शिव-सेना गठबंधन वहां सत्तारुढ़ है। अध्यक्ष के गुस्से पर सदन ने भी ठप्पा लगा दिया। अब विधायक क्या करते? किसके पास जाएं? राज्यपाल भी इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। मुख्यमंत्री तो अध्यक्ष के साथ हैं ही। आखिरकार उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे खटखटाए।
अच्छा हुआ कि अदालत ने अपना फैसला जल्दी ही दे दिया वरना देश में न्याय-व्यवस्था का हाल तो ऐसा है कि मरीज को मरने के बाद दवा मिला करती है। इन मुअत्तिल विधायकों को साल भर इंतजार नहीं करना पड़ा। अदालत ने महाराष्ट्र विधानसभा के सदन में उनकी उपस्थिति को बरकरार कर दिया। अपना फैसला देते वक्त अदालत ने जो तर्क दिए हैं, वे भारतीय लोकतंत्र को बल प्रदान करनेवाले हैं। वे जनता के प्रति विधानपालिका की जवाबदेही को वजनदार बनाते हैं।
जजों ने कहा कि विधायकों की एक साल की मुअत्तिली उनके निष्कासन से भी ज्यादा बुरी है, क्योंकि उन्हें निकाले जाने पर नए चुनाव होते और उनकी जगह दूसरे जन-प्रतिनिधि विधानसभा में जनता की आवाज बुलंद करते लेकिन यह मुअत्तिली तो जनता के प्रतिनिधित्व का अपमान है। इसके अलावा यदि विधायकों ने कोई अनुचित व्यवहार किया है तो उन्हें उस दिन या उस सत्र से मुअत्तिल करने का नियम जरुर है लेकिन उन्हें साल भर के लिए बाहर करने की पीछे सत्तारुढ़ दल की मन्शा यह भी हो सकती है कि विरोधी पक्ष को अत्यंत अल्पसंख्यक बनाकर मनमाने कानून पास करवा लें। जहां महाराष्ट्र की तरह गठबंधन सरकार हो, वहां तो ऐसी तिकड़म की संभावना ज्यादा होती है। इस घटना से अध्यक्ष, सत्तारुढ़ और विरोधी दलों— सबके सबक लिए समुचित सबक निकल रहा है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
27 मार्च सन 1966 के अंग्रेजी समाचारपत्र दंडकारण्य में एक छोटा सा समाचार यह भी प्रकाशित हुआ-
WAR PREPARATION
युद्ध की तैयारी
इस समाचार में कमिश्नर राजा वीरभद्र सिंह का जो बयान प्रकाशित हुआ है, वह बेहद दिलचस्प और संदेहास्पद है। कमिश्नर वीरभद्र सिंह अपने उक्त बयान में फरमाते हैं कि आदिवासी बैलगाडिय़ों में तीर धनुष का जखीरा भरकर लाए थे।गोया तीर धनुष का उत्पादन बंदूक की तरह किसी फैक्ट्री में होता हो।
क्या ऐसा संभव है कि आदिवासी तीर धनुष बैलगाडिय़ों में भरकर लाए होंगे?
क्या किसी ने आज तक बस्तर में तीर धनुष से भरी हुई कोई बैलगाड़ी देखी है?
मैं बस्तर में लंबे समय तक रहा हूं मैंने वहां कभी कोई ऐसी बैलगाड़ी नहीं देखी है और न ही ऐसी बैलगाड़ी की कभी कोई चर्चा ही सुनी है।
तब क्या कमिश्नर राजा वीरभद्र सिंह सीधे-सीधे झूठ बोलकर सच्चाई पर पर्दा डाल रहे थे?
बस्तर में बैलगाड़ी की फैंटेसी रच रहे थे? कभी-कभी ब्यूरोक्रेट ऐसी कहानी गढ़ते हैं कि कहानी भी शर्म से पानी-पानी हो जाए।
निहत्थे महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को राजमहल के उनके ड्रॉइंग रूम में गोलियों से भूनकर पुलिस ने कोई अपनी वीरता का परिचय नहीं दिया था अपितु एक तरह से अपनी कायरता का ही परिचय दिया था।
यह भी सच है कि 25 मार्च को सारे आदिवासियों के पास तीर धनुष नहीं रहे होंगे। कुछ एक आदिवासियों के पास ही तीर धनुष रहे होंगे। राजमहल परिसर में कई दिनों से आदिवासी स्त्रियां भी मौजूद थी।
इस बात का आंकड़ा किसी के पास मौजूद नहीं है कि उस दिन कितने पुरुष आदिवासी और कितनी महिला आदिवासी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे।

रमेश नैयर देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं। वे ‘स्वदेश’, ‘देशबंधु’, ‘ट्रिब्यून’ और ‘संडे ऑब्जर्वर’ के पश्चात रायपुर में लंबे समय तक ‘दैनिक भास्कर’ के संपादक रहे हैं। उनकी गिनती देश के ऐसे पत्रकार के रूप में होती है जिन्होंने हमेशा निष्पक्षता के साथ सत्य का पक्ष लिया है।
बस्तर गोलीकांड के दिनों में वे रायपुर से प्रकाशित ‘युगधर्म’ के संवाददाता थे। 26 वर्षीय युवा रमेश नैयर 26 मार्च की शाम को ही जैसे-तैसे इस घटना की रिपोर्टिंग करने जगदलपुर पहुंच चुके थे।
26 मार्च को पुलिस ने उन्हें राजमहल के भीतर जाने से रोक दिया था। उन्हें ही नहीं बल्कि अन्य किसी भी पत्रकार को उस दिन पुलिस ने राजमहल के भीतर नहीं जाने दिया।

27 मार्च को किसी तरह वे राजमहल के भीतर घुस पाने में सफल हुए थे। उन्होंने राजमहल के भीतर जगह-जगह पुलिस की गोलियों के निशान और दीवारों पर खून देखे।
राजमहल के बाहर रोते-बिलखते हुए आदिवासियों के हुजूम देखे। पुलिस की बर्बरता के सारे साक्ष्य उनकी आंखों के सामने एक खुली किताब की तरह दिखाई दे रहे थे।
उन्होंने इस वीभत्स गोलीकांड का सारा वृत्तांत ‘दिनमान’ पत्रिका को लिख भेजा था। टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप से निकलने वाली पत्रिका ‘दिनमान’ उस समय की सबसे महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय पत्रिका थी।
रमेश नैयर 27 मार्च को याद करते हुए बताते हैं कि जगदलपुर में चारों ओर कफ्र्यू जैसा आलम था चारों ओर केवल पुलिस ही पुलिस दिखाई दे रही थी।
रमेश नैयर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को याद करते हुए बताते हैं कि वे एक बेहद गंभीर, संवेदनशील और सुलझे हुए इंसान थे। बस्तर के आदिवासियों से वे बहुत प्रेम करते थे, उन्हें वे अपने बच्चों की तरह चाहते थे।
रमेश नैयर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव से कई बार रायपुर और जगदलपुर में मिल चुके थे। उनसे इंटरव्यू भी कर चुके थे। महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने उन्हें एकबार राजमहल में भोजन पर भी आमंत्रित किया था।

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को याद करते हुए वे कहते हैं कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई थी। इसलिए उनके सोचने-समझने का तौर-तरीका अलग था। वे डेमोक्रेसी का मतलब अच्छी तरह जानते थे। इसलिए बस्तर में जो कुछ भी आदिवासियों के साथ हो रहा था उससे वे दुखी थे। वे जानते थे कि कांग्रेस की नीतियां भी आदिवासियों के पक्ष में नहीं है।
रमेश नैयर के अनुसार महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव दंतेश्वरी देवी के अनन्य भक्त थे। दंतेश्वरी माता के अनन्य भक्त और प्रमुख पुजारी होने का कारण दशहरा में वे देवी के साथ रथारूढ़ हुआ करते थे। आदिवासी भी उन्हें अपना सच्चा हितैषी और भगवान मानते थे।
(बाकी अगले हफ्ते)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बिहार और उत्तरप्रदेश के छात्रों का गुस्सा इस कदर फूटा कि उन्होंने रेल के डिब्बे जला दिए, कई स्टेशनों पर तबाही मचा दी और जगह-जगह तोड़-फोड़ कर दी। उन्हें पता था कि दोनों प्रदेशों की सरकारें केंद्र-समर्थक हैं और वे उनकी मरम्मत किए बिना नहीं रहेंगी फिर भी उन्होंने पिछले दो-तीन दिन से भयंकर उत्पात मचाया हुआ है। पुलिस ने सख्त कार्रवाई भी की है। कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है और सैकड़ों छात्रों पर अब मुकदमे भी चलेंगे।
ये सब क्यों हुआ? यह इसीलिए हुआ कि रेल-विभाग में निकली करीब 35 हजार नौकरियों के लिए सवा करोड़ नौजवानों ने अर्जियां लगाई थीं। उनकी परीक्षा भी हो गई और उसके परिणाम भी 14 जनवरी को सामने आ गए लेकिन उन्हें कहा गया कि अभी उन्हें एक परीक्षा और भी देनी होगी। अगर उसमें वे पास हो गए तो ही उन्हें नौकरी मिलेंगी। ये नौकरियां सादी हैं। इनमें तकनीकी विशेषज्ञता की जरुरत नहीं है। इनकी तनखा भी सिर्फ 20 हजार से 35 हजार रु. तक की है।
सरकारें यह मान रही हैं कि इन लडक़ों को कुछ विपक्षी नेता और सांप्रदायिक तत्व भडक़ा रहे हैं। यह आरोप ठीक हो सकता है लेकिन वे इसीलिए भडक़ रहे हैं कि उनके साथ ज्यादती हो रही है। आप ही बताइए कि सिर्फ 35 हजार नौकरियों के लिए एक करोड़ लोगों का अर्जी देना, किस बात का सूचक है? भारत में चपरासी की दर्जन भर नौकरियों के लिए हजारों अर्जियों के जमा हो जाने का अर्थ आप क्या निकालते हैं? ये तो भारत है, जहां नेता और नौकरशाह गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं और पढ़े-लिखे नौजवानों को भूखे पेट सोना पड़ता है।
यदि यही हाल यूरोप और अमेरिका में हो तो वहां तो पता नहीं क्या हो जाए? भारत की शिक्षा-व्यवस्था इतनी चौपट है कि डिगरियां हथियाने के बावजूद छात्रों को कोई रोजगार नहीं मिलता। मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों को इस कोरोना-काल में जैसे अभावों का सामना करना पड़ रहा है, उसने उनके आक्रोश को दुगुना कर दिया है। बिहार और उत्तरप्रदेश के नौजवानों की हालत तो बहुत ही दयनीय है। उनमें से मुश्किल से 25 प्रतिशत नौजवानों को ही रोजगार मिला हुआ है।
लगभग 75 प्रतिशत नौजवान बेकारी और भुखमरी के शिकार हैं। ये बेरोजगार लोग हिंसा और तोड़-फोड़ करें, यह तो ठीक नहीं है लेकिन क्या खाली दिमाग अपने आप शैतान का घर नहीं बन जाता है? प्रादेशिक चुनावों के मौसम में छात्रों की यह बगावत किसी भी सरकार का दम फुलाने के लिए काफी है। रेल मंत्रालय ने एक जांच कमेटी बिठा दी है।
हमारी केंद्र सरकार और राज्य सरकारें देशी और विदेशी पूंजीपतियों को भारत में उद्योग-व्यापार के लिए प्रोत्साहित जरुरी कर रही है लेकिन इस बात पर उनका ध्यान बहुत कम है कि इन काम-धंधों से रोजगार बढ़ेंगे या नहीं? भारत को लाखों-करोड़ों लोगों को मध्य एशिया के विशाल क्षेत्रों में रोजगार के अपूर्व अवसर मिल सकते हैं लेकिन यह तभी हो सकता है जब हमारे नेताओं और उनके मार्गदर्शक नौकरशाहों को इन क्षेत्रों में दबे यूरेनियम, लोहे, तांबे, गैस और तेल के भंडारों के बारे में पूरी जानकारी हो। (नया इंडिया की अनुमति से)
- संजय श्रमण
कुछ महीने पहले एक गाँव में जाना हुआ। कुछ ग्रामीण परिवारों से बात हो रही थी। मुद्दा था कि वे लोग जो त्योहार मनाते हैं वे कब से शुरू हुए हैं। मुख्य विषय करवा चौथ को लेकर था। गाँव के एक परिवार से बात हो रही थी। उस परिवार की बूढ़ी स्त्री, दो पुत्र और दो बहुएं चर्चा में शामिल थीं, साथ में अन्य महिलाएं भी आकर बैठ गईं थीं।
मैंने पूछा कि माताजी आपने करवा चौथ पहली बार कब मनाया? माताजी ने कहा कि मैंने तो आज तक नहीं मनाया। ये सब तो इन बहुओं ने आकर शुरू किया है। फिर बहुओं से पूछा, बड़ी बहू बोली कि मेरी शादी दस साल पहले हुई है और छोटी बहू सात साल पहले आई है। दोनों ने जो कहा उससे साफ हुआ कि उन्होंने ही करवा चौथ मनाना शुरू किया है।
गाँव के अन्य परिवारों ने भी बहुत साफ ढंग से कहा कि यह सब पिछले आठ-दस सालों में शुरू हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि गाँव में यह सब कोई नहीं जानता था। करवा चौथ पहले शहरों में आया है फिर शहरों से गांवों में आया है।
फिर मैंने बहुओं से पूछा कि शहरों में आपको यह सब कैसे सीखने को मिला? उन्होंने कहा कि हमारे कुछ रिश्तेदार जो शहरों में रहते हैं उनकी महिलायें सज-सँवरकर यह सब मनाती हैं और फोटो भेजती हैं तो हमें भी लगता है कि हमें भी यह मनाना चाहिए। इसके बाद मैंने पूछा कि उन शहर के रिश्तेदारों को किसने सिखाया यह सब? इसके उत्तर में पूरा परिवार एक सुर में हँसते हुए बोला कि और कौन सिखाएगा? ये सब फिल्मों और टीवी से सीखा है।
फिर उन्होंने कुछ फिल्मों के नाम बताए। कभी खुशी कभी गम, बागबान और हम आपके हैं कौन। फिर कुछ टीवी सीरियल्स के नाम बताए जो ‘संस्कारी बहुओं’ के लिए बनाए गए हैं।
बाद में कुछ और बातें निकलीं जिससे पता चला कि इनकी धार्मिकता का मुख्य स्त्रोत फिल्में, टीवी और बाबा लोग हैं। और मजे की बात ये है कि ये पूरा खेल पैसे कमाने का और एक खास ढंग की राजनीतिक चेतना पैदा करने का काम कर रहा है।
इसके बाद कुछ नब्ज टटोलते हुए उनकी राजनीतिक रुचि पर सवाल किए। पता चला कि इस परिवार ने ही नहीं बल्कि पूरे मुहल्ले ने हिंदुस्तान पाकिस्तान वाला व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का पूरा सिलेबस पढ़ लिया है।
पाकिस्तान और उसके बहाने धर्म विशेष के लोगों को जाहिल और आतंकी बताने में उन्हें विशेष आनंद आता है। नेहरू के माता-पिता किस धर्म के थे और गांधी ने देश का कितना नुकसान कर दिया है, इस सबकी चर्चा व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के सिलेबस के अनुसार वे बड़े मजे से करते हैं। पूरे देश को किस तरह का भोजन खाना चाहिए, औरतों को अपनी ‘औकात’ में रहना चाहिए, एक खास ढंग से सभी को देशभक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए इत्यादि विषय मे भी उनके पक्के विचार हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि यह पूरी चर्चा दलित महिलाओं से हो रही थी।
अब इस बात पर थोड़ा सा विचार कीजिए।
आज बॉलीवुड ही नहीं बल्कि देश में जो दो खेमे बन गए हैं और जिस तरह से विचारधारा का संकट पैदा हुआ है उसका जिम्मेदार कौन है? गौर से देखिए। यह फिल्म और टीवी की दुनिया, अंधविश्वासों और चलताऊ संस्कारों का प्रचार करते हुए पैसा कमाने की तरकीब खोजती है। यह खेल अंत में फिल्मी दुनिया और मीडिया को ही नहीं बल्कि पूरे देश को गड्ढे में ले जाता है।
अब इन ग्रामीण परिवारों के बच्चे दूसरे धर्मों के लोगों के लिए बहुत ही नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। जिस गुंडई को हम आजकल सडक़ों या टीवी चैनल्स पर देखते हैं वह इन परिवारों को नार्मल लगती है। वे इसे ही खबर और विश्लेषण समझते हैं। ऐसे परिवारों के बच्चे पाकिस्तान की निंदा और अपने से भिन्न धर्म के लोगों की निंदा में बड़ा आनंद लेते हैं। ये परिवार अन्य धर्मों के लोगों के बारे में बड़े आत्मविश्वास से ऐसी बातें भी बताते हैं जिसे यहाँ लिखा नहीं जा सकता।
लेकिन ये सब वही बातें हैं जो आजकल पूरे न्यूज मीडिया और राजनीतिक प्रोपेगंडा का मुख्य सिलेबस बन गई है।
अब यही परिवार और यही बच्चे इन फिल्मों में काम करने वाले मुस्लिम नायकों, खिलाडिय़ों, राजनेताओं, शायरों और इतिहास के नायकों के खिलाफ एक खास किस्म की नफरत लेकर घूम रहे हैं। ये लोग जिन शायरों के फिल्मी गीतों पर पहले ठुमके लगाते थे अब उन्हीं के एक्सीडेंट में घायल होने पर तालियाँ बजा रहे हैं। अब ये परिवार हर दिशा में पहले से अधिक अंधविश्वासी और कट्टर बन गए हैं।
जिस बॉलीवुड और टीवी ने अंधविश्वासों और कुरीतियों में निवेश किया था उसका परिणाम न सिर्फ देश के सामने है बल्कि खुद बॉलीवुड और मीडिया के भी सामने है।
बॉलीवुड के शहंशाह, बादशाह, सुल्तान, दबंग, खिलाड़ी अनाड़ी सहित सब तरह के अगाड़ी और पिछाड़ी अब आमने सामने आ गए हैं। इसी के साथ पद्मावतियाँ और लंदन वाली क्वींस भी आमने सामने आ गई हैं। फिर भी अधिकांश लोग चुपचाप अपनी सुरक्षित गुफाओं मे बैठे हैं। कुछ की रीढ़ की हड्डी मे थोड़ी जान नजर आ रही है। लेकिन इतना तो पक्का है कि इन लोगों को अब समझ मे आ गया होगा कि वे जो कुछ करते आए हैं उसका परिणाम इस देश को ही नहीं बल्कि उनके अपने बच्चों को भी भुगतना होगा।
ये निर्णायक समय है। इस समय में बॉलीवुड टीवी और पत्रकारिता सहित कलाजगत के सभी लोगों को आत्मनिरीक्षण करने का बेहतरीन मौका है। मीडिया और विशेष रूप से सोशल मीडिआ के आने के बाद अंधविश्वासों और त्योहारों की ताकत जिस तरह से बढ़ी है वह एक भयानक बात है। अंधविश्वासों और त्योहारों का राजनीतिक इस्तेमाल सबसे भयानक बात है जो आज हम देख रहे हैं। इस खेल मे बड़े और छोटे पर्दे ने खूब जहर बोया है।
इन छोटे और बड़े पर्दे के नायकों को अब सारे पर्दे हटाकर आईना देखने का वक्त निकालना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘एकपंथ दो काज’ के मुहावरे को चरितार्थ किया है। अंगरेजी के मुहावरे के हिन्दी अनुवाद ‘एक तीर से दो शिकार‘ कहना ठीक नहीं होगा। गुजरात के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा राजधर्म मानने की सलाह का हिसाब चुकता कर दिया। राज कायम करना ही धर्म है। वाराणसी के सांसद मोदी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रवर्तक महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के लिए भारत रत्न का ऐलान कर अपने संसदीय क्षेत्र का सम्मान किया। यह अलग बात है कि 1909-1910 के कांग्रेस अध्यक्ष रहे मदनमोहन मालवीय ने ही 1910 में हिन्दू महासभा की स्थापना की। मनमोहन सिंह और मोदी अमेरिका भी के संयुक्त याचक हैं। हिन्दू महासभा और हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दू जैसे शब्दों से जिन्हें प्यार है वे इस शब्द को सही पुरस्कार देना चाहेंगे। भाजपा विजय पताका फहराकर अटल ‘बिहारी‘ नाम को सार्थक करेगी क्या?
मदनमोहन मालवीय के निधन के वर्षों बाद भारत रत्न देना उनके सच्चे प्रशंसकों तक के गले नहीं उतरता दिखा। उन्नीसवीं सदी के छठे दशक में रवीन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानन्द और गांधी की त्रिमूर्ति पैदा हुई। तीनों का योगदान अद्भुत और अतुलनीय है। घबराहट यह है कि कहीं इन्हें कोई भारत रत्न नहीं दे दे, जबकि तीनों निस्संदेह विश्वरत्न हैं। गांधी को नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। यदि वह उन्हें मिल जाता तो गांधी अपमानित हो जाते। मालवीय के साथ वाजपेयी को पुरस्कार देना एक और सवाल पैदा करता है। एक व्यक्ति को मरणोपरांत सम्मान दिया गया तो दूसरे जीवित व्यक्ति को। क्या भाजपा को भारत रत्न के लिए डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय का नाम वाजपेयी के पहले नहीं सूझा होगा? ये दोनों तो दक्षिणपंथी हिन्दू परिवार में वाजपेयी से सीनियर रहे हैं। क्या इतिहास आगे की ओर बहेगा तो आडवाणी जी का नंबर लगेगा और फिर मोदी जी का एकदम निश्चित है।
भारत रत्न देशभक्ति के थर्मामीटर पर क्वथनांक बिन्दु को नहीं दिया जाता। एक दक्षिणपंथी सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की यदि भगतसिंह को भारत रत्न देने की तजवीज करेगी तो देश तो उसका विरोध करेगा। भारत रत्न का सम्मान सचिन तेंदुलकर, लता मंगेशकर, वैज्ञानिक सी.एन.आर. राव, भीमसेन जोशी, पंडित रविशंकर, अमर्त्य सेन, अब्दुल कलाम, सत्यजीत रे वगैरह को उनके विशेष क्षेत्र में असाधारण योग्यता के कारण दिया गया है।
मदनमोहन मालवीय की तासीर के लोग किसी विधा के विशेषज्ञ की तरह नहीं आंके जा सकते और न वाजपेयी की तरह राजनेता के रूप में। मालवीय एक असाधारण जननेता और देशभक्त थे। उन्हें भारत रत्न का सम्मान देने से प्रधानमंत्री को राजनीतिक फायदा हुआ है। भारत रत्न तो जूता, साबुन का विज्ञापन कर रहे हैं। फिर भी वे जूते, साबुन नम्बर एक पर नहीं पहुंच रहे।
बाकी पद्म पुरस्कार ऐसे व्यक्तियों को दिये गये हैं बल्कि अब भी दिए जा रहे हैं जो संविधान की हिदायतों के अनुसार योग्य नहीं हैं। पुरस्कार का कई लोगों के लिए क्रमिक विकास भी किया गया। उन्हें पहले पद्मश्री, पद्मभूषण और फिर पद्मविभूषण के सम्मान से नवाजा गया। सम्मान उत्तरोत्तर तरक्की का सबूत नहीं होते। प्राथमिक सम्मानों के लिए आवेदन पत्र मंगाए जाते हैं और साथ में बायोडेटा तथा संस्तुतियां भी। यदि समाज सेवा के आधार पर पुरस्कार दिए गए तो यह प्रत्येक स्वतंत्रता संग्राम सैनिक को दे दिया जाना चाहिए था। देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने से बड़ी कौन सी सेवा हो सकती है?
पूर्व प्रधानमंत्रियों को भारत रत्न दिए जाने का सिलसिला है। बाकी प्रधानमंत्रियों को भी इस सम्मान से क्यों वंचित रखा जाए। मालवीय का योगदान जवाहरलाल नेहरू को छोडक़र बाकी प्रधानमंत्रियों से तो इतिहास में बड़ा आंका जाएगा। आजादी की लड़ाई में उनकी प्रकृति तथा बराबरी के इतने नेताओं की यादें हैं जिन्हें भारत रत्न दिया जाने से सूची बहुत लंबी हो जाएगी। महामना का तो इस्तेमाल हुआ है। वाजपेयी ने इतने दलों का गठजोड़ बनाकर पूरे कार्यकाल हुकूमत की जिसका कोई सानी नहीं है। बेहतर यही है कि पद्म सम्मानों को खत्म किया जाए। क्रांतिकारियों ने भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में जो कुर्बानियां की हैं, उनका सम्मान करना तो दूर, सरकार की आंखों में उनके लिए कृतज्ञता और आंसू तक नहीं दिखाई देते। यदि मतदान कराया जाए तो भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाषचंद्र बोस के मुकाबले मैदान में कोई नहीं ठहरेगा।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस बार घोषित पद्म पुरस्कारों पर जमकर वाग्युद्ध चल रहा है। कश्मीर के कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद को पद्मभूषण देने की घोषणा क्या हुई, कांग्रेस पार्टी के अंदर ही संग्राम छिड़ गया है। एक कांग्रेसी नेता ने बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और कम्युनिस्ट नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य के कंधे पर रखकर अपनी बंदूक दाग दी। भट्टाचार्य को भी भाजपा सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया है। उन्होंने यह सम्मान लेने से मना कर दिया।
इस पर कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने अपनी टिप्पणी बड़े काव्यात्मक अंदाज़ में कह डाली कि बुद्धदेवजी ‘आजाद’ रहना चाहते हैं, ‘गुलाम’ नहीं बनना चाहते हैं याने उन्होंने अपने वरिष्ठ साथी का नाम लिये बिना ही उनकी धुलाई कर दी। कई अन्य कांग्रेसी नेता और खुद कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर चुप है लेकिन कुछ ने आजाद को बधाई भी दी है।
यहां असली सवाल यह है कि इन सरकारी सम्मानों का देश में कितना सम्मान है? इसमें शक नहीं है कि जिन्हें भी यह पुरस्कार मिलता है, वे काफी खुश हो जाते हैं लेकिन यदि मेरे किसी अभिन्न मित्र को जब यह मिलता है तो मैं उसे बधाई के साथ—साथ सहानुभूति का पत्र भी भेज देता हूं, क्योंकि इसे पाने के लिए उन्हें बहुत दंड-बैठक लगानी पड़ती है। इस बार दिए गए 128 सम्मानों के लिए लगभग 50 हजार अर्जियां आई थीं। अर्जियों की संख्या यदि 50 हजार थी तो हर अर्जी के लिए कम से कम 10-10 फोन तो आए ही होंगे। इन सम्मानों का लालच इतना बढ़ गया है कि पद्मश्री जैसा सम्मान पाने के लिए लोग लाखों रु. देने को तैयार रहते हैं। समाज के प्रतिष्ठित और कुछ तपस्वी लोग ऐसे नेताओं के आगे नाक रगड़ते रहते हैं, जो उनकी तुलना में पासंग भर भी नहीं होते।
इसके अलावा किसी भी उपाधि, पुरस्कार या सम्मान को सम्मानीय तभी समझा जाता है, जब उसके देने वाले उच्च कोटि के प्रामाणिक लोग होते हैं। अब यह सवाल आप खुद से करें कि पद्म पुरस्कार के निर्णायक लोग कौन होते हैं? नौकरशाह, जो नेताओं के इशारे पर थिरकने के अभ्यस्त हैं, उनके दिए हुए पुरस्कारों की प्रामाणिकता क्या है? इसका अर्थ यह नहीं कि ये सारे पुरस्कार निरर्थक हैं। इनमें से कुछ तो बहुत ही योग्य लोगों को दिए गए हैं। अब तो विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार भी बहुत ही मामूली लोगों को राजनीतिक गुणा-भाग के आधार पर मिलने लगे हैं तो हमारे इन पद्म पुरस्कारों को कई लोग लेने से ही मना कर देते हैं। इन्हें देने के पीछे यदि राजनीति होती है तो नहीं लेने के पीछे भी राजनीति होती है।
नम्बूदिरिपाद ने तब और भट्टाचार्य ने अब इसीलिए मना किया है। दो बंगाली कलाकारों ने यह कहकर उन्हें लेने से मना कर दिया कि उन्हें यह बहुत देर से दिया जा रहा है। ‘मेनस्ट्रीम’ के संपादक निखिल चक्रवर्ती ने यह सम्मान लेने से मना किया था यह कहकर कि ऐसे सरकारी सम्मानों से पत्रकारों की निष्पक्षता पर कलंक लग सकता है। वैसे गुलाम नबी आजाद पहले विरोधी दल के नेता नहीं है, जिन्हें यह सम्मान मिला है।
नरसिंहराव सरकार ने मोरारजी देसाई को भारत रत्न और अटलजी को पद्म विभूषण दिया था। मोदी सरकार ने प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न, शरद पवार को पद्म विभूषण तथा असम व नागालैंड के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को भी पद्म पुरस्कार दिए थे। जरुरी यह समझना है कि जो मांग के लिए जाए, वह सम्मान ही क्या है और यह भी कि देनेवाले की अपनी प्रामाणिकता क्या है? (नया इंडिया की अनुमति से)
-दीपक मंडल
अंदरूनी फूट से जूझ रही कांग्रेस का संकट ख़त्म होता नजऱ नहीं आ रहा है। पांच राज्यों में चुनाव से पहले पार्टी में जिस एकता की जरूरत महसूस की जा रही थी, वह दूर की कौड़ी नजर आने लगी है। गुलाम नबी आज़ाद को पद्म भूषण मिलने के बाद पार्टी के दो धड़ों के बीच जिस तरह से बयानबाजी का दौर चला उससे साफ हो गया है कि पार्टी में कलह कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है।
कांग्रेस का यह अंदरूनी झगड़ा 26 जनवरी को तब और खुल कर सामने आया, जब पार्टी में जी-23 गुट का नेतृत्व करने वाले गुलाम नबी आजाद को पद्मभूषण मिलने पर दूसरे गुट के नेता जयराम रमेश ने ‘गुलाम’ कह दिया।
पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की ओर से पद्म भूषण लेने से इनकार करने की तारीफ करते हुए रमेश ने कहा, ‘उन्होंने सही फैसला किया है। वह आजाद रहना चाहते हैं कि न कि गुलाम।’
माना जा रहा है कि जयराम रमेश ने इस टिप्पणी के जरिए गुलाम नबी आजाद पर तंज किया। लेकिन कपिल सिब्बल ने आजाद को बधाई दी और कहा कि यह बिडंबना ही है कि कांग्रेस को उनकी सेवाओं की जरूरत नहीं है, जबकि राष्ट्र सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को स्वीकार करता है।
आनंद शर्मा और राज बब्बर ने भी ग़ुलाम नबी आज़ाद को बधाई दी। ये सभी नेता कांग्रेस के उस जी-23 का हिस्सा हैं जिसने 2020 में सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कांग्रेस में आमूलचूल बदलाव की मांग की थी।
चुनाव से पहले कांग्रेस में झगड़ा बढऩा बड़ा संकट
इन बयानों से साफ है कि कांग्रेस में धड़ेबाजी सतह पर है और यह घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। इससे चुनावों से पहले कांग्रेस की संभावनाओं को काफी चोट पहुंची है। यूपी में ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस के सीनियर नेताओं का पार्टी छोडक़र जाना पार्टी में बढ़ते जा रहे अंतर्कलह का नतीजा है।
आरपीएन सिंह कांग्रेस छोडऩे वाले पांचवें बड़े नेता हैं। उनसे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया, अमरिंदर सिंह के अलावा यूपी से नाता रखने वाले जितिन प्रसाद, अदिति सिंह पार्टी छोड़ चुके हैं।
सिर्फ आरपीएन सिंह ही नहीं बल्कि पडरौना विधानसभा से कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी मनीष जायसवाल ने पार्टी से इस्तीफा देकर अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है।
जि़ला अध्यक्ष राजकुमार सिंह और जि़ला महासचिव टीएन सिंह ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। कांग्रेस पर दूसरी पार्टियों के हमले भी तेज हैं। बीएसपी चीफ मायावती ने तो यहां तक कह दिया है कि यूपी के वोटर कांग्रेस पर अपना वोट बर्बाद न करें।
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी का कहना है, ‘यूपी में कांग्रेस अपने नेताओं को एकजुट रखने में नाकाम रही है। प्रियंका गांधी खुल कर प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू का साथ देती रही हैं, इसलिए आरपीएन सिंह जैसे बड़े नेताओं की नाराजगी बढ़ गई। लल्लू के काम करने की अपनी शैली है।’
वे कहते हैं, ‘आरपीएन सिंह और दूसरे कुछ नेताओं से वह पार्टी में जूनियर हैं, इसलिए उनका उनसे तालमेल नहीं बैठ रहा है। बताया जाता है कि लल्लू के काम करने की स्टाइल से ये नेता खुश नहीं थे। इसलिए पार्टी के कई सीनियर लीडर उसका दामन छोड़ चुके हैं। लल्लू के काम करने की शैली की वजह से राज्य में पार्टी के उपाध्यक्ष और मीडिया प्रभारी रहे सत्यदेव त्रिपाठी जैसे नेता ने पार्टी छोड़ दी।’
क्या जी-23 को बीजेपी से शह मिल रही है?
यूपी में कांग्रेस में कलह का ही नतीजा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का बड़ा चेहरा रहे इमरान मसूद ने समाजवादी पार्टी जॉइन कर ली, जबकि पार्टी ने उन्हें टिकट भी नहीं दिया।
कांग्रेस के अंदर का यह झगड़ा आज से नहीं चल रहा है। पार्टी में अनदेखी से नाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में चले गए। सचिन पायलट के अंसतोष को थामने के लिए पार्टी को एड़ी-चोट का जोर लगाना पड़ा। पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू, अमरिंदर सिंह और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच के झगड़े ने कांग्रेस को इस चुनावी साल में बुरी तरह झकझोर दिया।
उत्तराखंड में हरीश रावत ने भी जब बगावत के संकेत दिए तो उन्हें मनाने के लिए राहुल गांधी को मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन कांग्रेस की इस दिक्कत का अंत नहीं दिख रहा है। पार्टी नेतृत्व को यह समझ नहीं आ रहा है कि इस मुश्किल से कैसे निपटा जाए। कांग्रेस नेतृत्व बेबस होकर नेताओं को पार्टी छोड़ कर जाता देख रहा है।
राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं, ‘जब-जब पार्टी के पुराने नेता नेतृत्व को लेकर सवाल उठाते हैं या संगठन में परिवर्तन की मांग करते हैं तो उसे लगता है कि जी-23 जैसे गुट को बीजेपी की ओर से शह मिल रही है। लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस, पार्टी के अंदर की इस स्थिति से निकल नहीं पा रही है। यह वक्त बताएगा कि आने वाले समय में पार्टी के अंदर यह झगड़ा और कितना नुकसान पहुंचा सकता है।’
कांग्रेस के झगड़े का असर पूरे विपक्ष पर
पिछले साल नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस में फूट को लेकर दिलचस्प टिप्पणी की थी। उनका कहना था कि कांग्रेस, बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेंकने की बात करती है। लेकिन जब पार्टी के नेता आपस में लड़ रहे हैं, तो उससे बीजेपी का मुकाबला करने की उम्मीद करना तो बेमानी ही होगी।
उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की इस कार्रवाई का असर हर उस पार्टी पर होगा, जो बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए से बाहर है, क्योंकि करीब 200 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है।
अब्दुल्ला ने यह टिप्पणी उस दौर में की थी, जब सिद्धू साथ झगड़े के बीच पंजाब में अमरिंदर सिंह ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।
चुनाव के दौर में भी पार्टी नेताओं के सुर अलग-अलग
पार्टी में पुराने नेताओं को लगता है कि राहुल, सोनिया और प्रियंका मिलकर उन्हें दरकिनार करने में लगे हैं। त्र-23 नाम के गुट में शामिल ये नेता मानते हैं कि कांग्रेस में जो सुधार होना चाहिए वो नहीं हो रहा है। जबकि नौजवान नेताओं का लगता है कि गांधी परिवार के इर्द-गिर्द एक गुट घेरा बनाए हुए है, इसलिए राहुल-सोनिया को इन्हें धीरे-धीरे किनारे करना चाहिए।
दो साल पहले पार्टी के एक पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने एक अंग्रेज़ी अख़बार में एक लेख लिखकर पार्टी में सुधार लाने पर ज़ोर दिया था जिसके नतीजे में पार्टी ने उन्हें प्रवक्ता के पद से हटा दिया था।
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा था, ‘जिन मुद्दों की हमने अपने लेख में चर्चा की थी, इच्छाशक्ति और बदलाव लाने का जज़्बा जो पार्टी के लिए जरूरी है वो अब भी पार्टी नहीं कर सकी है। अभी बयानबाजी हम ज़्यादा सुन रहे हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं हुआ है।’
बहरहाल, कांग्रेस में झगड़े इतने बढ़े हुए हैं कि पांच राज्यों के अहम चुनावों से पहले भी यह अपनी तैयारियों को चाक-चौबंद नहीं कर पा रही है। पार्टी के नए-पुराने नेता हर दिन नए बयान दे रहे हैं। और किसी भी मुद्दे पर आपस में भिड़ते हुए दिख रहे हैं।
कुल मिलाकर कांग्रेस में इस वक्त अंदरूनी झगड़े बढ़ते ही दिख रहे हैं। दिक्कत यह है कि इस पर फिलहाल कोई लगाम लगने की सूरत नहीं दिखती। चुनावों को देखते हुए भी पार्टी के नेता एक सुर में बोलते नहीं दिख रहे। (बीबीसी)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान ने अभी-अभी नई सुरक्षा नीति प्रचारित की थी, जिसमें भारत से सहज संबंध बनाने की वकालत की गई थी और अब उसने भारतीय विदेश मंत्रालय को एक नया प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव में भारत से मांग की गई है कि पाकिस्तान के मुस्लिमों, हिंदुओं और सिखों को अपने-अपने तीर्थों में जाने की हवाई सुविधा दी जाए। याने लाहौर और कराची हवाई अड्डों से उडऩे वाले पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के विशेष जहाजों से उन्हें भारत आने दिया जाए। तीर्थयात्रियों को वीज़ा भी दिए जाएं !
यह मांग पाकिस्तान की हिंदू कौंसिल के नेता रमेश वंकवानी ने एक पत्र में की है, जिसे पाकिस्तानी उच्चायोग ने हमारे विदेश मंत्रालय को सौंपा है। इसका अर्थ क्या हुआ? यही न, कि पाकिस्तानी सरकार इस मांग का समर्थन करती है। यह तो बहुत अच्छी बात है। पाकिस्तान सरकार के इस रवैए का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इमरान सरकार ऐसी मांग का समर्थन करने के पहले यह क्यों नहीं बताती कि उसने पिछले माह भारतीय तीर्थयात्रियों को पाकिस्तानी एयर लाइंस के जहाजों से पाकिस्तान क्यों नहीं जाने दिया? नवंबर में उसने शारजा-श्रीनगर उड़ानों को भी अनुमति नहीं दी। 2019 से ही पाकिस्तानी उड़ानों पर पाकिस्तान ने प्रतिबंध थोप रखा है।
अब पाकिस्तान अपने तीर्थयात्रियों की हवाई उड़ानों का समर्थन कर रहा है लेकिन 1947 से अभी तक उन्हें सिर्फ थलमार्ग से ही जाने की अनुमति थी। हिंदू तीर्थयात्री नवंबर में लंदन, दुबई और स्पेन आदि से तो जहाज की यात्रा करके पेशावर पहुंचे थे लेकिन भारतीयों पर वह प्रतिबंध अभी तक कायम है। भारत तो मुस्लिम तीर्थयात्रियों को अजमेर शरीफ, निजामुद्दीन दरगाह और अन्य जगहों पर जाने के लिए जहाज-यात्रा की सुविधा दे देगा लेकिन पाकिस्तान भी तो कुछ उत्साहवर्द्धक इशारा करे।
उसका हाल तो इतना विचित्र है कि उसे अफगानिस्तान के मुस्लिम भाइयों की जान की भी परवाह नहीं है। भारत द्वारा भेजे जानेवाले 50 हजार टन अनाज और डेढ़ टन औषधियों के थैले अभी वागाह बार्डर पर पड़े-पड़े सड़ रहे हैं लेकिन इमरान सरकार के सिर पर जूं भी नहीं रेंग रही है। पता नहीं, पाकिस्तान भारत से इतना क्यों डरा रहता है? एयर इंडिया की उड़ाने उसने अपने यहां आने से 2008 में रोकी थीं।
आज भी वही ढर्रा चल रहा है। पाकिस्तान के सिंधी नेता वंकवानी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने रास्ते खोलने की यह पहल की है। मुझे विश्वास है कि भारत और पाकिस्तान दोनों की सरकारें थोड़ा साहस दिखाएंगी और इसी बहाने सार्थक और बड़े संवाद की शुरुआत करेंगी। पाकिस्तान अगर खुद पहल करे तो भारत पीछे नहीं रहेगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले 5-7 साल में हमारे देश में गरीबी और अमीरी दोनों का ही काफी तेजी से विकास हुआ हैं। यही सबका साथ है, और यही सबका विकास है। जब से नरसिंहराव सरकार ने उदारीकरण की अर्थ नीति चलाई थी और भारतीय अर्थव्यवस्था पर से सरकारी शिकंजे को ढीला किया था, देश के सबसे निचले 20 प्रतिशत गरीबों की आमदनी सालाना हिसाब से बढ़ती ही जा रही थी। इस 25-26 साल की अवधि में भाजपा और कांग्रेस की गठबंधन सरकारें भी आईं लेकिन गरीबों की आमदनी घटी नहीं जबकि 2020-21 में उनकी जितनी सालाना आमदनी थी, वह आधी से भी कम रह गई।
उसमें 53 प्रतिशत की गिरावट हुई। यह गिरावट थी— 2015-16 के मुकाबले ! पांच सालों के दौरान देश के 20 प्रतिशत सबसे मालदार लोगों की आय में 39 प्रतिशत सालाना की वृद्धि हो गई है। ये आंकड़े एक ताजा खोजबीन से सामने आए हैं। कोरोना महामारी के प्रकोप ने इस गैर-बराबरी की खाई को और भी गहरा कर दिया है। देश के मालदार लोग विदेशों में बड़ी-बड़ी संपत्तियां खरीद रहे हैं, ज्यादातर बैंक लंबी-चौड़ी राशियों के जमा होने के विज्ञापन दे रहे हैं, उद्योगपति लोग देश और विदेश में नए-नए पूंजी-निवेश के अवसर ढूंढ रहे हैं।
कईयों को यही समझ में नहीं आ रहा है कि छप्पड़ फाडक़र आई इस पूंजी का इस्तेमाल वे कैसे करें और दूसरी तरफ शहरों के मजदूर अपने-अपने गांवों में भाग रहे हैं। शहरों में या तो निर्माण-कार्य बंद हो गए हैं या जो चल रहे हैं, उनमें मजदूरी पूरी नहीं मिल रही है। सिर्फ सरकारी कर्मचारियों का वेतन सुरक्षित है लेकिन करोड़ों गैर-सरकारी वेतनभोगियों की आमदनी में काफी कटौती हो रही है। उन्हें अपना रोजमर्रा का खर्च चलाना दूभर हो रहा है। छोटे दुकानदार भी परेशान हैं। उनकी बिक्री घट गई है। नाइयों, धोबियों, दर्जियों, पेंटरों, जूता-पालिशवालों के लिए काम ही नहीं बचा है, क्योंकि लोग अपने-अपने घरों में घिरे हुए हैं।
छोटे किसान भी दिक्कत में है। लोगों ने सब्जियों और फलों की खरीद घटा दी है। राजस्थान के प्रसिद्ध लोक कलाकार इस्माइल खाँ से एक बड़े समारोह में किसी मुख्य अतिथि ने पूछा कि सभी कलाकारों ने पगड़ी पहन रखी है लेकिन आपके सिर पर पगड़ी क्यों नहीं है? उन्होंने कहा कि कोविड काल में पहले मकान बिका, फिर बेटी की शादी का कर्ज माथे चढ़ा। अब पगड़ी का बोझ यह माथा कैसे सहेगा?
इस्माइल खाँ की पत्नी ने पत्रकारों को बताया कि अब घर में कभी-कभी सब्जी बनती ही नहीं है। बच्चों को चाय में डुबो-डुबोकर रोटी खिलानी पड़ती है। पराठे की जिद करने वाला बच्चा भूखा ही सो जाता है। सरकार ने 80 करोड़ लोगों को अनाज बांटने का जो अभियान चलाया है, उससे गरीबों को थोड़ी राहत तो मिली है लेकिन जिन अमीरों की अमादनी करोड़ों, अरबों, खरबों बढ़ी है, वे क्या कर रहे हैं? वे अपनी तिजोरियाँ कब खोलेंगे?
(नया इंडिया की अनुमति से)
-अपूर्व गर्ग
साढ़े छह फीट लम्बे सत्यजीत रे चल रहे थे और कालीबाड़ी, रायपुर द्वार से लेकर मैदान तक उनके साथ रहने के लिए हमें दौड़ लगानी पड़ी।
दरअसल, तब मैं छोटा बच्चा था, शरारतें तो करता था पर शरारतों से ज़्यादा उत्सुकता को शांत करने की फिराक में रहता। मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि इन्होंने पथेर पांचाली, अपराजितों, अपुर संसार, चारुलता, तीन कन्या जैसी महान फिल्में बनाईं हैं।
मुझे नहीं पता था कि इन्हें पदमश्री, पदम् विभूषण, डी लिट्, रमन मैगसेसे पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सबसे बड़े अवार्ड मिले। हालाँकि बाद में ऑस्कर और भारत रत्न से इन्हें अलंकृत किया गया।
मुझे ये जरूर पता था कि मेरा नाम अपूर्व ‘अपुर संसार’ से ही प्रेरित होकर रखा गया है।
आज तो बहुत से नन्हे-मुन्ने अपूर्व हैं पर उस दौर में जब अजय-विजय-संजय-अनिल-सुनील-नरेश-दिनेश थे...तब क्लास ही नहीं स्कूल में मैं अकेला अपूर्व था। ये और बात है बंगाल में कई ‘ओपोरबो’
‘ओपू।’ थे ...खैर...
घर में बड़ी चर्चा थी। ‘अपुर संसार’ वाली बात मुझे बताई गई थी, इसलिए मैं ज़्यादा उत्सुक था।
सत्यजीत रे कालीबाड़ी स्कूल आने वाले थे, रविंद्र सभागृह के शिलान्यास के लिए। हम लोग कालीबाड़ी स्कूल में पढ़ते ही नहीं थे बल्कि बगल में घर भी था।
दरअसल, रायपुर में सत्यजीत रे ‘सदगति’ की शूटिंग के सिलसिले में आए हुए थे। ‘सदगति’ प्रेमचंद की कहानी पर आधारित फिल्म थी, जिसमें ओमपुरी, स्मिता पाटिल ने अभिनय किया था और इसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था। इस फिल्म में ‘धनिआ’ बच्ची की भूमिका हमारी माँ की स्कूल की छात्रा ऋचा मिश्रा ने निभाई थी।
सत्यजीत रे रायपुर के सर्किट हाउस में रुके थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था।
बंगाली कालीबाड़ी समाज उन्हें सर्किट हाउस से कालीबाड़ी लाया और हम शिलान्यास स्थल तक उनके साथ दौड़ लगा रहे थे।
वाकई मुझे अंदाज नहीं था मैं किन महान हस्ती के पीछे चल रहा हूँ। उस वक्त तो उनकी महानता से ज़्यादा उनके लम्बे कद को देख चकित था।
मेरे साथ मेरा प्रिय मित्र रंजन भी दौड़ लगा रहा था। रे साहब रुके, उन्होंने लोगों को ऑटोग्राफ दिए।
मेरे भाई को सत्यजीत रे के व्यक्तित्व का अंदाज था। उसके पास ऑटोग्राफ बुक थी और वो ऑटोग्राफ लेने में कामयाब भी रहा और मैं लगातार इस अपूर्व शख्सियत के ‘अपुर संसार’ से कैसे अपूर्व शब्द मेरे लिए निकला इस पर सोचता रहा और शिलान्यास करके उनके विदा होते तक उनके साथ बना रहा।
वो जितने लम्बे थे, महान थे उतने ही सरल और प्यार से सबसे मिल रहे थे। उनके साथ और पास रहते ये लग ही नहीं रहा था हम दुनिया के बड़े सेलिब्रिटी के निकट हैं।
बाद के दिनों में बॉलीवुड के बड़े-बड़े दिग्गज कलाकारों से मिलना हुआ फोटो लेना हुआ पर आज भी सत्यजीत रे को देखना, उनके तेज कदमों के साथ दौड़ लगाना, भाई को ऑटोग्राफ देना, रंजन की शरारतों को देखकर हम लोगों की तरफ देखकर मुस्कुराना जिस तरह दिल में बसा है वो जगह कोई कलाकार नहीं बना पाया।
बहुत से सेलिब्रिटी से मिलना होता रहा पर
अपूर्व का ‘अपुर संसार’ तो बस वही था...


