विचार / लेख
-बिल एटकिन
जब पहली बार मैंने गांव की भैंसों को लगभग खड़े पहाड़ पर चढ़ते देखा तो मैं दंग रह गया था। उन्हें ऊपर चढ़ाने के लिये पुचकारना और कई बार धकियाना पड़ता था ताकि वह रास्ते की बाधाओं को फांदें लेकिन जैसे-तैसे वह पिन्नाथ की चोटी तक पहुंच ही जाती थीं। इस जगह को बूढ़ा पिन्नाथ कहते हैं जहां एक प्राचीन मंदिर, भगवान शिव के धर्नुर्धारी रूप को समर्पित है।
पिन्नाथ के सम्मुख पहाड़ी पर नीचे की ओर चौड़ी कोसी जलधारा के साथ जाने पर आपको एक आकर्षक मंदिर मिलता है जिसे मध्यकाल में कुमाऊं के राजाओं ने बनाया था। नीचे बने पिन्नाथ मंदिर पर नदी से सीढिय़ां जाती हैं। मैं पूरा अंदाज़ा तो नहीं लगा सकता लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूं कि इस मंदिर को स्थापित करने में बहुत अधिक श्रम लगा होगा। यहां न तो पानी है और न ही यहां से बर्फ की कोई चोटी दिखती है। घने जंगल में बने इस मंदिर पर पहुंच कर लगता है कि वहां से आगे कोई रास्ता नहीं है लेकिन यहां से पुराने मंदिर पर पहुंचना हो तो आप एक खड़ी चढ़ाई पार कर जा सकते हैं। अगर तंत्र-मंत्र न करना हो तो इस सुदूर वीरान जगह मंदिर बनाने का कोई कारण मुझे समझ नहीं आता। मैं यहां रात को ठहरा और मैंने इस मंदिर से लिपटी भक्ति और समर्पण की बयार महसूस की फिर भी इसे यहां क्यों स्थापित किया गया। यह सवाल मरे लिये अनसुलझा ही रहा।
अपनी हिमायल यात्रा के दौरान मैंने शिव के धनुर्धर रूप को बहुत विराट और शक्तिशाली पाया है। वह कामदेव की तरह आसक्ति के तीर बरसाते हैं और एक बार वह किसी पर्वतारोही को लग गये तो वह हमेशा यहीं का होकर रहेगा। कभी-कभी तो लगता है कि ये पर्वत भी सम्मोहित करने के लिये ऐसे तीर बरसा रहे हों। बर्फ का धवल त्रिभुजाकार शिवलिंग गंगा का मुकुट-स्रोत है लेकिन मैंने उसे हमेशा एक हिम-ज्योति की तरह देखा है। जहां भी आपको शिव मिलेंगे वहां विरोधाभासी प्रतीकों का संगम भी होगा।
फक्कड़ मनमौजी स्वभाव और अपार ऊर्जा के स्रोत भगवान शंकर की छवि बर्फ से ढकी चोटियों से मेल खाती है जबकि संयमी और गंभीर भगवान विष्णु इसके बिल्कुल विपरीत हैं जिनका दैवीय अवतार सहज-सपाट मैदानों जैसा है। हिमालयी इलाकों में रहने वाले अधिकांश लोग शैव हैं और शायद इसके पीछे एक कारण वैष्णव उपासना पद्धति से जुड़ी तमाम कठिनाइयां हैं। पहाड़ों में मज़ाक में कहा जाता है कि विष्णु के अनुयायी नहाने से और शिव के खाने से मर जाते हैं। इस विनोद का चतुर संबंध दोनों के समाजशास्त्र और तौर तरीकों से भी जुड़ा है। अगर आप पहाड़ों पर स्नान कर्म अधिक करें तो मर सकते हैं। कठोर शिवभक्त मंदिर में मिलने वाले प्रसाद से गुजारा करते हैं लेकिन कभी-कभी वह खाने लायक नहीं होता और आपको मार भी सकता है।
अनुवाद - हृदयेश जोशी


